Yog Sadhan Ashram Bani

Yog Sadhan Ashram Bani ॐ नमः श्री राम लाल प्रभु जी परब्रह्मणे नमः !!

"ज्ञान समुद्र  है परम, विस्तृत  मेरे तात।पार न इसका पा सके,निश्चित  है यह  बात"।।योग ही ऐसी विद्या है/ योग ही एक माध्यम ...
13/03/2026

"ज्ञान समुद्र है परम, विस्तृत मेरे तात।
पार न इसका पा सके,निश्चित है यह बात"।।

योग ही ऐसी विद्या है/ योग ही एक माध्यम है जो हमें इस जीवन रुपी यात्रा के लक्ष्य,मानव जीवन का कारण अथवा इस यात्रा का उद्देश्य व यात्रा पूरी होने के उपरान्त कहां जाना है। उपरोक्त सव विषयों का समग्र ज्ञान प्राप्त कराता है।
"योग का आधार"। योग का आधार सत्य है।इस सिद्धांत पर चलने वाला योगी संकल्प सिद्ध हो जाता है,तत्पश्चात वाक सिद्ध तथा वर देने का सामर्थवाहन होता है।
"मन का विज्ञान "
मन मन का साक्षी है।
हिंसा हिंसा को उपजाती है।
दया दया को प्रकटता है।
यह सब जानने,समझने व प्रमाणित करने के लिए श्री सदगुरुदेव जी ने अपना पूरी जीवन यात्रा हम सव जन मानस के लिए समर्पित कर दिया,समस्त जनों का कल्याण केवल योगयुक्त जीवन शैली से ही हैऔर यही जीवन की वास्तविकता है।

सर्वे सर्भवन्तु सुखिनां,सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणी पश्यंतु मा कशिचददु:ख भाग भवेत।।


"जय श्री प्रभु जी की जी"


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भोग योनि उस जीव की, मानव से जो भिन्न। रत मानव जो भोग में,विधना उस से खिन्न"।।        वहुत ही गहन/सघन विषय है। जैसा कि सर...
11/03/2026

भोग योनि उस जीव की, मानव से जो भिन्न।
रत मानव जो भोग में,विधना उस से खिन्न"।।

वहुत ही गहन/सघन विषय है। जैसा कि सर्व विदित है कि इस सृष्टि के मालिक ने यह ऐसी रचना रची है कि इसमें असंख्य सुन्दर से सुन्दर जीवों का संग्रह है। इसमें मानव सहित सभी जीव इस जीवन यापन यात्रा में लगे रहते हैं।उपरोक्त कथन बढी सरलता/ स्पष्टता से उजागर कर्ता है कि मानव से भिन्न जितने भी जीव हैं सभी की भोग योनि है तथा जो मानव योनि में आ कर भी दूसरे जीवों की तरह केवल भोग में ही रत रहता है अर्थात इस मानव योनि के लक्ष्य को भ्रमित होकर भूल जाता है उससे विधाता /सृषटि के रचियाता रुष्ट होते हैं। मानव जीवन का लक्ष्य केवल मात्र निर्वाण/ मोक्ष है।यह लक्ष्य केवल योगी सदगुरु की शरण में ही पाया जा सकता है जो कि आदिकाल से हमारे पूर्वजों/ऋषियों द्वारा प्रमाणित है। श्री सदगुरुदेव जी नेअपने जीवनकाल में इस तथ्य को मानव कल्याण हेतु चरितार्थ किया है जो कि हम सभी अपनीजीवन शैली को वदल कर केवल योग युक्त जीवन शैली से ही हासिल कर सकते हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिना:सर्वे सन्तु निरामय:।
सर्वे भद्रा इ पश्यंतु
मा कशिचददुख भाग भवेत।।

"जय श्री प्रभु जी की जी"।

"जगत विधाता  ने रचा,भोग व  मुक्ति हेत।मानव को इस जन्म  में,हो मुक्ती अभिप्रेत"।।ईश्वर ,विधाता,परमात्मा उस परम शक्ति के अ...
10/03/2026

"जगत विधाता ने रचा,भोग व मुक्ति हेत।
मानव को इस जन्म में,हो मुक्ती अभिप्रेत"।।

ईश्वर ,विधाता,परमात्मा उस परम शक्ति के असंख्य नाम हैं जिसने सारा जगत रचा है।इस जगत का सारा अभिप्राय भोग विलास मुक्ति है।मानव जन्म के अतिरिक्त सब जीव,जन्तु केवल मात्र इस जगत में केवल भोग के लिए हीआऐ हैं। मनुष्य जन्म का लक्ष्य मोक्ष है। यह सारा जगत भोग के कारणवश अनेकों कर्म कर्ता है जिसमें पाप,पण्य अच्छे, बुरे सव आते हैं तथा उन कर्मो के अनुसार यह सारा जन्म, मरण का चक्र चलता रहता है।मानव जन्म मिलने के उपरान्त भी हम ईस जन्म के लक्ष्य को भूल कर चौरासी के ही चक्र में पढ कर उलझे रहते हैं। इन सव उलझनों/ अविद्या से वचने के लिए योग मार्ग दर्शक / योगी सदगुरु की आवश्यकता होती है ताकि हम योगाअनुकूल जीवन यापन करते हुए अपने उस लक्ष्य को हासिल करने में सामर्थवाहन हों।श्री सदगुरुदेव जी ने अपना जीवन इस महान यज्ञ के लिए समर्पित कर दिया। उनके लिए सच्चे श्रदा, सुमन केवल योगयुक्त जीवन ही है।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"

