08/12/2025
मेरा नाम नेहा है। मैं 27 साल की हूँ।
poetry ेरा
पिछले साल फरवरी में मेरी शादी हुई थी और मैं प्रयागराज में अपने ससुराल में रहने लगी। मेरे पति बहुत अच्छे हैं, पर उनकी नौकरी दिल्ली में लग गई। दिसंबर के आखिर में वो वहाँ चले गए और बोले, “नेहा, बस दो-तीन महीने में तुम्हें भी बुला लूँगा।”
घर में अब सिर्फ़ मैं और मेरे ससुर थे। सास जी बहुत पहले गुज़र चुकी थीं। ससुर जी 55 साल के हैं, लंबे, चौड़े कंधों वाले। उनकी आँखों में हमेशा एक गहरा सन्नाटा रहता था। मैं उन्हें पापा कहती थी। वो मुझे बेटी की तरह प्यार करते थे, पर कभी-कभी उनकी नज़र मेरे चेहरे पर रुक जाती और फिर शर्मा कर हट जाती। मुझे लगता, वो भी उतने ही अकेले हैं जितनी मैं।
एक सर्द रात। दिसंबर का अंत। मुझे ज़बरदस्त प्यास लगी। मैं धीरे से बेड से उठी, रसोई की तरफ़ जा रही थी। ससुर जी का कमरा रास्ते में था। दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी दिख रही थी। मुझे चिंता हुई, “इतनी रात को पापा जाग रहे हैं? कहीं तबियत तो नहीं ख़राब?”
मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला। वो बिस्तर पर थे। आँखें बंद, साँसें तेज़। उनका हाथ धीरे-धीरे हिल रहा था। पहली बार मैंने देखा… उनका मर्दानापन। इतना बड़ा, इतना सुंदर। मेरी साँस रुक गई। मैं वहाँ से चुपके से हट गई, पर उस रात नींद नहीं आई। मेरे बदन में एक अजीब सी आग लगी थी।
अगले कुछ दिन मैं खुद को समझाती रही, “नेहा, ये ग़लत है। वो तुम्हारे पापा हैं।”
पर दिल मानता ही नहीं था।
पति के जाने के बाद घर और ख़ामोश हो गया। मैं शाम को नई-नई नाइटीज़ पहनने लगी। कभी लाल, कभी काली। ट्रांसपेरेंट वाली। मैं जानबूझकर उनके सामने झुकती, बाल संवारती, चाय बनाते वक़्त मुस्कुराती। वो मेरी तरफ़ देखते, फिर नज़रें झुका लेते। उनकी आँखें कहती थीं कि वो भी तड़प रहे हैं।
9 जनवरी की रात।
मैंने लाल रंग की जालीदार नाइटी पहनी थी। चूचियाँ उसमें से साफ़ झलक रही थीं। मैंने जानबूझकर ससुर जी को दूध देने का बहाना बनाया।
जब मैं कमरे में गई, वो बिस्तर पर थे। उनका चेहरा लाल, साँसें तेज़। पजामे में उभार साफ़ दिख रहा था। मैंने गिलास साइड टेबल पर रखा और मुड़ने लगी तो उनकी आवाज़ आई,
“नेहा… रुक ना… एक मिनट।”
मैं रुक गई। वो उठे, मेरे पास आए। उनकी आँखों में पानी था।
“बेटा… तुम बहुत सुंदर हो। मैं… मैं बहुत दिनों से अकेला हूँ। तुम्हें देखकर… दिल नहीं मानता।”
मैंने सिर झुका लिया। मेरी आँखें भी भर आईं।
“पापा… मैं भी अकेली हूँ।”
बस इतना कहते ही उन्होंने मुझे गले लगा लिया। एक बाप नहीं, एक मर्द ने मुझे गले लगाया था। उनका गर्म बदन मेरे बदन से सटा था। मैंने भी हाथ उनके गले में डाल दिए।
हम दोनों देर तक ऐसे ही खड़े रहे। फिर वो मुझे बिस्तर पर ले गए।
धीरे-धीरे मेरी नाइटी उतारी। मेरी चूचियों को प्यार से छुआ। मैं सिहर उठी।
“नेहा… अगर तुझे अच्छा न लगे तो बता देना।”
मैंने उनकी आँखों में देखा और सिर हिला दिया। “मुझे अच्छा लग रहा है पापा… बहुत अच्छा।”
उन्होंने मेरे होंठ चूमे। पहला चुंबन इतना कोमल था कि मेरी आँखों से आँसू निकल आए। फिर वो मेरे गले, कंधों, चूचियों पर किस करते गए। मैंने उनका सिर अपने सीने पर दबा लिया।
जब उन्होंने अपना लंd मेरे हाथ में दिया तो मैं सहम गई। इतना मोटा, इतना गर्म। मैंने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। वो मेरे कान में फुसफुसाए,
“नेहा… मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।”
मैंने उन्हें अपनी चू$@@चियों पर किस करने दिया। फिर नीचे… मेरी नाभि… फिर मेरी चooत। जब उनकी जीभ मेरी चूooot पर लगी तो मैंने कमर ऊपर उठा दी। मैंने कभी ऐसा सुख नहीं महसूस किया था।
मैंने उन्हें अपने ऊपर खींचा।
“पापा… अब और इंतज़ार नहीं होता।”
उन्होंने बहुत प्यार से, बहुत धीरे-धीरे मुझे अपना बनाया। पहला धक्का थोड़ा दर्द भरा था, पर उसके बाद सिर्फ़ सुकून। वो मेरे अंदर थे। पूरी तरह। मैंने उनकी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। वो मेरे कान में बोले,
“नेहा… तुम मेरी हो… आज से हमेशा के लिए।”
हमने पूरी रात एक-दूसरे को प्यार किया। कभी मैं ऊपर, कभी वो। कभी 69 में एक-दूसरे को चाटते-चूसते। जब वो मेरे अंदर झड़े तो मैंने उन्हें इतना ज़ोर से गले लगाया कि लगा हम दोनों एक हो गए।
सुबह जब आँख खुली तो वो मुझे सीने से लगाए थे। मेरे बालों को सहला रहे थे।
मैंने मुस्कुरा कर कहा, “पापा… अब मैं कभी अकेली नहीं रहूँगी न?”
उन्होंने मेरे माथे पर किस किया, “कभी नहीं, मेरी जान।”
उसके बाद से हमारा रिश्ता बदल गया। बाहर हम सास-ससुर और बहू थे, पर रातें… रातें सिर्फ़ हमारी थीं। प्यार की, सुकून की, एक-दूसरे को पूरा करने वाली।
और हाँ… जब मेरे पति मुझे दिल्ली बुलाने आए, मैंने मना कर दिया।
कह दिया, “मुझे यहीं अच्छा लगता है। पापा अकेले हो जाएँगे।”
वो समझ नहीं पाए कि मैंने किस अकेलेपन की बात की थी।
पर मुझे पता था… मैंने अपना सुकून, अपना प्यार यहीं पा लिया था। 🙏🙏like and comments🙏🙏🙏