Dr. Indu Sharma Ayurveda

Dr. Indu Sharma Ayurveda She has been treating all kind of patients in Gynae and obstetrics problems, joints pain.

Dr.Indu Sharma B.A.M.S (bachelor of Ayurvedic Medicine and Surgery) from Shri Krishna Ayurvedic College, Kurukshetra (Haryana) has been practicing for last 20 yrs.

On This Mother’s Day…..!!!! आज़ जब फेस बुक पर आयी ओल्ड मेमोरीज़ की पुराने वाली पोस्ट ,तुम्हारी सुंदर सी  फोटो देख कर पहल...
10/05/2026

On This Mother’s Day…..!!!!

आज़ जब फेस बुक पर आयी ओल्ड मेमोरीज़ की पुराने वाली पोस्ट ,
तुम्हारी सुंदर सी फोटो देख कर पहले वाली माँ की याद आयी मोस्ट,

सिर्फ़ पाँच साल पहले ही तुम कितनी स्वस्थ और सुंदर दिखती थी ,
फिर क्या हुआ जो उम्र बढ़ रही है ,
कोई ख़ास रोग भी नहीं है , खाना भी ठीक ही ले रही है ।

दिखाई तो कई सालों से कम ही देता है ,
चलने में भी सहारा ज़रूरी होता है ।
माँ अब तो तुम इतनी दुबली हो गई हो कि लगता है जैसे हवा भी तुम्हें उड़आ सकती है ,

क्या बच्चों के बड़े होकर उनके भी बच्चों को बड़ा होने से माता-पिता इतने बूढ़े हो जातें हैं
कि वे ख़ुद ही बच्चे जैसेअसहाय बन जातें हैं
इसी माँ ने जन्म दिया था हम फिर ये याद कहाँ रख पातें हैं?

ना जाने कितनी प्रार्थनाओं का फल थे हम ,
कितने कष्टों को पाकर तुमने हमको पाया था ,
रात-रात भर जाग -जाग कर पलने में झुलाया था ,

गोदी में लेकर , लोरी सुना कर ख़ुद थक कर सुलाया था ।
जब तक जान में जान थी सब कुछ भूल कर सीने से लगाया था ।

माँ हमें बड़ा करते-२ धीरे-२ दिन पर दिन तुम कब घटती चली गई पता ही नहीं चला।
तेरे बिना शर्तों के प्यार में , दुलार में ज़िन्दगी कब बीतती चली गयी पता ही ना चला ।

और अब जैसे सब कुछ लुटा कर ख़ाली सी क्यूँ हो गई हो माँ तुम ?
ऐसा बड़ा नहीं था होना जिससे पड़ गया पहले जैसी माँ को खोना ,

ए काश मेरा बचपन फिर लौट आए …
मेरी माँ पहले जैसी हो जाए हृष्ट और पुष्ट ,
आज जब फेस बुक पर आयी ओल्ड मेमोरीज़ की पहले वाली पोस्ट,
तुम्हारी सुंदर सी फोटो देख कर पहले जैसी माँ की याद आयी मोस्ट ।
वैद्य इंदु शर्मा अनुगृहिता
10th May 2026❤️❤️

सहिर्दय धन्यवाद “विकास जिंदा है “ NGO की साहित्य धारा मैगज़ीन में स्थान देने के लिए !!!
28/04/2026

सहिर्दय धन्यवाद “विकास जिंदा है “ NGO की साहित्य धारा मैगज़ीन में स्थान देने के लिए !!!

ऋग्वेद  अस्य वामीय -३H).——गोएँ ( sun rays)द्यु लोक से पृथ्वी पर उपर से नीचे और नीचे से ऊपर सतत गतिमान हैं , यह बछड़े ( ज...
17/04/2026

ऋग्वेद अस्य वामीय -३

H).——गोएँ ( sun rays)द्यु लोक से पृथ्वी पर उपर से नीचे और नीचे से ऊपर सतत गतिमान हैं , यह बछड़े ( जीवन तत्त्व )को धारण किए किस लक्ष्य की और जातें हैं।
a)—-ये प्रवाह पृथ्वी के किसी भी अर्ध भाग ( hemispere) को छूते हुए निकल जातें हैं ???????
b).——- कब जीवन तत्त्व को प्रकट कर देतें हैं किसी को पता नहीं है ?
I).———-
द्यु लोक से ( आकाश ) से नीचे पृथ्वी के पिता ( सूर्यदेव ) तथा पृथ्वी के ऊपर स्थित अग्निदेव को जानते हैं , अर्थात् उपासना करतें हैं वे निश्चित ही विद्वान हैं ।
यह दिव्यता से युक्त आचरण वाला मन कहाँ से उत्पन्न हुआ इस रहस्य की जानकारी देने वाला ज्ञानी कौन है ???????

