Pyari Bhabhi

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मेरी  #पत्नी का निधन हो गया, मेरी सास ने अपनी  #बहन से मेरी शादी तय कर दी, शादी की रात मुझे एक चौंकाने वाली सच्चाई का पत...
13/12/2025

मेरी #पत्नी का निधन हो गया, मेरी सास ने अपनी #बहन से मेरी शादी तय कर दी, शादी की रात मुझे एक चौंकाने वाली सच्चाई का पता चला तो मैं स्तब्ध रह गया।

मेरा बचपन बिहार राज्य में गंगा नदी के किनारे एक गरीब मोहल्ले में, लंबे, शांत और धुंधले दिनों की एक श्रृंखला थी। मेरे न पिता थे, न माता, न ही कोई खून का रिश्तेदार। मेरी दुनिया तब अस्थायी भोजन और एक छोटे से किराए के कमरे की चार नीरस दीवारों के इर्द-गिर्द घूमती थी। बिना किसी मार्गदर्शक के बड़े होने के कारण, मैंने हर चीज़ का सामना खुद ही करना सीखा। स्नेह की कमी ने मेरे दिल के चारों ओर एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी, जिससे मैं खुद को बंद कर लेता था और "परिवार" शब्द पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।

ज़िंदगी ऐसे ही चलती रही जब तक मेरी मुलाक़ात मीरा से नहीं हुई। वह मेरे लिए एक बिल्कुल नई दुनिया लेकर आई - एक ऐसी जगह जिसका मैं लंबे समय से इंतज़ार कर रहा था।

मीरा एक सौम्य, विचारशील और प्यारी लड़की थी। उसके साथ रहकर, मुझे एक ऐसी गर्मजोशी का एहसास हुआ जो मैंने अपने जीवन में पहले कभी महसूस नहीं किया था। मीरा मुझे एक सरल, सच्चे प्यार से प्यार करती थी। उसने कभी मेरे अतीत के बारे में नहीं पूछा, बस मेरे साथ रही और मेरे दिल के खालीपन को प्यार और परवाह से भर दिया। जब वाराणसी के एक छोटे से मंदिर में हमारी शादी हुई, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे पूरी दुनिया मिल गई हो। मीरा न सिर्फ़ मेरी पत्नी थीं, बल्कि मेरी जीवनसंगिनी भी थीं, वो खोई हुई चीज़ जिसने मेरे जीवन को पूरा किया। जिस दिन मैंने उनका हाथ थामा और शादी के गलियारे में कदम रखा, मैंने मन ही मन वादा किया कि मैं अपना पूरा जीवन उस महिला से प्यार और सुरक्षा में बिताऊँगी जिसने मुझे एक घर दिया।

शादी के बाद, हम मीरा की माँ - कमला देवी के साथ रहने चले गए। मेरे ससुर का बहुत पहले निधन हो गया था, और कमला एक सौम्य और दयालु महिला थीं। उन्होंने एक चमकदार मुस्कान और प्यार भरी आँखों से मेरा स्वागत किया। उनका कोई बेटा नहीं था, और मुझे पता था, उन्होंने मुझे पहले ही पल से अपना खून मान लिया था। उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया, उनके हाथ पतले और गर्म थे, फिर धीरे से कहा:

"तुम यहीं रहो, यह घर तुम्हारा घर है। मेरा कोई बेटा नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें अपने खून की तरह प्यार करती हूँ। तुम्हें किसी भी चीज़ की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"

उन शब्दों ने मेरे दिल के किसी कोने को छू लिया। पहली बार, किसी बुज़ुर्ग महिला ने मुझे पूरी ईमानदारी से "बेटा" कहा। मेरे आँसू बह निकले, दुख से नहीं, बल्कि खुशी से। मुझे एक सच्चा घर मिल गया था - एक ऐसा परिवार जिसे मैं कभी सिर्फ़ एक सपना समझती थी।

हम अपनी माँ के साथ रहते थे, साथ मिलकर हमने सब कुछ शुरू से बनाया। मीरा हमारे घर के पास एक कंपनी में अकाउंटेंट के रूप में काम करती थीं, मैंने पटना में एक छोटी सी ऑटो रिपेयर की दुकान खोली। हर दिन, हम साथ उठते, साथ में सादा नाश्ता करते और साथ में काम पर जाते। शाम को जब हम घर आते, तो मेरी सास गरमागरम चावल और मीठा सूप बना चुकी होतीं। छोटा सा घर हमेशा हँसी, सुकून और खुशियों से भरा रहता। एक साल बाद, मीरा ने मुझे एक अनमोल तोहफ़ा दिया: एक खूबसूरत, परी जैसी बेटी। उसकी बड़ी-बड़ी, गोल आँखें रात में तारों की तरह चमकती थीं, और उसकी मुस्कान सुबह के सूरज जैसी चमकीली थी। हमने उसका नाम प्रिया रखा। मीरा को उसे गोद में लिए, भोजपुरी में मीठी लोरियाँ गाते देखकर, मुझे लगा कि मेरा जीवन आखिरकार पूरा हो गया।

लेकिन ज़िंदगी हमेशा फूलों से भरी नहीं होती। जब प्रिया सिर्फ़ दो साल की थी, तब हमारी नाज़ुक खुशियों को एक बड़े झटके ने परख लिया...👇पूरी कहानी जानने के लिए कामेंट बाक्स में जाकर next लिख दीजिए 👇 💘💘💘💘💘

एक दुनिया अलग सी

 #शादी के तुरंत बाद भी अगर ये अहसास होता है कि आपकी जिससे शादी हुई है उसके साथ नहीं रह सकते तो तभी अलग हो जाइए.अगर आप तब...
13/12/2025

#शादी के तुरंत बाद भी अगर ये अहसास होता है कि आपकी जिससे शादी हुई है उसके साथ नहीं रह सकते तो तभी अलग हो जाइए.

अगर आप तब समाज के लिए सोच कर रह भी जाएँगे तो कभी अपने पार्टनर को सच्चे दिल से अपना नहीं मान पाएंगे.

कल को बच्चे होंगे आप उन बच्चों को विरासत और बचपन में क्या देंगे?

कल एक क्लाइंट की काउंसलिंग कर रही थी उन्होंने बताया कि शादी को 16 वर्ष हो गए हैं, दो बच्चे भी हैं लेकिन कभी पति से कोई प्यार या अपनानपन फील नहीं हुआ. अब बच्चे बड़े हो गए हैं तो अकेलापन खाने को दौड़ता है. दिन भर काम में निकल जाता है लेकिन जब फ्री होती हूँ तो लगता है कि ज़िन्दगी में मुझे क्या मिला?

आप ख़ुद लो इस मुकाम पर नहीं ले जाइए. पहले ही सोचिए. नहीं समझ पा रहे हैं तो सेशन बुक करिए!

ज़िन्दगी एक बार मिलती है और इस ज़िन्दगी पर आपका हक़ है...क्या आप मेरी बात से सहमत हो,,,अगर सहमत हो तो कामेंट बाक्स में जाकर Agree लिख दीजिए....!!!! 💘💘

एक दुनिया अलग सी

आधी रात को जागने पर, मैं अपनी पत्नी को मेड के सामने घुटनों के बल बैठा देखकर चौंक गया। मुझे इस सब के पीछे का कड़वा राज़ ज...
13/12/2025

आधी रात को जागने पर, मैं अपनी पत्नी को मेड के सामने घुटनों के बल बैठा देखकर चौंक गया। मुझे इस सब के पीछे का कड़वा राज़ जानने के लिए 30 लाख रुपये देने पड़े। लेकिन उसके बाद की हरकतें कहीं ज़्यादा डरावनी थीं…
प्रिया और मेरी शादी को मुंबई में एक साल से भी कम समय हुआ था। हमारा हनीमून किसी बॉलीवुड फ़िल्म जितना प्यारा था। पिछले महीने, प्रिया ने अपनी प्रेग्नेंसी अनाउंस की। पॉज़िटिव प्रेग्नेंसी टेस्ट पकड़े हुए, मैं इतना खुश था कि मैं दिल्ली की सड़कों पर यह बात चिल्लाकर बताना चाहता था। प्रिया कमज़ोर थी और उसे बहुत ज़्यादा मॉर्निंग सिकनेस थी; उसे इतना पीला देखकर, मुझे उसके लिए बहुत बुरा लगा। अपने मसाले के इंपोर्ट/एक्सपोर्ट बिज़नेस में बिज़ी होने के कारण, मैं उसके पास नहीं रह सकता था, इसलिए मैंने उसकी मदद के लिए एक मेड रखने का फ़ैसला किया।

