30/12/2025
एक मित्र का प्रश्न: मैं प्रतिदिन मंत्र-जप करती हूँ। नियमित रूप से ध्यान नहीं हो पाता, लेकिन जप करते समय थोड़ा-बहुत ध्यान अपने आप हो जाता है। लगभग एक वर्ष से निरंतर जप कर रही हूँ।
पिछले कुछ दिनों से मुझे कानों में लगातार सीटी जैसी आवाज़ सुनाई दे रही है। यह आवाज़ कभी धीमी हो जाती है और कभी तेज़, लेकिन लगातार बनी रहती है। मंत्र-जप करते समय इस आवाज़ के कारण ऐसा महसूस होता है कि कानों में शक्ति बढ़ गई है और कुछ बाहर निकलने जैसा अनुभव होता है।
इसके अलावा, एक-दो बार ध्यान करते समय सहस्रार चक्र पर बहुत तीव्र ऊर्जा का अनुभव हुआ। बाद में वही ऊर्जा नीचे की ओर सरकती हुई कानों के पास से होकर आज्ञा चक्र तक आती हुई महसूस हुई।
कृपया इन अनुभवों के बारे में उचित मार्गदर्शन प्रदान करें।...................................................
मार्गदर्शन/ उत्तर
आपने अपना अनुभव बहुत साफ़ और ईमानदारी से साझा किया है। मैं इसे संयम, विवेक और संतुलन के साथ समझाने का प्रयास कर रहा हूँ।
जो अनुभव आप बता रही हैं — उनका अर्थ
1️⃣ कानों में लगातार सीटी जैसी आवाज़
साधना में इसे परंपरागत रूप से “नाद” कहा जाता है।
जब मंत्र-जप लंबे समय तक होता है तो मन भीतर की ओर सूक्ष्म होने लगता है और इंद्रियाँ भी संवेदनशील हो जाती हैं।
यह आवाज़ कभी धीमी, कभी तेज़ होना — ध्यान की गहराई बदलने का संकेत हो सकता है
जप के समय कानों में “पावर बढ़ने” या बाहर निकलने जैसा लगना — प्राण की सक्रियता का अनुभव है
👉 लेकिन एक जरूरी विवेक की बात
यदि यह आवाज़
बहुत परेशान करे
नींद में बाधा बने
सिर दर्द, घबराहट या बेचैनी दे
तो ENT डॉक्टर से सामान्य जाँच अवश्य करा लें।
आध्यात्मिक साधना और शारीरिक संतुलन — दोनों साथ चलना चाहिए।
2️⃣ ऊर्जा का सहस्रार से नीचे आना
ध्यान में सहस्रार पर तेज़ ऊर्जा और फिर उसका
कानों के पास से होते हुए आज्ञा चक्र तक आना —
यह प्राण प्रवाह का मार्ग है।
कान के पास से गुजरना इसलिए अनुभव होता है क्योंकि:
वहाँ सूक्ष्म नाड़ियाँ बहुत सक्रिय होती हैं
आज्ञा चक्र से पहले प्राण वहीं संतुलन खोजता है
यह अनुभव अपने आप में सही दिशा का संकेत है,
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अब किसी विशेष चक्र पर ज़ोर दिया जाए।
आपको अब क्या करना चाहिए (बहुत महत्वपूर्ण)
✅ 1. जप जारी रखें — पर दबाव न बनाएं
आपका जप सही चल रहा है।
ध्यान अलग से न हो पाए तो भी जप ही आपका ध्यान है — इसे स्वीकार करें।
✅ 2. किसी भी आवाज़ या ऊर्जा पर “टिकने” की कोशिश न करें
न आवाज़ को पकड़ें
न उसे बढ़ाने की इच्छा करें
न चक्रों को ऊपर-नीचे करने का प्रयास करें
👉 सिर्फ मंत्र में सहज रहें
✅ 3. सहस्रार पर ज़ोर न दें
यह बहुत आवश्यक है।
सहस्रार पर बार-बार ध्यान या ऊर्जा रोकना
मानसिक असंतुलन
बेचैनी
डर या भ्रम
दे सकता है।
यदि ऊर्जा ऊपर जाए — उसे जाने दें,
यदि नीचे आए — उसे भी जाने दें।
✅ 4. शरीर को ग्राउंड करें (बहुत ज़रूरी)
रोज़ इनमें से कुछ करें:
सुबह 10–15 मिनट नंगे पैर धरती पर चलना
हल्का भोजन
दिन में 1–2 बार गुनगुना पानी
साधना के बाद थोड़ी देर सामान्य काम (झाड़ू, बर्तन, पौधों को पानी)
यह ऊर्जा को संतुलित रखेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात 🙏
आप जो अनुभव कर रही हैं वह
न कोई सिद्धि है
न कोई लक्ष्य
यह केवल रास्ते के संकेत हैं।
सच्ची साधना में:
अनुभव आते हैं —
और साधक उनसे चिपकता नहीं।
आपका मार्ग सही है,
बस संयम, सहजता और विवेक बनाए रखें।
यदि आगे
डर
बेचैनी
नींद की समस्या
अत्यधिक संवेदनशीलता
महसूस हो — तो बताना
मैं उसी अनुसार अगला मार्गदर्शन दूँगा 🙏