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बिहार में इस बार बेहद तगड़ी सर्दी पड़ रही है. राजधानी पटना सहित पूरे राज्य के ज्यादातर जिलों में दिसंबर के मध्य से कोहरा...
10/01/2026

बिहार में इस बार बेहद तगड़ी सर्दी पड़ रही है. राजधानी पटना सहित पूरे राज्य के ज्यादातर जिलों में दिसंबर के मध्य से कोहरा और ठंड का कहर बना हुआ है. भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) की ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 तक बिहार में लगातार कोल्ड डे और घने कोहरे की स्थिति बनी हुई है, जिससे करीब 22 दिन से धूप नहीं निकली है. ऐसे में लोगों को सूरज की पर्याप्त रोशनी नहीं मिल रही है, जो शरीर में विटामिन डी बनाने का मुख्य सोर्स है. डॉक्टरों का कहना है कि विटामिन डी की कमी से लोगों में बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है.
बिहार में कैसा है मौसम?
आईएमडी की जनवरी 2026 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि बिहार के सभी 38 जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी है. दिसंबर के अंत और जनवरी की शुरुआत में सुबह से शाम तक घना कोहरा छाया रहा, जिससे विजिबिलिटी बहुत कम हो गई. पटना में कई दिनों तक अधिकतम तापमान 14-15 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहा और न्यूनतम तापमान 8-10 डिग्री तक गिर गया. राज्य के उत्तरी, दक्षिणी और मध्य हिस्सों में कोल्ड डे की स्थिति बनी रही. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी हवाओं की वजह से ठंड बढ़ी है और कोहरा जनवरी के मध्य तक बना रह सकता है. ऐसे में कोहरे की वजह से धूप न मिलने के कारण विटामिन डी की कमी का खतरा बहुत बढ़ गया है.
क्यों जरूरी है विटामिन डी?
डॉक्टरों के मुताबिक, विटामिन डी हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है. यह हड्डियों को मजबूत बनाता है, इम्यूनिटी बढ़ाता है, मांसपेशियों को ताकत देता है और दिमाग को हेल्दी रखता है. शरीर का 80-90 प्रतिशत विटामिन डी सूरज की रोशनी से बनता है. इसके लिए सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक की धूप सबसे फायदेमंद होती है, लेकिन जब लगातार 22-25 दिनों तक धूप नहीं निकलती तो शरीर में इसकी कमी हो जाती है. बिहार में पहले से ही विटामिन डी की कमी बेहद कॉमन है. कई स्टडीज में सामने आया है कि बिहार में 70 से 90 पर्सेंट लोग विटामिन डी की कमी से जूझते हैं. 2023 के एक सरकारी सर्वे से पता चला था कि पटना जिले में 82 प्रतिशत लोगों में विटामिन डी की कमी है.
विटामिन डी की कमी कितनी खतरनाक?
पटना के मशहूर हड्डी रोग विशेषज्ञ और ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अश्विनी गौरव ने बताया कि विटामिन डी की कमी से हड्डियां और मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं. कमर, घुटनों और जोड़ों में दर्द रहता है. बच्चों में रिकेट्स नाम की बीमारी हो सकती है, जिसमें हड्डियां टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं. बुजुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ता है, यानी हड्डियां बहुत कमजोर होकर आसानी से टूट जाती हैं. थोड़ी सी चोट में भी फ्रैक्चर हो सकता है. इम्यूनिटी कमजोर होने से बार-बार सर्दी-खांसी और वायरल इंफेक्शन होता है और बीमारी से ठीक होने में वक्त लगता है. विटामिन डी की कमी के शुरुआती लक्षण ज्यादा नहीं दिखते, लेकिन हड्डियों में दर्द हो तो इसे नजरअंदाज न करें. घरेलू उपाय आजमा सकते हैं, लेकिन एक-दो दिन में आराम न मिले तो डॉक्टर से मिलें और विटामिन डी की जांच कराएं.
विटामिन डी की कमी से क्या होता है?
न्यूरो सर्जन डॉ. श्याम सुंदर ने भी चेतावनी दी है कि विटामिन डी की कमी दिमाग पर बुरा असर डालती है. सुस्ती, थकान, चिड़चिड़ापन, उदासी, डिप्रेशन और नींद की समस्या हो सकती है. दिन भर सुस्ती रहती है, काम करने की इच्छा नहीं होती. हाल की स्टडीज में पाया गया कि विटामिन डी की कमी से डिप्रेशन और एंग्जायटी की दिक्कत बढ़ जाती है. विटामिन डी से दिमाग में सूजन कम होती है और यह सेरोटोनिन हार्मोन को नियंत्रित करता है, जो खुशी का हार्मोन है. वहीं, विटामिन डी की कमी होने पर मूड खराब रहता है. डॉ. श्याम सुंदर कहते हैं कि अगर ये लक्षण दिखें तो तुरंत जांच कराएं. धूप न मिल रही हो तो दवा से कमी पूरी की जा सकती है, लेकिन इन दवाओं का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें.
महिलाओं-बच्चों को होती है ये दिक्कतें
डॉक्टरों के मुताबिक, विटामिन महिलाओं और बच्चों पर इसका असर ज्यादा पड़ता है. गर्भवती महिलाओं में विटामिन डी की कमी से डिलीवरी के समय दर्द नहीं होता है. इससे गर्भ में बच्चे का विकास रुक सकता है और हड्डियां कमजोर हो सकती हैं. बच्चों में लंबाई और वजन नहीं बढ़ते. साथ ही, बाल झड़ते हैं, स्किन रूखी हो जाती है और घाव जल्दी नहीं भरते. डायबिटीज और दिल की बीमारी का खतरा भी बढ़ता है.
कैसे करें अपना बचाव?
डॉक्टरों की सलाह है कि ज्यादा से ज्यादा ताजा हरी सब्जियां और फल जैसे पालक, मशरूम, दूध और अंडे खाएं, जिनमें विटामिन डी के सोर्स होते हैं. हालांकि, मुख्य सोर्स धूप है. जब धूप निकले तो 15-20 मिनट चेहरे, हाथ-पैर पर लगने दें. ठंड में गर्म कपड़े पहनकर बाहर निकलें. अगर विटामिन डी की कमी ज्यादा है तो डॉक्टर से दवा लें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी हवाओं की वजह से ठंड बढ़ी है और कोहरा जनवरी के मध्य तक बना रह सकता है. ऐसे में को...