एक करीबी दोस्त की सलाह से, मुझे कमला के बारे में पता चला – केरल की एक लंबे समय से मेड जिसे प्रेग्नेंट महिलाओं की देखभाल का अनुभव था। मेरे दोस्त ने कमला की साफ़-सुथरी, समझदार और अच्छी कुक होने की तारीफ़ की, खासकर साउथ इंडियन डिशेज़ के लिए। मैंने पूरे भरोसे के साथ उसे तुरंत काम पर रख लिया।

जिस दिन कमला ने अपनी नई नौकरी शुरू की, प्रिया अभी भी पुणे में अपने माता-पिता के घर पर थी, अपनी प्रेग्नेंसी के दौरान आराम कर रही थी। मैंने अपनी पत्नी को सिर्फ़ टेक्स्ट करके बताया। अगले दिन, मैं प्रिया को लेने गया। जैसे ही हम बांद्रा में अपार्टमेंट में घुसे, प्रिया के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई जब उसने कमला को लिविंग रूम साफ़ करते देखा। उसका चेहरा पीला था, उसके हाथ कांप रहे थे। मैंने बेचैनी से पूछा, "क्या हुआ? क्या तुम ट्रिप से थक गई हो?" प्रिया हकलाई, उसकी नज़रें मुझसे बच रही थीं, बस जल्दी से नमस्ते किया और फिर ऊपर आराम करने के लिए कहा। उस समय, मुझे लगा कि वह बस अपनी प्रेग्नेंसी से थक गई है।

लेकिन अगले दिनों में, माहौल अजीब हो गया। प्रिया—जो आमतौर पर बहुत खुशमिजाज रहती थी—हमेशा कमला से बचने की कोशिश करती थी। वह अक्सर अपने कमरे में रहती थी और कम खाती थी। हर बार जब मैं पूछता, तो प्रिया सिरदर्द का बहाना बनाती। कमला चुपचाप काम करती रही, लेकिन कभी-कभी मैंने उसे मेरी पत्नी को मतलब भरी नज़रों से देखते हुए पकड़ लिया।

तीसरी रात, मैं प्यासा उठा और देखा कि मेरी पत्नी मेरे पास नहीं थी। मैं दबे पाँव नीचे गया। अपार्टमेंट शांत था, सिर्फ़ मेड के कमरे से आ रही पीली रोशनी से रोशन था। मैं अंदर जाने ही वाला था कि मुझे एक जानी-पहचानी सिसकने की आवाज़ सुनाई दी। यह प्रिया की थी। उत्सुकता में, मैंने दरवाज़े की दरार से झाँका। यह नज़ारा देखकर मैं वहीं जम गया: प्रिया ठंडे मार्बल के फ़र्श पर घुटनों के बल बैठी थी, उसके हाथ कमला के हाथों को कसकर पकड़े हुए थे। वह सिसक रही थी, उसकी आवाज़ में गुज़ारिश भरी थी:👇👇

आगे की कहानी जानने के लिए कामेंट बाक्स में next लिखें.

एक दुनिया अलग सी




कहाँ गए हमारे  #संस्कार ????1.  पहले जो गाने कुछ पुरुष रात के अंधेरे में मुंह छुपा कर कोठे पर जाकर सुनते थे, आज उसे हम अ...
13/12/2025

कहाँ गए हमारे #संस्कार ????

1. पहले जो गाने कुछ पुरुष रात के अंधेरे में मुंह छुपा कर कोठे पर जाकर सुनते थे, आज उसे हम अपने घर में बहन बेटियों के साथ सुनते हैं; जिसे हमने 'आइटम सोंग्स' का नाम दिया है | समारोहों में सरेआम उत्तेजक डांस देखे जाते हैं...

2. पहले आइटम सोंग्स करने वाली अभिनेत्री को बी ग्रेड में रखा जाता था, आज 'ए ग्रेड' की अभिनेत्री ऐसी अश्लील हरकतों को पर्दे पर दिखा कर अपनी कलाकारी सिद्ध कर पुरस्कार लेती हुई दिखाई देती है...

3. पहले रतिचित्रित फिल्मों की अभिनेत्री को घृणा से देखा जाता था, अब देश के जाने माने निर्देशक उन्हे फिल्मों में ब्रेक देते हैं। अतः अब भारतीय अभिनेत्रियाँ और किशोरियों के लिए फिल्मों में ब्रेक के लिए एक नयी दिशा मिल गयी और इस दिशा में अवश्य पहल करेंगी...CID जैसी सिरियल के TV EP और अन्य TV shows मे उनको स्थान दिया जा रहा है...

4. पहले हम शराब पीना, गाली देना, जुआ खेलना इसे निकृष्ट कृति मानते थे | अब समारोहों में सरेआम शराब पिलाई जाती है | यहां तक महिलाएं भी सरेआम शराब पीने लगी हैं | वह सब हमारे आधुनिक होने के लक्षण समझें जाते हैं...

5. पहले स्त्री के तन से आंचल न गिरे, ऐसा प्रयास माँ सिखाती थी. अब माँ अपनी बच्चियों को पूरे विश्व के सामने नग्न होने के लिए "Beauty Contest" और "Modeling" में ले जाती हैं, जहां Swimming Suit राउंड होता है और पूरे विश्व के लोग उसे आनंद से अपने परिवार के साथ देखते हैं...

6. पहले वक्षस्थल से चुनरी हट जाए तो युवती असहज अनुभव करती थी, शर्म महसूस कर तुरंत ढक लेती थी। अब तो सलवार ही गायब, और सलवार है भी तो उसमे चुनरी गायब हो रही है। वक्षस्थल ढंकने की लज्जा का प्रश्न ही नहीं। क्योंकि मिनी स्कर्ट, वन पीस, जीन्स आदि पहनने से वो लज्जा नही अपितु इसतरह मनोवैज्ञानिक रूप से सहज व्यवहार और स्वभाव आचरण पर असर डालकर व्यक्तित्व पर वैसा ही प्रभाव छोड रही है। पुरी जनरेशन पर धीमा जहर मार्केट ने उडेंल दिया है।

वाह री 'Modernisation', तूने मात्र कुछ वर्षों में हमारी लाखों वर्ष की संस्कृति को निगल लिया और भारत को 'इंडिया' बना दिया...क्या आप मेरी बात से सहमत हो,,, अगर सहमत हो तो कामेंट बाक्स में जाकर Agree लिख दीजिए..