"जो जन्मा  इस जगत में ,पडे अविद्या  कूप।इससे निकासी सदगुरु,जो योगिन के भूप"।।उपरोक्त  शब्दों  में इस जीवन रुपी सफर की वा...
09/03/2026

"जो जन्मा इस जगत में ,पडे अविद्या कूप।
इससे निकासी सदगुरु,जो योगिन के भूप"।।

उपरोक्त शब्दों में इस जीवन रुपी सफर की वास्तविकता की अनुभूति मिलती है। यहां यह जानना आवश्यक है कि अविद्या ऐसी क्या शक्ति है जिस कारण हम सभी जीव नर्क के कुएं में पढने के लिए विवश हैं।इस विषय को हम ऐसे समझ सकते हैं कि अविद्या एक ऐसी शक्ति है जो आदिकाल/ सृष्टि वनने के साथ से ही विद्यमान है। इसे लौकिक/ संसारिक दृष्टि से ऐसे जान सकते हैं कि यह संसार उस घनघोर अन्धेरे तुल्य है जिसमें कुछ भी जव तक नहीं दिखाई देता तव तक रोशनी की व्यवस्था नहीं होती। ऐसे ही हमारे जीवन रुपी सफर है जिसमें अन्धेरे के कारण वश हम सभी इस सफर के लक्ष्य को पाने में तव तक असमर्थ/ निस्सहाय हैं जव तक कोई प्रकाश की व्यवस्था नहीं हो पाती। यही इस यात्रा की वास्तविकता है कि इसके लक्ष्य को पाने के लिए योगी सदगुरु की व्यवस्था करनी होगी तभी हम इस अविद्या के चंगुल से वाहर निकल कर लक्ष्य को पाने में सामर्थवाहन हो सकते हैं।क्यूंकि अविद्या के कारण ही दृश्य और दृष्टा का संयोग होता है और संयोग ही बन्धन का कारण है।यह सव इसलिए होता है कि यह खूबसूरत सृष्टि प्रभु ने वनाइ है,हम सभी उस घनघोर अन्धेरे के कारण वास्तविकता से अनभिज्ञ रहते हैं तथा क्षणिक सुख के लिए उसे हासिल करने के लिए अचछे,बुरे कर्म करते हैं परिणाम स्वरूप आवागमन में ही रहते हैं जब तक प्रकाश की व्यवस्था करने वाले योगी की शरण में नहीं पहुंचते ,इसी सचाई को जानते हुए योग युक्त जीवन ,योगी सदगुरु की शरण पाने से ही इस अविद्या आदि शक्ति के बन्धन से मुक्त हो कर लक्ष्य को पा सकते हैं।

सभी प्रभु भक्तों से अनुरोध है कि अपने जीवन के सफर यानि जीवन शैली को यम नियम का अनुसरण दृढ़तापूर्वक करते हुए लक्ष्य की ओर अभ्यास रत रहें तभी इस आवागमन से मुक्त हो सकते हैं। इसी मनोकामना के साथ सभी को वन्दन जी।

" जय श्री प्रभु जी की जी"

"देह मिला इस जीव को,हो आत्म  उदार।बिन पढे इस चक्र  में,मोक्ष न दे करतार"।।उपरोक्त  रहस्यमय  विषय पर इतना अवश्य कह सकते ह...
08/03/2026

"देह मिला इस जीव को,हो आत्म उदार।
बिन पढे इस चक्र में,मोक्ष न दे करतार"।।

उपरोक्त रहस्यमय विषय पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि मनुष्य जीवन की अगर यही वास्तविकता है तो इस जीवन रुपी सफर का एक 2 पल वे शुमार कीमती है।अगर हम श्री प्रभु जी के इस उपहार का सदुपयोग करने में असफल रहते हैं तो शायद इससे वढी भू ल कोई नहीं होगी। श्री प्रभु जी ने स्वयंम आ कर हमें वो विधि वताई जो की हम भूल चुके थे। वह विधि है योगयुक्त जीवन शैली जो कि आदिकाल से प्रमाणित है तथा यही एकमात्र मार्ग है जो हमें इस देह/जीवन के लक्ष्य को पाने में सामर्थवाहन वनाता है।श्री सदगुरुदेव जी की महान अनुकम्पा है कि हमें योग मार्ग मिल गया,शायद यह हमारे पूर्व के कर्मो/संस्कारों का परिणाम है।आप सभी पुन्य आत्माओं से विनम्र अनुरोध है कि अविद्या के चंगुल से समय रहते बाहर निकल कर अपने लोक परलोक का उदार करें।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी।"