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग जल्दी-जल्दी तैयार होने वाले पैकेज्ड फूड पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं. चिप्स, बिस्किट, प...
10/01/2026

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग जल्दी-जल्दी तैयार होने वाले पैकेज्ड फूड पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं. चिप्स, बिस्किट, पैकेट वाला जूस, कोल्ड ड्रिंक, प्रोसेस्ड मीट, रेडी-टू-ईट नूडल्स और ब्रेड जैसी चीजें हर घर में आम हो गई हैं. अब सवाल उठता है कि क्या पैकेट वाली इन चीजों से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है? इस सवाल पर दुनिया भर में रिसर्च हो रही है. फ्रांस की बड़ी स्टडी न्यूट्रीनेट-सैंटे से लेकर हाल की रिपोर्ट्स तक कई सबूत मिले हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के ज्यादा सेवन से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है, लेकिन कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अभी पुख्ता सबूत नहीं हैं. पटना के मशहूर कैंसर एक्सपर्ट डॉ. बीपी सिंह ने भी इस पर अपनी राय दी है. आइए जानते हैं कि इस मसले पर उन्होंने क्या खुलासा किया?
कैसे होते हैं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने की वे चीजें हैं, जो फैक्ट्री में बहुत ज्यादा प्रोसेस की जाती हैं. इनमें नमक, चीनी, तेल और कई तरह के केमिकल ऐडिटिव्स जैसे प्रिजर्वेटिव्स, कलर, फ्लेवर और इमल्सिफायर मिलाए जाते हैं, जिससे फूड प्रॉडक्ट्स लंबे समय तक खराब न हों और स्वाद अच्छा लगे. आमतौर पर पैकेट में बंद चिप्स, सोडा, पैकेट जूस, प्रोसेस्ड चीज, सॉसेज, हैम जैसे मीट प्रॉडक्ट्स और कई तरह के स्नैक्स इसी कैटेगरी में आते हैं.
रिसर्च में क्या आ चुका सामने?
सबसे पहले पुरानी रिसर्च की बात करते हैं. दरअसल, साल 2018 के दौरान न्यूट्रीनेट-सैंटे नाम की बड़ी स्टडी में पाया गया कि अगर डाइट में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का हिस्सा 10 पर्सेंट बढ़ जाए तो कैंसर का खतरा 12 पर्सेंट और ब्रेस्ट कैंसर का खतरा 11 पर्सेंट बढ़ जाता है. यह स्टडी मशहूर मेडिकल जर्नल बीएमजे में प्रकाशित हुई थी, जिसके लिए हजारों लोगों को काफी समय तक फॉलो किया गया था. वहीं, जनवरी 2026 में ही बीएमजे जर्नल में न्यूट्रीनेट-सैंटे स्टडी का नया हिस्सा पब्लिश हुआ है, जिसमें फूड प्रिजर्वेटिव्स यानी सामान को खराब होने से बचाने वाले केमिकल्स पर फोकस किया गया.
नई स्टडी में इतने लोग हुए शामिल
जानकारी के मुताबिक, नई स्टडी में एक लाख से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया. नतीजे बताते हैं कि कुछ खास प्रिजर्वेटिव्स का ज्यादा सेवन सभी तरह के कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ाता है. दरअसल, पोटैशियम सोर्बेट, सोडियम नाइट्राइट, पोटैशियम नाइट्रेट और सोडियम इरिथोरबेट जैसे ऐडिटिव्स से खतरा ज्यादा दिखा. हालांकि, प्रिजर्वेटिव्स और कैंसर में डायरेक्ट कनेक्शन नहीं मिला, लेकिन ज्यादा इस्तेमाल करने वालों में कैंसर का रिस्क 10-20 प्रतिशत तक बढ़ा पाया गया.
क्यों बढ़ता है खतरा?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में ज्यादा नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट होता है, जो मोटापा, डायबिटीज और इन्फ्लेमेशन बढ़ाता है. ये सब कैंसर के लिए रिस्क फैक्टर हैं. साथ ही, पैकेजिंग से आने वाले केमिकल्स और प्रिजर्वेटिव्स शरीर में सूजन पैदा कर सकते हैं या डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं. प्लास्टिक पैकेट से माइक्रोप्लास्टिक्स भी शरीर में जा सकते हैं.
क्या कभी नहीं खाने चाहिए पैकेज्ड फूड?
तमाम रिसर्च पर फोकस करने पर सवाल उठता है कि क्या गलती से भी पैकेज्ड फूड नहीं खाने चाहिए? इस पर पटना के मशहूर कैंसर एक्सपर्ट डॉ. बीपी सिंह ने बताया कि अब तक कई रिसर्च हो चुकी हैं, लेकिन अब तक किसी लैब में पुख्ता सबूत नहीं मिले कि पैकेट वाले खाने से कैंसर होता है. यह साफ है कि पैकेज्ड फूड हानिकारक होता है, जिससे पेट की बीमारियां और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रॉब्लम्स बढ़ती हैं. ताजा जूस, दूध या ब्रेड फायदेमंद होते हैं, लेकिन पैकेट वाले फूड हानिकारक हो सकते हैं. प्लास्टिक पैकेट में आने वाले दूध को भी अच्छा नहीं माना जाता है, लेकिन कैंसर के सबूत अब तक नहीं मिले हैं. हालांकि, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसे फूड से पेट और आंतों से संबंधित कैंसर का खतरा बढ़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने की वे चीजें हैं, जो फैक्ट्री में बहुत ज्यादा प्रोसेस की जाती हैं. इनमें नमक, चीनी, तेल और ....