इस गतिशील विश्व में नक्षत्रादि पास आते और दूर जाते दिखायी देतें हैं । हे सोमदेव ( king of plants )आपने और इन्द्र देव ने जो चक्र चला रखा है,, वह धुरे से ( axis/axial)से जुड़ा रह कर लोकों का वहन करता है।
J).———-
विश्व की कल्पना एक वृक्ष के रूप में की गई है।परमात्मा और जीवात्मा ( सुयजा और सुखाया( गतिशील )दो पक्षी इस वृक्ष ( प्रकृति अथवा शरीर)पर एक साथ रहतें हैं । इनमें गतिशील जीवात्मा ( अज्ञानी )स्वादिष्ट पीपल के फल खाता ( involved इन worldly desires)है , दूसरा परमात्मा उन्हें ना खाता हुआ केवल देखता ( दृष्टा भाव /ज्ञानी ) से रहता है।
फल खाने वाला या प्राण रस का पान करने वाला जीवात्मा है जो प्रजनन क्षमता युक्त है , तथा दूसरा शुद्ध चेतनता युक्त परमात्मा रूपी पक्षी साक्षी भाव से स्थित देखता है ।

परमात्मा ने गायत्री छंद से प्राण की रचना की , अंतरिक्ष में त्रिष्टुप (११ रुद्रों सहित वायु / यजुर वाक्यों को ), आकाश में जगती (१२ आदित्यों /ऋचाओं के समूह )से सामवेद को तथा सातों छंद मय वाणियों को प्रादुर्भूत किया । इन सब को जानने वाला देवत्व / अमरत्व को प्राप्त कर लेता है।
K)———
प्रजापति ( supreme God/ परम ब्रह्मण ने सूर्य द्वारा >>>>द्युलोक में जल वृष्टि के माध्यम से प्राण , सूर्य देव और पृथ्वी संयुक्त होतें हैं । अग्नि ( आठ वसुओं सहित ), विद्युत और सूर्य ( पृथ्वी , द्यु और अंतरिक्ष )—— ये तीन गायत्री के तीन पाद हैं ।

NOTE —YANHA par hum gaytree mantr ki importance samahj sakten hain aur uska arth jaan sakten hain ki kyun wo mantr itna famous hai?
L)————
26-32 mantron में आत्म विद्या को गो , वत्स बछड़ा (जीव को जिज्ञासु )को संघ्या देकर उसके द्वारा विवेक प्राप्ति और सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त कराने वाला परमात्मा (धेनु गाय )का उल्लेख है ।
अर्थात् गो माता अपने वत्स को शब्द करती हुई, स्नेह बरसा कर दूध पिलाती है।( ***जिस जिज्ञासु पर आत्मविद्या की परम कृपा होती है , और मानव हृदय में विवेक का उदय होता है । तब उसे इस संसार की असारता का भान होता है , वह नित्य और अनित्य पदार्थों में अंतर समझने लगता है ।इसके विपरीत यही जीवात्मा माता के गर्भ के समान प्रकृति के कार्यभूत जागतिक प्रपंचों में फँसा रहता है और जन्म- मरण के चक्र में घूमता रहता है ।

M)———
३३ वें मंत्र में प्रकृति और पुरुष के संयोंग से ब्रह्माण्ड की रचना बतायी गई हैA CONTROVERSIAL STATEMENT ACCORDING TO VEDAS ABOUT BRAMHA HAS A PARALLEL SECRET ( about being reproducing the srishti by his own daughter)>>>>> पुरुष को पिता तथा प्रकृति को दुहिता कहा गया ।

N)———-
३४ वें मंत्र में जिज्ञासु शिष्य चार प्रश्न करता है ।
१)— पृथ्वी की अंतिम पराकाष्ठा क्या है ?
Ans—यज्ञ की यह वेदी
२)— इस लोक के मूल केंद्र का स्थान कहाँ है ?
Ans— यह यज्ञ सर्वलोक की नाभि है ।
३)—- वीर्यवान अश्व का वीर्य कहाँ है ?
Ans— यह सोमरस वीर्यवान अश्व का वीर्य है ।
४)—- दिव्य वाणी ( गो )का परमश्रेष्ठ आकाश कहाँ है ?
Ans— यह ब्रह्म वाणी (🕉️)का परम आकाश स्थान रूप है ।( परा नाभि में
पशयन्ति ऋत्वजों के हृदय में ,मध्यमा कंठ में नाद रूप से विचरण करती हुई ,और वैखरी छंद,चरण आदि के रूप में )उस अक्षर ब्रह्म से ही व्यंजन , स्वर आदि वर्ण उत्पन्न होतें हैं।

O)—— ३७ वें मंत्र में Rishi says there is a tripod of parmatma ( purest form of energy)- jeevatma ( मरण - धर्म देह )- atamgyan ( अन्तर्मन समाधिस्थ में होने वाला ज्ञान ) regulated and controlled by sukarma and dushkarma .

