Yog Sadhan Ashram Bani

Yog Sadhan Ashram Bani ॐ नमः श्री राम लाल प्रभु जी परब्रह्मणे नमः !!

"योग दान गुरु ने दिया,जो सव सुखों की खान।तीन लोक की संपदा, नहीं योग समान"।योग एक ऐसा उपहार है जो हम सभी जीवों को भगवान  ...
06/04/2026

"योग दान गुरु ने दिया,जो सव सुखों की खान।
तीन लोक की संपदा, नहीं योग समान"।

योग एक ऐसा उपहार है जो हम सभी जीवों को भगवान ने स्वयंम दिया है ताकि इस जीवन को योग युक्त करके प्रसन्नचित ओर सन्तोषजनक वनाते हुए भगवान कि इस सृष्टि को खूबसूरत वनाने में अपना अपना सहयोग दें।योग ही केवल ऐसी विधि ,विद्या, सम्पति है जिसके समान कोई भी ओर विकल्प नहीं है।यह सारा तथ्य भगवान ने समय समय पर अवतरित हो कर चरितार्थ किया है। श्री सदगुरुदेव जी ने अपना सारा जीवन यही समझाने में समर्पित
कर दिया। योगयुक्त जीवन से हम अपने इस जीवन रुपी सफर को आनंदमय वना कर समस्त संसार को खुशहाल वनाने में अपना योगदान सुनिश्चित करने में समर्थ हो पाऐंगे।यह एक सर्वोच्च दान है।यही सन्तुष्ट, सुखी जीवन का आधार है।इसका दृढ़तापूर्वक पालन करना हम सभी का लक्ष्य होना चाहिए। यही इस जीवन की सचाई है।

सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वे सन्तु निरामयय।
सर्वे भद्राणी पशुयन्तु मा कशिचंददुख भाग भवेत।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"।

"महिमा सदगुरुदेव की मुख से कही न जाए।   अल्प मति है दास की गुरु गुण कहां समाय" उपरोक्त शव्द इस जीवन रुपी सफर के आधार हैं...
03/04/2026

"महिमा सदगुरुदेव की मुख से कही न जाए।
अल्प मति है दास की गुरु गुण कहां समाय"

उपरोक्त शव्द इस जीवन रुपी सफर के आधार हैं।इसे सुगमता से जानने के लिए हमें अवलोकन करना होगा जीवन की चारों अवस्थाओं का,हम पाएंगे कि केवल एक गुरु ही इस जीवन का पका व स्थाई सहारा है।जीवन में गुरु की महता को समझे वगैर जीवन के लक्ष्य को हासिल करने वारे सोचना भी मुमकिन नहीं अथवा गुरू ही एक माध्यम है जो हमें केवल लक्ष्य का ही एहसास नहीं करवाते अपितु लक्ष्य को पाने में सामर्थवाहन वनाते हैं। इस वास्तविकता को जानने वाला जीव ही लोक परलोक को में सुखी व सन्तुष्ट रह सकता है।यही हमारे जीवन की सचाई है।यह सब जानने पर सम्पूर्ण जीवन आनंदित व हल्का, फुल्का हो जाता है।

सर्वे भवन्तु सखिना ,सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्राणी पशुयनतु मा कशिचंददुख भाग भवेत।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"

"राम ,कृष्ण से कोउ वढा,तिनहें भी गुरु कीन।तीन लोक के वे धनी,गुरु आगे अधीन"।।उपरोक्त  पंक्तियाँ  दर्शाती हैं कि हमारे जीव...
21/03/2026