Why Do We Crave Sugar In Winter: सर्दियों में दिन छोटे और तापमान कम होते ही शरीर का झुकाव अपने-आप ज्यादा एनर्जी देने वाल...
10/01/2026

Why Do We Crave Sugar In Winter: सर्दियों में दिन छोटे और तापमान कम होते ही शरीर का झुकाव अपने-आप ज्यादा एनर्जी देने वाले खाने की तरफ बढ़ने लगता है. इसमें मीठी चीजें भी शामिल हैं. दरअसल, ठंड के मौसम में शरीर अतिरिक्त एनर्जी की तलाश करता है, ताकि खुद को गर्म और संतुलित रख सके. यही वजह है कि खाना खाने के बाद भी मिठाई या कुछ मीठा खाने की तलब महसूस होने लगती है.
इस मौसमी बदलाव का असर सिर्फ भूख पर नहीं, बल्कि मूड पर भी पड़ता है. कुछ स्टडी में पाया गया है कि सर्दियों में कार्बोहाइड्रेट और मीठी चीजों की क्रेविंग का संबंध मौसमी उदासी या सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर से भी हो सकता है. हालांकि अच्छी बात यह है कि रोशनी, सही खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी जैसी आदतों से इन क्रेविंग्स को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है.
सर्दियों में मीठे की तलब क्यों बढ़ती है?
2022 में Food Quality and Preference जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, ठंडा मौसम, कम होती धूप और सर्दियों से जुड़ी मानसिक धारणाएं लोगों को हल्के खाने के बजाय ज्यादा कैलोरी वाले फूड की ओर आकर्षित करती हैं. आसान शब्दों में कहें तो जैसे-जैसे मौसम ठंडा और अंधेरा होता है, शरीर और दिमाग दोनों ज्यादा एनर्जी देने वाले खाने की मांग करने लगते हैं.
वहीं, मेंटल हेल्थ से जुड़े रिसर्च बताते हैं कि सर्दियों का असर हमारी भावनाओं पर भी पड़ता है. The American Journal of Psychiatry में प्रकाशित एक पुराने लेकिन जरूरी स्टडी में पाया गया कि सीजनल डिप्रेशन से जूझ रहे लोग सर्दियों में वसंत या गर्मियों की तुलना में ज्यादा कार्बोहाइड्रेट और मीठी चीज़ें खाते हैं. रिसर्चर के अनुसार, मीठे और कार्बोहाइड्रेट की क्रेविंग सर्दियों में होने वाले डिप्रेशन के प्रमुख लक्षणों में से एक है.
मीठे की क्रेविंग को कैसे करें कंट्रोल?
अगर सर्दी आपको मीठे की तरफ खींच रही है, तो भी इसका मतलब यह नहीं कि आप खुद को बेबस मान लें। इन आसान उपायों से आप क्रेविंग को संभाल सकते हैं:
धूप को दिनचर्या में शामिल करेंधूप में कुछ समय बिताना या लाइट थेरेपी लैम्प का इस्तेमाल मूड और बॉडी क्लॉक को बेहतर करता है, जिससे मीठे की तलब कम हो सकती है.
हेल्दी और गर्म खाना चुनेंसूप, स्टू, गर्म अनाज, सब्ज़ियां जैसे भरपेट और पौष्टिक विकल्प अपनाएं. ये आपको संतुष्टि देंगे और बार-बार मीठा खाने की इच्छा नहीं होगी.
एक्टिव रहेंहल्की वॉक, स्ट्रेचिंग या घर के अंदर की एक्सरसाइज ब्लड शुगर को बैलेंस रखती है और मूड भी बेहतर बनाती है.
मेंटल हेल्थ का ध्यान रखेंसर्दियों में अकेलापन और तनाव बढ़ सकता है. दोस्तों से बातचीत, हॉबीज़ या क्रिएटिव एक्टिविटी इसमें मददगार हो सकती हैं.
पहले से तैयारी रखेंघर में हेल्दी विकल्प जैसे मेवे, गर्म चाय, फल या होल ग्रेन स्नैक्स रखें, ताकि मीठा ही एकमात्र विकल्प न बने.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आज के भागदौड़ भरे जीवन में जहां लोग बीमारियों के 'त्वरित समाधान' ढूंढ रहे हैं, वहीं योग गुरु बाबा रामदेव ने एक बार फिर प...
09/01/2026

