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Is Injecting Your Own Blood Dangerous: भोपाल में एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है, जिसे डॉक्टर ब्लड किक ...
16/04/2026

Is Injecting Your Own Blood Dangerous: भोपाल में एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है, जिसे डॉक्टर ब्लड किक के नाम से पहचान रहे हैं. यह कोई सामान्य नशा नहीं है, न इसमें शराब है, न ड्रग्स. लेकिन इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर उतने ही गंभीर और जानलेवा हो सकते हैं. इस अजीब आदत में कुछ युवा अपने ही शरीर से खून निकालकर उसे दोबारा इंजेक्ट करते हैं, ताकि उन्हें कुछ पलों के लिए ऊर्जा, सुकून या कंट्रोल का एहसास हो सके.
जनवरी 2026 से अब तक गांधी मेडिकल कॉलेज में ऐसे कम से कम पांच मामले सामने आ चुके हैं. सभी मरीज 18 से 25 साल के हैं. शुरुआत में परिवार को सिर्फ व्यवहार में बदलाव दिखता है, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहना. लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि उन्हें साइकेट्रिक के पास ले जाना पड़ता है.
पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग
हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि यह पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग मामला है. इन युवाओं में न शराब के लक्षण मिलते हैं, न ड्रग्स के. लेकिन शरीर पर सुई के निशान साफ दिखाई देते हैं. उनका मानना होता है कि अपने ही खून को दोबारा शरीर में डालने से उन्हें तुरंत राहत मिलती है, जबकि असल में यह एक खतरनाक मानसिक और शारीरिक जाल है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, साइकेट्रिस्ट डॉ जेपी अग्रवाल के अनुसार, यह व्यवहारिक लत है, कोई इलाज नहीं. दिमाग इस प्रक्रिया को एक इनाम की तरह लेने लगता है. खून निकालने का दर्द और उसके बाद मिलने वाला एहसास धीरे-धीरे आदत बन जाता है. वे बताते हैं यह खून के बारे में नहीं, बल्कि उस झूठे सुकून के बारे में है, जिसे व्यक्ति महसूस करता है.
बेहद गंभीर मामले
एक्सपर्ट के अनुसार, इसके खतरे बेहद गंभीर हैं. बार-बार खुद को इंजेक्शन लगाने से शरीर में इंफेक्शन फैल सकता है. सेप्सिस, एचआईवी, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा नसों को नुकसान, खून के थक्के, एनीमिया और यहां तक कि अंग फेल होने का जोखिम भी रहता है. शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया इस तरह के दबाव को झेल नहीं पाती और कुछ मामलों में यह अचानक मौत का कारण बन सकता है.
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मेंटल हेल्थ पर असर
डॉक्टर यह भी बताते हैं कि यह समस्या सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी है. इसके पीछे अक्सर डिप्रेशन, आत्म-नुकसान की प्रवृत्ति या ध्यान पाने की इच्छा छिपी होती है. यानी यह एक तरह से अंदर के दर्द का संकेत है, जो बाहर सुकून के रूप में दिखाई देता है. सोशल मीडिया भी इस खतरनाक ट्रेंड को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. अजीब और जोखिम भरे कंटेंट युवाओं को एक्सपेरिमेंट करने के लिए उकसाते हैं, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाता है.
डॉ. जेपी अग्रवाल साफ चेतावनी देते हैं, जो खून आपको जिंदा रखता है, वही गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर जान भी ले सकता है. यह कोई थ्रिल नहीं, बल्कि क्लिनिकल डेथ की ओर बढ़ता कदम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Harmful Habits And Health Risks: डॉक्टरों का कहना है कि यह पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग मामला है. इन युवाओं में न शराब के लक्षण मिलते हैं, ...

Can Heat Damage S***m Quality In Men: गर्मियों में तेज धूप में बाइक खड़ी करना कई लोगों के लिए रोज की बात है. जल्दी में ह...
