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Merried Cpl 26,32
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24/12/2025

#बेवफा Modified Magazine

24/12/2025

मेरा नाम नेहा है। मैं 27 साल की हूँ। poetry                  ेरा पिछले साल फरवरी में मेरी शादी हुई थी और मैं प्रयागराज म...
08/12/2025

मेरा नाम नेहा है। मैं 27 साल की हूँ।
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पिछले साल फरवरी में मेरी शादी हुई थी और मैं प्रयागराज में अपने ससुराल में रहने लगी। मेरे पति बहुत अच्छे हैं, पर उनकी नौकरी दिल्ली में लग गई। दिसंबर के आखिर में वो वहाँ चले गए और बोले, “नेहा, बस दो-तीन महीने में तुम्हें भी बुला लूँगा।”

घर में अब सिर्फ़ मैं और मेरे ससुर थे। सास जी बहुत पहले गुज़र चुकी थीं। ससुर जी 55 साल के हैं, लंबे, चौड़े कंधों वाले। उनकी आँखों में हमेशा एक गहरा सन्नाटा रहता था। मैं उन्हें पापा कहती थी। वो मुझे बेटी की तरह प्यार करते थे, पर कभी-कभी उनकी नज़र मेरे चेहरे पर रुक जाती और फिर शर्मा कर हट जाती। मुझे लगता, वो भी उतने ही अकेले हैं जितनी मैं।

एक सर्द रात। दिसंबर का अंत। मुझे ज़बरदस्त प्यास लगी। मैं धीरे से बेड से उठी, रसोई की तरफ़ जा रही थी। ससुर जी का कमरा रास्ते में था। दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी दिख रही थी। मुझे चिंता हुई, “इतनी रात को पापा जाग रहे हैं? कहीं तबियत तो नहीं ख़राब?”

मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला। वो बिस्तर पर थे। आँखें बंद, साँसें तेज़। उनका हाथ धीरे-धीरे हिल रहा था। पहली बार मैंने देखा… उनका मर्दानापन। इतना बड़ा, इतना सुंदर। मेरी साँस रुक गई। मैं वहाँ से चुपके से हट गई, पर उस रात नींद नहीं आई। मेरे बदन में एक अजीब सी आग लगी थी।
अगले कुछ दिन मैं खुद को समझाती रही, “नेहा, ये ग़लत है। वो तुम्हारे पापा हैं।”

पर दिल मानता ही नहीं था।
पति के जाने के बाद घर और ख़ामोश हो गया। मैं शाम को नई-नई नाइटीज़ पहनने लगी। कभी लाल, कभी काली। ट्रांसपेरेंट वाली। मैं जानबूझकर उनके सामने झुकती, बाल संवारती, चाय बनाते वक़्त मुस्कुराती। वो मेरी तरफ़ देखते, फिर नज़रें झुका लेते। उनकी आँखें कहती थीं कि वो भी तड़प रहे हैं।

9 जनवरी की रात।
मैंने लाल रंग की जालीदार नाइटी पहनी थी। चूचियाँ उसमें से साफ़ झलक रही थीं। मैंने जानबूझकर ससुर जी को दूध देने का बहाना बनाया।
जब मैं कमरे में गई, वो बिस्तर पर थे। उनका चेहरा लाल, साँसें तेज़। पजामे में उभार साफ़ दिख रहा था। मैंने गिलास साइड टेबल पर रखा और मुड़ने लगी तो उनकी आवाज़ आई,

“नेहा… रुक ना… एक मिनट।”
मैं रुक गई। वो उठे, मेरे पास आए। उनकी आँखों में पानी था।
“बेटा… तुम बहुत सुंदर हो। मैं… मैं बहुत दिनों से अकेला हूँ। तुम्हें देखकर… दिल नहीं मानता।”
मैंने सिर झुका लिया। मेरी आँखें भी भर आईं।
“पापा… मैं भी अकेली हूँ।”