"राम ,कृष्ण से कोउ वढा,तिनहें भी गुरु कीन।
तीन लोक के वे धनी,गुरु आगे अधीन"।।

उपरोक्त पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि हमारे जीवन में गुरु का महत्व क्या है।इस तथ्य को समझाने के लिए अपार शक्ति ने साक्षात मानव रुप में अवतरित हो कर आम जन मानस का मार्ग दर्शन करते हुए यह स्पष्ट किया कि गुरु के विना हम में से किसी का भी जीवन सार्थक नहीं हो सकता।दूसरे पहलु के अनुसार भी अगर अवलोकन/मंथन करें वचपन,जवानी और वुढापा तो भी आसानी से यह ही निष्कर्ष निकलता है कि इस जीवन रुपी सफर में कदम कदम पर मार्ग दर्शक की आवश्यकता है। अर्थात गुरु के विना यह सफर सन्तोषजनक नहीं हो सकता है तथा इसके लक्ष्य पूर्ति की तो हम सोच भी नहीं सकते।जीवन के हर कदम,हर पल,हर मोड पर सहारा / मार्ग दर्शक/गुरु की नितांत आवशयकता होती है।आज सबसे बडा प्रश्न वास्तविक गुरु को कैसे पहचाना जाए।
"सद्गगुरु"
तीन ताप,पांच तत्व के बन्धन से मुक्त हुआ श्री सत स्वरुप, अपार अविनाशी में अभेद पद को प्राप्त हुआ योगी, जो तीन ऋण,ताप दोष आदि से अज्ञान दुख सागर में गोते खाने वाले जीव को निकालने या अपने वास्तविक दिव्य आत्म अपार सुख की प्राप्ति कराने में सामर्थवाहन हो सदगुरु कहलाता है।

"गुरु सुरज सम होत है,योगी गुरु जो होय।
योग विना जो गुरु भय,वुझे दीप सम सोय"।।

अर्थात योगी गुरु ही वास्तविक गुरु है।योगी गुरु के मार्ग दर्शन में जीवन लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

"सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय।
सर्वे भद्राणी पशुयंतु मा कशिचददुख भाग भवेत"।।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"

"  योग मार्ग  श्री कृष्ण  का  ,राम का मार्ग  योग।    शिव ने योग अपनाया,सन्मार्ग  है योग"।।श्री प्रभु जी ने पुनः  समझा कर...
20/03/2026

" योग मार्ग श्री कृष्ण का ,राम का मार्ग योग।
शिव ने योग अपनाया,सन्मार्ग है योग"।।

श्री प्रभु जी ने पुनः समझा कर और स्वयंम करवा कर योग का उद्धार किया। यही सनातन की वास्तविकता है।

इस सृष्टि में योग मार्ग ही एक मात्र सन्मार्ग है।जिसको स्वयंम उस पार ब्रह्म शक्ति ने समय समय पर अर्थात सत युग, त्रेता, द्वापर और कल युग में अवतार रुप में/ by mean of incarnation आ कर समझाया की यही एक सन्मार्ग है जो कि मानव को इस संसारिक यात्रा के लक्ष्य को हासिल कराता है। इस तथ्य के दृष्टिगत एक चित हो कर योगयुक्त जीवन को अपना कर हम सव अपनी अपनी यात्रा को सन्तोषजनक तह करते हुए लोक, परलोक की यात्रा को सफल कर सकते हैं।जैसे कि स्वयंम उस परम शक्ति ने इस सृष्टि में आ कर चरितार्थ किया है।निसंदेह इसके लिए योगी सदगुरु की शरण में जाना पाढेगा,क्यूंकि यह संसार भव सागर है,जो कि विन सहारे पार नहीं किया जा सकता।यह ठीक वैसे ही है जैसे कि एक विद्यार्थी केवल पुस्तक पढ कर सफल नहीं हो सकता जब तक अध्यापक कि शरण में नहीं जाता। इसका विमोचन करने पर यह आदिकाल से ही प्रमाणित है।इसलिए योग मार्ग ही सन्मार्ग है जिसपर चल कर हम में से कोई भी जीवन लक्ष्य को पा सकता है।

"सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणी पशुयंतु मा कशिचददुखः भाग भवेत"।।

"जय श्री प्रभु जी की जी"

"मिले योग न गुरु बिना,बह्म  का भय न भान।चित एकाग्र  न भये,निश्चय से लो जान"।।उपरोक्त  शव्द  तो इस जीवन रुपी संसारिक  यात...
19/03/2026

