Sanatana Dharma Parishad

Sanatana Dharma Parishad Sanatana Dharma Parishad is a Religious Organization. Its, main motive is Propagate indian cluture

04/06/2022
28/05/2022

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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*॥ कर्मों की फलती - फूलती खेती ॥*
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👉 *"मनुष्य जीवन एक खेत है, जिसमें कर्म बोए जाते हैं और उन्हीं के अच्छे - बुरे फल काटे जाते हैं ।"* जो अच्छे कर्म करता है, वह अच्छे फल पाता है, बुरे कर्म करने वाला बुराई समेटता है । कहावत है -- *"आम बोएगा, वह आम खाएगा, बबूल बोएगा, वह काँटे पाएगा ।"* बबूल बोकर जिस तरह आम प्राप्त करना प्रकृति का सत्य नहीं, उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर भलाई पा लेने की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
👉 मनुष्य जीवन में भी इस सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । *"भलाई" का फल "सुख," "शान्ति" और "प्रगति" के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता, वैसे ही "बुराई" का प्रतिफल "बुराई" न हो - ऐसा आज तक न कभी हुआ और न आगे होगा ।"* इतिहास इसका साक्षी है ।
👉 *"कार्य कभी कारणरहित नहीं होते और उसी तरह कोई भी क्रिया परिणामरहित नहीं होती ।"*'स्थूल और सूक्ष्म दोनों दृष्टि से सृष्टि का यह मौलिक नियम है कि *"भाग्य कभी अपने आप नहीं बनते वरन वह व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखे जाते हैं ।"* अच्छा या बुरा भाग्य सदैव अपने ही कर्म का फल होता है ।
👉 व्यक्ति हो, समाज या राष्ट्र हो - वह बुराई से पनपा, *"यह एक भ्रम है ।"* जीवन हर क्षण का लेखा-जोखा रखता है । *"धोखे की सफलताएँ अंततः पतन और अपयश का ही कारण बनती हैं ।"* अंत तक साथ देने वाली सफलता भलाई की है *"उसी से मनुष्य का यह लोक और परलोक सुधरता है । "कर्मफल तो अकाट्य है ।"*
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28/05/2022

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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*॥ कर्मों की फलती - फूलती खेती ॥*
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👉 *"मनुष्य जीवन एक खेत है, जिसमें कर्म बोए जाते हैं और उन्हीं के अच्छे - बुरे फल काटे जाते हैं ।"* जो अच्छे कर्म करता है, वह अच्छे फल पाता है, बुरे कर्म करने वाला बुराई समेटता है । कहावत है -- *"आम बोएगा, वह आम खाएगा, बबूल बोएगा, वह काँटे पाएगा ।"* बबूल बोकर जिस तरह आम प्राप्त करना प्रकृति का सत्य नहीं, उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर भलाई पा लेने की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
👉 मनुष्य जीवन में भी इस सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । *"भलाई" का फल "सुख," "शान्ति" और "प्रगति" के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता, वैसे ही "बुराई" का प्रतिफल "बुराई" न हो - ऐसा आज तक न कभी हुआ और न आगे होगा ।"* इतिहास इसका साक्षी है ।
👉 *"कार्य कभी कारणरहित नहीं होते और उसी तरह कोई भी क्रिया परिणामरहित नहीं होती ।"*'स्थूल और सूक्ष्म दोनों दृष्टि से सृष्टि का यह मौलिक नियम है कि *"भाग्य कभी अपने आप नहीं बनते वरन वह व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखे जाते हैं ।"* अच्छा या बुरा भाग्य सदैव अपने ही कर्म का फल होता है ।
👉 व्यक्ति हो, समाज या राष्ट्र हो - वह बुराई से पनपा, *"यह एक भ्रम है ।"* जीवन हर क्षण का लेखा-जोखा रखता है । *"धोखे की सफलताएँ अंततः पतन और अपयश का ही कारण बनती हैं ।"* अंत तक साथ देने वाली सफलता भलाई की है *"उसी से मनुष्य का यह लोक और परलोक सुधरता है । "कर्मफल तो अकाट्य है ।"*
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07/05/2022