15/04/2026

Can Heat Damage S***m Quality In Men: गर्मियों में तेज धूप में बाइक खड़ी करना कई लोगों के लिए रोज की बात है. जल्दी में हम अक्सर इस बात पर ध्यान ही नहीं देते कि कुछ घंटों तक धूप में खड़ी रही बाइक कितनी ज्यादा गर्म हो जाती है. लेकिन शायद ही कोई यह सोचता हो कि इसका असर सिर्फ बाइक पर नहीं, बल्कि आपकी सेहत खासतौर पर पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर भी पड़ सकता है.
क्या होता है असर?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट cloudninecare शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में स्पर्म सेल्स तापमान के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं. यही वजह है कि टेस्टिकल्स शरीर के बाहर होते हैं, ताकि उनका तापमान शरीर से 2–4 डिग्री कम बना रहे. यह संतुलन स्पर्म के सही विकास के लिए बेहद जरूरी होता है. लेकिन जब आप धूप से गर्म चीजों के संपर्क में आते हैं, तो गर्मी सीधे इस हिस्से का तापमान बढ़ा देती है.
एक्सपर्ट्स के अनुसार, लंबे समय तक ज्यादा गर्मी के संपर्क में रहने से स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या दोनों पर असर पड़ सकता है. हाई टेम्परेचर स्पर्म की मूवमेंट को धीमा कर देता है, जिससे उनकी स्टिकल्स तक पहुंचने की क्षमता कम हो जाती है. इतना ही नहीं, ज्यादा गर्मी स्पर्म के डीएनए को भी नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे उनकी संरचना असामान्य हो जाती है.
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हार्मोनल बैलेंस पर भी असर
गर्मी का असर सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. लगातार शरीर के उस हिस्से का तापमान बढ़ने से हार्मोनल बैलेंस भी बिगड़ सकता है. टेस्टोस्टेरोन जैसे जरूरी हार्मोन, जो स्पर्म प्रोडक्शन को नियंत्रित करते हैं, उनका स्तर प्रभावित हो सकता है. इसके साथ ही, ज्यादा गर्मी से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, जो टेस्टिकल्स को नुकसान पहुंचा सकता है. गर्मियों में डिहाइड्रेशन भी एक बड़ी समस्या बन जाता है. शरीर में पानी की कमी होने पर ब्लड फ्लो और हार्मोन का ट्रांसपोर्ट प्रभावित होता है. इससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया और भी कमजोर हो सकती है. याद रखें, सीमन का बड़ा हिस्सा पानी से बना होता है, इसलिए शरीर का हाइड्रेटेड रहना बहुत जरूरी है.
इन चीजों का भी होता है असर
इसके अलावा टाइट कपड़े पहनना, लंबे समय तक गर्म सीट पर बैठना और लगातार धूप में रहना ये सभी चीजें मिलकर स्थिति को और खराब कर सकती हैं. यही कारण है कि एक्सपर्ट्स गर्मियों में शरीर को ठंडा रखने और ज्यादा हीट एक्सपोजर से बचने की सलाह देते हैं. अगर आप रोजाना बाइक इस्तेमाल करते हैं, तो कोशिश करें कि उसे सीधी धूप में लंबे समय तक खड़ा न रखें. कवर का इस्तेमाल करें या छांव में पार्क करें. बाइक चलाने से पहले सीट को थोड़ा ठंडा होने दें. इसके साथ ही, ढीले और आरामदायक कपड़े पहनें और शरीर को हाइड्रेट रखें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Summer Health Tips For Men: लंबे समय तक ज्यादा गर्मी के संपर्क में रहने से स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या दोनों पर असर पड़ सकता है. हाई ...

हमारे देश में नई पीढ़ी की वजन घटाने वाली दवाओं पर हुई एक स्टडी में सामने आया है कि बिना डायबिटीज वाले लोग को और कम उम्र ...