एक दुनिया अलग सी

28 साल की अंजली अपने  #जेठ राजेंद्र के साथ सहारनपुर के पास एक छोटे से कस्बे के पुराने, बड़े मकान में रह रही थी। यह मकान ...
13/12/2025

28 साल की अंजली अपने #जेठ राजेंद्र के साथ सहारनपुर के पास एक छोटे से कस्बे के पुराने, बड़े मकान में रह रही थी। यह मकान उनके पति और राजेंद्र के छोटे भाई, सुरेश का था, जो पिछले दो सालों से दुबई में नौकरी कर रहे थे।

सुरेश की कमाई अच्छी थी, पर उसकी गैर-मौजूदगी में अंजली को उस बड़े घर की खामोशी हर पल सालती थी। वह देखने में बहुत आकर्षक, सुडौल और भरे बदन की थी, जिसने अकेलेपन में एक अजीब सी बेचैनी पाल रखी थी।

राजेंद्र, जो 38 साल के थे, शहर के पास की सरकारी फैक्ट्री में बड़े बाबू थे। उनका सीधा-सादा स्वभाव था, और वह हमेशा भाभी और छोटे भाई के रिश्ते का पूरा मान रखते थे, पर अंजली के मन की चंचलता को वह भी महसूस करते थे।

अंजली और राजेंद्र का रिश्ता हमेशा से ही एक सम्मान की दूरी पर टिका रहा था, पर सुरेश के जाने के बाद, दोनों एक-दूसरे का सहारा बन गए थे।

राजेंद्र हर शाम फैक्ट्री से लौटकर पहले अंजली से पूछते थे कि उसे कोई परेशानी तो नहीं है। उनकी यह फिक्र, अंजली के अकेलेपन में एक मीठी सी गर्माहट भर देती थी।

गर्मी का मौसम था, और रात को बिजली अक्सर गुल हो जाती थी। उस दिन अमावस्या की काली रात थी, और गर्मी अपने चरम पर थी। कूलर भी हवा नहीं दे रहा था।

करीब ग्यारह बजे बिजली चली गई। अंजली अपने कमरे में लेटी हुई थीं, मगर नींद आँखों से कोसों दूर थी। उनके माथे पर पसीने की बूँदें थीं और उनका मन किसी साथी की तलाश में बेचैन था।

उन्होंने दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक दी। "जेठ जी, क्या आप जागे हुए हैं?" उनकी आवाज़ में एक हल्की सी घबराहट और एक अनकही उम्मीद थी।

राजेंद्र अपने कमरे में एक पुराने पंखे की धीमी हवा में लेटे थे। उन्होंने दरवाज़ा खोला। अंजली को इस तरह रात को अपने दरवाज़े पर देखकर वह थोड़ा चौंक गए।

अंजली एक हल्के गुलाबी रंग की सूती साड़ी में थीं, जो पसीने से उनके सुडौल शरीर से चिपक गई थी। उनका पल्लू कंधे से नीचे खिसका हुआ था।

"क्या हुआ, अंजली? इतनी रात को?" राजेंद्र ने धीमी आवाज़ में पूछा।

"जेठ जी, बहुत गर्मी लग रही है और बिजली भी चली गई। कमरे में दम घुट रहा है। और पता नहीं क्यों, आज बहुत डर लग रहा है," अंजली ने अपनी आवाज़ को और भी नरम और भीगी हुई बना दिया।

राजेंद्र समझ गए कि अंजली को सिर्फ गर्मी नहीं लग रही, बल्कि वह भावनात्मक सहारे की तलाश में थीं। "अरे, डरो मत। मैं हूँ न। आओ, बैठो। बालकनी में थोड़ी हवा है, वहीं चलते हैं।"

राजेंद्र ने अपने कमरे की पुरानी लालटेन उठाई और बालकनी की तरफ़ बढ़ने लगे। अंजली धीरे से उनके पीछे चल दीं। उनकी चाल में एक अजीब सी बेचैनी थी, जो राजेंद्र को भी महसूस हुई।

बालकनी में एक पुरानी सी खाट पड़ी थी। राजेंद्र ने लालटेन को खाट के पास एक छोटी सी मेज पर रखा, जिससे एक पीली, हल्की रौशनी चारों तरफ़ फैल गई।

"आओ, अंजली। बैठो। यहाँ हवा है," राजेंद्र ने खाट पर बैठकर कहा।

अंजली उनके पास ही थोड़ी दूरी पर बैठ गईं। उनके बीच की दूरी सामान्य थी, पर माहौल में एक अजीब सी उत्तेजना भरी हुई थी।

"जेठ जी, आप सुरेश की कमी महसूस नहीं करते?" अंजली ने धीरे से पूछा। उनकी आवाज़ में यह सवाल सिर्फ सुरेश के लिए नहीं था, बल्कि उनके खुद के अकेलेपन का इज़हार था।

राजेंद्र ने गहरी साँस ली। "कमी तो लगती है, अंजली। छोटा भाई है मेरा। पर क्या करें? उसका भविष्य बनाना भी ज़रूरी है।"

"पर क्या ये दूरी रिश्तों को कमज़ोर नहीं कर देती, जेठ जी?" अंजली ने अपनी नज़रें उठाते हुए राजेंद्र की तरफ़ देखा। उनकी आँखें उस लालटेन की रौशनी में उदास और जिज्ञासु लग रही थीं।

राजेंद्र ने उनकी आँखों में देखा। उन्हें लगा जैसे अंजली सुरेश की नहीं, बल्कि अपने और उनके बीच के रिश्ते की दूरी की बात कर रही हैं।

"कमज़ोर तो हो ही जाती है, अंजली। पर हमें मज़बूत बनना पड़ता है। घर की ज़िम्मेदारी जो है," राजेंद्र ने कहा, और उनका हाथ अनजाने में खाट के किनारे पर पड़ी अंजली की हथेली के बहुत करीब आ गया।

अंजली ने जानबूझकर अपना हाथ ज़रा सा सरका दिया, जिससे उनकी हथेली का पिछला हिस्सा राजेंद्र की उँगलियों से छू गया। यह स्पर्श बेहद हल्का था, मगर दोनों के लिए बहुत कुछ कह गया।

राजेंद्र तुरंत संभल गए और अपना हाथ थोड़ा पीछे खींच लिया। उनके माथे पर हल्की सी शिकन आई, पर अंजली के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी।

"जेठ जी, आप हमेशा इतने सीधे क्यों रहते हैं? कभी खुलकर बातें क्यों नहीं करते?" अंजली ने अब अपनी आवाज़ में थोड़ी चंचलता मिलाई।

राजेंद्र थोड़ा असहज हो गए। "मैं... मैं तो हमेशा खुलकर ही बात करता हूँ, अंजली। मैं अपनी भाभी से और क्या बात कर सकता हूँ?"

"बस यही तो परेशानी है, जेठ जी! आप हमेशा मुझे 'भाभी' समझते हैं। क्या हम दोस्त नहीं बन सकते? इस अकेलेपन में?" अंजली ने कहा, और अपनी साड़ी का पल्लू जानबूझकर थोड़ा और खिसकने दिया।

उनके सुडौल वक्षों का उभार उस हल्की रौशनी में और भी आकर्षक लग रहा था। राजेंद्र की नज़रें एक पल के लिए वहाँ गईं, और फिर उन्होंने तुरंत अपनी नज़रें हटा लीं।

"दोस्त... दोस्ती तो है ही, अंजली। तुम मेरे छोटे भाई की पत्नी हो, और मैं तुम्हारा बड़ा... दोस्त," राजेंद्र ने खुद को संभालते हुए कहा।

अंजली धीरे से हँस पड़ीं। "बस! मुझे यही चाहिए था, जेठ जी। अब दोस्ती हो गई है, तो मेरी एक बात मानिए।"

"क्या?" राजेंद्र ने उत्सुकता से पूछा।

अंजली ने धीरे से अपना सिर राजेंद्र की तरफ़ झुकाया, और फुसफुसाते हुए कहा, "मुझे बहुत डर लग रहा है। आप थोड़ा और क़रीब बैठिए।"

राजेंद्र को लगा जैसे उनके पूरे शरीर में गर्मी दौड़ गई है। वह जानते थे कि यह एक नाज़ुक पल है। उन्होंने धीरे से खुद को थोड़ा सरकाया और अंजली के थोड़ा करीब आ गए, लेकिन उनके बीच अभी भी एक मर्यादा की दूरी थी।

"बस अब ठीक है न, अंजली? अब डर नहीं लगेगा," राजेंद्र ने कहा, पर उनकी आवाज़ में अब एक हल्की सी घबराहट थी।

अंजली ने संतुष्टि से गहरी साँस ली। "हाँ, अब ठीक लग रहा है।" उन्होंने धीरे से अपना हाथ खाट पर पीछे की तरफ़ रखा, जहाँ वह राजेंद्र की पीठ के करीब था।

राजेंद्र को लगा कि अंजली का हाथ उनकी पीठ को छू रहा है। यह स्पर्श बहुत हल्का था, जैसे हवा का झोंका हो, पर इस छूअन में एक गहरा, अनकहा आकर्षण था।