"मिले योग न गुरु बिना,बह्म का भय न भान।
चित एकाग्र न भये,निश्चय से लो जान"।।

उपरोक्त शव्द तो इस जीवन रुपी संसारिक यात्रा का मूल हैं।यह तो स्वयं भगवान ने हम सभी जीवों के कल्याणार्थ समय समय पर चरितार्थ किया है।यह इसलिए करना पढा क्यूंकि सभी जीवों का स्वाभाव भूलना है इसलिए भगवान ने उपरोक्त तथ्य को हमारे समक्ष स्थापित किया है। इसके अनुसार योगयुक्त जीवन के लिए योगी सदगुरू के विना मुमकिन नहीं है। उनके मार्ग दर्शन के विना हम में से कोई भी उस अपार शक्ति को नहीं पा सकता। अर्थात योगयुक्त जीवन शैली के बिना उस अपार शक्ति का एहसास नहीं हो सकता और एहसास बिना चित एकाग्र नहीं हो सकता तथा चित की एकाग्रता के बिना कोई भी इस महान यात्रा का लक्ष्य मोक्ष/ मुक्ति / निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता। यह सारा रहस्य हमारे समक्ष स्वयं प्रभु जी ने रखा है।अर्थात योग की त्रिवेणी ही हमें जीवन लक्ष्य हासिल करवा सकती है। योग त्रिवेणी से ही तन,मन और वुधि का विकास हो सकता है।

"सर्वे भवन्तु सुखिनाः,सर्वे सन्तु निरामय।
सर्वे भद्रराणि पशुयंतु मा कशिचददुख:भाग भवेत"।।

जय श्री प्रभु जी की जी।

"शुद्ध  करे जो देह को,स्वस्थ  रहे वह पुरुष।स्वस्थ  पुरुष ही कर सके,सभी योग अभ्यास"।।               उपरोक्त  का तात्पर्य ...
15/03/2026

"शुद्ध करे जो देह को,स्वस्थ रहे वह पुरुष।
स्वस्थ पुरुष ही कर सके,सभी योग अभ्यास"।।

उपरोक्त का तात्पर्य तन,मन और वुधि से है।

योगयुक्त जीवन शैली में सर्वप्रथम देह/तन की शुद्धी की क्रियाओं द्वारा करने का उल्लेख है।जिसमें षट कर्म, प्राणायाम, आसन तथा मुद्राओं का अभ्यास क्रमानुसार करने से देह की शुद्धी,मजबूती व दृढता आदिकाल से प्रमाणित है।

तत्पश्चात मन की शुद्धी यम,नियम को अपने जीवन में अभिन अंग धार कर उनका योग निषठता से पालन करने से है।इसका आधार हर कसोटी पर सचाई तथा सफाई से है।

वुधि की शुद्धी के लिए ऋषी कृत् ग्रन्थों के स्वाध्याय से है ।जिसमें श्री मद भगवत गीता का आलौकिक स्थान है,हम सव इस को अच्छी तरह से समझ सकें इसे सदगुरुदेव जी ने बहुत ही सरल रुप में सभी जिज्ञासाओं के हितानुसार श्री योग महा दिव्य रामायण के प्रारुप में लिखा है।इसका स्वाध्याय करके मन की शुद्धि कर सकते हैं।इन सबका संगम योग त्रिवेणी कहा जाता है।

इसी क्रम के अनुसार योग में योग त्रिवेणी की विशेष उपमा है।यह सब आदिकाल से यानि जव से सृष्टि बनी है तव से ही प्रमाणित है। यह सब पाने के लिए एक मार्ग दर्शक/योगी गुरु कि नितांत आवश्यकता है।तभी इसका प्रमाणित लाभ हासिल किया जा सकता है।

सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु नीरामय।
सर्वे भद्राणी पशुयंतु मा कशिचददु:ख भाग भवेत।।

"जय श्री प्रभु जी की जी"

"ज्ञान समुद्र  है परम, विस्तृत  मेरे तात।पार न इसका पा सके,निश्चित  है यह  बात"।।योग ही ऐसी विद्या है/ योग ही एक माध्यम ...
13/03/2026

