Shreesiddh dhaam adhyatmic sadhna siddhi evam chikitsa kendra

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29/06/2023

🌺।।लुप्त होती भगवान वराह की उपासना।।🌺

श्री भगवान वराह भगवान विष्णु के दशावतर मे से एक प्रमुख अवतार है
इसी अवतार में प्रभु ने राक्षस हिरण्याक्ष वध व पृथ्वी का उद्धार किया था और गुरुत्वाकर्षण शक्ति को व्यवस्थित कर के पृथ्वी के विकास में योगदान दिया था।
प्राचीन काल में भगवान वराह के स्वरूप व उपासना का बहुत विस्तृत वर्णन शास्त्रों में प्राप्त होता है। इनकी उपासना प्राचीन समय में जनमानस में इतनी प्रचलित थी कि इनकी लीलाओं के विषय में एक स्वतंत्र पुराण "वराह पुराण" की रचना हुई तथा अनेकों तंत्र शास्त्रों मे भी इनकी उपासना पर बहुत जोर दिया गया।

परंतु आज दुर्भाग्य देखिए भारत के बहुत कम हिस्सों में ही आपको वराह भगवान के उपासक देखने को मिलेंगे आज इनकी उपासना लुप्त होती जा रही है।
इनकी उपासना को रोकने के लिए विधर्मी ने कई भ्रामक प्रचार किए जैसे वराह भगवान को सूअर बताना और विष्ठा खाने वाला बताकर उनका अपमान करना। परंतु सत्य बहुत अलग है वराह भगवान का स्वरूप आप देखेंगे तो पाएंगे वराह भगवान ग्राम सुकर स्वरूप में नहीं है वह जंगली शूकर स्वरूप में है और आपको पता ही होगा जंगली सूअर कंद मूल फल अधिक खाते हैं और अकाल की स्थिति में कभी-कभी शिकार करते हैं ग्राम सूअर जैसे विष्ठा जंगली सूअर नहीं खाते।

आइए वराह उपासना के बारे में थोड़ी सी चर्चा करते हैं-:
1) किसी व्यक्ति पर तंत्र मंत्र, अभिचार,भूत-प्रेत आदि की पीड़ा हो तो उसमें वराह उपासना तत्काल फल प्रदान करने वाली बताई गई है।
2) मकान बनाने में अड़चन आ रही हो भूमि का सुख प्राप्त नहीं हो रहा हो तो उसमें भी वराह उपासना चमत्कारिक फल प्रदान करती है
3) शत्रुओं से रक्षा के लिए वराह उपासना अमोघ है।
और भी अनेक लाभ शास्त्रों में वर्णित है आइए मिलकर वराह भगवान की उपासना करें अपने जीवन को धन्य बनाएं
नित्य पाठ करने हेतु सामग्री-:
1) वराह स्तोत्र
2) वराह सहस्त्रनाम
3) वराह अष्टोत्तर शतनाम
4) वराह पंचकम
5) वराह स्तुति
6) वराह कवच
7) वराह मंत्र
8) श्री वाराह आष्टक
9) वराह पुराण

*प्रायः पेड़ पौधों की प्रजाति को लोग वनस्पति समझ लेते हैं जो कि ग़लत है ।वनस्पति का अर्थ होता है जो वन का राजा या वन का पत...
16/04/2023

*प्रायः पेड़ पौधों की प्रजाति को लोग वनस्पति समझ लेते हैं जो कि ग़लत है ।

वनस्पति का अर्थ होता है जो वन का राजा या वन का पति ।

वनस्पति सभी पेड़ पौधों को नहीं कहा जाता है । वनस्पति विज्ञान के नाम से आधुनिक लेखकों ने सभी पेड़ पौधों को एक ही वर्ग में डाल दिया है जो कि बिल्कुल ग़लत अवधारणा है ।

अब इस अवधारणा को अगर कोई तोड़े या सही सही बताएगा तो उसे ही गालियाँ पड़ेंगी क्योंकि कोई नहीं चाहता कि उनके बने बनाये सदियों से सिद्धांत या ज्ञान पर कोई उँगली उठाये ।

अब सभी तो वनस्पति अर्थात वन के राजा या जंगल के अधिराज तो हो नहीं सकते ।

सभी वन में विचरने वाले जीव को वनराज या सिंह तो कहा नहीं जा सकता ।

देखिये छह प्रकार से पेड़ पौधों का वर्गीकरण किया जाता है ।

1. वनस्पति
2. औषधि
3. लता
4. त्वकसार
5. वीरुध
6. द्रुम

अब आईए एक एक कर समझते हैं !