राजेंद्र चुप रहे। उन्होंने आसमान में बादलों को देखा, फिर लालटेन की रौशनी को। उनके मन में तूफान चल रहा था, पर वह बाहर से शांत बने रहे।

अंजली ने धीरे से अपना सिर खाट के सहारे राजेंद्र की पीठ की तरफ़ झुका दिया। "जेठ जी, आप मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं। आप हमेशा मेरा साथ देते हैं।"

राजेंद्र को अंजली का सिर अपनी पीठ पर महसूस हुआ। उनके बाल, उनकी साँसों की हल्की सी गर्मी, राजेंद्र के शरीर में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर गई।

उन्होंने धीरे से कहा, "बस तुम खुश रहो, अंजली। मेरे लिए यही काफी है।"

अंजली ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उन्हें लगा कि इस अकेलेपन और गर्मी की रात में, उन्हें एक ऐसा भावनात्मक सहारा मिल गया है, जो उनके मन को सुकून दे रहा था।

राजेंद्र स्थिर बैठे रहे। वह जानते थे कि वह एक सीमा पर खड़े हैं, जहाँ देवर-भाभी का रिश्ता अब दोस्त और अकेले साथी के रिश्ते में बदल रहा था, और यह बदलाव बहुत आत्मीय और थोड़ा सा कामुक था।

थोड़ी देर बाद, अंजली ने धीरे से आँखें खोलीं। उन्होंने महसूस किया कि राजेंद्र का शरीर अब भी एकदम सीधा और शांत था, जैसे वह अपने मन के तूफ़ान को काबू में रख रहे हों।

अंजली धीरे से उठीं। "शुक्रिया, जेठ जी। अब मुझे थोड़ा सुकून मिला है। मैं सोने जाती हूँ।"

"ठीक है, अंजली। शुभ रात्रि," राजेंद्र ने कहा, और उनके जाने के बाद भी उसी जगह बैठे रहे, जहाँ अंजली का सिर उनकी पीठ से टिका था।

वह जानते थे कि उस रात, रिश्ते की मर्यादा और अकेलेपन की ज़रूरत के बीच एक नया, भावुक पुल बन गया था, जिसकी गर्माहट उनके दिल में हमेशा रहेगी.....कहानी को आगे जानने के लिए कामेंट बाक्स में next लिख दीजिए...!!

एक दुनिया अलग सी

गौरी का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने गौरी पूरी बोगी घूम आई, मुश्किल से द...
13/12/2025

गौरी का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने गौरी पूरी बोगी घूम आई, मुश्किल से दो या तीन औरतें होंगी । मन अनजाने भय से काँप सा गया । रात्रि का समय था और बीच के स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या बढ़ भी सकती थी और घट भी सकती थी ।

पहली बार रात्रि में अकेली सफर कर रही थी, इसलिये पहले से ही घबराई हुई थी। अतः खुद को सहज रखने के लिए चुपचाप अपनी सीट पर बैठकर मोबाइल में देखने लगी।

नवयुवकों का झुंड जो शायद किसी कैम्प जा रहे थे, के हँसी - मजाक , चुटकुले उसके हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे। गौरी के भय और घबराहट के बीच अनचाही सी रात धीरे - धीरे उतरने लगी ।

सहसा सामने के सीट पर बैठे लड़के ने मौन भंग किया "हेलो, मैं साकेत और आप ? "

भय से पीली पड़ चुकी गौरी ने कहा

" जी मैं "

" कोई बात नहीं , नाम मत बताइये । वैसे जा कहाँ रहीं हैं आप ?"

गौरी ने धीरे से कहा "वाराणसी"

" अच्छा क्या आप भी वाराणसी से ही हैं ? मेरा तो यहां ननिहाल है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन लगीं ।" खुश होते हुए साकेत ने कहा और फिर वाराणसी की प्रशंसा चालू हो गई । गंगा,सारनाथ, गंगा घाटों और बनारस की गलियों की विशेषताएं । साकेत अपने ननिहाल की अनगिनत बातें बताता रहा कि उसके नाना जी काफी नामी व्यक्ति हैं , उसके दोनों मामा सेना में उच्च अधिकारी हैं, एक मामी पटना की हैं और दूसरी लखनऊ की । और भी ढेरों नई - पुरानी बातें । गौरी भी मुस्कुरा उठी । धीरे - धीरे सामान्य हो गई और उसके बातों में रूचि लेती रही ।

रात जैसे कुँवारी आई थी , वैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई ।

सुबह गौरी ने कहा " मेरा मोबाइल नंबर फीड कर लीजिए , कभी ननिहाल आइये तो जरुर मिलने आइयेगा ।"

"कैसी ननिहाल बहन ?

वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ - मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा । मैं तो पहले कभी वाराणसी आया ही नहीं ।"

"क्या ?" -- चौंक उठी गौरी ।

" देखो बहन ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं कि किसी अकेली लड़की को देखा नहीं कि उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ें । हम ही तो पिता और भाई भी होते हैं ।" कह कर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुराया था साकेत ।

गौरी साकेत को देखती रही जैसे अपना ही भाई उससे विदा ले रहा हो । गौरी की आँखें गीली हो चुकी थीं....कहानी को आगे जानने के लिए कामेंट बाक्स में जाकर next लिखें...

एक दुनिया अलग सी

तीस साल की सुमिता अपने  #पति राजेश के साथ गुड़गाँव की एक ऊँची सोसायटी के फ्लैट में रहती थी, जहाँ रोशनी और हवा तो खूब थी,...
13/12/2025

तीस साल की सुमिता अपने #पति राजेश के साथ गुड़गाँव की एक ऊँची सोसायटी के फ्लैट में रहती थी, जहाँ रोशनी और हवा तो खूब थी, पर अपनेपन की कमी हमेशा खलती थी। उनका यह रिश्ता पिछले पाँच सालों से चल रहा था, मगर अब उसमें एक अजीब सी ठंडक और ख़ामोशी पसर गई थी।

राजेश एक बड़ी आईटी कंपनी में देर रात तक काम करते थे। उनका लैपटॉप, उनका फोन और उनकी दफ़्तर की फाइलें ही उनकी दुनिया बन चुकी थीं। सुमिता के लिए, जो कभी अपने चंचल स्वभाव और गदराए बदन की वजह से सबके आकर्षण का केंद्र थीं, अब घर की चार दीवारी और उनकी ऊँची एड़ी की चप्पलें ही उनका एकमात्र साथी थीं।

आज बुधवार की रात थी, और बाहर तेज़ हवा चल रही थी। एसी की ठंडक के बावजूद सुमिता को अंदर से एक खालीपन महसूस हो रहा था। उन्होंने किचन में आकर खुद के लिए एक कप हर्बल चाय बनाई और बालकनी में आकर बैठ गईं। सामने की बालकनी में उनके पड़ोसी, पैंतीस साल के अनुराग, अकेले खड़े थे। अनुराग एक बैंक में ऊँचे पद पर थे और पिछले दो सालों से पड़ोस में रह रहे थे।

अनुराग की पत्नी पिछले महीने मायके गई थी, और तब से अनुराग एकदम अकेले थे। दोनों की बालकनी के बीच मुश्किल से दस फीट का फासला था, और अक्सर वे एक-दूसरे को देखते हुए हल्की मुस्कान दे दिया करते थे। आज इस उदास रात में, अनुराग भी कुछ गंभीर और गुमसुम लग रहे थे।

सुमिता ने हल्की आवाज़ में कहा, "अरे, अनुराग जी! आज इतनी रात को जाग रहे हैं आप? सब ठीक है न?" उनकी आवाज़ में वो हल्की सी मिठास थी, जो अकेलेपन में किसी को भी खींच ले।

अनुराग ने पलटकर देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, जो जल्दी ही उदासी में बदल गई। "हाँ, सुमिता जी। बस... नींद नहीं आ रही थी। शायद इस शहर की तेज़ हवाओं ने आज कमरे में भी बेचैनी भर दी है।" उन्होंने धीरे से कहा, उनकी आवाज़ में भी एक गहरा खालीपन था।