P)———- ३९-४५ वें मंत्र में वाणी की उत्पत्ति के बारे में वाणी के चारों रूपों को अलग-२ ना मानकर सरस्वती के एक ही रूप में उसे विश्व पोषयित्री माता कहा गया है । कवि उसकी स्तुति करते हुए कहता है कि तुम वर्णीय धन , रतन , शोभन दान प्रदान कराने वाली हमारे लिया सुलभ हो जाइए ।
४६ वें मंत्र में एकेश्वर वाद का प्रतिपादक अत्यधिक प्रसिद्ध मंत्र ———

“एकं सदविप्रा बहुधा वदन्ति “
VISHAV KI PARTEYK VASTU MEIN EK HI PARAM TATTV HAI.
Ye hi mantr ka mool siddhant hai . उस परमात्म तत्त्व को अग्नि के रूप में , कोई उसे इंद्र के रूप में तो कोई वरुण के रूप में देखता है ।
God is one and eternal , everywhere but represents differently according to देश , काल और दिशानुसार विविध रूपों में परिणीत होता है ।
वैद्य इंदु शर्मा ( अनुगृहीता).

Rigved Asya vamiya -2 ऋग्वेद एक विपुल ज्ञान सामग्री से परिपूर्ण है ।इसमें धार्मिक , सामाजिक , लौकिक तथा आध्यात्मिकता को ...
07/04/2026

Rigved Asya vamiya -2

ऋग्वेद एक विपुल ज्ञान सामग्री से परिपूर्ण है ।इसमें धार्मिक , सामाजिक , लौकिक तथा आध्यात्मिकता को सृष्टि के आरम्भ से लेकर अनंत काल तक वर्णय विषय सूक्तों ( मंत्रों के संग्रह के रूप में ) के माध्यम से पिरोए गए हैं ।

मुख्य रूप से दार्शनिक सूक्तों में ,अस्य वामस्य (१/१६४) एवं दशम मंडल के पुरुष सूक्त ( १०/१२१), वाक् सूक्त ( १०/१२५),नासदीय सूक्त १/१२९) हैं।

ASYAVAMEEY SOOKTA…….

ऋग्वेद १.६४ ,,,,, असय वामस्य से शुरू होकर ५२ मंत्रों तक के सूक्त को अस्य वामीय सूक्त कहा गया है । ऋग्वेद में तत्त्व ज्ञान के प्रतिपादक सूक्तों में इसका एक विशिष्ट स्थान है ।

A)——-अश्व , विश्व ,सुवर्ण ,रथ , गौ , वृषभ ,समुद्र , वृक्ष , दिन , रात्रि आदि प्रतीकों के माध्यम से ••••••••••• पुरुष , प्रकृति तथा विश्व सृजन की प्रक्रियाओं को समझाया गया है ।

B)———There are three brothers in this explaination .
1). Vaam the eldest / Sun in physical form / Parmatma in spiritual form… which is the Supreme of all and has seven lokas as the symbol in the form of seven son ( putras).

2). Ashwan the middle one / as the vayu in physical form and Virat purush in the spiritual sense .

3). Ghritprisht the youngest one / as Agni in physical form and Jeevatma in spiritual sense .
The Vaama has taken the Supreme God (Param Bramh ) , the Owner of Seven Laukas (भू:,भुव :,स्व:, मह :,जन:,तप:,सत्यम) by seven putras or seven horses.

C). In the 2nd and 3rd mantra the world ‘s ( Vishwa ) parallel has been assumed as the Single Wheel Ratha with seven horses or only one horse drags the single wheel ratha ( Brahmand ratha- ब्रह्माण्ड रथ ) seven different names. Sayanacharya has assumed seven Sun Rays or six weathers ( ऋतुएँ ) including one abnormal — as seven horses physically or can be taken as mann , pranna and panchendiryan.

The wheel is one but has three centres , immortal and relaxed forever. The whole world’s exist in the arrayas of thus wheel.

D). ——-In Vedic literature an Year is called Samvatsara ( three centred wheel of seasons and present, past , future time).When the Jupiter moves from one place to another is the beginning of new Samvatsara.

Also there are 60 yrs. in one Vedic cycle like the same revolving in a giant wheel.First 20 yrs. are dedicated to Lord Brahma next 20 yrs to Lord Vishnu and last 20 yrs. to Lord Shiva .