1. वनस्पति :- यह पेड़ पौधों की वह प्रजाति होती है जो बिना बौर आये फल देते हैं । इनके वृक्ष पर एक नहीं कई जीवों की प्रजातियों का पालन पोषण होता है और यह अपने साथ कई पेड़ पौधों को भी सहारा देते हैं ।
यह पूरा बड़ा Ecosystem अपने साथ रखते हैं ।

इनमें पुष्प नहीं आते अर्थात बौर नहीं आते , वस्तुतः आते हैं पर वह दृष्टिगोचर होने से पहले फल के रूप में बन जाते हैं ।

जैसे पीपल , बरगद , गूलर ,पाकड़ या Ficus प्रजाति के सभी पेड़ वनस्पति कहलाते हैं ।
Ficus प्रजाति के अलावा भी वह सभी वृक्ष जिनमें पुष्प दिखे बिना ही फल लगते हैं , वह सब वनस्पति कहलाते हैं ।
किसी भी वन में इन्हीं का वर्चस्व सबसे ज्यादा और prominent अवस्था में होता है ।

इनमें सबसे अधिक मात्रा में ऊर्जा और विकिरण को सोखने की क्षमता होती है । ऊर्जा के सबसे अधिक निकालने वाले और जीव जंतुओं के जीवन को अत्यधिक प्रभावित करने वाले यही वृक्ष होत्र हैं ।

इसीलिए कभी इन वृक्षों के नीचे ध्यान या साधना करने बैठिए तो ध्यान का केन्द्रीयकरण होने लगता है और मन का संचालन उर्ध्वाकार होता है । इसलिए ऋषि मुनि महात्मा इत्यादि सभी इसी वृक्ष के नीचे ही शिक्षण और ध्यान करते रहे हैं । इसकी इतनी बड़ी ऊर्जा होती है कि जो व्यक्ति इसके नीचे निरन्तर रहने लगता है उसको वैराग्य हो जाता है ।
महात्मा बुद्ध ने इसी वृक्ष के नीचे निर्वाण की प्राप्ति की थी ।

इसीलिए भगवान ने गीता में कहा है कि वृक्षों में मैं पीपल हूँ ।

इन्हीं ऊर्जा के कारण इन वृक्षों को मन्दिर या देवालय के पाश लगाने का प्रावधान है ।
इसकी पत्तियों में इतनी ऊर्जा होती है कि आप इससे छोटी battery तक चार्ज कर सकते हैं ।

इस प्रजाति पर बहुत research की आवश्यकता है , लेकिन हमारा आधुनिक विज्ञान हमें यह सब नहीं करने देता ।

यह वैराग्य की अंतिम अवस्था तक को प्राप्त कराने में सहायक होता है इसलिए इसे गृहस्थियों को घर में लगाने या घर के आसपास लगाने को मना किया जाता है । पीपल , बरगद , गूलर इत्यादि की पूजा इसीलिए की जाती है ।

सबने शांति मन्त्र पंडितों से सुना ही होगा !

शान्ति: वनस्पति शांतिः औषध: ...........

वनस्पति और औषधि दो को ही शांत अर्थात आनंद प्रदान करने वाला , विकृत नहीं हो , ऐसा होने को कहा गया है । क्योंकि यही दो मूल आधार हैं जीवन की प्रणाली चलाने में ।

कोई रोगी व्यक्ति हो , उसको अगर पीपल वृक्ष के नीचे उपचार किया जाय या उसे रखा जाय तो वह शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करेगा ।

बहुत बड़ा विज्ञान है इसमें , यह तो ऊपर ऊपर से बता रहा हूँ कि पोस्ट न लंबी हो जाय , फिर से आप शिकायत करेंगे ।