परिस्थितियाँ जैसी होंगी वैसी भली-बुरी स्थिति हमें प्राप्त होगी, यह सोचना गलत है । सही यह है कि जैसी कुछ अपनी भीतरी स्थिति होगी उसी के अनुरूप बाह्य स्थितियाँ बदलती चली जाएँगी । अपने आप को सुधारने का मतलब है, अपनी उलझी समस्याओं को सुधारना और अपनी सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करना । यह कठिन है कि बाहर के व्यक्तियों को अथवा घटनाओं को अपनी इच्छानुकूल ढाल लें । उस की अपेक्षा यह सरल है कि अपनी अंत:स्थिति को बदलकर अभीष्ट वातावरण को, अपने आप ही बदल जाने का द्वार खोल दें, बुद्धिमत्ता की यही रीति है ।
👉 दूसरों की सही समीक्षा कर सकना कठिन है, पर अपने आपको आसानी से जाना जा सकता है । दूसरे को सुधारना कठिन है, पर अपने आपको तो आसानी से सुधारा जा सकता है । दूसरों की सहायता बड़ी मात्रा में करना संभवत: उतना न बन पड़े जितना कि अपनी सहायता आप की जा सकती है । हम अपने को समझें, अपने को सुधारें और अपनी सेवा करने के लिए आप तत्पर हो तो निश्चित रूप से दूसरों की सेवा के लिए किए जाने वाले पुण्य-परमार्थ का यह प्रथम किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण कदम होगा ।
👉 जो पाना चाहते हैं, उसके लिए बाहरी दौड़-धूप करने से पहले अपने भीतर उपयुक्त पात्रता उत्पन्न करें, व्यक्तित्व को जितना ही प्रखर परिपक्व और समर्थ मनाया जाएगा उतना ही अभीष्ट उपलब्धियों को प्राप्त करना संभव ही नहीं, सरल भी होगा । अपनी विशेषताएँ ही बाहरी सहयोग को आकर्षित करती हैं । उपलब्धियों से लाभ उठा सकना भी उसी के लिए संभव है, जो भीतर से मजबूत है, अपनी दुर्बलताओं की उपेक्षा करते रहेंगे तो बाहरी उपलब्धियाँ पकड़ की सीमा से बाहर ही बनी रहेंगी । *इसलिए अपना चुंबकत्व प्रखर बनाने के लिए तत्पर होना चाहिए, अनेक सफलताएँ उसी के आधार पर खिंचती हुई चली आएँगी ।

07/05/2022

एक बुज़ुर्ग शिक्षिका भीषण गर्मियों के दिन में एक बस में सवार हुई, पैरों के दर्द से बेहाल, लेकिन बस में खाली सीट न देख कर जैसे – तैसे खड़ी हो गई।

कुछ दूरी ही तय की थी बस ने कि एक उम्रदराज औरत ने बड़े सम्मानपूर्वक आवाज़ दी, "आ जाइए मैडम, आप यहाँ बैठ जाएं” कहते हुए उसे अपनी सीट पर बैठा दिया।

खुद वो बेहद साधारण सी औरत बस में खड़ी हो गई।

मैडम ने दुआ दी, "बहुत-बहुत धन्यवाद, मेरी बुरी हालत थी सच में।"

उस महिला के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान फैल गई।

कुछ देर बाद शिक्षिका के पास वाली सीट खाली हो गई। लेकिन महिला ने एक और महिला को, जो एक छोटे बच्चे के साथ यात्रा कर रही थी और मुश्किल से बच्चे को ले जाने में सक्षम थी, को उस सीट पर बिठा दिया।

अगले पड़ाव पर बच्चे के साथ महिला भी उतर गई, सीट खाली हो गई, लेकिन नेकदिल महिला ने ख़ुद बैठने का लालच नहीं किया ।

उसने फ़िर बस में चढ़े एक कमजोर बूढ़े आदमी को उस सीट पर बैठा दिया जो अभी - अभी बस में चढ़ा था।

कुछ दूर जाने के बाद सीट फिर से खाली हो गई।

बस में अब गिनी – चुनी सवारियां ही रह गईं थीं।

अब उस अध्यापिका ने महिला को अपने पास बिठाया और पूछा, "सीट कितनी बार खाली हुई है लेकिन आप लोगों को ही बैठाते रहे, खुद नहीं बैठे, क्या बात है?"

महिला ने कहा, "मैडम, मैं एक मजदूर हूं औऱ दिनभर खड़ा रह कर मज़दूरी करने से ही मेरा जीवन चलता है।इसके साथ ही मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं कुछ दान पुण्य या दूसरा परोपकार का काम कर सकूं।" तो मैं क्या करती हूं कि कहीं रास्ते से कूड़ा करकट उठाकर एक तरफ कर देती हूं, कभी किसी जरूरतमंद को पानी पिला देती हूं, कभी बस में किसी के लिए सीट छोड़ देती हूं, फिर जब सामने वाला मुझे दुआएं देता है तो मैं अपनी गरीबी भूल जाती हूं । दिन भर की थकान दूर हो जाती है और तो और, जब मैं दोपहर में रोटी खाने के लिए बैठती हूं ना बाहर बेंच पर, तो ये पंछी - चिड़ियां पास आ के बैठ जाते हैं, रोटी डाल देती हूं छोटे-छोटे टुकड़े करके । जब वे खुशी से चिल्लाते हैं, तो उन भगवान के जीवों को देखकर मेरा पेट भर जाता है। पैसा रुपया न सही, सोचती हूं दुआएं तो मिल ही जाती है ना मुफ्त में। फायदा ही है ना और हमने लेकर भी क्या जाना है यहां से ।

शिक्षिका अवाक रह गई, एक अनपढ़ सी दिखने वाली महिला इतना बड़ा पाठ जो पढ़ा गई थी उसे ।

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