परमात्मा है जो सबका स्वामी है ब्रह्मांड रथ जिसका केवल एक पहिया है ,सात लोकों को चक्र में ऋतुओं के साथ ( mainly summers , rainy and winters)समय के वर्तमान , भूत भविष्य — भूत , देव और आत्म मंडल ( त्रि नाभि )तीन नाभि स्थित हैं।सम्पूर्ण विश्व उसी को आधार और आश्रय बना कर अवस्थित है ।
In the third mantra samvatsar रूपी saat अवयवों को अयन,ऋतु,मास,पक्ष ,दिन ,रात्रि तथा मुहूर्त को सात चक्र बताया गया है ।

E).——- सूक्त के ४-७ मंत्रों में पहेली के रूप में आध्यात्मिक प्रश्न पूछे गयें हैं ।
ए)—- WHO has seen whom which exist in bony body without bones?
b).—- where are the breaths, blood and spirit of Earth?
c)—- कौन शिष्य सृष्टि के कारण - कार्य को जानने की जिज्ञासा हेतु तत्त्व ज्ञानी के पास ज्ञान लेने जाता है ? और क्या कोई तत्त्ववेता है जो परमात्मा को जानता है ?
d)—- क्या कोई ऐसा तत्त्व वेता है जो जानता हो की गौ माएँ कैसे दुग्ध / जल
ग्रहण करती है ?

F)——— ८-१५ मंत्रों में ,,,,,,,, ऊपर पूछे गए प्रश्नों। का समाधान ( secret)बताया है ,,,,,
प्रकृति ( सृष्टि / जगत ) माता है , परमात्मा पिता है । प्रकृति में पुरुष द्वारा गर्भ धारण करने की भावना पहले उत्पन्न हुई , संयोग हुआ जिसे यज्ञ कहा गया । उसे विश्व रूप गर्भ स्थित हुआ , वह गर्भ वत्स बन कर गाय ( प्रकृति रूपी माता )को देखता है , फिर पृथ्वी को देखता है । प्रपंचात्मक तीन माताओं ( आकाश , अंतरिक्ष , पृथ्वी ) तथा तीन पिताओं ( सूर्य , वायु , अग्नि )से प्रथम विश्वरूप में विराट ही प्रकृति और पुरुष का पुत्र बनता है ।
काल/ समय / वक़्त संवत्सर चक्र परमात्मा का स्वरूप होने से निरंतर गतिशील रहता है। जिसमे १२ months, 12 archs , 360 days with the couple of 360 nights stree ( females )and 360 days purush roop ( total 12 plus 12 hrs. of days and nightsin 360 days ).
Samvatsar ( year)रूप पिता के पाँच पैर ( पाँच ऋतुएँ / seasons) under the control of Sun cycle.
संवत्सर ( yr) को seven chakras वाला ( अयन, ऋतु,मास,पक्ष ,दिन,रात्रि तथा मुहूर्त ) पाँच या छह आराओं ( six seasons)वाला ,सदा गतिशील रहने वाला रथ कहा जाता है ।यह एक पहिए वाला रथ बहुत बड़ा , भारी , कभी न तपने वाला सर्वदा अजर , अमर अपने मंडल के साथ निरंतर घूमने वाला है ।

G)———
मंत्र (१६-१८ ) There is a contest like questions are there about prakriti and purusha swaroop ( look like ).
1). Ist riddle like question is that /— my presence is known as masculine even after having feminine shapes……..????
2).—— gyan chakshu ( eyes with eyesight ) , उसे देख सकतें हैं , पर वो सब जो नहीं देख सकते वो अंधें हैं ।
3).—— जो कवि हो भले ही आपका पुत्र क्यों ना हो वह उसे जानता है पर जो उसको जानता है वो पुत्र होकर भी पिता बन जाता है या पिता समान समझा जाना चाहिए ।

“ऋग्वेद अस्य वामीय “Disclaimer All the datas , refrences are quoted from authorised sources but due to thousands of year...
02/04/2026

“ऋग्वेद अस्य वामीय “

Disclaimer All the datas , refrences are quoted from authorised sources but due to thousands of years old ages … assumptions , presumptions can be there.—-
परिचय——

भारत की धार्मिक और सामाजिक परंपरा वेदों को परमात्मा का अनादि ज्ञान मानती है , जो सृष्टि के आरंभ में मानव जाति के हितार्थ ऋषियों के अंतर्मन समाधिस्थ ( when conciousness goes beyond all barriers connects with Supreme conciousness with aatma and mann i.e. absence of इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष )ke माध्यम से दिया गया था ।

महाभारत के अनुसार परमात्मा ने जिस अपौरुषेय वाक् का सृजन किया वह अनादि , अनंत, दिव्य वाक् है जिससे ये सारा जगत उत्पन्न हुआ है ।

यागवल्क्य ऋषि अपनी पंडिता स्त्री मैत्रेयी को उपदेश करते हैं कि हे मैत्रयी जो आकाश आदि से बड़ा सर्वव्यापक परमेश्वर है उससे ही ऋक्, यजु:, साम और अथर्व चार वेद उत्पन्न हुए हैं ।सभी भिन्न-२ भारतीय विद्वान और पाश्चात्य विद्वान वेदों ( ऋक् वेद ) से पुराना अन्य कोई ग्रंथ धराधाम पर नहीं पाया गया । ऐसा भी समझा जाता है कि वेद मूलतः एक ही राशि था ,किंतु अग्नि , वायु ,आदित्य नामक प्राण ( भृगु अंगिरा ,परमेष्ठी स्थानीय)तत्वों से अनुभूत होकर चार वेदों में नामकृत हो गया ।