बस इतना कहते ही उन्होंने मुझे गले लगा लिया। एक बाप नहीं, एक मर्द ने मुझे गले लगाया था। उनका गर्म बदन मेरे बदन से सटा था। मैंने भी हाथ उनके गले में डाल दिए।
हम दोनों देर तक ऐसे ही खड़े रहे। फिर वो मुझे बिस्तर पर ले गए।

धीरे-धीरे मेरी नाइटी उतारी। मेरी चूचियों को प्यार से छुआ। मैं सिहर उठी।
“नेहा… अगर तुझे अच्छा न लगे तो बता देना।”
मैंने उनकी आँखों में देखा और सिर हिला दिया। “मुझे अच्छा लग रहा है पापा… बहुत अच्छा।”
उन्होंने मेरे होंठ चूमे। पहला चुंबन इतना कोमल था कि मेरी आँखों से आँसू निकल आए। फिर वो मेरे गले, कंधों, चूचियों पर किस करते गए। मैंने उनका सिर अपने सीने पर दबा लिया।

जब उन्होंने अपना लंd मेरे हाथ में दिया तो मैं सहम गई। इतना मोटा, इतना गर्म। मैंने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। वो मेरे कान में फुसफुसाए,
“नेहा… मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।”
मैंने उन्हें अपनी चू$@@चियों पर किस करने दिया। फिर नीचे… मेरी नाभि… फिर मेरी चooत। जब उनकी जीभ मेरी चूooot पर लगी तो मैंने कमर ऊपर उठा दी। मैंने कभी ऐसा सुख नहीं महसूस किया था।

मैंने उन्हें अपने ऊपर खींचा।
“पापा… अब और इंतज़ार नहीं होता।”
उन्होंने बहुत प्यार से, बहुत धीरे-धीरे मुझे अपना बनाया। पहला धक्का थोड़ा दर्द भरा था, पर उसके बाद सिर्फ़ सुकून। वो मेरे अंदर थे। पूरी तरह। मैंने उनकी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। वो मेरे कान में बोले,

“नेहा… तुम मेरी हो… आज से हमेशा के लिए।”
हमने पूरी रात एक-दूसरे को प्यार किया। कभी मैं ऊपर, कभी वो। कभी 69 में एक-दूसरे को चाटते-चूसते। जब वो मेरे अंदर झड़े तो मैंने उन्हें इतना ज़ोर से गले लगाया कि लगा हम दोनों एक हो गए।

सुबह जब आँख खुली तो वो मुझे सीने से लगाए थे। मेरे बालों को सहला रहे थे।
मैंने मुस्कुरा कर कहा, “पापा… अब मैं कभी अकेली नहीं रहूँगी न?”

उन्होंने मेरे माथे पर किस किया, “कभी नहीं, मेरी जान।”
उसके बाद से हमारा रिश्ता बदल गया। बाहर हम सास-ससुर और बहू थे, पर रातें… रातें सिर्फ़ हमारी थीं। प्यार की, सुकून की, एक-दूसरे को पूरा करने वाली।
और हाँ… जब मेरे पति मुझे दिल्ली बुलाने आए, मैंने मना कर दिया।

कह दिया, “मुझे यहीं अच्छा लगता है। पापा अकेले हो जाएँगे।”
वो समझ नहीं पाए कि मैंने किस अकेलेपन की बात की थी।
पर मुझे पता था… मैंने अपना सुकून, अपना प्यार यहीं पा लिया था। 🙏🙏like and comments🙏🙏🙏

08/12/2025
08/12/2025

08/12/2025

08/12/2025

08/12/2025
08/12/2025

08/12/2025

रात मैं पत्नी के साथ होटल में रुका था। सुबह दस बजे मैं नीचे नाश्ता करने गया। लेकिन जैसे ही रेस्टोरेंट के काँच के दरवाज़े पर पहुँचा, मेरी नज़र होटल के रिसेप्शन पर खड़े दो पुलिसवालों पर पड़ी। वे किसी का नाम पूछ रहे थे—कमरा 209… वही कमरा, जिसमें हम दोनों ठहरे थे।
एक पल को लगा जैसे मेरा दिल किसी ने मुट्ठी में कस लिया हो।