15/04/2026

हमारे देश में नई पीढ़ी की वजन घटाने वाली दवाओं पर हुई एक स्टडी में सामने आया है कि बिना डायबिटीज वाले लोग को और कम उम्र के मरीजों में वजन तेजी से कम होता है. यह स्टडी देश में पहली बार वास्तविक परिस्थितियों में की गई है, जिसमें ओवरवेट और मोटापे से जूझ रहे लोगों पर इन दवाओं के असर को देखा गया है. यह रिसर्च 150 ऐसे लोगों पर आधारित है, जिन्हें 6 महीने तक इंजेक्शन के जरिए सेमाग्लूटाइड और टिरजेपेटाइड जैसी दवाएं दी गई. यह दोनों दवाएं जीएलपी-1 थेरेपी से जुड़ी है, जो पहले टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए विकसित की गई थी. लेकिन अब मोटापे के इलाज में भी इस्तेमाल हो रही है. इस स्टडी के नतीजे इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित हुए हैं.कितने लोगों का वजन कितना घटा?स्टडी के अनुसार करीब 41 प्रतिशत प्रतिभागियों का वजन 10 प्रतिशत से ज्यादा काम हुआ. कुल मिलाकर औसत वजन घटने की दर 8.2 प्रतिशत रही. इस स्टडी में डायबिटीज से ग्रस्त और बिना डायबिटीज वाले लोगों के बीच अंतर भी साफ दिखा. जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उनका वजन औसतन 11.21 प्रतिशत तक घटा, जबकि डायबिटीज वाले मरीजों में यह कमी करीब 5.48 प्रतिशत रही.कौन सी दवाएं रही ज्यादा असरदार?इस स्टडी में यह भी पाया गया है कि टिरजेपेटाइड लेने वाले मरीजों में वजन घटने की दर ज्यादा रही. इस दवा के साथ औसत वजन में 8.60 प्रतिशत की कमी देखी गई. जबकि सेमाग्लूटाइड लेने वालों में यह 5.62 प्रतिशत रही. इसके अलावा जो मरीज पहले कभी जीएलपी-1 थेरेपी नहीं ले चुके थे उनमें वजन तेजी से घटता देखा गया.स्टडी में उम्र का भी दिखा असररिसर्च में यह सामने आया कि युवाओं में वजन कम होने की प्रक्रिया तेज होती है. खासतौर पर 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने का लक्ष्य युवा और नए मरीजों में जल्दी हासिल हुआ. हालांकि 10 प्रतिशत से कम वजन घटाने की रफ्तार पर डायबिटीज का असर खास असर नहीं देखा गया है. इसके अलावा स्टडी के अनुसार 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने में औसतन 9.5 महीने का समय लगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन दवाओं का पूरा असर आमतौर पर 12 से 18 महीना के बीच दिखाई देता है.ये भी पढ़ें-Roti or Rice Health Benefits: उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?
डायबिटीज और मोटापे के बीच का कनेक्शनस्टडी में यह भी सामने आया है कि जिन मरीजों को डायबिटीज के साथ मोटापा भी है, उनमें वजन कम होना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है. एक्सपर्ट के अनुसार भारतीय मरीजों में मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्या ज्यादा खतरनाक होती है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस भी ज्यादा पाया जाता है. इसके अलावा डायबिटीज के मरीज अक्सर पहले से कई दवाएं ले रहे होते हैं, जिनमें इंसुलिन भी शामिल हो सकता है. इससे वजन घटाने की प्रक्रिया धीमी में हो जाती है. वहीं बताया जा रहा है कि यह नतीजा ऐसे समय सामने आए हैं, जब सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म हो गया है, जिससे भारत के तेजी से बढ़ते एंटी ओबेसिटी मार्केट में कई जेनेरिक वर्शन का रास्ता साफ हो गया है. जिससे देश में हिंदी दवाओं की बिक्री और बढ़ गई है. वहीं एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज पीड़ित है. 25.4 करोड़ लोग जनरलाइज्ड ओबेसिटी से पीड़ित है और 35.1 प्रतिशत लोग पेट के मोटापे से पीड़ित है. डॉक्टरों के अनुसार यह सब बदलते खान-पान और बढ़ती हुई सेडेंटरी लाइफस्टाइल की वजह से हो रहा है.
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यह स्टडी देश में पहली बार वास्तविक परिस्थितियों में की गई है, जिसमें ओवरवेट और मोटापे से जूझ रहे लोगों पर इन दवाओं क...

Does Drinking Milk Increase Parkinson Disease Risk: आपने शायद कहीं न कहीं यह जरूर सुना होगा या देखा होगा कि दूध और पार्क...