वेदों का पारमार्थिक ज्ञान का अर्थ आध्यात्मिक ज्ञान ( ईश्वर , जीव , प्रकृति , सृष्टि विद्या , जन्म - मरण , पुनर्जन्म मोक्षादि)से एवेम वयवहरिक ज्ञान लोगो के दिन- प्रतिदिन में प्रयोग होने वाला होता है।

स्वामी दयानंद वेदों में अपरा विद्या ( knowldge of all the things present on earth) परा विद्या ( knowldge of supreme god) का ज्ञान का साधन होना बतातें हैं ।
वेद अद्वैतवाद को प्रतिपादित करते हुए भी बहुदेवता वाद ( Henotheism)को मानते हुए प्रतीत होतें हैं । स्वामी दयानंद जी कृत भाष्यार्थ में वेदों सभी स्तुतत्य देवता भी परमेश्वर के ही प्रतीक हैं।क्योंकि परमात्मा तो सर्वव्यापक होने से परमाणु रूप में या स्थूल रूप जैसे - अग्नि ,इन्द्र, वायु, वरुण सविता ( सूर्य), उषा , अदिति ,विश्वेदेवा , बृहस्पति,यम ,सरस्वती,अदिति , रुद्र ,विष्णु , भाग , पूषा, पर्जन्य देवता इत्यादि ।
ऋग्वेद में , दर्शन , धर्म , आचार , नीति , लौकिक ज्ञान - विज्ञान मानव - हितार्थ कोई भी विधा नहीं है जिसकी चर्चा ना की गई हो ।

महाभाष्यकार पतंजलि के अनुसार वेदों की शाखाओं की कुल संख्या ११३१ है जिसमे ऋग्वेद की —-२१ , यजुर्वेद की १०१ ,सामवेद की एक हज़ार १००० और अथर्वेद की नौ (९) । शाखाओं के नाम उनके प्रवर्तक आचार्यों के नाम पर होतें थे।
ऋग्वेद इक्कीस शाखाओं के आचार्य हैं —- शाकल , शांखायन , आश्वलायन ,मांडूक, बाशकल,ऐतरेय ,कौषीतिकी , जातुकरण, शतबलाकाश इत्यादि । ऋग्वेद की मुख्य पाँच शाखाएं है —- शाकल , बाशकल, आश्वलायन ,शांखायन, मण्डूकायन ।

ऋक् वेद में दस मण्डल १०२८ सूक्त तथा १०५५२निर्दिष्ट मंत्र हैं । दूसरी तरह का विभाग अष्टक एवं अध्याय और वर्ग में विभाजित ( आठ अष्टक ,६४ चौंसठ अध्याय ,२०२५ दो हज़ार चौबीस वर्ग )हैं।उत्पत्ति काल के बहुत समय बाद जब श्रुतिओं रूपी वेदों का अस्तित्व खोने के भय से , जन साधारण में वेदार्थ को सुलभ करने के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रणयन किया गया । जिनमें मुख्यतः वेदों का कर्मकांड ही अनुवादित किया गया था

विनियोग —— मंत्र उच्चारण से पहले विनियोग का अति महत्वपूरण स्थान है जिसमें तीन अंग ,,,👉देवता ( मंत्र दृष्टा ऋषि द्वारा तत्त्व देवता का आवाहन ), ऋषि ( मंत्र दृष्टा सिद्ध ऋषि)एवम छंद ( मन्त्र के आयतनों को अनुशासित करने वाली विधा —rules एंड regulations)को स्थापित कर मंत्रों और सूक्तों का निर्धारण किया जाता है ।

मंत्रों द्वारा स्तुतत्य देवता को ऋक् भी कहा जाता है ,मंत्र वेदों का सबसे छोटा हिस्सा ज्ञान और उपासना के लिए बोला जाने वाला ),,,पवित्र वाक्य । छंद मंत्रों की बनावट या मीटर की कोई भी मंत्र कैसे उच्चारित किया जाएगा ( गायत्री, अनुष्टुप ,जगती आदि १५ पंद्रह प्रकार ) । सूक्त —- मंत्रों का समूह अर्थात् किसी विषय या देवता की स्तुति या प्रस्तुतीकरण ( presentation) जैसे की नासदीय सूक्त , पुरुष सूक्त ,ईशावास्य सूक्त सूर्य सूक्त पृथ्वी सूक्त इत्यादि ।