आज के भागदौड़ भरे जीवन में जहां लोग बीमारियों के 'त्वरित समाधान' ढूंढ रहे हैं, वहीं योग गुरु बाबा रामदेव ने एक बार फिर पारंपरिक योग और अनुशासन की ओर लौटने का आह्वान किया है. अपने दैनिक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान दर्शकों को संबोधित करते हुए, रामदेव ने जोर देकर कहा कि योग केवल शरीर को हिलाना-डुलाना नहीं है, बल्कि यह एक स्थायी जीवनशैली है जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाती है.
संतुलन ही है असली स्वास्थ्य रामदेव ने आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों पर चर्चा करते हुए बताया कि आधुनिक जीवनशैली की अधिकांश समस्याओं की जड़ शरीर में वात, पित्त और कफ का असंतुलन है. उन्होंने कहा कि 'पावर योग' और 'एंटी-एजिंग योग' जैसी पद्धतियां शरीर के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में मदद करती हैं. जब ये तीन तत्व संतुलित रहते हैं, तो शरीर पुरानी बीमारियों, थकान और लाइफस्टाइल विकारों से लड़ने में अधिक सक्षम होता है. उनके अनुसार, "योग जीवन की नींव है, जो हमें अनुशासन और आंतरिक स्थिरता प्रदान करता है."
योग में 'तीव्रता' से ज्यादा मायने रखती है 'निरंतरता'
दैनिक अभ्यास और खान-पान पर जोर सत्र के दौरान उन्होंने सूर्य नमस्कार और प्राणायाम जैसे सरल अभ्यासों का प्रदर्शन किया. उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात यह कही कि योग में 'तीव्रता' से ज्यादा 'निरंतरता' मायने रखती है. स्वास्थ्य केवल चटाई पर योग करने से नहीं, बल्कि रसोई के अनुशासन से भी आता है.
रामदेव ने खान-पान के प्रति सचेत रहने की सलाह देते हुए कहा कि हमें पैकेज्ड फूड के बजाय प्राकृतिक और घर के बने भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए. उन्होंने प्रोटीन के लिए मूंगफली, दालें और दूध जैसे सुलभ विकल्पों का सुझाव दिया. साथ ही, उन्होंने चीनी के स्थान पर शहद का उपयोग करने और खाना पकाने में पाम ऑयल से बचने की सख्त हिदायत दी.
अनुशासित जीवनशैली को सही पोषण देना भी जरूरी
वेलनेस और सप्लीमेंट्स की भूमिका कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बताया कि एक अनुशासित जीवनशैली को सहारा देने के लिए सही पोषण भी जरूरी है. उन्होंने पतंजलि के वेलनेस और पोषण उत्पादों का जिक्र करते हुए कहा कि जब इन उत्पादों को नियमित योग और संतुलित आहार के साथ जोड़ा जाता है, तो बेहतर और लंबे समय तक टिकने वाले स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं.

