13/12/2025
तीस साल की सुमिता अपने #पति राजेश के साथ गुड़गाँव की एक ऊँची सोसायटी के फ्लैट में रहती थी, जहाँ रोशनी और हवा तो खूब थी, पर अपनेपन की कमी हमेशा खलती थी। उनका यह रिश्ता पिछले पाँच सालों से चल रहा था, मगर अब उसमें एक अजीब सी ठंडक और ख़ामोशी पसर गई थी।
राजेश एक बड़ी आईटी कंपनी में देर रात तक काम करते थे। उनका लैपटॉप, उनका फोन और उनकी दफ़्तर की फाइलें ही उनकी दुनिया बन चुकी थीं। सुमिता के लिए, जो कभी अपने चंचल स्वभाव और गदराए बदन की वजह से सबके आकर्षण का केंद्र थीं, अब घर की चार दीवारी और उनकी ऊँची एड़ी की चप्पलें ही उनका एकमात्र साथी थीं।
आज बुधवार की रात थी, और बाहर तेज़ हवा चल रही थी। एसी की ठंडक के बावजूद सुमिता को अंदर से एक खालीपन महसूस हो रहा था। उन्होंने किचन में आकर खुद के लिए एक कप हर्बल चाय बनाई और बालकनी में आकर बैठ गईं। सामने की बालकनी में उनके पड़ोसी, पैंतीस साल के अनुराग, अकेले खड़े थे। अनुराग एक बैंक में ऊँचे पद पर थे और पिछले दो सालों से पड़ोस में रह रहे थे।
अनुराग की पत्नी पिछले महीने मायके गई थी, और तब से अनुराग एकदम अकेले थे। दोनों की बालकनी के बीच मुश्किल से दस फीट का फासला था, और अक्सर वे एक-दूसरे को देखते हुए हल्की मुस्कान दे दिया करते थे। आज इस उदास रात में, अनुराग भी कुछ गंभीर और गुमसुम लग रहे थे।
सुमिता ने हल्की आवाज़ में कहा, "अरे, अनुराग जी! आज इतनी रात को जाग रहे हैं आप? सब ठीक है न?" उनकी आवाज़ में वो हल्की सी मिठास थी, जो अकेलेपन में किसी को भी खींच ले।
अनुराग ने पलटकर देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, जो जल्दी ही उदासी में बदल गई। "हाँ, सुमिता जी। बस... नींद नहीं आ रही थी। शायद इस शहर की तेज़ हवाओं ने आज कमरे में भी बेचैनी भर दी है।" उन्होंने धीरे से कहा, उनकी आवाज़ में भी एक गहरा खालीपन था।
सुमिता उनकी बात समझ गईं। यह खालीपन सिर्फ हवा का नहीं था, यह भावनात्मक दूरी का था। उन्होंने चाय का कप होठों से लगाया और कहा, "ये शहर ऐसा ही है, अनुराग जी। यहाँ रिश्ते भी एसी की हवा की तरह ठंडे हो जाते हैं।"
अनुराग अपनी रेलिंग पर झुके, और सुमिता को देर तक देखते रहे। सुमिता ने महसूस किया कि अनुराग की निगाहें केवल उन्हें देख नहीं रही हैं, बल्कि उनकी उदासी को, उनके भरे बदन में छुपी बेचैनी को पढ़ रही हैं।
सुमिता को थोड़ा संकोच हुआ, तो उन्होंने अपने पल्लू को थोड़ा खींच लिया। वो हल्के हरे रंग की एक पतली कॉटन की साड़ी में थीं, जो उनके सुडौल वक्षों के पास बहुत आकर्षक लग रही थी।
"राजेश जी अभी तक नहीं आए?" अनुराग ने धीरे से पूछा।
"नहीं, आज भी देर रात तक काम है। उनका काम ही उनकी दुनिया है, अनुराग जी," सुमिता ने एक लंबी आह के साथ जवाब दिया, जिसमें अब शिकायत से ज़्यादा एक गहरी हताशा थी।
अनुराग ने धीरे से अपनी बालकनी की रेलिंग से हाथ हटाया और सुमिता की तरफ़ दो कदम बढ़े। "सुमिता जी, क्या मैं आपको डिस्टर्ब कर रहा हूँ?"
"अरे नहीं, बिल्कुल नहीं। बल्कि आपसे बात करके अच्छा लग रहा है। इस फ्लैट में तो कोई बात करने वाला भी नहीं मिलता," सुमिता ने कहा, और अपनी चाय खत्म करके खाली कप रेलिंग पर रख दिया।
अनुराग ने थोड़ी देर तक शांत रहने के बाद कहा, "आप चाहें तो... मैं चाय बनाने के लिए कुछ बिस्किट या नमकीन ला सकता हूँ। मेरे पास कुछ अच्छे देसी बिस्किट हैं।"
सुमिता मुस्कुराईं। यह एक सरल प्रस्ताव था, मगर इसमें एक अनकहा सहारा छिपा था। "नहीं, अनुराग जी। शुक्रिया। बस आप थोड़ी देर यहीं खड़े होकर बात कर लें, तो वो ही काफी है।"
फिर अचानक अनुराग ने धीरे से कहा, "सुमिता जी, क्या आप अकेलेपन से परेशान हैं?"