प्रथम मंडल में मधुचन्दा,मेधातिथि , अगस्त्य , गौतम ,पाराशर आदि ऋषिओं के सूत्र हैं । इस प्रथम मंडल में ————-
वाक् विषयक अस्य वामीय सूक्त ( १:१६४) प्रमुख है । इसके ऋषि दीर्घतमा औच्छाथय ,,,, देवता —-विश्वदेवा, वाक् , आप ,धूम , सोम , अग्नि , सूर्य , वायु सरस्वती , पर्जन्य सरसवाँ हैं ।
छंद—- त्रिष्टुप ,जगती प्रस्तारपंक्ति इत्यादि हैं ।
मन्त्र संख्या —- १७१६—१७६७ पर्यंत है।

Source for above —- rigved samhita by Pandit Shri Ram Sharma Aachary , Bharat vaibhav nbt. india ( Om Parkash Panday ) , Rigved ek saral parichy by Dr.Bhavani Lal Bharteeya . Part-1 by
Vaidya—-इंदु शर्मा अनुगृहिता ।

21/03/2026
“शिक्षा के अर्थ “वर्तमान समय में अगर शिक्षा की बात होती है तो बोला जाता है , education क्या है आपकी ?, कहाँ तक पढ़े हो ?...
20/03/2026