बाबा रामदेव ने योग को जीवनशैली का अभिन्न अंग बताते हुए शारीरिक और मानसिक संतुलन पर जोर दिया. उन्होंने पतंजलि के वे.....

हाल ही में एक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान योग गुरु स्वामी रामदेव ने मानव शरीर की अद्भुत संरचना और उसके महत्व पर विस्तार से...
09/01/2026

हाल ही में एक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान योग गुरु स्वामी रामदेव ने मानव शरीर की अद्भुत संरचना और उसके महत्व पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने कहा कि मानव शरीर ब्रह्मांड के सबसे बड़े अजूबों में से एक है. रामदेव के अनुसार, शरीर के भीतर अनगिनत जटिल प्रक्रियाएं हर पल चलती रहती हैं, लेकिन अक्सर हम उन पर तब तक ध्यान नहीं देते जब तक कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या सामने नहीं आती.
प्राकृतिक खान-पान और अच्छी नींद
रामदेव ने स्वस्थ रहने के लिए दैनिक आदतों और खान-पान में सुधार पर जोर दिया. उन्होंने एक दिलचस्प जानकारी साझा करते हुए बताया कि रसोई में आसानी से उपलब्ध 'प्याज' प्राकृतिक रूप से अच्छी नींद लाने में सहायक हो सकता है. उनके अनुसार, कुछ प्राकृतिक खाद्य पदार्थ हमारे तंत्रिका तंत्र (Nervous system) को शांत करने में मदद करते हैं, जिससे बिना किसी बाहरी दवाओं के बेहतर आराम और गहरी नींद मिल सकती है.
लिवर और किडनी की भूमिका
शरीर के अंगों की कार्यप्रणाली को समझाते हुए उन्होंने लिवर और किडनी को 'स्वास्थ्य का आधार' बताया. रामदेव ने कहा कि लिवर न केवल पाचन में मदद करता है, बल्कि शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने (Detoxification) और मेटाबॉलिज्म को सुचारू रखने में भी महत्वपूर्ण है. इसी तरह, किडनी खून को साफ करने और रक्तचाप को नियंत्रित करने का आवश्यक कार्य करती है. इन अंगों का स्वस्थ होना ही शरीर की ऊर्जा और संतुलन के लिए अनिवार्य है.
योग और जड़ी-बूटियों का महत्व
रामदेव ने कपालभाति और अनुलोम-विलोम जैसे प्राणायामों के लाभों पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि इन श्वसन क्रियाओं से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है और मानसिक स्पष्टता आती है. साथ ही, उन्होंने 'अश्वगंधा' जैसी पारंपरिक जड़ी-बूटियों के महत्व को रेखांकित किया, जो तनाव कम करने और शारीरिक शक्ति बढ़ाने में कारगर हैं.
अनुशासित जीवनशैली ही कुंजी है
सत्र के अंत में उन्होंने लोगों को एक अनुशासित जीवनशैली अपनाने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि योग में निरंतरता, जागरूक खान-पान और पतंजलि के आयुर्वेद उत्पादों के सही उपयोग से व्यक्ति दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है. उनके अनुसार, प्रकृति के करीब रहना और अपनी शारीरिक क्षमताओं का सम्मान करना ही स्वस्थ जीवन का असली मार्ग है.

स्वामी रामदेव ने फेसबुक लाइव में मानव शरीर को अद्भुत बताते हुए स्वस्थ जीवनशैली पर जोर दिया. उन्होंने प्याज से अच्छ...

कड़ाके की ठंड और बदलते मौसम के साथ ही बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. ऐसे में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी 'इम्यू...
09/01/2026

कड़ाके की ठंड और बदलते मौसम के साथ ही बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. ऐसे में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी 'इम्यूनिटी' को मजबूत बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है. हाल ही में एक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान योग गुरु स्वामी रामदेव ने सर्दियों में स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने और बीमारियों से लड़ने के लिए जरूरी सुझाव साझा किए.
इम्यूनिटी रातों-रात नहीं, निरंतरता से बनती है
रामदेव बाबा ने अपने खास अंदाज में दर्शकों को समझाते हुए कहा कि इम्यूनिटी कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे रातों-रात हासिल किया जा सके. उन्होंने इसकी तुलना 'कंपाउंड इंटरेस्ट' (चक्रवृद्धि ब्याज) से की. उन्होंने बताया कि जिस तरह धीरे-धीरे जमा किया गया धन समय के साथ कई गुना बढ़ जाता है, उसी तरह जब हम शरीर को लंबे समय तक सही पोषण और अच्छी आदतें देते हैं तो उसके फायदे कई गुना बढ़कर मिलते हैं. यही अनुशासन हमें लंबी उम्र, बेहतर स्टैमिना और बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है.
पतंजलि च्यवनप्राश: 51 जड़ी-बूटियों का संगम
सत्र के दौरान उन्होंने पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि 'च्यवनप्राश' के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने बताया कि पतंजलि बैलेंस सेंटर्स में अलग-अलग उम्र और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के हिसाब से कई तरह के च्यवनप्राश उपलब्ध हैं. एक विशेष फार्मूले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें 51 जड़ी-बूटियों से निकले 5,000 से अधिक औषधीय यौगिक शामिल हैं. ये तत्व शरीर के प्राकृतिक रक्षा तंत्र को मजबूत करते हैं और सर्दियों के दौरान होने वाली थकान और संक्रमण से बचाते हैं.
शुगर के मरीजों के लिए खास विकल्प
अक्सर मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित लोग मीठा होने के कारण च्यवनप्राश के सेवन से बचते हैं. इस समस्या का समाधान बताते हुए रामदेव बाबा ने कहा कि अब शुगर-फ्री विकल्प भी मौजूद हैं. इससे मधुमेह रोगी भी बिना किसी चिंता के अपनी इम्यूनिटी बढ़ा सकते हैं और सर्दियों की बीमारियों से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं.
अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी औषधि तभी असरदार होती है जब आपकी जीवनशैली सही हो. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे च्यवनप्राश जैसे पारंपरिक सप्लीमेंट्स के साथ-साथ:

प्रतिदिन योगाभ्यास करें.
अनुशासित जीवन जिएं.
खान-पान में सावधानी बरतें.

स्वामी रामदेव के अनुसार, पारंपरिक आयुर्वेद और आधुनिक अनुशासन का मेल ही हमें स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रख सकता है.

सर्दी में बीमारियों से बचने के लिए स्वामी रामदेव ने इम्यूनिटी बढ़ाने पर जोर दिया है. उन्होंने च्यवनप्राश (51 जड़ी-बू...

Scientific Truth Behind Knuckle Cracking: कई लोगों का मानना है कि उंगलियां चटकाने से हाथों की पकड़ कमजोर हो जाती है. लेक...
09/01/2026

Scientific Truth Behind Knuckle Cracking: कई लोगों का मानना है कि उंगलियां चटकाने से हाथों की पकड़ कमजोर हो जाती है. लेकिन साइंटफिक रिसर्च इस धारणा का समर्थन नहीं करते. स्टडी में सामने आया है कि इस आदत से न तो ग्रिप स्ट्रेंथ कम होती है और न ही आर्थराइटिस का कोई पुख्ता संबंध पाया गया हैय एक डॉक्टर ने तो 50 साल तक रोज एक हाथ की उंगलियां चटकाईं, फिर भी उन्हें किसी तरह की समस्या नहीं हुईय हालांकि, अगर उंगलियां चटकाने के बाद दर्द या सूजन हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. ज्यादातर लोगों के लिए यह आदत सुरक्षित मानी जाती है.
उंगलियां चटकाने में एक अजीब-सी सुकून मिलता है, लेकिन इसके साथ अक्सर यह चेतावनी भी सुनने को मिलती है कि इससे हाथ कमजोर हो सकते हैं. इस आवाज के पीछे अनुमान और वर्षों से चली आ रही धारणाओं का मिक्सअप है, जो लोगों को सोचने पर मजबूर करता है क्या यह मामूली-सी आदत वाकई हाथों को नुकसान पहुंचा सकती है?
उंगलियाँ चटकाने पर आवाज क्यों आती है?
उंगलियां या जोड़ चटकाने पर जो चट-चट या दूसरी तरह की आवाज आती है, वह हड्डियों के टकराने से नहीं होती. एक्सपर्ट के मुताबिक, यह आवाज जोड़ों में मौजूद तरल साइनोवियल फ्लूइड में गैस के बुलबुले बनने और फूटने से आती हैय एक बार आवाज आने के बाद इन गैसों को दोबारा घुलने में समय लगता है, इसलिए तुरंत उसी जोड़ को फिर से चटकाया नहीं जा सकता.
रिसर्च क्या कहती है?
ग्रिप स्ट्रेंथ और कार्टिलेज एक चर्चित स्टडी में नियमित रूप से उंगलियां चटकाने वालों और न चटकाने वालों की पकड़ की ताकत और कार्टिलेज की मोटाई की तुलना की गई. नतीजा यह रहा कि रोज कई बार उंगलियां चटकाने वालों की ग्रिप स्ट्रेंथ दूसरों से कम नहीं थी.
लंबे समय में जोड़ों पर असर
लंबे समय के अध्ययनों में भी यह साबित नहीं हो पाया कि उंगलियां चटकाने से गठिया होता है। शोध बताते हैं कि अगर चटकाने में दर्द नहीं हो रहा, तो इससे लिगामेंट्स या जोड़ों को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचता.
कब सावधान होने की जरूरत है?
हालांकि यह आदत आमतौर पर सुरक्षित है, लेकिन अगर उंगलियां चटकाने के बाद दर्द या सूजन हो, जोड़ों में कमजोरी महसूस हो या फिर किसी असामान्य जोड़ में चटकाने पर तकलीफ हो तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है. इसी के साथ आपको एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि अब तक के साइंटफिक सबूत यही बताते हैं कि बिना दर्द के नियमित रूप से उंगलियां चटकाने से न तो हाथ कमजोर होते हैं और न ही जोड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारतीय रसोई में आलू और शकरकंद दोनों को ही जरूरी माना जाता है. एक तरफ आलू है, जिसे सब्जियों का राजा कहा जाता है तो वहीं  ...
09/01/2026