मैंने आगे बढ़कर सुनना चाहा, पर तभी एक होटल स्टाफ ने मुझे रोकते हुए कहा—
“सर, कृपया इधर से आइए…”
उसकी आवाज़ में अजीब-सी घबराहट थी।

मुझे कुछ समझ नहीं आया, पर मन में एक ही सवाल था—मेरी पत्नी? क्या हुआ उसे?
मैं दौड़कर लिफ्ट की ओर बढ़ा और अंदर घुसते ही उँगलियाँ काँपते हुए 2nd फ्लोर का बटन दबा दिया। लिफ्ट के शीशे में अपना चेहरा देखा—पसीने की बूंदें जिद की तरह जकड़ी हुई थीं।

जैसे-जैसे लिफ्ट ऊपर जा रही थी, एक अनजाना डर दिल को भारी करता जा रहा था।

दस मिनट पहले…
रात काफी देर तक हम बातें करते रहे थे। वह हमेशा की तरह मुस्कुरा रही थी, लेकिन उसकी आँखों में कुछ अनकहा था, जो वह बोलना चाहती लेकिन बोल नहीं पा रही थी।
कितनी बार पूछा—
“सब ठीक है, न?”
वह बस इतना कहती—
“हाँ, तुम हो न… सब ठीक है।”

सवेरे जब मैं नाश्ते के लिए निकला तो वह अभी सो रही थी। मैंने उसे कंबल ठीक से ओढ़ाया और धीरे से दरवाज़ा बंद कर दिया।

मुझे क्या पता था कि बस यही मेरा आखिरी स्पर्श होगा…

लिफ्ट खुलते ही मेरे कदम लड़खड़ाए
कमरा 209 के बाहर तीन लोग खड़े थे—एक डॉक्टर, एक होटल मैनेजर और एक पुलिस अधिकारी।
उनके चेहरे पर उतनी ही गंभीरता थी जितनी मेरे अंदर बेचैनी।

मैं उनके पास पहुँचा और आवाज़ गले में अटकते-अटकते निकली—
“मेरी… मेरी पत्नी कहाँ है?”

पुलिसवाले ने मेरी ओर देखा, जैसे कोई कठोर सच्चाई बताने की हिम्मत जुटा रहा हो।

“सर… अंदर आइए।”

कमरे का दरवाज़ा खुला।

मैं अंदर गया और मेरा पूरा शरीर जैसे किसी ने सुन्न कर दिया।
मेरी पत्नी बिस्तर पर पड़ी थी, बिल्कुल शांत… जैसे सो रही हो…
लेकिन उसकी साँसें नहीं चल रही थीं।

डॉक्टर ने धीरे से कहा—
“हमें अफसोस है… इन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ था। जब स्टाफ ऊपर आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”

मैं वहीं ज़मीन पर बैठ गया।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
मेरी आँखें सूख चुकी थीं, फिर भी उनमें से आँसू फूटते गए।

पर सस्पेंस यहीं खत्म नहीं होता…
मैंने अपनी पत्नी को कभी हार्ट की कोई समस्या बताई नहीं सुनी।
वह बिल्कुल स्वस्थ थी।
फिर यह सब अचानक कैसे?

मैंने पुलिस से पूछा, “यह कैसे हुआ? क्यों हुआ?”