सुमिता उनकी बात समझ गईं। यह खालीपन सिर्फ हवा का नहीं था, यह भावनात्मक दूरी का था। उन्होंने चाय का कप होठों से लगाया और कहा, "ये शहर ऐसा ही है, अनुराग जी। यहाँ रिश्ते भी एसी की हवा की तरह ठंडे हो जाते हैं।"

अनुराग अपनी रेलिंग पर झुके, और सुमिता को देर तक देखते रहे। सुमिता ने महसूस किया कि अनुराग की निगाहें केवल उन्हें देख नहीं रही हैं, बल्कि उनकी उदासी को, उनके भरे बदन में छुपी बेचैनी को पढ़ रही हैं।

सुमिता को थोड़ा संकोच हुआ, तो उन्होंने अपने पल्लू को थोड़ा खींच लिया। वो हल्के हरे रंग की एक पतली कॉटन की साड़ी में थीं, जो उनके सुडौल वक्षों के पास बहुत आकर्षक लग रही थी।

"राजेश जी अभी तक नहीं आए?" अनुराग ने धीरे से पूछा।

"नहीं, आज भी देर रात तक काम है। उनका काम ही उनकी दुनिया है, अनुराग जी," सुमिता ने एक लंबी आह के साथ जवाब दिया, जिसमें अब शिकायत से ज़्यादा एक गहरी हताशा थी।

अनुराग ने धीरे से अपनी बालकनी की रेलिंग से हाथ हटाया और सुमिता की तरफ़ दो कदम बढ़े। "सुमिता जी, क्या मैं आपको डिस्टर्ब कर रहा हूँ?"

"अरे नहीं, बिल्कुल नहीं। बल्कि आपसे बात करके अच्छा लग रहा है। इस फ्लैट में तो कोई बात करने वाला भी नहीं मिलता," सुमिता ने कहा, और अपनी चाय खत्म करके खाली कप रेलिंग पर रख दिया।

अनुराग ने थोड़ी देर तक शांत रहने के बाद कहा, "आप चाहें तो... मैं चाय बनाने के लिए कुछ बिस्किट या नमकीन ला सकता हूँ। मेरे पास कुछ अच्छे देसी बिस्किट हैं।"

सुमिता मुस्कुराईं। यह एक सरल प्रस्ताव था, मगर इसमें एक अनकहा सहारा छिपा था। "नहीं, अनुराग जी। शुक्रिया। बस आप थोड़ी देर यहीं खड़े होकर बात कर लें, तो वो ही काफी है।"

फिर अचानक अनुराग ने धीरे से कहा, "सुमिता जी, क्या आप अकेलेपन से परेशान हैं?"

सुमिता उनकी तरफ़ बिना पलक झपकाए देखती रहीं। यह एक सीधा सवाल था, जो सीधा उनके दिल पर लगा। "कौन नहीं होता, अनुराग जी? इस शहर में तो सब अकेले हैं, बस भीड़ का भ्रम है।"

अनुराग ने आगे बढ़कर अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया, ताकि कोई आवाज़ बाहर न जाए। "कभी-कभी लगता है कि शादी के बाद भी आदमी अकेला ही रह जाता है। बस एक छत और कुछ रिश्ते बदल जाते हैं।"

सुमिता ने अपनी आवाज़ को बहुत धीमा किया। "आपकी बात सही है। हमारे बीच भी अब भावनात्मक दूरी इतनी हो गई है कि मुझे लगता है मैं किसी अंजान के साथ रह रही हूँ।"

उनके बीच की दूरी अब महज़ भौतिक नहीं थी, बल्कि भावनात्मक रूप से वे एक-दूसरे के बेहद करीब आ चुके थे। सुमिता के भरे हुए, आकर्षक वक्षों पर उनकी साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था, और अनुराग की निगाहें एक पल के लिए भी उनसे हटना नहीं चाहती थीं।

अनुराग ने धीरे से कहा, "सुमिता जी, कभी-कभी हमें अपने मन की बात कह देनी चाहिए। बोझ हल्का हो जाता है।"

"कहने वाला भी तो कोई हो, अनुराग जी। जो बिना जज किए मेरी बात सुने," सुमिता ने कहा, और उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी थी।

अनुराग ने अपनी बालकनी की रेलिंग को पार करने की इच्छा को दबाते हुए, अपने हाथों को कसकर भींच लिया। उन्होंने महसूस किया कि सुमिता केवल बात नहीं करना चाहती हैं, बल्कि वो भावनात्मक और आत्मिक रूप से एक जुड़ाव चाहती हैं।

अगले दिन सुबह, सुमिता को एक छोटा सा कागज का टुकड़ा अपनी बालकनी की रेलिंग पर रखा मिला। उसे पता था कि यह अनुराग ने ही रखा होगा।

कागज़ पर साधारण हिंदी में लिखा था: "सुमिता जी, मैंने सुना... अकेलेपन में नींद नहीं आती। अगर मन करे तो आज शाम को सात बजे अपने फ्लैट की बालकनी में आना। मैं बस कुछ अच्छी बातें करूँगा।" नीचे सिर्फ 'ए' लिखा था।

सुमिता के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई। यह एक छोटा सा निमंत्रण था, जो उनके दिल को छू गया। उन्हें लगा कि इस अकेलेपन में किसी ने उन्हें याद किया है।

शाम को सात बजे, सुमिता ने जानबूझकर एक गहरे नीले रंग की पतली साड़ी पहनी, जिससे उनके भरे बदन का आकर्षण और बढ़ गया था। उन्होंने अपने बालों को खुला रखा और बालकनी में आईं।

अनुराग पहले से ही वहाँ खड़े थे। उन्होंने सुमिता को देखकर एक गहरी साँस ली और मुस्कुराए। "आप आ गईं, सुमिता जी। मुझे लगा शायद आप नाराज़ होंगी।"

"नाराज़ क्यों होऊँगी, अनुराग जी? आपने तो बस एक अच्छी सी दावत दी थी," सुमिता ने अपनी चंचल आवाज़ में कहा, और अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा और सँभाला।

"दावत तो चाय और बिस्किट की है, सुमिता जी। लेकिन साथ में मेरी कुछ बातें भी होंगी। जो शायद आपके मन को थोड़ा सुकून दें।" अनुराग ने अपनी बालकनी की छोटी सी मेज पर दो कप और एक प्लेट में बिस्किट रखे।

उन्होंने कहा, "माफ़ करना, मैं आपको आपके घर आकर नहीं दे सकता था, इसलिए यहीं रख दिया। आप ले लीजिए।"

सुमिता ने धीरे से कहा, "आप भी कमाल करते हैं, अनुराग जी। ये तो दोनों बालकनी के बीच की दूरी है। आप वहीं से फेंक दीजिए, मैं लपक लूंगी।"

अनुराग हँस पड़े। "आप भी बहुत चंचल हैं, सुमिता जी। पर फेंकना ठीक नहीं। रुकिए..."

अनुराग अपने कमरे के अंदर गए और एक लम्बी डंडी वाली झाड़ू लेकर आए। उन्होंने उस डंडी के सिरे पर चाय के कप और प्लेट को कपड़े से बाँधा और धीरे से सुमिता की बालकनी की तरफ़ बढ़ाया।

इस नटखट तरीके पर सुमिता की हँसी छूट गई। "ये क्या कर रहे हैं, अनुराग जी? ये तो किसी फिल्म का सीन लग रहा है!"