2. औषधि :- यह वह पादप श्रृंखला होती है जिनमें फूल फल आते हैं लेकिन जैसे ही फल पक जाते हैं , यह स्वयमेव नष्ट हो जाते हैं ।
जैसे जौ , चना , उड़द , दाल , तिलहन , या समस्त वह औषधि जिसे आप औषधि के रूप में जानते हैं ।

यह वह पादप शृंखला हैं जो जीव को रोग में रोगमुक्त करती हैं और वह समस्त अवयव प्रदान करती हैं जिससे बाहरी रोगों से रक्षण हो सके ।

शांति: औषधयः ।

3. लता :- यह वह पादप श्रृंखला हैं जो किसी अन्य वृक्ष की सहायता से ऊपर चढ़ती हैं । यह बेल के रूप में किसी अन्य वृक्ष की सहायता से ऊपर चढ़ती हैं ।

4. त्वक्सार :- यह वह पादप हैं जिनकी छाल बहुत कठोर होती है ।
जैसे बाँस , दारुचीनी ( जिसको हम लोग दालचीनी कहते हैं ) , सन का पेड़ आदि ।

5. वीरुध :- वह लतायें जो पृथ्वी या भूमि पर ही फैलती हैं । जैसे दूर्वा , खीरा , ककड़ी , तरबूज , खरबूज , कद्दू इत्यादि ।

6. द्रुम :- वह सभी वृक्ष जिनमें फूल आकर फल लगते हैं । जैसे आम ,जामुन ,नीम इत्यादि ।

सबके विषय में वृहद नहीं बताया क्योंकि पोस्ट लंबी हो जाती और फिर कोई नहीं पढ़ता ।

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05/03/2023

7 मार्च को होलिका दहन सायं 6:30 से रात्रि 8:51 के बीच प्रदोष काल में रहेगा विशेष फलदायी

हर्षोल्लास से भरा पावन पर्व होली एक धार्मिक एवम्‌ सामाजिक पर्व है ।यह एक प्रकार से वैदिक यज्ञ भी है ।इस पर्व में वर्ण और जाति-भेद का कोई विचार नहीं होता।यह पर्व तांत्रिकों के लिए भी विशेष पर्व है।भक्त प्रहलाद से तो इसका सम्बन्ध जोड़ा जाता है। इसी दिन मनु भगवान की भी पूजा की जाती है क्योंकि फाल्गुन मास की पूर्णमासी के दिन मनु भगवान का भी जन्म हुआ था। इस दिन भगवत्‌ पूजा भी अपना विशेष महत्त्व रखती है।

भविष्यपुराण में उल्लेख के अनुसार नारद जी ने भी युधिष्ठिर से कहा था कि फाल्गुनी पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभय दान देना चाहिए ताकि उल्लास पूर्वक स्वतंत्रता के साथ लोग स्वस्थ हास्य-परिहास करते हुए होलिकादहन करें । होली उत्सव मनाने से पापों का नाश होता है मनोकामना पूर्ण होती है।

इस वर्ष 7 मार्च 2023 दिन मंगलवार को ही होलिका दहन श्रेष्ठ रहेगा। 6 मार्च 2023 को भद्रा शाम 4 बजकर 17 मिनट से प्रारम्भ होकर दिनांक 7 मार्च 2023 को प्रातः काल 5 बजकर 13 मिनट तक रहेगी । भद्रा काल में होलिका दहन करना निषेध माना जाता है ऐसा शास्त्रो में उल्लेख है इसीलिए 7 मार्च 2023 को ही प्रदोष काल में सांय 6:30 बजे से रात्रि 8:51 के बीच ही होलिका दहन करना श्रेष्ठ एवं उत्तम रहेगा। होलिका का पूजन पूर्णिमा में किया जाता है और पूर्णिमा 6 मार्च 2023 को शाम 4 बजकर 17 मिनट पर प्रारम्भ होगी और अगले दिन 7 मार्च 2023 को शाम 6 बजकर 10 मिनट तक रहेगी।इस दिन महिलायें दोपहर 12 बजे से 1:30 बजे के बीच गुलीक काल में होलिका पूजन करेंगी तो विशेष फलदायी रहेगा। 8 मार्च 2023 को दुल्हैण्डी का पर्व मनाया जायेगा।