“शिक्षा के अर्थ “
वर्तमान समय में अगर शिक्षा की बात होती है तो बोला जाता है , education क्या है आपकी ?, कहाँ तक पढ़े हो ?, आपने academically क्या किया है ?, कौन सी डिग्री है ?, किस चीज़ के मास्टर हो?, क्या specialization है ?, कौन सी stream है ? और भी अनगिनत तरह से पूछा जाने वाला या बताने वाला विषय है शिक्षा । किसी बच्चे से भी पहली बार अगर हम मिलतें हैं तो नाम के बाद कौन सी क्लास में हो ? ये सबसे महत्त्वपूरण प्रश्न ही पूछतें हैं।
यहाँ तक की किसी सेवानिवृत व्यक्ति के बारें में पूछा या बताया जाने वाला प्रश्न या बातचीत आगे बढ़ाने का कारण होता है। और सबसे हैरान करने की बात ये है कि हम सभी ये जानते ही नहीं की शिक्षा माने ज्ञान का सही अर्थ क्या है । हम सभी अपने बच्चों के समय वो ही करतें हैं , जो हम ठीक समझतें हैं । अन्य किसी परिवार के , मित्रों या रिश्तेदारों के अनुभवों से लाभ नहीं लेना चाहते , ये कह कर की हम जो करेंगे वो ही बेस्ट होगा , या फिर ये बोल कर की उनका जमाना और था ।कुछ १५-२० वर्षों के बाद फिर वही प्रश्नोतरों व सुझावों का पहिया घूम कर वंही आ जाता है ।
अगर अनुमति सर्वमान्य आँकड़ों की बात मानें तो रामायण आज से १४,००० वर्षों पहले और महाभारत आज से ७००० वर्षों पूर्व घटित वृतांत माने जातें हैं । ऋग्वेद सभी वेदों की एक ही राशि के रूप में अनुमातः २१,००० वर्षों पहले श्रुतिओं के रूप अपने
घटित हुए । अवधि की लंबाई से ये ज्ञात होता है की कोई भी धर्म , सभ्यता , ज्ञान शिक्षा ,,,आर्य सभ्यता , और हिंदू सनातन धर्म से बढ़ कर नहीं है। पुरातत्व विभाग द्वारा उत्तर- पश्चिमी क्षेत्रों में सप्त - सिंधु प्रदेशों से गंगा नदी के मैदानों की ओर फैलते खुदाई में , हड़ड़पा, काली बंगा वैदिक निवासन से लेकर उत्तर वैदिक काल तक चित्रित धूसर मृभदांड शिल्प -कला कौशल और लौह उपकरणों में उपस्थित कृषि और युद्ध - हेतु उपकरण के प्रमाण सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता की कथा कहतें हैं ।
Myth of trans- migration theory of Indo-Ayyans भी अत्ति- प्राचीनतम संस्कृति - सभ्यता को सिद्ध करतें हैं । शिक्षा वो जो धर्म और relgion में अंतर ,विभिन्न धार्मिक मतों के प्रसार में अनुसरण करके अलग -२ धर्मों की स्थापना कर अविद्या और असत्यता में ना उलझाए।
शिक्षा , वो जो सब धार्मिक मतों से ऊपर, सबसे पहले , सबके लिए वैदिक या हिंदू सनातन धर्म में उत्पन्न होना बता कर सभी धार्मिक भ्रांतियों को दूर करवाये ।
कोई भी धार्मिक पंथ जो अनित्य है , अशाश्वत् है वो जो आज पूरे विश्व में युद्ध - घृणा के विनाश में डूबा हुआ है , उन्हें सत्यता बताकर सही मार्ग पर लाए ।
शिक्षा वह जो बताए कि जो सूरज , चांद , सितारे , मौसम , धूप , वर्षा को संचालित करने वाला परम परमात्मा ही हम सबमें विद्यमान होकर संतुलन बनाता है , सर्वव्यापक है , घूमती हुई पृथ्वी को अपने भिन्न प्रकार के नियमों ( गुरतुवाकर्षण इत्यादि ) से हमे स्थिरता प्रदान करता है ।
शिक्षा वो जो ये बताए कि “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे “ पंच भौतिक सृष्टि , हम में भी पंच महाभूतों के रूप में विद्यमान है और इन्ही पंच तत्वों में मिल जाएगी । परम ब्रह्म हम में जीवात्मा के रूप में विद्यमान है और वो ही जन्म - मरण , पुनर्जन्म के नियमों में बंध कर युगों-२ से अस्तित्व में है ।
शिक्षा वो जो वेदों , उपनिषदों , शास्त्रों में ( प्रत्यक्ष , अनुमान , उपमान , उपमेय) जैसे प्रमाणों द्वारा सृष्टि के उद्भव से ही अस्तित्व में है । वेदांग साहित्य का अध्ययन्न कर ( वरण व्यवस्था , आश्रम व्यवस्था ,चतुष्टय पुरुषार्थ सिद्धि )सभी प्रकार की वास्तविकताओं से अवगत करवाए ।
शिक्षा वो नहीं जो पश्चिमी सभ्यता , संस्कृति , उन्ही की भाषा को सीखने में गर्व का अनुभव करे और हमारी वैदिक, संस्कृत / हिंदी ( देवनागरी ) को बोलने और पढ़ने में हीं भावना का अनुभव करे ।
शिक्षा वो जो ये बोध करवाए की हम सब धरा पर जीवात्माएँ ऋषिओं की संतान हैं , कोई धर्म , जाति , देश की सीमाएं मानवता को बाँट नहीं सकती । जिस प्रकार कार्य - कारण संबंध को आधार बना कर ये सिखाए कि कुम्हार के बिना घड़ा , ड्राइवर के बिना बस नहीं चल सकती उसे तरह परम् ब्रह्म के सृष्टि नहीं चल सकती चाहे व्यक्ति , जीव संपूरण संसार में कहीं भी कोई भी धार्मिक मत ( मुस्लिम , सिख , ईसाई आदि )को मानने वाला हो। वो सृष्टि संचालक , नियंता तो एक ही है , फिर मुझमें - तुझमें कोई भेद कैसे हो सकता है।
शिक्षा वह जो मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने वाले कृत्यों को समझाए , सिखाए ।
आत्मा अजर -अमर , स्थिर है , श्रवण , मनन , निदिद्यासन से अभ्यास , वैराग्य , विवेक ज्ञान प्राप्त करवाए । सबसे बढ़ कर संसार की नश्वरता के ज्ञान ( जगत मिथ्या , ब्रह्म सत्य ) का , अद्वैतवाद का बोध कराए।
निष्कर्ष —— सब कह लेने के बाद सही मार्ग का चयन कैसे किया जाए। इसका उपाय , तरीका या रास्ता केवल और केवल कच्ची मिट्टी रूपी बचपन में दी जाने वाली वैदिक शिक्षा ही है । हम सबको लौटना होगा वेदों की और , गीता की और , सनातन धर्म की ओर,,,,, जिससे हम अपने बच्चों को पश्चिमी शिक्षा को साथ लेकर मुख्यतः गुरुकुल पद्दति द्वारा ही , ब्रह्मचर्य का पालन कर , आधुनिक विज्ञान से होने वाले उन्नति - पतनों के महत्व को समझें ।
प्राइमरी शिक्षा को मुफ्त देकर देश के हर एक बच्चे से उसके देश भक्त होने , मानवता प्रेम के बीज को रोपित करने का अधिकार ना छीने । यही हमारा , देश की सरकार का , माता - पिता की अत्तिआवश्यक कर्तव्य होना चाहिए ।
जय हिन्द , जय भारत ।🙏🕉️
वैद्य इंदु शर्मा ( अनुगृहीता )।

दर्पण सबकी आँखें देखें सबको , ख़ुद अपने को देख ना पाती….दर्पण ही दिखलाता सबको अपनी - अपनी मोहिनी - मूर्ति ।मन- मोहित होन...
01/03/2026