15/04/2026

Does Drinking Milk Increase Parkinson Disease Risk: आपने शायद कहीं न कहीं यह जरूर सुना होगा या देखा होगा कि दूध और पार्किंसन बीमारी के बीच कोई संबंध हो सकता है. यह सुनकर कई लोग चौंक जाते हैं और सोचने लगते हैं कि क्या अब दूध पीना भी नुकसानदायक है. सच यह है कि इस विषय पर जो रिसर्च हुई है, वह पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है कि दूध पीना बंद कर दें, वरना बीमारी हो जाएगी.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. सादिक पठान ने TOI को बताया कि कई स्टडीज में यह देखा गया है कि डेयरी प्रोडक्ट्स, खासकर ज्यादा मात्रा में दूध पीने वाले लोगों में पार्किंसन का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है. खासतौर पर पुरुषों में यह जोखिम 20 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा पाया गया है. हालांकि, यह सीधा कारण नहीं बल्कि एक संबंध है, जिसे अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है.
क्या निकला रिसर्च में?
इस विषय पर सबसे लंबी और बड़ी रिसर्च हार्वर्ड यूनिवर्सिटीसे जुड़ी स्टडीज में नर्सेस हेल्थ स्टडी और हेल्थ प्रोफेशनल्स फॉलो-अप स्टडी में सामने आई. करीब 25 साल तक लोगों की डाइट को ट्रैक करने के बाद पाया गया कि जो लोग रोजाना लो-फैट डेयरी के तीन या उससे ज्यादा सर्विंग लेते थे, उनमें पार्किंसन का खतरा 34 प्रतिशत ज्यादा था, तुलना में उन लोगों के जो बहुत कम डेयरी लेते थे.
इसी तरह अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की कैंसर प्रिवेंशन स्टडी में भी एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया. इसमें हजारों पुरुष और महिलाओं को शामिल किया गया और पाया गया कि डेयरी का सेवन करने वालों में यह जोखिम पुरुषों में 1.8 गुना और महिलाओं में 1.3 गुना तक बढ़ा हुआ था.
क्या दूध से ऐसा होता है?
अब सवाल यह है कि आखिर दूध में ऐसा क्या हो सकता है? कुछ रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि दूध में मौजूद पेस्टिसाइड के अवशेष, जैसे हेप्टाक्लोर एपॉक्साइड, दिमाग के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. इसके अलावा दूध में मौजूद गैलेक्टोज भी एक फैक्टर माना जा रहा है, जो ज्यादा मात्रा में लेने पर दिमाग पर असर डाल सकता है. एक और दिलचस्प थ्योरी गट-ब्रेन कनेक्शन से जुड़ी है. माना जाता है कि डेयरी हमारे गट माइक्रोबायोम को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ ऐसे प्रोटीन बनते हैं जो आगे चलकर दिमाग तक पहुंच सकते हैं और बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
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हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको तुरंत दूध या डेयरी प्रोडक्ट्स छोड़ देने चाहिए. रिसर्च का संकेत सिर्फ इतना है कि संतुलन जरूरी है. अगर आप बहुत ज्यादा मात्रा में खासकर लो-फैट या स्किम मिल्क लेते हैं, तो उसे थोड़ा कम करना बेहतर हो सकता है.
क्या होता है पार्किंसन के लक्षण?
भारत में पार्किंसन के मामले भी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. इसके लक्षणों में हाथ कांपना, शरीर में जकड़न, धीमी मूवमेंट और पोस्टर का बिगड़ना शामिल हैं. वहीं शुरुआती संकेतों में कब्ज, सूंघने की क्षमता कम होना, नींद की समस्या और मूड स्विंग भी देखे जा सकते हैं. डॉक्टरों का मानना है कि इस बीमारी से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर जोखिम को कम जरूर किया जा सकता है.
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Dairy And Brain Connection: कई स्टडीज में यह देखा गया है कि डेयरी प्रोडक्ट्स, खासकर ज्यादा मात्रा में दूध पीने वाले लोगों में पार्कि...

Salt to Newborn Baby: हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में परंपराएं और रीति रिवाज जीवन के हर पड़ाव से जुड़े होते हैं. ऐसा ही...
