27/06/2020
बुद्ध के ऊपर एक आदमी थूक गया , तो बुद्ध ने थूक पोंछ लिया अपनी चादर से । वह आदमी बहुत नाराज था । बुद्ध के ऊपर थूका तो बुद्ध के शिष्य भी बहुत नाराज हो गए । लेकिन जब वह आदमी चला गया , तो आनंद ने पूछा कि यह बात बहुत सीमा के बाहर हो गयी । और सहिष्णुता का यह अर्थ नहीं है । और इस तरह तो लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा । और हमारे हृदय में आग जल रही है । आप का अपमान हम बर्दाश्त नहीं कर सकते । बुद्ध ने कहा , तुम व्यर्थ ही उत्तेजित मत होओ । यह तुम्हारा उत्तेजित होना , तुम्हारे कर्म की श्रृंखला बन जाएगी । मैंने इसे कभी दुख दिया था , वह निपटारा हो गया । मैंने कभी इसका अपमान किया था , वह लेना - देना चुक गया । इस आदमी के लिए ही मैं इस गांव में आया था । यह न थकता तो मेरी मुसीबत थी । अब सुलझाव हो गया । इससे मेरा खाता बंद हो गया । अब मैं मुक्त हो गया । यह आदमी मुझे मुक्त कर गया है , मेरे ही किसी कृत्य से । इसलिए मैं धन्यवाद करता हूँ उसका । और तुम नाहक उत्तेजित मत हो । क्योंकि तुम्हारा तो कुछ लेना - देना नहीं है इसमें । लेकिन अगर तुम उत्तेजित होते हो और तुम उस आदमी के खिलाफ कुछ करते हो , तो तुम एक नयी श्रृंखला बना रहे हो । मेरी श्रृंखला तो टूटी और तुम्हारी व्यर्थ बन गयी । तुम बीच में क्यों आते हो ? जिन्हें मैंने दुख दिया है , उनसे मुझे उत्तर लेना ही पड़ेगा । और मेरी परिपूर्ण समाप्ति के पूर्व — जिसको वे महापरिनिर्वाण कहते हैं इसके पहले कि मैं अनंत में पूरी तरह लीन हो जाऊं ; व्यक्तियों से , वस्तुओं से , संबंधों में , क्रोध में , अपमान में , घृणा में , मोह में , लोभ में , जो भी नाते - रिश्ते बने हैं , उन सबकी निर्जरा हो जानी जरूरी है । उसको ही हम परममुक्त पुरुष कहते हैं , जिसके सारे कर्मों की निर्जरा हो गयी । तो एक तो ध्यान रखना कि अतीत में जो किया है , उसे शांत भाव से , संतोष से , परम तृप्ति से , निपटारा समझ कर , प्रसन्नता से पूरा हो जाने देना । नयी श्रृंखला खड़ी मत करना । तो अतीत से संबंध धीरे - धीरे शांत हो जाता है । और दूसरी बात है कि नया कुछ मत करना दूसरे को दुख देने के लिए । अन्यथा फिर तुम बंधे हुए चले आओगे । हम अपने ही भीतर अपनी जंजीरों को ढालते हैं । तो पुरानी जंजीरों को तोड़ना है और नयी बनानी नहीं । ये दो बातें खयाल रखना । महावीर के दो शब्द बड़े प्रिय है । एक शब्द है आस्तव , और एक है निर्जरा । आस्रव का अर्थ है , नए को आने मत देना । और निर्जरा का अर्थ है , पुराने को गिर जाने देना । धीरे - धीरे एक ऐसी घड़ी आएगी कि पुराना कुछ बचेगा नहीं , नया कुछ होगा नहीं , तुम मुक्त हो गए । और जब वैसी दशा आती है तब परम आनंद फलित होता है । जय बुद्ध 🙏🙏🙏