भारतीय रसोई में आलू और शकरकंद दोनों को ही जरूरी माना जाता है. एक तरफ आलू है, जिसे सब्जियों का राजा कहा जाता है तो वहीं दूसरी तरफ शकरकंद अपने मीठे स्वाद और न्यूट्रिएंट्स की वजह से जाना जाता है. दोनों ही जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां है और अंग्रेजी में इनके नाम भी मिलते-जुलते हैं. लेकिन जब बात गट हेल्थ की आती है, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि इनमें से कौन-सा ज्यादा फायदेमंद है. ऐसे में चलिए आज आपको बताते हैं कि शकरकंद या आलू गट हेल्थ के लिए बेस्ट ऑप्शन क्या है
आलू और गट हेल्थ का कनेक्शन
गट हेल्थ सिर्फ पाचन तक सीमित नहीं है. अच्छी आंतों की सेहत का सीधा कनेक्शन इम्यूनिटी, ब्लड शुगर कंट्रोल, वजन और यहां तक कि मूड से भी जुड़ा होता है. ऐसे में आ डाइट में क्या खाते हैं यह बहुत जरूरी माना जाता है. आलू को सिर्फ कार्बोहाइड्रेट से भरपूर माना जाता है, लेकिन इसमें कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो आंतों के लिए फायदेमंद माने जाते हैं. दरअसल आलू में पाया जाने वाला रेसिस्टेंट स्टार्च छोटी आंत में पचता नहीं है, बल्कि सीधे बड़ी आंत तक पहुंचता है. यहां यह गुड बैक्टीरिया के लिए फूड की तरह काम करता है और गट माइक्रोबायोम को मजबूत करता है. इसके अलावा आलू में फाइबर, विटामिन C और B6 भी होता है, जो पाचन के प्रोसेस को सपोर्ट करता है. हालांकि अगर किसी को गैस, एसिडिटी या पेट फूलने की समस्या रहती है, तो ज्यादा मात्रा में आलू खतरनाक हो सकता है.
शकरकंद को माना जाता है गट फ्रेंडली
शकरकंद को गट हेल्थ के लिए आलू से ज्यादा बेहतर ऑप्शन माना जाता है और इसकी वजह इसमें मौजूद फाइबर और प्रीबायोटिक गुण है. शकरकंद के छिलके में भरपूर फाइबर होता है, जो आंतों में गुड बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करता है. यही बैक्टीरिया पाचन को बेहतर बनाते हैं और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाते हैं. इसके अलावा शकरकंद में भी रेसिस्टेंट स्टार्च पाया जाता है, जो ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ने देता है और पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करता है.
किसका फाइबर ज्यादा असरदार?
शकरकंद में आलू की तुलना में लगभग दोगुना फाइबर पाया जाता है. यह फाइबर पाचन को दुरुस्त रखने, सूजन कम करने और आंतों की एक्टिविटी को नियमित बनाने में मदद करता है. वहीं आलू में फाइबर की मात्रा कम होती है, लेकिन उसका रेसिस्टेंट स्टार्च गट बैक्टीरिया के लिए फायदेमंद रहता है. आलू हो या शकरकंद दोनों को ही डीप फ्राई करने या ज्यादा नमक और मसालों के साथ खाने से इनके गुण कम हो जाते हैं. ऐसे में इन्हें उबालकर, भूनकर या सब्जी के रूप में खाना ही गट हेल्थ के लिए सही माना जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

गट हेल्थ पाचन तक सीमित नहीं है. आंतों की सेहत का सीधा कनेक्शन इम्यूनिटी, ब्लड शुगर कंट्रोल, वजन और यहां तक कि मूड से भ...