"होने दीजिए, सुमिता जी। ज़िंदगी में थोड़ा ड्रामा भी ज़रूरी है, खासकर जब ज़िंदगी में कोई दिलचस्पी न बची हो," अनुराग ने कहा, और मुस्कुराते हुए सुमिता को बिस्किट और चाय का कप पकड़ा दिया।

जब सुमिता ने कप लिया, तो अनुराग का हाथ डंडी पर था, और उनकी उँगलियाँ सुमिता की उँगलियों के बहुत करीब थीं। उस पल दोनों ने एक-दूसरे को देर तक देखा। इस साधारण से स्पर्श में एक गहरा रोमांच और आत्मिक जुड़ाव था।

सुमिता ने चाय का कप लेते हुए कहा, "आप तो बड़े वीर रस के आदमी हैं, अनुराग जी। इतनी दूर से भी चीज़ें पहुँचा देते हैं।"

"वीरता का क्या है, सुमिता जी? असली वीरता तो तब है जब इंसान अपने मन की बात किसी और को बता पाए, बिना किसी डर के।" अनुराग ने अब अपनी आवाज़ को और भी धीमा और भावुक कर दिया।

वे दोनों धीरे-धीरे अपनी चाय पी रहे थे। हवा अब भी चल रही थी, लेकिन अब उसमें एक मीठी सी गर्माहट महसूस हो रही थी। सुमिता ने महसूस किया कि अनुराग की बातें उसके पति राजेश की बेरुखी से कितनी अलग थीं।

अनुराग ने कहा, "पता है, सुमिता जी। मैं जब भी आपको देखता हूँ, मुझे लगता है कि आप किसी गहरे दर्द को छिपा रही हैं। आपकी आँखें... उनमें एक अजीब सी चमक है, लेकिन वो उदास है।"

सुमिता की आँखें भर आईं। वह हमेशा से चाहती थीं कि कोई उनके इस भावनात्मक खालीपन को पहचाने। "आप सही कह रहे हैं, अनुराग जी। अब तो बस... ज़िंदगी कट रही है। राजेश जी के पास मेरे लिए वक़्त ही नहीं है।"

अनुराग ने धीरे से सिर हिलाया। "वक्त की कमी नहीं होती, सुमिता जी। बस प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "आप इतनी खूबसूरत हैं, आपका मन इतना चंचल है। आपको हमेशा खुश रहना चाहिए। पर जब मैं देखता हूँ कि आप हर शाम ऐसे अकेली बैठी रहती हैं, तो मेरा भी मन उदास हो जाता है।"

सुमिता को लगा कि यह केवल पड़ोसी की सहानुभूति नहीं है। यह उससे कहीं ज़्यादा था। अनुराग की आँखें उनके भरे बदन को, उनके आकर्षण को सम्मान से देख रही थीं, लेकिन उनकी बातों में एक आत्मिक जुड़ाव की गहरी कसक थी।

"मैं क्या करूँ, अनुराग जी? मैं तो थक गई हूँ," सुमिता ने कहा, और अपनी नज़रों को ज़मीन पर झुका लिया।

अनुराग ने धीरे से कहा, "थकना नहीं चाहिए, सुमिता जी। बस अपने मन को थोड़ा खुला रखना चाहिए। कभी-कभी हमें बाहर से सहारा लेना पड़ता है, जब घर के अंदर की दीवारें ठंडी पड़ जाती हैं।"

यह बात एक बड़े गहरे राज़ की तरह थी। सुमिता जानती थी कि अनुराग क्या कहना चाह रहे हैं। यह एक अनकहा रिश्ता था, जो उनके अकेलेपन की वजह से पनप रहा था।

वे दोनों देर तक खामोश रहे। उनकी ख़ामोशी में एक-दूसरे के प्रति गहरी समझ और दबी हुई इच्छाएं थीं। सुमिता को लगा कि उनके और अनुराग के बीच अब सिर्फ़ दो बालकनी नहीं हैं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक पुल बन चुका है।

रात गहरा रही थी। सुमिता ने धीरे से कहा, "शुक्रिया, अनुराग जी। आज आपसे बात करके मुझे सचमुच सुकून मिला। और चाय भी बहुत अच्छी थी।"

अनुराग ने धीरे से मुस्कुराया। "शुक्रिया की कोई बात नहीं, सुमिता जी। बस... आप जब चाहें, मुझे यहाँ खड़ा पाएंगी। मैं भी अकेलेपन से लड़ रहा हूँ।"

सुमिता अपने फ्लैट में वापस चली गईं, पर उस रात उन्हें कई दिनों बाद गहरी नींद आई। उन्हें लगा कि उनके जीवन में एक नया, अनकहा और भावुक सहारा आ गया है, जो रात के सुकून में बदल गया था। वह जानती थी कि यह रिश्ता बस एक शुरुआत है, और उनके जीवन की कहानी में एक नया अध्याय जुड़ चुका है....आगे की कहानी जानने के लिए कामेंट बाक्स में जाकर next लिख दीजिए....!!!!! 💘💘

एक दुनिया अलग सी




“कुछ  #पुरुष एक बात ज़िंदगी भर नहीं समझते…रखैल आपके साथ तब तक रहती है, जब तक आपकी जेब भरी रहती है।जिसे आप ‘प्रेमिका’ कहत...
13/12/2025

“कुछ #पुरुष एक बात ज़िंदगी भर नहीं समझते…
रखैल आपके साथ तब तक रहती है, जब तक आपकी जेब भरी रहती है।

जिसे आप ‘प्रेमिका’ कहते हैं न… वो आपको प्रेम नहीं करती,
वो सिर्फ पैसे से प्यार करती है।

जिस दिन आपकी जेब खाली,
उसी दिन वो आपको ऐसे लात मारकर निकल देगी,
जैसे कभी जानती तक नहीं थी।
क्योंकि रखैल का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता—
उसका सिर्फ एक धंधा होता है… पैसा।

आप मानें या न मानें,
हजारों उदाहरण उठाकर देख लीजिए…
जिसे आप प्रेम समझ रहे हैं,
वो बस एक सौदा है।

अगर आज आप उस पर महीने के 10 हज़ार उड़ा रहे हैं,
और कल कोई 20 हज़ार देने वाला मिल गया—
वो उसी के साथ चली जाएगी।
क्योंकि उसके दिमाग में आप नहीं,
रुपया बैठा होता है।

पत्नी वो होती है,
जो सुख-दुख में साथ निभाती है।
रखैल वो है,
जो हर किसी को ‘पति’ बनाकर इस्तेमाल कर सकती है।

इसलिए वक्त रहते संभल जाइए।
पैसा भी चला जाएगा,
और पत्नी का रिश्ता भी।
फिर आख़िर में हाथ आएगा सिर्फ… खालीपन।

सुधरिए, और अपनी पत्नी के साथ
एक मधुर और सम्मान वाला रिश्ता बनाईए।
इसी में आपकी असली जीत है।”

क्या आप मेरी बात से सहमत हो,,,,अगर सहमत हो तो कामेंट बाक्स में जाकर Agree लिख दीजिए....!!! 💘💘

एक दुनिया अलग सी

*ननदरानी कभी तो पति पत्नी को अकेला छोड़ दो*नमिता के हाथ जल्दी-जल्दी चल रहे थे। उसे अपना काम पूरा करने की बहुत जल्दी थी। ...
13/12/2025

*ननदरानी कभी तो पति पत्नी को अकेला छोड़ दो*

नमिता के हाथ जल्दी-जल्दी चल रहे थे। उसे अपना काम पूरा करने की बहुत जल्दी थी। ननद भव्या के आने से पहले पहले वो पूरा काम कर यहां से रवाना हो जाना चाहती थी। क्योंकि पति सुधीर उसका इंतजार कर रहा होगा।
सुबह ऑफिस जाने से पहले ही सुधीर नमिता को समझा गया था कि शाम को तुम मुझे ऑफिस के बाहर ही मिल जाना। वहां से हम कोई मूवी देखने चलेंगे और उसके बाद कैंडल लाइट डिनर करेंगे। और भगवान के लिए इस बार तुम अकेली ही आना। ऐसा ना हो कि हर बार की तरह भव्या को लेकर आ जाओ।
नमिता ने ममता जी से भी पूछा तो उन्होंने सहर्ष ही उसे जाने के लिए हां कर दी। पर साथ ही कह दिया कि जाने से पहले खाना बनाकर जाना। मुझे और तुम्हारे पापा जी को समय पर खाना खाने की आदत है।
इसलिए नमिता चार बजे से ही रसोई में फटाफट काम करने में लगी हुई थी। वो 6:00 बजे से पहले घर से निकल जाना चाहती थी। क्योंकि 6:00 बजे तक भव्या अपने कोचिंग से आ जाती थी। वो शाम का खाना बना चुकी थी और तैयार होने अपने कमरे में जा ही रही थी कि इतने में सास ममता जी ने उसे रोक लिया और कहा,
" बहु जाने से पहले थोड़ा बेसन का हलवा भी बना कर रख जा। बहुत दिन हो गए खाए हुए। आज बहुत मन कर रहा है कि कुछ मीठा खाए"
आखिर नमिता को वापस रसोई में आना पड़ा। अब वो बेसन का हलवा बना रही थी। जैसे ही बेसन का हलवा बन गया, वो तैयार होने अपने कमरे में चली गई। फटाफट से शिफॉन की गुलाबी रंग की साड़ी जो कि सुधीर को बहुत पसंद थी पहनकर हल्का सा मेकअप कर वो तैयार हो गई। और अपना पर्स उठाकर बाहर निकली कि इतने में भव्या आती दिखी।