होली दहन के उपरान्त होली की भस्म अवश्य लगानी चाहिये और जलती होली की 7 परिक्रमा भी करनी चाहिये। जलती होली की परिक्रमा करने से हमारे शरीर में कम से कम 140 फ़ारेनहाइट गर्मी प्रविष्ट हो जाती है और शरीर की उस गर्मी से उत्पन्न करने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते है।

होली का पर्व पितृ शान्ति के लिये भी विशेष महत्व रखता है। होली वाले दिन बाजार से सूखा खाने वाला तेल वाला गोला लायें और उसे ऊपर से काटकर उसमें काले तिल भर लें । तिल भरने के उपरान्त गोले के कटे हुऐ टुकडे को पुनः गोले पर रखकर कलावा बांध दें और इस गोले को नदी में बहा दें तथा पीछे से एक चांदी का नाग (सर्प) भी बहा दें और चुपचाप घर वापस आ जायें ।शास्त्रों में उल्लेख है कि फाल्गुनी पूर्णिमा वाले दिन हिन्डौले में झूलते हुए भगवान श्री कृष्ण के दर्शन से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है

11/09/2022

*कैसे करनी चाहिए नित्य सूर्यपूजा?*

महातेज, मार्तण्ड, मनोहर, महारोगहर।
जयति सूर्यनारायण, जय जय सर्व सुखाकर।। (पद-रत्नाकर)

भगवान सूर्य साक्षात् परमात्मा का स्वरूप हैं। सूर्योपनिषद् में सूर्य को ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र का स्वरूप माना गया है। माना जाता है कि उदयकालीन सूर्य ब्रह्मारूप में होते हैं, दोपहर में सूर्य विष्णुरूप में और संध्या के समय वे संसार का अंत करने वाले रूद्ररूप में होते हैं।

नित्य सूर्योपासना की विधि : - संसार के अन्धकार को दूर करने व मनुष्य को कर्म करने को प्रेरित करने के लिए साक्षात् नारायणरूप भगवान सूर्य प्रतिदिन प्रात:काल इस भूमण्डल पर उदित होते हैं। अत: उनके स्वागत के लिए मनुष्य को सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध वस्त्र पहन कर तैयार हो जाना चाहिए। शास्त्रों में सूर्यपूजा सूर्योदय के समय की श्रेष्ठ बतायी गयी है, अत: सुबह जितनी जल्दी हो सके सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए अथवा सूर्योदय के समय सूर्य को नमस्कार करने से भी अत्यन्त शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

अर्घ्यजल तैयार करने की विधि,,,,,, एक तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें रक्तचंदन (अथवा चंदन), कुंकुम, चावल, करवीर (कनेर) या लाल पुष्प मिलाकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के अनेक मन्त्र हैं, जो भी मन्त्र सुविधाजनक लगे उससे अर्घ्य दिया जा सकता है—

सूर्य को अर्घ्य देने के मन्त्र,,,,

ॐ सूर्याय नम: या ॐ घृणि: सूर्याय नम: इन मन्त्रों से भगवान सूर्य को अर्घ्य दे सकते हैं।

भगवान सूर्य को तीन बार गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते हुए अर्घ्य दिया जा सकता है। अथवा

‘ॐ घृणि: सूर्य आदित्योम्’ इस मन्त्र से भी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अथवा

निम्न श्लोक का उच्चारण करके सूर्य को अर्घ्य दे सकते हैं—

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर ।।

भगवान सूर्य को अर्घ्य किसी पात्र में या गमले में अर्पण करना चाहिए। अर्घ्यजल पैरों पर नहीं आना चाहिए। अर्घ्य देने के बाद उसी स्थान पर घूमकर सूर्य की परिक्रमा करनी चाहिए।

इन बारह नामों का उच्चारण कर करें भगवान सूर्य को प्रणाम,सूर्य भगवान को उनके बारह नामों का उच्चारण कर प्रणाम करें—

ॐ मित्राय नम:

ॐ रवये नम:

ॐ सूर्याय नम:

ॐ भानवे नम:

ॐ खगाय नम:

ॐ पूष्णे नम:

ॐ हिरण्यगर्भाय नम:

ॐ मरीचये नम:

ॐ आदित्याय नम:

ॐ सवित्रे नम:

ॐ अर्काय नम:

ॐ भास्कराय नमो नम:

सूर्य गायत्री–मन्त्र,सूर्य की विशेष आराधना के लिए,नित्य सूर्य गायत्री–मन्त्र की एक माला का जप किया जा सकता है—

ॐ आदित्याय विद्महे सहस्त्रकिरणाय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात्।

अर्थात्—हम भगवान आदित्य को जानते हैं, पूजते हैं, हम सहस्त्र किरणों वाले भगवान सूर्यनारायण का ध्यान करते हैं, वे सूर्यदेव हमें प्रेरणा प्रदान करें।

रोगों से मुक्ति का सूर्य मन्त्र,जटिल रोगों से मुक्ति के लिए सूर्य का विशेष अष्टाक्षर–मन्त्र है, उसकी एक माला नित्य सूर्य की ओर मुख करके जपने से भयंकर रोग दूर हो जाते हैं, एवं दरिद्रता का नाश हो जाता हैं—

ॐ घृणि: सूर्य आदित्योम्।

विभिन्न पूजा–उपचारों का फल,शास्त्रों में विभिन्न प्रकार से सूर्यपूजा करने के फल बताए गए हैं—

लाल वर्ण के (लाल चंदन युक्त या रोली) जल से अर्घ्य देने व कमल के पुष्प से सूर्यपूजा करने पर मनुष्य स्वर्ग के सुख प्राप्त करता है।

सूर्यदेव को गुग्गुल की धूप निवेदित करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

मन्दार पुष्पों से सूर्य पूजा करने पर मनुष्य सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है।

यदि सूर्य की आराधना के लिए पुष्प न हों तो शुभ वृक्षों के कोमल पत्तों व दूर्वा से भी सूर्यपूजा की जा सकती है। यदि यह भी न हो तो केवल सूर्य के नामों का उच्चारणकर प्रणाम ही कर लें तो भी सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं।

सूर्यभगवान का पूजन करने से धन, धान्य, संतान की वृद्धि होती है। मनुष्य निष्काम हो जाता है तथा अंत में सद्गति प्राप्त होती है। भगवान सूर्य के प्रसन्न हो जाने पर राजा, चोर, ग्रह, शत्रु आदि पीड़ा नहीं देते तथा दरिद्रता और सभी दुख दूर हो जाते हैं।

भगवान सूर्य की आराधना करने वाले मनुष्य को राग–द्वेष, झूठ और हिंसा से दूर रहना चाहिए। कलुषित हृदय और अप्रसन्न मन से मनुष्य भगवान सूर्य को सब–कुछ अर्पित कर दे तो भी भगवान आदित्य उस पर प्रसन्न नहीं होते। लेकिन यदि शुद्ध हृदय से मात्र जल अर्पण करने पर सूर्यपूजा के दुर्लभ फल की प्राप्ति हो जाती है।

🙏 ● *जय श्री कृष्ण* ● 🙏
🕉🕉🕉🔱🕉🕉
*🕉️🥰जय श्री राम🥰🕉️

🕉जीवन आदर्श🕉

09/07/2022

#गांजा_का_चमत्कार
(गांजा,Cannabis)

1914 का वर्ष है। प्रथम विश्व युद्ध के वर्ष और अमेरिकी डॉलर के लिए "भांग" की खेती करने वाले किसान ... इसे ध्यान में रखें और पढ़ते रहें।
औद्योगिक भांग सिर्फ एक कृषि संयंत्र नहीं है!
यह तेल और डॉलर के खिलाफ मारक है!
गांजा कैसे प्रतिबंधित किया गया था?

1. भांग का एक टुकड़ा खेत 25 एकड़ जंगल के बराबर ऑक्सीजन पैदा करता है।

2. फिर से, एक एकड़ गांजा 4 एकड़ पेड़ों के बराबर कागज़ का उत्पादन कर सकता है।

3. जहां भांग को 8 बार कागज में बदला जा सकता है, वहीं लकड़ी को 3 बार कागज में बदला जा सकता है।

4. गांजा 4 महीने में उगता है, पेड़ 20-50 साल में।

5. कैनबिस विकिरण का एक वास्तविक पकड़ने वाला है।

6. भांग को दुनिया में कहीं भी उगाया जा सकता है और इसके लिए बहुत कम पानी की जरूरत होती है। इसके अलावा, चूंकि इसे कीड़ों से बचाया जा सकता है, इसलिए इसे कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती है।