सुमिता उनकी तरफ़ बिना पलक झपकाए देखती रहीं। यह एक सीधा सवाल था, जो सीधा उनके दिल पर लगा। "कौन नहीं होता, अनुराग जी? इस शहर में तो सब अकेले हैं, बस भीड़ का भ्रम है।"
अनुराग ने आगे बढ़कर अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया, ताकि कोई आवाज़ बाहर न जाए। "कभी-कभी लगता है कि शादी के बाद भी आदमी अकेला ही रह जाता है। बस एक छत और कुछ रिश्ते बदल जाते हैं।"
सुमिता ने अपनी आवाज़ को बहुत धीमा किया। "आपकी बात सही है। हमारे बीच भी अब भावनात्मक दूरी इतनी हो गई है कि मुझे लगता है मैं किसी अंजान के साथ रह रही हूँ।"
उनके बीच की दूरी अब महज़ भौतिक नहीं थी, बल्कि भावनात्मक रूप से वे एक-दूसरे के बेहद करीब आ चुके थे। सुमिता के भरे हुए, आकर्षक वक्षों पर उनकी साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था, और अनुराग की निगाहें एक पल के लिए भी उनसे हटना नहीं चाहती थीं।
अनुराग ने धीरे से कहा, "सुमिता जी, कभी-कभी हमें अपने मन की बात कह देनी चाहिए। बोझ हल्का हो जाता है।"
"कहने वाला भी तो कोई हो, अनुराग जी। जो बिना जज किए मेरी बात सुने," सुमिता ने कहा, और उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी थी।
अनुराग ने अपनी बालकनी की रेलिंग को पार करने की इच्छा को दबाते हुए, अपने हाथों को कसकर भींच लिया। उन्होंने महसूस किया कि सुमिता केवल बात नहीं करना चाहती हैं, बल्कि वो भावनात्मक और आत्मिक रूप से एक जुड़ाव चाहती हैं।
अगले दिन सुबह, सुमिता को एक छोटा सा कागज का टुकड़ा अपनी बालकनी की रेलिंग पर रखा मिला। उसे पता था कि यह अनुराग ने ही रखा होगा।
कागज़ पर साधारण हिंदी में लिखा था: "सुमिता जी, मैंने सुना... अकेलेपन में नींद नहीं आती। अगर मन करे तो आज शाम को सात बजे अपने फ्लैट की बालकनी में आना। मैं बस कुछ अच्छी बातें करूँगा।" नीचे सिर्फ 'ए' लिखा था।
सुमिता के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई। यह एक छोटा सा निमंत्रण था, जो उनके दिल को छू गया। उन्हें लगा कि इस अकेलेपन में किसी ने उन्हें याद किया है।
शाम को सात बजे, सुमिता ने जानबूझकर एक गहरे नीले रंग की पतली साड़ी पहनी, जिससे उनके भरे बदन का आकर्षण और बढ़ गया था। उन्होंने अपने बालों को खुला रखा और बालकनी में आईं।
अनुराग पहले से ही वहाँ खड़े थे। उन्होंने सुमिता को देखकर एक गहरी साँस ली और मुस्कुराए। "आप आ गईं, सुमिता जी। मुझे लगा शायद आप नाराज़ होंगी।"
"नाराज़ क्यों होऊँगी, अनुराग जी? आपने तो बस एक अच्छी सी दावत दी थी," सुमिता ने अपनी चंचल आवाज़ में कहा, और अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा और सँभाला।
"दावत तो चाय और बिस्किट की है, सुमिता जी। लेकिन साथ में मेरी कुछ बातें भी होंगी। जो शायद आपके मन को थोड़ा सुकून दें।" अनुराग ने अपनी बालकनी की छोटी सी मेज पर दो कप और एक प्लेट में बिस्किट रखे।
उन्होंने कहा, "माफ़ करना, मैं आपको आपके घर आकर नहीं दे सकता था, इसलिए यहीं रख दिया। आप ले लीजिए।"
सुमिता ने धीरे से कहा, "आप भी कमाल करते हैं, अनुराग जी। ये तो दोनों बालकनी के बीच की दूरी है। आप वहीं से फेंक दीजिए, मैं लपक लूंगी।"
अनुराग हँस पड़े। "आप भी बहुत चंचल हैं, सुमिता जी। पर फेंकना ठीक नहीं। रुकिए..."
अनुराग अपने कमरे के अंदर गए और एक लम्बी डंडी वाली झाड़ू लेकर आए। उन्होंने उस डंडी के सिरे पर चाय के कप और प्लेट को कपड़े से बाँधा और धीरे से सुमिता की बालकनी की तरफ़ बढ़ाया।
इस नटखट तरीके पर सुमिता की हँसी छूट गई। "ये क्या कर रहे हैं, अनुराग जी? ये तो किसी फिल्म का सीन लग रहा है!"