उसे देखते ही नमिता का दिल बैठ गया। 'हे भगवान! ये आ गई। अब जरूर जिद करेगी मेरे साथ जाने के लिए। अब मैं सुधीर को क्या जवाब दूंगी? ये मम्मी जी को भी इसी समय हलवा खाना था। अब सुधीर का मूड ऑफ होगा सो होगा, मुझे भी डांट पड़ेगी सो अलग'
भव्या अंदर आई और नमिता को तैयार देख कर बोली,
" भाभी कहीं बाहर जा रही हो?"
पर नमिता के बोलने से पहले ही ममता जी बोली,
" हां, आज सुधीर और इसका मूवी देखने का प्लान है। फिर दोनों बाहर ही डिनर करके आएंगे। इसलिए जा रही है"
ममता जी की बात सुनकर नमिता मुंह फुलाते हुए बोली,
" मेरे बगैर?? भला ये भी कोई बात हुई"
उसकी बात सुनकर तो नमिता का हलक ही सूख गया। अब तो पक्का कंफर्म था कि वो भी साथ ही जाएगी। आखिर ममता जी भव्या की बात को कभी नहीं टालती थी। आखिर मां का प्यार अपनी बेटी के लिए उमड़ उमड़ कर जो आता था। उसने ममता जी की तरफ देखा तो बजाय अपनी तेइस साल की बेटी को समझाने के उन्होंने नमिता को ही समझाया,
" अरे! ये तो अभी बच्ची है। आखिर इसका भी तो मन करता होगा। ले जाओ इसे भी। इसका भी दिल बहल जाएगा। आखिर तुम भाभी हो, तो इसकी जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही है"
उनकी बात सुनकर नमिता को कुछ समझ ही नहीं आया कि क्या जवाब दूं। अपनी चार महीने की शादीशुदा जिंदगी में वो कई बार ऐसा देख चुकी है, जहां भव्या बेवजह दोनों पति-पत्नी के बीच में आ गई हो। इस तेइस साल की लड़की के लिए लड़का ढूंढा जा रहा है जिस में इतनी सी अक्ल नहीं है कि उसके भैया भाभी को भी प्राइवेसी चाहिए होगी। बस बेवजह की जिद करके बैठ जाती है और ममता जी बजाय उसे समझाने के उसका ही साथ देती है।
इस भव्या ने तो उनकी शादी के बाद जिद करके उनके हनीमून को फैमिली ट्रिप बना दिया था। शादी के एक सप्ताह बाद केरल के लिए टिकट बुक थे। पर भव्या की जिद के कारण भव्या और ममता जी का टिकट भी बना। जब विपुल जी ने समझाने की कोशिश की तो ममता जी ने जवाब दिया,
" अरे वो दोनों तो अलग कमरे में रहेंगे और हम दोनों अलग कमरे में"
" अरे पर तुम बेटे बहु के साथ अच्छी लगोगी क्या?"
"क्यों नहीं अच्छी लगूँगी? एक आदर्श बहू तो वही होती है जो अपने परिवार को अपने साथ लेकर चले। आखिर हम सब जितना एक साथ रहेंगे, उतना ही तो परिवार को जान पाएंगे"
इसके आगे विपुल जी भी कुछ समझा नहीं पाए। अब दोनों पति-पत्नी ना तो ठीक से कहीं घूम पाए और ना ही एंजॉय कर पाए। क्योंकि पहले दिन ही ममता जी की तबीयत खराब हो गई। सो दो दिन तो उनकी सेवा में निकले। और आखिर दो दिन बाद सुधीर में टूर ही कैंसिल कर दिया और सब लोग घर लौट आए।
तभी बाहर से ससुर विपुल जी अंदर आए और नमिता को वही देख कर बोले,
" अरे बहू, अभी तक तुम गई नहीं"
" हां बस, भव्या अभी तैयार हो जाए। फिर नमिता उसके साथ ही निकलेगी"
अचानक ममता जी ने कहा तो विपुल जी ने नमिता की तरफ देखा। उन्हें बात समझते देर नहीं लगी। उन्होंने ममता जी से कहा,
" अरे! भव्या वहाँ क्या करेगी? भला इन दोनों के बीच में उसका वहां क्या काम"
" क्या करेगी से क्या मतलब? मूवी देखेगी और डिनर बाहर करके आएगी। जैसे ये दोनों करके आएंगे। और भैया भाभी ये लोग उसके। इनसे जिद नहीं करेगी तो किससे करेगी"
ममता जी ने तुनक कर कहा।
इसके आगे भी विपुल जी कुछ कह नहीं पाए। इधर नमिता अपने कमरे में आ गई और उसने सुधीर को मोबाइल पर मैसेज लिखकर भेज दिया,
" भव्या भी आ रही है"
ये मैसेज सुधीर ने देखा तो उसने फटाफट नमिता को फोन लगाया और नमिता ने भी फोन उठाने में देर नहीं की। नमिता के फोन उठाते ही सुधीर बोला,
" तुमसे कहा था ना मैंने कि भव्या के आने के पहले ही निकल जाना। जरूरी है क्या हर बार भव्या को साथ लाना"
उसकी बात सुनकर नमिता बोली,
" इसमें मेरी क्या गलती? तुम्हारी बहन को इतनी अक्ल नहीं है कि पति पत्नी को भी प्राइवेसी चाहिए होती है। ऊपर से मम्मी जी भी उसकी हां में हां मिलाते हुए उसे साथ भेज देती है"
नमिता की बात सुनकर सुधीर गुस्से में बोला,
" रहने दो, मत आओ तुम लोग यहां पर। मैं खुद ही घर आ रहा हूं"
" अरे! पर अब अगर तुम कैंसिल करोगे तो वो लोग मुझे दो बातें सुनाएंगे"
" कह देना कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है"
कहकर सुधीर ने गुस्से में फोन काट दिया। इधर नमिता का भी मूड ऑफ हो चुका था। उसने भी कपड़े चेंज कर लिए।
भव्या तैयार होकर उसके कमरे में आई तो देखा नमिता घर का सूट पहने कपड़े समेट रही थी। उसे देखते ही वो बोली,
" ये क्या भाभी अपने कपड़े भी चेंज कर लिए? जाना नहीं है क्या?"
उसकी बात सुनकर नमिता बोली,
" नहीं दीदी, आपके भैया का फोन आया था। उनकी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए उन्होंने मना कर दिया"
नमिता के सामने तो भव्या ने कुछ नहीं कहा लेकिन बाहर आकर ममता जी से बोली,
" भाभी ने सारा प्लान कैंसिल कर दिया। पता नहीं मुझे देखकर तो वो कभी खुश ही नहीं होती"
उसकी बात सुनकर ममता जी ने नमिता को आवाज देकर बुलाया और कहा,
" ये मैं क्या सुन रही है बहू? तुमने सारा प्लान कैंसिल कर दिया। तुमसे मेरी बेटी खुशी देखी नहीं जाती। अरे तुम लोगों से नहीं बोलेगी तो किससे बोलेगी? हम लोग तो आज है कल नहीं है। इसका मतलब तो साफ है कि हमारे जाने के बाद मेरी बेटी का तो मायका ही नहीं होगा। अगर तुम्हारे मायके वाले तुम्हारे साथ ऐसा करे तो तुम्हें कैसा लगेगा"
इधर ममता जी अपनी बहू को सुनाए जा रही थी, उधर भव्या ये देख कर मुस्कुरा रही थी। आखिर नमिता ने कहा,
" मम्मी जी प्लान मैंने कैंसिल नहीं किया है। सुधीर जी का फोन आया था। उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो खुद उन्होंने मना किया है"
कहकर नमिता रसोई में चली गई और बाकी बचे सदस्यों का खाना तैयार करने लगी। इतने में सुधीर भी आ गया। पर उससे किसी ने कुछ नहीं कहा। सुधीर ने नमिता से बिल्कुल बात नहीं की।
दो दिन तक सुधीर और नमिता के बीच में बातचीत नहीं हुई। आखिर थक हारकर नमिता सुधीर से बोली,
" आखिर मेरी क्या गलती है जो तुम मुझसे बात नहीं कर रहे हो"
उसकी बात सुनकर सुधीर गुस्से में बोला,
" तुम मना नहीं कर सकती थी भव्या को? हर जगह उसे अपने साथ लेकर चलना जरूरी है क्या? मैं तुम्हारा पति हूं। मेरे भी कुछ अरमान है। कुछ समय तुम्हारे साथ अकेले बिताना चाहते हूँ, तो क्या गलत है। लेकिन नहीं, तुम तो भव्य और मम्मी को कुछ बोल ही नहीं पाती हो"
उसकी बात सुनकर नमिता गुस्से में बोली,
" अरे वाह श्रवण कुमार, तुम्हारी खुद की तो हिम्मत होती ही नहीं है अपनी मम्मी और बहन को कुछ कहने की। और मुझसे उम्मीद करते हो कि मैं ही कहूं। मैं तो भाभी हूं, पर तुम तो सगे भाई हो। पर फिर भी तुम्हारी ये हालत है। खैर तुम आदर्शवादी बने रहो, मैं ही बुरी बन जाती हूं। मैं तो बाहर से आई हूं, मुझे तो बुरा कहना बहुत आसान है"
नमिता की बातों के आगे सुधीर कुछ भी नहीं कह पाया। आखिर वो गलत भी नहीं थी। कुछ दिनों बाद सुधीर को ऑफिस की तरफ से महाबलेश्वर ट्रिप मिला। घर आकर उसने नमिता से कहा,
" नमिता तुम भी तैयार रहना। दस दिन बाद महाबलेश्वर ट्रिप पर हम दोनों साथ चलेंगे"
लेकिन जैसे ही भव्या को पता चला तो उसने फिर जिद पकड़ ली कि वो भी साथ चलेगी। उसने कभी महाबालेश्वर नहीं देखा। लेकिन इस बार सुधीर ने साफ मना कर दिया कि वो ऑफिस के स्टाफ के साथ जा रहा है, जहां सब सिर्फ अपनी अपनी पत्नी के साथ आ रहे हैं।
लेकिन भव्या ने इस पर मुंह फुला लिया और नाराज हो कर बैठ गयी। उस दिन उसने डिनर भी नहीं किया। ये देखकर ममता जी ने नमिता को ही डाँटा,
" अरे तू मना नहीं कर सकती है क्या सुधीर को? तेरा घूमना जरूरी है क्या? कितना मन था उस बच्ची का महाबालेश्वर देखने का। लेकिन अब वो नहीं जा सकती तो तू मना कर दे। कम से कम कुछ तो तसल्ली मिलेगी उसे"
लेकिन नमिता ने कोई जवाब नहीं दिया और ना ही जाने से इनकार किया। जब भव्या ने चिल्लाकर नमिता से कहा तो नमिता ये बात बर्दाश्त नहीं कर पाई कि भव्या उससे इस तरह से चिल्लाकर बात कर रही है। उसने पलट कर भव्या से कह दिया,
" दीदी मुझे माफ करो। पर हम पति-पत्नी हैं, कभी तो हमें अकेला छोड़ दिया करो। हर जगह हमारे साथ जाना जरूरी है क्या"
बस यही बात ममता जी और भव्या ने पकड़ ली। इस कारण से घर का माहौल बड़ा खराब सा हो गया। लेकिन महाबलेश्वर जाने से पहले इससे उभरने का बहुत जल्दी ही मौका मिला।