मिजोरम में पूर्व रणजी ट्रॉफी खिलाड़ी के. लालरेमरूआता की क्रिकेट मैदान पर ही हार्ट अटैक से मौत हो गई. मिजोरम के लिए रणजी ...
09/01/2026

मिजोरम में पूर्व रणजी ट्रॉफी खिलाड़ी के. लालरेमरूआता की क्रिकेट मैदान पर ही हार्ट अटैक से मौत हो गई. मिजोरम के लिए रणजी ट्रॉफी और सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी खेल चुके लालरेमरूआता महज 38 साल के थे और पूरी तरह फिट लगते थे. इससे पहले 2024 के दौरान कर्नाटक के पूर्व क्रिकेटर के. होयसाला की मैच के दौरान मौत हो गई थी तो 2025 के दौरान पंजाब में हरजीत सिंह नाम के एक स्थानीय क्रिकेटर छक्का मारने के तुरंत बाद गिर पड़े और उनकी मौत हो गई थी. ये सभी खिलाड़ी युवा थे और नियमित रूप से क्रिकेट खेलते थे. ऐसे में सवाल उठता है कि फिट खिलाड़ियों को भी हार्ट अटैक क्यों पड़ रहा है?
क्या है पूरा मामला?
आइजॉल के पास सिहमुई में स्थानीय सेकंड डिवीजन टूर्नामेंट चल रहा था. 8 जनवरी के मैच में लालरेमरूआता बैटिंग कर रहे थे. बैटिंग खत्म करके वह पवेलियन की तरफ लौट रहे थे. अचानक उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ और वह मैदान पर ही गिर पड़े. साथी खिलाड़ी और दर्शक उन्हें तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. मिजोरम क्रिकेट असोसिएशन ने बताया कि स्ट्रोक या हार्ट अटैक की वजह से ऐसा हुआ.
फिट दिखने वालों को क्यों पड़ रहा हार्ट अटैक?
मुंबई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल के सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अजित मेनन कहते हैं कि जिम जाने वाले या खेलने वाले जवान लोग अचानक हार्ट अटैक के शिकार हो रहे हैं. इसका कारण नींद की कमी, ज्यादा तनाव, गलत खान-पान, देर रात पार्टी करके सुबह जिम जाना और कभी-कभी नशीले पदार्थों का इस्तेमाल है. दरअसल, कई बार नसों में पहले से प्लाक जमा होता है, जो फट जाता है और खून का थक्का बन जाता है.
यह दिक्कत भी आई सामने
विजयवाड़ा स्थित मणिपाल हॉस्पिटल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. लक्ष्मी नव्या के मुताबिक, खेलते या एक्सरसाइज करते वक्त दिल तेज धड़कता है. अगर संबंधित व्यक्ति को पहले से ब्लॉकेज है तो अचानक दिक्कत हो सकती है और हार्ट अटैक पड़ सकता है. युवा खिलाड़ियों में जेनेटिक कारण भी होते हैं. साउथ एशियन लोगों में हार्ट की बीमारी का खतरा ज्यादा होता है. इसके अलावा मोटापे, धूम्रपान, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और परिवार में हार्ट की बीमारी की हिस्ट्री से भी खतरा बढ़ता है.
फिट लोग भी हो सकते हैं बीमार
डॉक्टरों का कहना है कि फिट दिखने वाले लोग भी हार्ट की समस्या के शिकार हो सकते हैं. कई बार दिल की नसों में ब्लॉकेज पहले से होती है, लेकिन पता नहीं चलता. खेलते समय दिल पर ज्यादा जोर पड़ता है तो ब्लॉकेज फट सकता है और हार्ट अटैक पड़ जाता है. पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में लोग 10 साल पहले ही हार्ट की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.
कैसे रखें अपना ध्यान?

रोजाना कम से कम 7-8 घंटे की नींद लें. नींद की कमी दिल पर बुरा असर डालती है.
तनाव कम करें. योग, ध्यान या घूमना-फिरना मदद करता है.
खान-पान संतुलित रखें. ज्यादा तला-भुना, जंक फूड से बचें. फल, सब्जियां, साबुत अनाज ज्यादा खाएं.
व्यायाम धीरे-धीरे बढ़ाएं. अचानक ज्यादा इंटेंस ट्रेनिंग न करें.
खेलने या जिम जाने से पहले डॉक्टर से दिल की जांच करवाएं. ईसीजी, ट्रेडमिल टेस्ट या ईको जरूरी है.
अगर परिवार में किसी को हार्ट की समस्या है तो ज्यादा अलर्ट रहें.
धूम्रपान और शराब बिल्कुल छोड़ दें.
खेलते समय अगर सीने में दर्द, सांस फूलना या चक्कर आएं तो तुरंत रुकें और डॉक्टर से मिलें.
इनके अलावा व्यायाम के साथ रेस्ट जरूरी है. हफ्ते में एक-दो दिन आराम भी करें.
हाइड्रेटेड रहें. खेलते समय खूब पानी पिएं.
संतुलित डाइट लें. बादाम, अखरोट जैसे ड्राई फ्रूट्स दिल के लिए अच्छे होते हैं.
ब्लड प्रेशर और शुगर चेक नियमित रूप से कराएं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

लालरेमरूआता बैटिंग खत्म करके वह पवेलियन लौट रहे थे. अचानक उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ और वह मैदान पर ही गिर पड़े. स.....

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