14/04/2026


Salt to Newborn Baby: हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में परंपराएं और रीति रिवाज जीवन के हर पड़ाव से जुड़े होते हैं. ऐसा ही एक रिवाज एक समुदाय में भी खूब प्रचलित हैं. जहां जन्म से लेकर मृत्यु तक कई खास परंपराएं निभाई जाती है, जिनमें नमक का भी विशेष महत्व माना जाता है.
हमारे देश में एक जगह पर नवजात बच्चे को जन्म के तुरंत बाद नमक चाटने की परंपरा है, जो इस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौन सी जगह पर बच्चा पैदा होते ही नमक चटाया जाता है और इसका सेहत पर क्या असर पड़ता है.
यहां बच्चा पैदा होते ही चटाया जाता है नमक
मणिपुर के मैतेई समुदाय में बच्चा पैदा होते ही नमक चाटने की परंपरा है. मैतेई समुदाय में नमक सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े हर महत्वपूर्ण अवसर का हिस्सा माना जाता है. स्थानीय स्तर पर तैयार किया जाने वाला नमक जिसे थुम भी कहा जाता है, इसे प्राकृतिक खारे पानी के सोर्स से तैयार किया जाता है. गांव में लोग इन सोर्स से पानी इकट्ठा कर उसे उबालते हैं, जिससे नमक तैयार होता है. यही नमक बाद में घरों में उपयोग किया जाता है और बाजार में भी बेचा जाता है. वहीं इस समुदाय में मान्यता है कि बच्चों के जन्म के बाद उसे नमक चाटना जरूरी होता है. इस तरह यहां किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसके मुंह में नमक रखा जाता है. शादी, त्योहार और दूसरे पारिवारिक आयोजन में भी नमक का इस्तेमाल अनिवार्य माना जाता है. इस तरह से यहां नमक को जीवन चक्र का अहम हिस्सा माना जाता है.
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सेहत के नजरिए से क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि नवजात बच्चे को जन्म के बाद शुरुआती महीनों में नमक देना ठीक नहीं होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और डॉक्टराें के अनुसार, बच्चों को जन्म से लेकर 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध ही देना चाहिए. इसके बाद ठोस आहार शुरू किया जाता है, तब भी शुरुआत में नमक और चीनी से परहेज करने की सलाह दी जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों की किडनी पूरी तरह विकसित नहीं होती है. इसलिए ज्यादा नमक उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है. इससे किडनी पर दबाव पड़ता है और भविष्य में हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
कब देना चाहिए बच्चों को नमक?
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार बच्चों को 1 साल की उम्र के बाद ही सीमित मात्रा में नमक देना शुरू करना चाहिए. 1 से 3 साल के बच्चों के लिए रोजाना नमक की मात्रा बहुत कम रखनी चाहिए, ताकि उनके शरीर पर इसका नकारात्मक असर न पड़े.
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How Fake Keytruda Reached Cancer Patients In India: पंजाब के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी भारत में कैंसर इलाज की एक...
14/04/2026

How Fake Keytruda Reached Cancer Patients In India: पंजाब के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी भारत में कैंसर इलाज की एक खतरनाक सच्चाई को उजागर करती है. साल 2022 की शुरुआत में चंडीगढ़ के पास रहने वाली 56 वर्षीय महिला का लिवर कैंसर का इलाज PGIMER में चल रहा था. डॉक्टरों ने उन्हें एक महंगी इम्यूनोथेरेपी दवा कीट्रूडा लेने की सलाह दी, जिसकी कीमत 100 mg की एक वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था, इसलिए परिवार ने सितंबर से दिसंबर के बीच 12 वायल डिस्काउंट पर करीब 16 लाख रुपये में खरीदीं। लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली पुलिस का फोन आया और पता चला कि ये दवाएं नकली थीं, जिनमें एंटीफंगल दवा भरी गई थी.
जांच में खुलासा
यह मामला अकेला नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस औरइंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स की संयुक्त जांच में सामने आया है कि भारत में महंगी कैंसर दवाओं, खासकर कीट्रूडा, का एक बड़ा नकली बाजार सक्रिय है. इस जांच में 12,500 से ज्यादा पन्नों के रिकॉर्ड, अस्पताल डेटा और डॉक्टरों से बातचीत शामिल रही.