7. यदि भांग का कपड़ा व्यापक हो जाता है, तो कीटनाशक उद्योग पूरी तरह से गायब हो सकता है।

8. पहली जींस भांग से बनी थी; यहां तक ​​​​कि "कानवास" शब्द भी भांग उत्पादों को दिया गया नाम है।
गांजा रस्सियों, डोरियों, बैगों, जूतों, टोपियों के निर्माण के लिए भी एक आदर्श पौधा है।

9. भांग, एड्स और कैंसर के उपचार में कीमोथेरेपी और विकिरण के प्रभाव को कम करना; यह गठिया, हृदय, मिर्गी, दमा, पेट, अनिद्रा, मनोविज्ञान और रीढ़ की बीमारियों जैसे कम से कम 250 रोगों में प्रयोग किया जाता है।

10. भांग के बीज का प्रोटीन मूल्य बहुत अधिक होता है और इसमें दो फैटी एसिड प्रकृति में और कहीं नहीं पाए जाते हैं।

11. सोयाबीन की तुलना में गांजा का उत्पादन और भी सस्ता है।

12. जिन जानवरों को भांग खिलाया जाता है उन्हें हार्मोनल सप्लीमेंट की जरूरत नहीं होती है।

13. सभी प्लास्टिक उत्पादों को भांग से बनाया जा सकता है, और भांग प्लास्टिक प्रकृति में वापस आना बहुत आसान है।

14. अगर कार की बॉडी गांजा की बनी हो तो यह स्टील से 10 गुना ज्यादा मजबूत होगी।

15. इसका उपयोग इमारतों के इन्सुलेशन के लिए भी किया जा सकता है; यह टिकाऊ, सस्ता और लचीला है।

16. गांजा साबुन और सौंदर्य प्रसाधन पानी को प्रदूषित नहीं करते हैं; इसलिए यह पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है।

अमेरिका में 18वीं शताब्दी में इसका उत्पादन अनिवार्य था और गैर-उत्पादक किसानों को बंद कर दिया गया था। लेकिन अब स्थिति इसके उलट है. कहां से?
-डब्ल्यू। आर. हर्स्ट 1900 के दशक में अमेरिका में समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और मीडिया के मालिक थे। उनके पास जंगल थे और कागज़ का उत्पादन करते थे। अगर कागज भांग से बना होता, तो उसे लाखों का नुकसान हो सकता था।

-रॉकफेलर विश्व के सबसे धनी व्यक्ति थे। एक तेल कंपनी थी। बेशक, जैव ईंधन, भांग का तेल, उसका सबसे बड़ा दुश्मन था।

-मेलन ड्यूपॉन्ट में एक प्रमुख शेयरधारक था और उसके पास पेट्रोलियम उत्पादों से प्लास्टिक के उत्पादन के लिए एक पेटेंट था। और भांग उद्योग अपने बाजार को खतरे में डाल रहा था।

-बाद में मेलॉन अमेरिकी राष्ट्रपति हूवर के कोषागार के सचिव बने। हमने जिन बड़े नामों के बारे में बात की, उन्होंने उनकी बैठकों में तय किया कि भांग दुश्मन है। और उन्होंने उसका सफाया कर दिया। मीडिया के माध्यम से, उन्होंने मारिजुआना शब्द के साथ-साथ लोगों के दिमाग में एक जहरीली दवा के रूप में मारिजुआना का इंजेक्शन लगाया है।

भांग की दवाओं को बाजार से वापस ले लिया गया है और उनकी जगह आज इस्तेमाल होने वाली रासायनिक दवाओं ने ले ली है।

कागज उत्पादन के लिए जंगलों को काटा जा रहा है।
कीटनाशक और कैंसर का नशा बढ़ रहा है। और फिर हमने अपनी दुनिया को प्लास्टिक कचरे, खतरनाक कचरे से भर दिया।
साभार 🙏🏼
~~ VEDIC Science