उसने कमरे की ओर इशारा किया—
“लगता है आपकी पत्नी रात में काफी देर तक जागी थीं… शायद किसी बात का तनाव था। उन्होंने होटल की डायरी में कुछ लिखा भी है…”

“डायरी?”
मेरी साँसें जैसे उलझ गईं।

पुलिसवाले ने एक छोटी-सी नोटबुक मेरी तरफ बढ़ाई।

मैंने उसे खोला।
पहला पन्ना खाली था।
दूसरा भी।
पर तीसरे पन्ने पर उसने कुछ लिखा था—धीरे-धीरे, हिचक-हिचककर…

“शायद यह मेरी आखिरी रात है…”
“मैं तुमसे बहुत कुछ कहना चाहती थी…”
“मेरी हालत को मैं कई महीनों से छुपा रही थी…”

मैंने पढ़कर पन्ना पकड़ते-पकड़ते गिरा दिया।

क्या?
उसने मुझसे कुछ छुपाया था?

डायरी आगे सच बयां करती गई…
“डॉक्टर ने कहा था कि मेरा दिल बहुत कमजोर है… कभी भी रुक सकता है।”
“मैं चाहती थी तुम्हें न बताऊँ… क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे जीने का हौसला मिलता था।”
“मैं नहीं चाहती थी कि तुम मेरी बीमारी के बोझ में दब जाओ।”

मेरी आँखें धुँधली हो गईं।
मैं पन्ना बदल भी नहीं पा रहा था।

लेकिन अगले शब्दों ने मुझे तोड़ दिया—

“कल रात तुमने मुझसे पूछा था कि ‘सब ठीक है न?’
मैं झूठ बोली थी।”

मुझे लगा जैसे कमरे की सारी हवा गायब हो गई।

सबसे आखिरी पन्ना… सबसे बड़ा झटका
मैंने काँपते हुए आखिरी पन्ना खोला—

“अगर सुबह मेरी आँख न खुले, तो कृपया मुझे दोष मत देना।”
“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाना चाहती, पर मेरी साँसें मेरे बस में नहीं हैं।”
“बस एक वादा—जिस प्यार से तुमने मुझे जिया है, उसी प्यार को अपने अंदर जिंदा रखना।”
“तुम टूटना मत… क्योंकि मैं तुमसे दूर नहीं जा रही… मैं बस दिख नहीं पाऊँगी।”

मेरा पूरा वजूद जैसे बिखर गया।
मैं बिस्तर के पास बैठ गया, उसके ठंडे हाथ पकड़कर रोता रहा।
कितना कुछ उसने अकेले सहा…
कितना कुछ छुपाया…
और मैं कुछ जान भी नहीं पाया।

पुलिस ने कागज़ात पूरे किए और सब चले गए
कमरा खाली हो गया।
सिर्फ मैं और वह…
और वह डायरी…

मैंने सिर झुकाकर उसके माथे पर हाथ फेरा।
फिर याद आया—
मैं सुबह जल्दी-जल्दी निकल आया था, उसे देख भी नहीं पाया था ठीक से।
अगर पाँच मिनट और रुक जाता?
अगर उसे जगा देता?
अगर उसके पास ही रहता?

क्या वह बच जाती?

ये सवाल हमेशा मेरे साथ रहेंगे…

अंतिम दृश्य — प्यार का मौन वादा
अगले दिन जब मैं उसकी अंतिम यात्रा के लिए सब तैयार कर रहा था, तो उसकी डायरी का आखिरी संदेश पढ़ते-पढ़ते मेरी रूह कांप उठी—

“जब भी अकेलापन लगे, उस सुबह को याद कर लेना जब तुमने मेरा कंबल ठीक किया था।
वो एहसास मैं लेकर जा रही हूँ।
मुझे वहीं मिलना… किसी दूसरी दुनिया में… वही स्पर्श लिए हुए।”

मेरी आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
मैंने डायरी सीने से लगाई और आसमान की ओर देखा—
“तुम कहीं नहीं गई… तुम यहीं हो। बस मैं तुम्हें देख नहीं पा रहा।”

होटल का कमरा, वह बिखरी-सी चादर, और उसका आखिरी लिखा शब्द…
सब मेरे अंदर हमेशा के लिए बंद हो गए

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