बेहद संगठित तरीके से काम करता है नेटवर्क
जांच में पता चला कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता है. खाली वायल इकट्ठा की जाती हैं, उनमें दूसरी दवाएं भरकर दोबारा सील किया जाता है और फिर बाजार में सस्ती कीमत पर बेचा जाता है. कई बार यह कीमत असली से 40 प्रतिशत तक कम होती है, जिससे मरीजों को यह राहत लगती है, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में अस्पतालों के अंदर के लोग भी शामिल पाए गए. दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में काम करने वाले कुछ फार्मासिस्ट कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए या आधे भरे वायल बाहर ले जाते थे और उन्हें इस रैकेट को बेचते थे. पुलिस ने छापेमारी में कई वायल, खाली बॉक्स और संदिग्ध बैच नंबर बरामद किए, जो सीधे मरीजों को दी गई दवाओं से मेल खाते थे. जांच में जब पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलनी शुरू कीं, तो एक अहम नाम सामने आया, परवेज. वह पहले एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के तौर पर काम कर चुका था और बाद में इस रैकेट का अहम हिस्सा बन गया. पुलिस के मुताबिक, परवेज ही वह कड़ी था जो अस्पताल के अंदर से दवाओं को बाहर लाने और उन्हें आगे सप्लाई करने का काम संभाल रहा था.
अस्पताल में काम करने वाले लोग शामिल
परवेज ने यह भी बताया कि उसने अस्पताल में काम करने वाले कोमल और अभय से संपर्क किया, जो उसे खाली और भरी हुई वायल उपलब्ध कराते थे. उसने बताया कि मैं खाली वायल के 3000 दूंगा और अगर अगर वो इंजेक्शन भरा उपलब्ध करवाते हैं, तो उसके बदले में 40 हजार से 50 हजार दिया जाएगा. इस तरह 8 से 9 महीने में 10- 12 भरा वायल और 120 वायर कोमल से उसे मिला और अभय ने उसे 10 खाली और 10-12 भरा वायर दिया. जो बाद में इस अवैध नेटवर्क के जरिए बेची गईं.
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मरीज की हो गई मौत
जांच में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में सख्त प्रोटोकॉल होने के बावजूद एक बड़ी कमी थी कि खाली वायल की गिनती का कोई ठोस सिस्टम नहीं था. इसी खामी का फायदा उठाकर यह पूरा खेल चलाया गया. बाद में अस्पतालों ने निगरानी बढ़ाई, CCTV सिस्टम मजबूत किया और दवा निपटान की प्रक्रिया को और सख्त बनाया. इस रैकेट का सबसे दर्दनाक असर मरीजों पर पड़ता है. बिहार की एक महिला, जो सस्ती दवा की तलाश में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से इंजेक्शन खरीद रही थीं, इलाज के दौरान ही हालत बिगड़ने के बाद दम तोड़ गईं. बाद में परिवार को पता चला कि दवा नकली हो सकती थी. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक गैंग तक सीमित नहीं है. यह एक बड़े सिस्टम की कमजोरी को दिखाता है, जहां महंगे इलाज और आर्थिक दबाव के बीच मरीज आसानी से ठगी का शिकार बन जाते हैं.
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Roti or Rice Health Benefits : भारत में खाने की परंपरा बहुत अलग है. उत्तर भारत में जहां रोटी मुख्य खाना है, वहीं दक्षिण ...
14/04/2026

Roti or Rice Health Benefits : भारत में खाने की परंपरा बहुत अलग है. उत्तर भारत में जहां रोटी मुख्य खाना है, वहीं दक्षिण और पूर्व भारत में खाने में चावल का ज्यादा यूज होता है. अक्सर लोग इस बात पर बहस करते हैं कि रोटी ज्यादा हेल्दी है या चावल? कुछ लोग कहते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, जबकि कई लोग मानते हैं कि चावल तो सदियों से हमारा मुख्य खाना रहा है और इसे खाने से लोग हेल्दी रहते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है.
रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है
असल में रोटी और चावल के बीच कौन बेहतर है, इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह व्यक्ति के शरीर, उसकी पाचन शक्ति, लाइफस्टाइल और खाने की आदतों पर निर्भर करता है. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस बात को मानते हैं कि हर इंसान के लिए एक जैसी डाइट सही नहीं होती है. जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है, उनके लिए चावल हल्का और आसानी से पचने वाला ऑप्शन होता है, जबकि जिनका शरीर ज्यादा एक्टिव है और जो शारीरिक मेहनत करते हैं, उनके लिए रोटी ज्यादा एनर्जी और लंबे समय तक पेट भरा रखने वाली होती है.
चावल और गेहूं के फायदे
1. चावल और गेहूं दोनों को ही जरूरी अनाज माना गया है, लेकिन इनके गुण और प्रभाव अलग-अलग बताए गए हैं. आयुर्वेद के अनुसार हर खाने का असर शरीर की प्रकृति (प्रकृति), पाचन शक्ति (अग्नि) और दोषों (वात, पित्त, कफ) पर पड़ता है.
2. चावल को आयुर्वेद में मीठे टेस्ट वाला, शरीर को ठंडक देने वाला और हल्का अनाज माना गया है, जो आसानी से पच जाता है. 3. इसे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ तीनों को संतुलित करने में मददगार बताया गया है. इसी कारण चावल को रोज खाने योग्य खाना माना गया है, खासकर जब इसे सही तरीके से पकाया जाए और बैलेंस डाइट के साथ लिया जाए. 4. वहीं रोटी को भारी, ज्यादा पोषण देने वाला और शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला अनाज कहा गया है. 5. यह शरीर में ताकत और एनर्जी बढ़ाने में मदद करता है और वात- पित्त दोष को शांत करता है. इसलिए गेहूं को विशेष रूप से उन लोगों के लिए अच्छा माना गया है जो शारीरिक रूप से ज्यादा एक्टिव रहते हैं या जिन्हें ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है.
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किन लोगों के लिए क्या बेहतर है?
चावल और रोटी दोनों ही अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरह से फायदेमंद होते हैं. चावल को हल्का और आसानी से पचने वाला माना जाता है, इसलिए यह बीमार लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और कमजोर पाचन शक्ति वाले व्यक्तियों के लिए बेहतर ऑप्शन है. ऐसे लोगों के लिए खिचड़ी या दाल-चावल जैसा हल्का खाना ज्यादा यूजफुल होता है क्योंकि ये पेट पर ज्यादा बोझ नहीं डालते और आसानी से पच जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रोटी, यानी गेहूं से बना खाना, ज्यादा एनर्जी और ताकत देने वाला माना जाता है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो शारीरिक मेहनत करते हैं, जैसे किसान या भारी काम करने वाले लोग, या जिनकी पाचन शक्ति मजबूत होती है.
विज्ञान क्या कहता है?
विज्ञान के अनुसार, रोटी और चावल दोनों के अपने अलग-अलग पोषण गुण हैं, ऐसे में यह तय करना कि कौन बेहतर है, इसके लिए पूरा डाइट पैटर्न ज्यादा जरूरी होता है. गेहूं में चावल की तुलना में ज्यादा प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है, जिससे यह पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है और एनर्जी धीरे-धीरे रिलीज करता है. वहीं चावल हल्का होता है और जल्दी पच जाता है. लेकिन जब इन्हें दाल, सब्जी और घी जैसे संतुलित आहार के साथ खाया जाता है, तो दोनों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) लगभग समान हो जाता है, यानी ब्लड शुगर पर इनका असर काफी हद तक संतुलित हो जाता है. इसलिए विज्ञान यह बताता है कि सिर्फ रोटी या चावल पर ध्यान देने की जगह पूरे खाने की क्वालिटी और बैलेंस ज्यादा फायदेमंद रखता है.
किस अनाज से होता है शरीर को नुकसान
आजकल हम जो अनाज खाते हैं वह बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और रिफाइंड हो चुका है. पॉलिश किया हुआ सफेद चावल अपने छिलके और जर्म को खो देता है, जिससे उसमें फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं और उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बढ़ जाता है, जिसके कारण यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. इसी तरह मैदा, जो गेहूं को बहुत ज्यादा रिफाइन करके बनाया जाता है, उसमें भी फाइबर और पोषण लगभग खत्म हो जाते हैं, जिससे यह पाचन के लिए भारी और शरीर के लिए कम फायदेमंद हो जाता है.
