02/04/2026
“ऋग्वेद अस्य वामीय “
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परिचय——
भारत की धार्मिक और सामाजिक परंपरा वेदों को परमात्मा का अनादि ज्ञान मानती है , जो सृष्टि के आरंभ में मानव जाति के हितार्थ ऋषियों के अंतर्मन समाधिस्थ ( when conciousness goes beyond all barriers connects with Supreme conciousness with aatma and mann i.e. absence of इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष )ke माध्यम से दिया गया था ।
महाभारत के अनुसार परमात्मा ने जिस अपौरुषेय वाक् का सृजन किया वह अनादि , अनंत, दिव्य वाक् है जिससे ये सारा जगत उत्पन्न हुआ है ।
यागवल्क्य ऋषि अपनी पंडिता स्त्री मैत्रेयी को उपदेश करते हैं कि हे मैत्रयी जो आकाश आदि से बड़ा सर्वव्यापक परमेश्वर है उससे ही ऋक्, यजु:, साम और अथर्व चार वेद उत्पन्न हुए हैं ।सभी भिन्न-२ भारतीय विद्वान और पाश्चात्य विद्वान वेदों ( ऋक् वेद ) से पुराना अन्य कोई ग्रंथ धराधाम पर नहीं पाया गया । ऐसा भी समझा जाता है कि वेद मूलतः एक ही राशि था ,किंतु अग्नि , वायु ,आदित्य नामक प्राण ( भृगु अंगिरा ,परमेष्ठी स्थानीय)तत्वों से अनुभूत होकर चार वेदों में नामकृत हो गया ।
वेदों का पारमार्थिक ज्ञान का अर्थ आध्यात्मिक ज्ञान ( ईश्वर , जीव , प्रकृति , सृष्टि विद्या , जन्म - मरण , पुनर्जन्म मोक्षादि)से एवेम वयवहरिक ज्ञान लोगो के दिन- प्रतिदिन में प्रयोग होने वाला होता है।
स्वामी दयानंद वेदों में अपरा विद्या ( knowldge of all the things present on earth) परा विद्या ( knowldge of supreme god) का ज्ञान का साधन होना बतातें हैं ।
वेद अद्वैतवाद को प्रतिपादित करते हुए भी बहुदेवता वाद ( Henotheism)को मानते हुए प्रतीत होतें हैं । स्वामी दयानंद जी कृत भाष्यार्थ में वेदों सभी स्तुतत्य देवता भी परमेश्वर के ही प्रतीक हैं।क्योंकि परमात्मा तो सर्वव्यापक होने से परमाणु रूप में या स्थूल रूप जैसे - अग्नि ,इन्द्र, वायु, वरुण सविता ( सूर्य), उषा , अदिति ,विश्वेदेवा , बृहस्पति,यम ,सरस्वती,अदिति , रुद्र ,विष्णु , भाग , पूषा, पर्जन्य देवता इत्यादि ।
ऋग्वेद में , दर्शन , धर्म , आचार , नीति , लौकिक ज्ञान - विज्ञान मानव - हितार्थ कोई भी विधा नहीं है जिसकी चर्चा ना की गई हो ।
महाभाष्यकार पतंजलि के अनुसार वेदों की शाखाओं की कुल संख्या ११३१ है जिसमे ऋग्वेद की —-२१ , यजुर्वेद की १०१ ,सामवेद की एक हज़ार १००० और अथर्वेद की नौ (९) । शाखाओं के नाम उनके प्रवर्तक आचार्यों के नाम पर होतें थे।
ऋग्वेद इक्कीस शाखाओं के आचार्य हैं —- शाकल , शांखायन , आश्वलायन ,मांडूक, बाशकल,ऐतरेय ,कौषीतिकी , जातुकरण, शतबलाकाश इत्यादि । ऋग्वेद की मुख्य पाँच शाखाएं है —- शाकल , बाशकल, आश्वलायन ,शांखायन, मण्डूकायन ।
ऋक् वेद में दस मण्डल १०२८ सूक्त तथा १०५५२निर्दिष्ट मंत्र हैं । दूसरी तरह का विभाग अष्टक एवं अध्याय और वर्ग में विभाजित ( आठ अष्टक ,६४ चौंसठ अध्याय ,२०२५ दो हज़ार चौबीस वर्ग )हैं।उत्पत्ति काल के बहुत समय बाद जब श्रुतिओं रूपी वेदों का अस्तित्व खोने के भय से , जन साधारण में वेदार्थ को सुलभ करने के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रणयन किया गया । जिनमें मुख्यतः वेदों का कर्मकांड ही अनुवादित किया गया था
विनियोग —— मंत्र उच्चारण से पहले विनियोग का अति महत्वपूरण स्थान है जिसमें तीन अंग ,,,👉देवता ( मंत्र दृष्टा ऋषि द्वारा तत्त्व देवता का आवाहन ), ऋषि ( मंत्र दृष्टा सिद्ध ऋषि)एवम छंद ( मन्त्र के आयतनों को अनुशासित करने वाली विधा —rules एंड regulations)को स्थापित कर मंत्रों और सूक्तों का निर्धारण किया जाता है ।
मंत्रों द्वारा स्तुतत्य देवता को ऋक् भी कहा जाता है ,मंत्र वेदों का सबसे छोटा हिस्सा ज्ञान और उपासना के लिए बोला जाने वाला ),,,पवित्र वाक्य । छंद मंत्रों की बनावट या मीटर की कोई भी मंत्र कैसे उच्चारित किया जाएगा ( गायत्री, अनुष्टुप ,जगती आदि १५ पंद्रह प्रकार ) । सूक्त —- मंत्रों का समूह अर्थात् किसी विषय या देवता की स्तुति या प्रस्तुतीकरण ( presentation) जैसे की नासदीय सूक्त , पुरुष सूक्त ,ईशावास्य सूक्त सूर्य सूक्त पृथ्वी सूक्त इत्यादि ।
प्रथम मंडल में मधुचन्दा,मेधातिथि , अगस्त्य , गौतम ,पाराशर आदि ऋषिओं के सूत्र हैं । इस प्रथम मंडल में ————-
वाक् विषयक अस्य वामीय सूक्त ( १:१६४) प्रमुख है । इसके ऋषि दीर्घतमा औच्छाथय ,,,, देवता —-विश्वदेवा, वाक् , आप ,धूम , सोम , अग्नि , सूर्य , वायु सरस्वती , पर्जन्य सरसवाँ हैं ।
छंद—- त्रिष्टुप ,जगती प्रस्तारपंक्ति इत्यादि हैं ।
मन्त्र संख्या —- १७१६—१७६७ पर्यंत है।
Source for above —- rigved samhita by Pandit Shri Ram Sharma Aachary , Bharat vaibhav nbt. india ( Om Parkash Panday ) , Rigved ek saral parichy by Dr.Bhavani Lal Bharteeya . Part-1 by
Vaidya—-इंदु शर्मा अनुगृहिता ।