24/03/2021
एक महामानव की महासमाधि
एक महामानव की महासमाधि
अपने जीवन काल में हमने बहुत सी आध्यात्मिक हस्तियों को अपना शरीर छोड़ते देखा-सुना. परन्तु यहाँ मैं एक ऐसे महामानव के इस जीवन के अंतिम समय की चर्चा करूंगा जो पठनीय और चकित कर देने वाली है.
मेरे परमपूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यानंदजी, (१९२३-२००९) उन आध्यात्मिक हस्तियों में थे, जिन्होंने आत्मप्रचार अथवा राजनीतिक संरक्षण के लिए कभी कोई प्रयास नहीं किया. उनका जीवनकाल साफ़-साफ़ दो भागों में विभाजित था. पहला, -अपने गुरु स्वामी शिवानंदजी के आदेशानुसार योग विद्या का सन्देश पूरे विश्व में और घर-घर में पहुँचाना, इसके लिए विश्वभर में समर्पित योग प्रशिक्षकों को तैयार करने के लिए उन्होंने बिहार के मुंगेर में उन्होंने ‘बिहार योग विद्यालय’ की स्थापना किया, और अपने जीवन के दूसरे अध्याय के क्रियान्वयन के लिए इस संस्था को स्वामी निरंजनानन्द जी को १९८८ में सौंप कर मात्र एक जोड़ी गेरू वस्त्र और अपने गुरूजी द्वारा प्रदत्त १०८ रूपये लेकर मुंगेर को सदा के लिए छोड़ दिया, और संकल्पानुसार, वे दुबारा वहां कभी नहीं गए, यहाँ तक कि देश के महामहिम राष्ट्रपति जी के उक्त संस्था में आगमन के समय भी.
अपने जीवन के दूसरे अध्याय की सम्पूर्ति हेतु वह २३ सितम्बर १९८९ को देवघर के पास ग्राम रिखिया आये. यहाँ आने का प्रारम्भिक प्रयोजन तो उच्चस्तरीय साधना थी, लेकिन आस-पास की आर्थिक और सामाजिक स्थिति, उन्हें द्रवित करने के लिए पर्याप्त थी. उन्होंने उस ग्रामीण क्षेत्र के निर्धन और साधनविहीन निवासियों के लिए जो कुछ स्थायी व्यवस्था किया l उन्होंने दस वर्षों तक प्रतिवर्ष छः माह तक प्रचंड ग्रीष्मकाल में चलने वाली साधना ‘पंचाग्नि तप’ एकदम शास्त्रोक्त विधि से संपन्न किया. बताते हैं कि इस साधना को कलियुग में भगवान् रामकृष्ण की विवाहिता एवं आराध्य, माँ शारदा जीके बाद किसी ने नहीं किया था.
इस साधना में, मकर संक्रांति (१४ जनवरी) से कर्क संक्रांति (१४ जुलाई) की अवधि में प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक साधक के चारो दिशा में निर्मित, एक-एक अग्निकुंड में, साधक द्वारा स्वयं आहुतियाँ देकर पूरे समय अपने मंत्रोच्चारण के साथ साथ, अग्नि को प्रज्वलित रखा जाता है. धरती पर निर्मित इन चार अग्निकुंड और आकाश में तपते सूर्यदेव को मिलाकर इस साधना को पंचाग्नि-तप कहा जाता है. (इस अवधि में प्रायः निर्जलन की सम्भावना रहती है, और कई साधक बीच में ही छोड़ देते हैं.)
इसी पंचाग्नि तप के वर्षों में श्रीस्वामीजी ने एक बार कहा था- “मैं नहीं चाहता कि मेरा देहावसान अस्पताल में, चेलों से घिरे हुए, मुहं-नाक में ट्यूब डाले हुए हो. मेरी बस यही कामना है कि देह छोड़ते समय मेरे ह्रदय में भगवान शिव का वास हो, और होठों पर देवी माँ का नाम हो.”
उन्होंने अपने अन्य सत्संग में कहा था कि वे ऊपर से ‘रिटर्न टिकट’ आने का इंतज़ार कर रहे है. उन्होंने ‘रिटर्न टिकट’ को समझाया था, जिसका आशय यह था कि वे यहाँ से जाने के बाद “वहां” से परम विद्याएँ प्राप्त करके फिर किसी साधनविहीन निर्धन परिवार में जन्म लेना चाहेंगे, ताकि वे अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों का लाभ उस दलित समुदाय को दे सकें.
और उनकी यह इच्छामृत्यु, उन्हें ५-६ दिसंबर २००९ की रात्रि में प्राप्त हुयी. शाम तक एकदम सामान्य थे, रात १० बजे के आसपास उन्होंने अपनी वरिष्ठतम शिष्या और रिखिया आश्रम की उत्तराधिकारी स्वामी सत्संगीजी को अपने कक्ष में बुलवाया और बताया कि उनके जाने का समय हो गया है. उनके मुख में उनके पूर्व निर्देशानुसार, गंगाजल और तुलसी-दल रखा गया. वे पद्मासन में थे, वे हाथ जोड़ कर ऊपर देखते हुए बोले -“प्रभु मैं आ रहा हूँ”. इसके बाद लम्बी श्वांस लेकर ॐ का उच्चारण करते हुए, उन्होंने अंतिम श्वांस छोड़ा.
मेरा सौभाग्य था कि मै क्रिया-योग कोर्स के लिए, उस रात को आश्रम में ही था, लेकिन हमें सबेरे इस सब का संज्ञान हुआ. सारे दिन रोते-बिलखते हजारों ग्रामीणों का मेला लगा रहा, दिन में पद्मासन में बैठे हुए उनके देह का दर्शन हुआ. उनकी इच्छानुसार ही, शाम को उन्हें उसी स्थान के निकट ही समाधि दी गयी, जहाँ उन्होंने पंचाग्नि तप किया था. ऐसा था उस महामानव के शरीर का अंतिम दर्शन. परन्तु उनके देहत्याग के ६ साल बाद भी बिलकुल नहीं प्रतीत होता कि वे नहीं हैं. सबकुछ वैसे ही चल रहा है, मानों वे स्वयं सब संचालन कर रहे हैं.
ऊपर के फोटो में श्रीस्वामीजी का पार्थिव शरीर एक छोटे से टेबल पर ठीक उस स्थान पर पद्मासन में बैठा है, जहाँ बैठकर उन्होंने पंचाग्नि तप किया था. ध्यान से देखिये, किसी तरफ से कोई सपोर्ट के बिना भी शरीर स्थिर है. बिल्बपत्र से उनका माथा ढका हुआ है, उनका प्राण (सूक्ष्म शरीर) उनके सहस्रार से होकर बाहर आया था, और माथे के अग्रभाग में एक हलकी सी दरार बन गयी थी. ऐसी मृत्यु बिरलों को ही मिलती है. रिखिया आश्रम अब उनके भक्तों और स्थानीय लोगों के लिए एक तीर्थ बन चुका है.
Ek Yogi ki kalam se...
Om