"ज्ञान समुद्र है परम, विस्तृत मेरे तात।
पार न इसका पा सके,निश्चित है यह बात"।।

योग ही ऐसी विद्या है/ योग ही एक माध्यम है जो हमें इस जीवन रुपी यात्रा के लक्ष्य,मानव जीवन का कारण अथवा इस यात्रा का उद्देश्य व यात्रा पूरी होने के उपरान्त कहां जाना है। उपरोक्त सव विषयों का समग्र ज्ञान प्राप्त कराता है।
"योग का आधार"। योग का आधार सत्य है।इस सिद्धांत पर चलने वाला योगी संकल्प सिद्ध हो जाता है,तत्पश्चात वाक सिद्ध तथा वर देने का सामर्थवाहन होता है।
"मन का विज्ञान "
मन मन का साक्षी है।
हिंसा हिंसा को उपजाती है।
दया दया को प्रकटता है।
यह सब जानने,समझने व प्रमाणित करने के लिए श्री सदगुरुदेव जी ने अपना पूरी जीवन यात्रा हम सव जन मानस के लिए समर्पित कर दिया,समस्त जनों का कल्याण केवल योगयुक्त जीवन शैली से ही हैऔर यही जीवन की वास्तविकता है।

सर्वे सर्भवन्तु सुखिनां,सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणी पश्यंतु मा कशिचददु:ख भाग भवेत।।


"जय श्री प्रभु जी की जी"


..

भोग योनि उस जीव की, मानव से जो भिन्न। रत मानव जो भोग में,विधना उस से खिन्न"।।        वहुत ही गहन/सघन विषय है। जैसा कि सर...
11/03/2026

भोग योनि उस जीव की, मानव से जो भिन्न।
रत मानव जो भोग में,विधना उस से खिन्न"।।

वहुत ही गहन/सघन विषय है। जैसा कि सर्व विदित है कि इस सृष्टि के मालिक ने यह ऐसी रचना रची है कि इसमें असंख्य सुन्दर से सुन्दर जीवों का संग्रह है। इसमें मानव सहित सभी जीव इस जीवन यापन यात्रा में लगे रहते हैं।उपरोक्त कथन बढी सरलता/ स्पष्टता से उजागर कर्ता है कि मानव से भिन्न जितने भी जीव हैं सभी की भोग योनि है तथा जो मानव योनि में आ कर भी दूसरे जीवों की तरह केवल भोग में ही रत रहता है अर्थात इस मानव योनि के लक्ष्य को भ्रमित होकर भूल जाता है उससे विधाता /सृषटि के रचियाता रुष्ट होते हैं। मानव जीवन का लक्ष्य केवल मात्र निर्वाण/ मोक्ष है।यह लक्ष्य केवल योगी सदगुरु की शरण में ही पाया जा सकता है जो कि आदिकाल से हमारे पूर्वजों/ऋषियों द्वारा प्रमाणित है। श्री सदगुरुदेव जी नेअपने जीवनकाल में इस तथ्य को मानव कल्याण हेतु चरितार्थ किया है जो कि हम सभी अपनीजीवन शैली को वदल कर केवल योग युक्त जीवन शैली से ही हासिल कर सकते हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिना:सर्वे सन्तु निरामय:।
सर्वे भद्रा इ पश्यंतु
मा कशिचददुख भाग भवेत।।

"जय श्री प्रभु जी की जी"।

"जगत विधाता  ने रचा,भोग व  मुक्ति हेत।मानव को इस जन्म  में,हो मुक्ती अभिप्रेत"।।ईश्वर ,विधाता,परमात्मा उस परम शक्ति के अ...
10/03/2026