दर्पण
सबकी आँखें देखें सबको , ख़ुद अपने को देख ना पाती….
दर्पण ही दिखलाता सबको अपनी - अपनी मोहिनी - मूर्ति ।
मन- मोहित होने को ,ख़ुद पर गर्वित होने को ,
आईना बढ़ -चढ़ कर इतराता, सब कथा सुनाता ।
प्रसन्नता,अहंकार और आत्मविश्वास की राह बन जाता ।
अगर कहीं ना मिला पाए दर्पण ,
सब कुछ खाली सा हो जाता ।
मैं कैसा या कैसी लगती ,प्रश्न चिह्न बड़ा लग जाता ,
जाकर पहले आईना देखो ,के शब्द सुना कर ,
औक़ात समझाने का साधन बन जाता ।
इतने सब पर भी एक छोटी सी चोट से , अनगिनत हिस्सों में बंट जाता ,
अशुभ ही अशुभ होने का कारण माना जाता।
रूको -२ ,हटो,ध्यान से देखो , साफ़ करो , पास ना आओ कन्ही लग जाए ,
कहीं ख़ून ना आ जाए , कूड़े वाला और कूड़ादान भी घबरा जाता । फेकीं लकड़ी को तो सब ले जायें , पर शीशे को कोई ना हाथ लगाता,
वो ही दर्पण जो होता इतना मनभावन, एक अभिशाप जैसा ही बन जाता ।
क्यों ना हो , जरा सोचो तो,बस ये तो बात नहीं है दर्पण की ,
हम सबके जीवन , सोच , विचार , रिश्ते , भावनाएँ भी तो ऐसे ही रूप दिखलाती ,
स्वार्थ - निहित आवश्यकताएँ, निष्काम स्नेह के आवरण में छुप कर ,
नित्य जगत में खेल - खिलाती ,
दुर्भाग्य से, दुर्घटनाओं से , अस्वस्थताओं से या फिर असहाय वृद्धावस्था में जिंदगी,
दर्पण के जैसे ही जीने के मतलब समझाती,
सबकी आँखें देखें सबको ख़ुद अपने को देख ना पाती-२।
वैद्य इंदु शर्मा ( अनुगृहीता)।

वैलेंटाइन डे वाला प्यार💘   एक दिन यूँ ही मैंने अपने आप से पूछा ,,हे-ए-ए-ए …. ये वैलेंटाइन वाला प्यार क्या है ?शादी के पह...
14/02/2026

वैलेंटाइन डे वाला प्यार💘

एक दिन यूँ ही मैंने अपने आप से पूछा ,,
हे-ए-ए-ए …. ये वैलेंटाइन वाला प्यार क्या है ?
शादी के पहले वाला या शादी के बाद वाला
या फिर शादी के बहुत बाद वाला प्यार है क्या???
❤️पहली नज़र का आकर्षण या शादी में समझौते वाला योजनाबद्ध प्यार …
या एक से होकर टूटने पर दूसरे , फिर तीसरे से होने वाला प्यार 💘💘💘😎😎
क्या है प्यार की परिभाषा ????

❤️ऐसे ही सुहाने सपनों वाला कल्पनाओं में होने वाला प्यार …
कुछ उम्र की स्वाभाविकता, कुछ समाज के नियम या फिर जल्दी में होने वाली शादी की मजबूरियों वाला प्यार …
या फिर अपने ही प्यारे की किसी दूसरे से शादी होते देख कर प्रश्न पूछता प्यार ..अधूरा ही रह जाने वाला प्यार,

❤️शादी के बाद पति -पत्नी का प्यार या फिर भी किसी और से होने वाला प्यार ,
मेरे टाइप का नहीं था या बिना प्यार की शादी थी ,,के बहाने बनाने वाला प्यार ?

❤️कभी बच्चे ना होने पर बदलने वाला प्यार ,
कभी शादी से पहले ही बच्चा होने वाला प्यार ,
कभी असमानता से , कभी अस्वस्थता से ,
कभी शून्यता से , कभी ऊब जाने से ..ख़त्म होने वाला प्यार …??

❤️कभी दिखने में कुछ और दिखाने में कुछ और , या होने में कुछ और ,
बंद दरवाजों में असीम घृणा से , एक दूसरे को नीचा दिखता प्यार ….
कभी स्वार्थ से , कभी धन -लालसावश धोखा देता प्यार , और अंत में अकेलेपन के डर से वृद्धावस्था में होने वाला प्यार…
आख़िर प्यार है क्या ??😇😇

❤️अब अगर पाना है उत्तर ,कि क्या है ये प्यार,
आओ सब समझें , जाने और मानें …..
सृष्टि के उद्भव को ,अर्धनारीश्वर शिव और शक्ति का संगम है प्यार ,
राम और सीता सा संबंध बना कर अटूट विश्वास की जड़ों से रिश्ता निभाना है प्यार ,
आदर का ,सम्मान का , यथा ही तथैव स्वीकार्य का , ना कोई किंतु ,ना कोई परंतु का ….
ना कोई हानि - ना लाभ का ,हर स्थिति में
सदा एक जैसा रहने वाला होता है प्यार ,
कर्मों का पहिया गोल -२ घुमा कर अलग-२
हर जन्म में रिश्तें बदल - बदल कर आने वाला
होता है प्यार ,
जो जैसा है वैसा ही अच्छा है , हर दुख- सुख में बिना शर्त के,साथ निभाने वाला होता है प्यार -२
वैद्य इंदु शर्मा (अनुगृहिता )।💘🥰❤️🌹👍🕉️🙏

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04/02/2026

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