क्या है सही और बेस्ट ऑप्शन
सही और बेस्ट ऑप्शन के लिए आप प्राकृतिक और कम प्रोसेस किए हुए अनाज चुनें, जैसे ब्राउन राइस या अनपॉलिश चावल, और होल व्हीट यानी साबुत गेहूं का आटा, क्योंकि इनमें फाइबर और पोषक तत्व अधिक मात्रा में सुरक्षित रहते हैं. इसके साथ ही खाने को हमेशा बैलेंस में लेना जरूरी है, जिसमें दाल, सब्जी और थोड़ी मात्रा में घी शामिल हो, ताकि शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें.
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Why Doctors Recommend Drinking Water Before Meals: अक्सर आपने सुना होगा कि खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी ...
14/04/2026

Why Doctors Recommend Drinking Water Before Meals: अक्सर आपने सुना होगा कि खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी इस आदत को अपनाने की सलाह देते हैं. लेकिन क्या यह सच में फायदेमंद है या सिर्फ एक आम धारणा? इस सवाल का जवाब समझना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी रोजमर्रा की हेल्थ से जुड़ा हुआ है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर डॉक्टर ऐसा क्यों कहते हैं.
क्यों खाने से पहले पानी पीना चाहिए?
Harvard Health की एक रिपोर्ट के अनुसार, असल में, खाना खाने से पहले पानी पीने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे पेट पहले से थोड़ा भर जाता है, जिससे आप कम खाना खाते हैं. हमारे पेट में कुछ ऐसे नर्व्स होते हैं जो फैलाव को महसूस करके दिमाग को संकेत भेजते हैं कि अब खाना पर्याप्त है. माना जाता है कि अगर आप पहले पानी पी लेते हैं, तो यही सिग्नल जल्दी मिलने लगता है और ओवरईटिंग से बचाव होता है.
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क्या होता है इसका असर?
कुछ छोटे और सीमित समय वाली स्टडी में यह देखा भी गया है कि जो लोग खाने से पहले एक गिलास पानी पीते हैं, वे दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम खाना खाते हैं. खासकर जो लोग वजन घटाने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनमें यह आदत हल्का फायदा दे सकती है. हालांकि, लंबे समय में इसका असर कितना होता है, इस पर अभी भी पुख्ता सबूत नहीं हैं.
एक और कारण यह बताया जाता है कि कई बार हमें भूख नहीं बल्कि प्यास लगती है, लेकिन हम इसे समझ नहीं पाते और कुछ खा लेते हैं. ऐसे में अगर पहले पानी पी लिया जाए, तो अनावश्यक कैलोरी लेने से बचा जा सकता है. लेकिन इस थ्योरी को लेकर भी साइंटफिक प्रमाण बहुत मजबूत नहीं हैं.
वजन कम करने में मददगार
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पानी पीने से शरीर कैलोरी बर्न करता है, क्योंकि शरीर को पानी को अपने तापमान तक गर्म करना पड़ता है. लेकिन हाल के रिसर्च बताते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत कम कैलोरी खर्च होती है, इसलिए इसे वजन घटाने का बड़ा कारण नहीं माना जा सकता. हालांकि, एक बात साफ है कि अगर आप मीठे पेय या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीते हैं, तो यह आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है और वजन कम करने में मदद कर सकता है. तो क्या खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए? इसका जवाब पूरी तरह हां या नहीं में नहीं है. कुछ लोगों के लिए यह आदत फायदेमंद हो सकती है, खासकर अगर इससे वे कम खाते हैं या ओवरईटिंग से बचते हैं. लेकिन इसे कोई जादुई उपाय भी नहीं माना जा सकता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Healthy Drinking Habits: माना जाता है कि अगर आप पहले पानी पी लेते हैं, तो यही सिग्नल जल्दी मिलने लगता है और ओवरईटिंग से बचाव होता है. ...

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