"होने दीजिए, सुमिता जी। ज़िंदगी में थोड़ा ड्रामा भी ज़रूरी है, खासकर जब ज़िंदगी में कोई दिलचस्पी न बची हो," अनुराग ने कहा, और मुस्कुराते हुए सुमिता को बिस्किट और चाय का कप पकड़ा दिया।
जब सुमिता ने कप लिया, तो अनुराग का हाथ डंडी पर था, और उनकी उँगलियाँ सुमिता की उँगलियों के बहुत करीब थीं। उस पल दोनों ने एक-दूसरे को देर तक देखा। इस साधारण से स्पर्श में एक गहरा रोमांच और आत्मिक जुड़ाव था।
सुमिता ने चाय का कप लेते हुए कहा, "आप तो बड़े वीर रस के आदमी हैं, अनुराग जी। इतनी दूर से भी चीज़ें पहुँचा देते हैं।"
"वीरता का क्या है, सुमिता जी? असली वीरता तो तब है जब इंसान अपने मन की बात किसी और को बता पाए, बिना किसी डर के।" अनुराग ने अब अपनी आवाज़ को और भी धीमा और भावुक कर दिया।
वे दोनों धीरे-धीरे अपनी चाय पी रहे थे। हवा अब भी चल रही थी, लेकिन अब उसमें एक मीठी सी गर्माहट महसूस हो रही थी। सुमिता ने महसूस किया कि अनुराग की बातें उसके पति राजेश की बेरुखी से कितनी अलग थीं।
अनुराग ने कहा, "पता है, सुमिता जी। मैं जब भी आपको देखता हूँ, मुझे लगता है कि आप किसी गहरे दर्द को छिपा रही हैं। आपकी आँखें... उनमें एक अजीब सी चमक है, लेकिन वो उदास है।"
सुमिता की आँखें भर आईं। वह हमेशा से चाहती थीं कि कोई उनके इस भावनात्मक खालीपन को पहचाने। "आप सही कह रहे हैं, अनुराग जी। अब तो बस... ज़िंदगी कट रही है। राजेश जी के पास मेरे लिए वक़्त ही नहीं है।"
अनुराग ने धीरे से सिर हिलाया। "वक्त की कमी नहीं होती, सुमिता जी। बस प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।"
उन्होंने आगे कहा, "आप इतनी खूबसूरत हैं, आपका मन इतना चंचल है। आपको हमेशा खुश रहना चाहिए। पर जब मैं देखता हूँ कि आप हर शाम ऐसे अकेली बैठी रहती हैं, तो मेरा भी मन उदास हो जाता है।"
सुमिता को लगा कि यह केवल पड़ोसी की सहानुभूति नहीं है। यह उससे कहीं ज़्यादा था। अनुराग की आँखें उनके भरे बदन को, उनके आकर्षण को सम्मान से देख रही थीं, लेकिन उनकी बातों में एक आत्मिक जुड़ाव की गहरी कसक थी।
"मैं क्या करूँ, अनुराग जी? मैं तो थक गई हूँ," सुमिता ने कहा, और अपनी नज़रों को ज़मीन पर झुका लिया।
अनुराग ने धीरे से कहा, "थकना नहीं चाहिए, सुमिता जी। बस अपने मन को थोड़ा खुला रखना चाहिए। कभी-कभी हमें बाहर से सहारा लेना पड़ता है, जब घर के अंदर की दीवारें ठंडी पड़ जाती हैं।"
यह बात एक बड़े गहरे राज़ की तरह थी। सुमिता जानती थी कि अनुराग क्या कहना चाह रहे हैं। यह एक अनकहा रिश्ता था, जो उनके अकेलेपन की वजह से पनप रहा था।
वे दोनों देर तक खामोश रहे। उनकी ख़ामोशी में एक-दूसरे के प्रति गहरी समझ और दबी हुई इच्छाएं थीं। सुमिता को लगा कि उनके और अनुराग के बीच अब सिर्फ़ दो बालकनी नहीं हैं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक पुल बन चुका है।
रात गहरा रही थी। सुमिता ने धीरे से कहा, "शुक्रिया, अनुराग जी। आज आपसे बात करके मुझे सचमुच सुकून मिला। और चाय भी बहुत अच्छी थी।"
अनुराग ने धीरे से मुस्कुराया। "शुक्रिया की कोई बात नहीं, सुमिता जी। बस... आप जब चाहें, मुझे यहाँ खड़ा पाएंगी। मैं भी अकेलेपन से लड़ रहा हूँ।"
सुमिता अपने फ्लैट में वापस चली गईं, पर उस रात उन्हें कई दिनों बाद गहरी नींद आई। उन्हें लगा कि उनके जीवन में एक नया, अनकहा और भावुक सहारा आ गया है, जो रात के सुकून में बदल गया था। वह जानती थी कि यह रिश्ता बस एक शुरुआत है, और उनके जीवन की कहानी में एक नया अध्याय जुड़ चुका है....आगे की कहानी जानने के लिए कामेंट बाक्स में जाकर next लिख दीजिए....!!!!! 💘💘
एक दुनिया अलग सी