रविवार के दिन भव्या को देखने लड़के वाले आए। लड़का नवीन, उसकी मां पापा, बड़ा भाई और छोटी बहन भी आए थे। देखने दिखाने का सिलसिला चला और फाइनली उन लोगों को भव्या पसंद आ गई। ₹51 और मिठाई का डिब्बा देकर रोका कर दिया गया।
सभी पुरुष खा पीकर बाहर हॉल में बैठे थे, वही सारी महिलाएं भव्या के कमरे में बैठी हुई थी। तभी नमिता सबके लिए शरबत बना कर ले आई। उस समय भव्या की ननद ने भव्या से पूछा,
" भाभी बताइए आपको कौन सी जगह पसंद है, ताकि आपकी शादी के बाद हम आपका हनीमून ट्रिप वही का सेट कर दे"
यह सुनकर भव्या शरमा गई और कुछ नहीं बोली। यह देखकर भव्या की होने वाली सास बोली,
" अरे बेटा बताओगी नहीं तो हमें कैसे पता चलेगा"
तब उसकी जगह ममता जी बोली,
" मेरी बेटी को महाबलेश्वर जाने की बड़ी इच्छा हैं। वो तो अपने भैया भाभी के साथ जाना चाहती थी, लेकिन इन लोगों ने मना कर दिया"
ममता जी की बात सुनकर नमिता का चेहरा उतर गया। पर उसने बात संभालते हुए कहा,
" दरअसल बात ये है कि महाबालेश्वर ट्रिप इनके ऑफिस की तरफ से है। तो सभी स्टाफ मेंबर जा रहे हैं। और उनके साथ उनकी पत्नियाँ ही जा रही है। इसीलिए मना किया था। पर वैसे आप फिक्र मत कीजिए। हमारी दीदी बहुत ही आदर्शवादी है। हमारी मम्मी जी ने तो उन्हें शुरू से सिखाया है कि अपने परिवार को साथ लेकर चलना चाहिए। इसलिए हनीमून पर भी इन्हें अकेले भेजने की जरूरत नहीं है। आप चाहे तो पूरा फैमिली टूर कर सकते हैं"
उसकी बात सुनकर सब लोग हंस दिए। भव्या की ननद बोली,
" अरे भाभी, आपकी भाभी तो बड़ी ही मजाकिया है। लेकिन भाभी की भाभी जी, हम ऐसे नहीं हैं। अरे भैया भाभी को भी तो प्राइवेसी चाहिए होती है ना। अब इनके हनीमून पर हम क्या करेंगे"
उसकी बात सुनकर भव्या की होने वाली सास बोली,
" बिल्कुल सही कहा बेटा, बेटे बहू को भी तो प्राइवेसी चाहिए होती है। अब ऐसे में परिवार के सदस्य हर बार उनके बीच में आए तो कई जगह पर तो घर टूटने की कगार पर आ जाते हैं। ना बाबा ना, हम तो ऐसी हरकत के सख्त खिलाफ है"
उनकी बात सुनकर ममता जी और भव्या के चेहरे की हवाइयां उड़ गई। दोनों एक दूसरे की तरफ देखने लगी और जैसे ही उनकी नजर नमिता से टकराई दोनों ने अपनी नज़रें नीची कर ली।
खैर थोड़ी देर बाद लड़के वाले वहां से रवाना हो गए। इस बारे में घर में किसी ने कोई बात नहीं की। लेकिन जिस दिन सुधीर और नमिता महाबालेश्वर के लिए रवाना हो रहे थे, उस दिन घर में सब खुशी-खुशी उन्हें रवाना कर रहे थे। आज ना तो ननद का मुंह फूला था और ना ही सास डांट रही थी।

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