"जगत विधाता ने रचा,भोग व मुक्ति हेत।
मानव को इस जन्म में,हो मुक्ती अभिप्रेत"।।

ईश्वर ,विधाता,परमात्मा उस परम शक्ति के असंख्य नाम हैं जिसने सारा जगत रचा है।इस जगत का सारा अभिप्राय भोग विलास मुक्ति है।मानव जन्म के अतिरिक्त सब जीव,जन्तु केवल मात्र इस जगत में केवल भोग के लिए हीआऐ हैं। मनुष्य जन्म का लक्ष्य मोक्ष है। यह सारा जगत भोग के कारणवश अनेकों कर्म कर्ता है जिसमें पाप,पण्य अच्छे, बुरे सव आते हैं तथा उन कर्मो के अनुसार यह सारा जन्म, मरण का चक्र चलता रहता है।मानव जन्म मिलने के उपरान्त भी हम ईस जन्म के लक्ष्य को भूल कर चौरासी के ही चक्र में पढ कर उलझे रहते हैं। इन सव उलझनों/ अविद्या से वचने के लिए योग मार्ग दर्शक / योगी सदगुरु की आवश्यकता होती है ताकि हम योगाअनुकूल जीवन यापन करते हुए अपने उस लक्ष्य को हासिल करने में सामर्थवाहन हों।श्री सदगुरुदेव जी ने अपना जीवन इस महान यज्ञ के लिए समर्पित कर दिया। उनके लिए सच्चे श्रदा, सुमन केवल योगयुक्त जीवन ही है।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"

"जो जन्मा  इस जगत में ,पडे अविद्या  कूप।इससे निकासी सदगुरु,जो योगिन के भूप"।।उपरोक्त  शब्दों  में इस जीवन रुपी सफर की वा...
09/03/2026

"जो जन्मा इस जगत में ,पडे अविद्या कूप।
इससे निकासी सदगुरु,जो योगिन के भूप"।।

उपरोक्त शब्दों में इस जीवन रुपी सफर की वास्तविकता की अनुभूति मिलती है। यहां यह जानना आवश्यक है कि अविद्या ऐसी क्या शक्ति है जिस कारण हम सभी जीव नर्क के कुएं में पढने के लिए विवश हैं।इस विषय को हम ऐसे समझ सकते हैं कि अविद्या एक ऐसी शक्ति है जो आदिकाल/ सृष्टि वनने के साथ से ही विद्यमान है। इसे लौकिक/ संसारिक दृष्टि से ऐसे जान सकते हैं कि यह संसार उस घनघोर अन्धेरे तुल्य है जिसमें कुछ भी जव तक नहीं दिखाई देता तव तक रोशनी की व्यवस्था नहीं होती। ऐसे ही हमारे जीवन रुपी सफर है जिसमें अन्धेरे के कारण वश हम सभी इस सफर के लक्ष्य को पाने में तव तक असमर्थ/ निस्सहाय हैं जव तक कोई प्रकाश की व्यवस्था नहीं हो पाती। यही इस यात्रा की वास्तविकता है कि इसके लक्ष्य को पाने के लिए योगी सदगुरु की व्यवस्था करनी होगी तभी हम इस अविद्या के चंगुल से वाहर निकल कर लक्ष्य को पाने में सामर्थवाहन हो सकते हैं।क्यूंकि अविद्या के कारण ही दृश्य और दृष्टा का संयोग होता है और संयोग ही बन्धन का कारण है।यह सव इसलिए होता है कि यह खूबसूरत सृष्टि प्रभु ने वनाइ है,हम सभी उस घनघोर अन्धेरे के कारण वास्तविकता से अनभिज्ञ रहते हैं तथा क्षणिक सुख के लिए उसे हासिल करने के लिए अचछे,बुरे कर्म करते हैं परिणाम स्वरूप आवागमन में ही रहते हैं जब तक प्रकाश की व्यवस्था करने वाले योगी की शरण में नहीं पहुंचते ,इसी सचाई को जानते हुए योग युक्त जीवन ,योगी सदगुरु की शरण पाने से ही इस अविद्या आदि शक्ति के बन्धन से मुक्त हो कर लक्ष्य को पा सकते हैं।

सभी प्रभु भक्तों से अनुरोध है कि अपने जीवन के सफर यानि जीवन शैली को यम नियम का अनुसरण दृढ़तापूर्वक करते हुए लक्ष्य की ओर अभ्यास रत रहें तभी इस आवागमन से मुक्त हो सकते हैं। इसी मनोकामना के साथ सभी को वन्दन जी।

" जय श्री प्रभु जी की जी"

Address

Khadwana, Bani
Dehra Gopipur
177108

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Yog Sadhan Ashram Bani posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share