"प्रभु कृपा की जोत से,नाशे दु:ख अंधियार।रे मन निद्रा  त्याग दे,प्रभु  खडे हैं द्वार"।।अभी तक हमने मन की व्याधियां,इनके प...
06/03/2026

"प्रभु कृपा की जोत से,नाशे दु:ख अंधियार।
रे मन निद्रा त्याग दे,प्रभु खडे हैं द्वार"।।

अभी तक हमने मन की व्याधियां,इनके प्रकार, इन पर नियन्त्रण तथामन की एकाग्रता वारे चर्चा की है। इसी सन्दर्भ में आज मन की सफाई वारे,कि मन को साफ करना क्यूं अनिवार्य है तथा इसे कैसे साफ रख सकते हैं। इस सबको समझने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि अधयातमक विषयों वारे हमारे शास्त्र ही प्रमाण हैं। इसी के अनुसार मन की सफाई का एकमात्र उपाय सत्य को अपनाना है।सचाई के मार्ग पर चल कर ही मन को साफ किया जाता है।मन को साफ करके सभी प्रकार की आदि,व्याधियों से निजात पाया जाता है।मन को साफ रख कर हम लोक,परलोक दोनों में खुशहाल रह सकते हैं।यह हमारी जीवन रुपी यात्रा की वास्तविकता है।

"जय श्री प्रभु राम लाल जी की" ।।

"प्रभो दयामय दया कर,चरणों की दो सेव।सेवक राखो शरण में,प्रकट करो निज भेव"।।श्री प्रभु राम लाल जी की जय शरणम,जय शरणम,जय शर...
05/03/2026

"प्रभो दयामय दया कर,चरणों की दो सेव।
सेवक राखो शरण में,प्रकट करो निज भेव"।।

श्री प्रभु राम लाल जी की जय शरणम,जय शरणम,जय शरणम।

मन की व्याधियां ,वे कितने प्रकार की हैं ओर उन पर नियन्त्रण करने के क्रम पर चर्चा की है। आज इसी को आगे वढाते हुए कि मन को एकाग्र करना क्यूं अनिवार्य है तथा मन को कैसे एकाग्र कर सकते हैं।इस विषय पर स्थापित मानकों पर पाया गया कि कोई भी काम इच्छित परिणाम पाने के लिए मन की एकाग्रता परम अनिवार्य है। मन की एकाग्रता के लिए एक मात्र साधन ज्ञान अर्जित करना है।जो कि शास्त्रों के स्वाध्याय से ही सम्भव है।यही स्वस्थ मन का एक पैमाना है।योग युक्त जीवन से ही मन को एकाग्र कर सकते है,क्योंकि योगाअनुकूल जीवन ही मन की एकाग्रता दे सकता है।मन की एकाग्रता ही इस जीवन रुपी यात्रा को खुशहाल वना सकती है।

"(जय श्री प्रभु जी की जी)"

05/03/2026
"प्रभु  खडे हैं द्वार पे,ग्रह  दृढता से टेक।एक चित हो ध्यान कर, व्रती समेट अनेक "।।                 मानव का जीवन रुपी सफ...
03/03/2026

"प्रभु खडे हैं द्वार पे,ग्रह दृढता से टेक।
एक चित हो ध्यान कर, व्रती समेट अनेक "।।

मानव का जीवन रुपी सफर तन,मन व बुद्धि पर आधारित है। अतः इस जीवन रुपी यात्रा के लक्ष्य हेतु इन तीनों का स्वस्थ होना अनिवार्य है।परन्तु प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार आदि,व्याधि पर निरन्तर केन्द्रित हो कर ही लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
.. मन की पांच व्याधियां हैं।
1• संशय (DOUBT)
2• चिन्ता (WORRY)
3• अविरति (NON ATTACHMENT)
4•घबराहट (RESTLESS)
5•उदासीनता( DEPRESSION)
.. हम सभी उपरोक्त मन की पांचों व्याधियों पर नियत्रण पा सकते हैं केवल योगाअनुकूल जीवन शैली अपना कर,यही सचाई / वास्तविकता है।
("जय श्री प्रभु जी की जी")

1•  काल की गणना न रहे,चढे जो  भक्ति रंग।घटन अनोखी घटत है,भक्त  जनों के संग।।2•योग धर्म प्रभु  राम ने ,दीना जग को आन।पालन...
24/02/2026

1•
काल की गणना न रहे,चढे जो भक्ति रंग।
घटन अनोखी घटत है,भक्त जनों के संग।।
2•
योग धर्म प्रभु राम ने ,दीना जग को आन।
पालन इसका जो करे, धर्मी नर,नार वह जान।।
3•
प्रभू खडे हैं द्वार पे,ग्रह दृढता से टेक।
एक चित हो ध्यान कर, व्रती समेट अनेक।।

श्री प्रभु राम लाल जी की जय शरणम जी।

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Khadwana, Bani
Dehra Gopipur
177108

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