12/12/2021
26/11/2021

अष्टांग आयुर्वेद - वाजीकरण

मुख्या आठ भाग में विभाजित करने की प्रक्रिया अत्यंत प्राचीन है जिसमे सभी ने अष्टांग योग, अष्ट सिद्धि आदि के विषय में सुना है उसी प्रकार से आयुर्वेद को भी मुख्या ८ भाग में विभाजित किया गया है जिसमे से काय चिकित्सा, बाल चिकित्सा, भूत(ग्रह) चिकित्सा, शालक्य तंत्र, शल्य तंत्र, विष चिकित्सा, रसायन चिकित्सा व
बाजीकरण
आयुर्वेद को दवा के रूप में लेना उचित नही है क्यूंकि जो भी भोज पदार्थ आपके जीवन (आयु) की वृद्धि का रहे हैं वह सब आयुर्वेद का ही भाग है जो आपको भूमि अथवा प्रकृति के किसी न किसी माध्यम से प्राप्त हो रहे हैं लेकिन आज के समय में व्यक्ति आयुर्वेद को कुछ पाउडर आदि के सम्मिलित स्वरुप की ओली को ही आयुर्वेद समझ बैठे हैं जो की गलत है अनाज, फल, जल रस आदि सब आयुर्वेद का ही भाग है जिनके माध्यम से मनुष्य अपना जीवन यापन करता है और अपने जीवन में रोग मुक्ति की प्राप्ति करता है.

आज के समय में प्रदूषित वातावरण प्रकृति को भी उतना ही दूषित कर रहे हैं जितना मनुष्य स्वयं को इनके संपर्क में लाके कर रहा है इसी लिए आज के समय में आयुर्वेद की आवश्यकता इतनी अधिक है -

१. आयुर्वेद का कोई नुक्सान नही है अर्थात शरीर में किसी भी प्रकार से किसी अंग अथवा किसी भी प्रकार से कोई विकार नही उत्पन्न करता यदि निर्धारित मात्रा में सेवन किया जाये तो

२. आयुर्वेद के माध्यम से आप अपने शरीर को इतना मज़बूत रख सकते हैं जिससे की बीमारी आप में फ़ैल न सकें

३. आयुर्वेद मनुष्य को पूर्ण रूप से समझने में सक्षम है क्यूंकि आज से हजारों वर्ष पूर्व अनेक महाऋषियों ने इसकी जानकारी दी जिस समय इतनी अद्धुनिकता भी नही थी

यह कुछ सामान्य सी बाते हैं आयुर्वेद के विषय में जो हर कोई समझ सकता है
मूल विषय वाजीकरण - यह मनुष्य के गुप्तांग भाग से सम्बंधित है,

मनुष्य निर्धारित मात्रा से अधिक एवं प्रदूषित खान पान के कारण साथ ही साथ अपनी व्यकिगत गलतियों के कारण अपना पौरुष खो देता है और इसका परिणाम हुए तब पता चलता है जब वह अपने साथी को संतुष्ट नही कर पाता है जिस कारण से उसमे नाना प्रकार के मानसिक विकार उत्पन्न होने लगते हैं
आयुर्वेद बेमारी को जड़ से समाप्त करता है क्यूंकि यह ही एक माध्यम है जो आन्तरिक कोष एवं प्राण में नियंत्रण स्थापित कर सकता है आयुर्वेद की एक मात्र औषधि के सेवन के शरीर की अनेकाएक बेमारी स्वतः ही दूर हो जाती है इसीलिए आज के समय भी विदेश में भी लोगों ने इसका सेवन शुरू किया है और यह भारत का दुर्भाग्य है की हम अपनी संस्कृति पर तब विश्वास करते हैं जब उसे विदेश में स्वीकृति मिलती है और अपने ही ग्रन्थ न पढ़ते हुए नाना प्रकार के वैज्ञानिक शोध पर भरोसा करते हैं और जब उन्हें किसी भी ग्रन्थ आदि में ढूंडा जाता है तो यह पाया जाता है की कई सौ अथवा हज़ार वर्ष पूर्व इसकी व्याख्या पूर्व में ही कर दी गयी है मंदिर में इसके चित्र भी उपलब्ध है लेकिन जब तक अद्धुनिक युग उसकी खोज नही करता हम समझ ही नही पाते हैं की यह है क्या.

विशेष समय पर आधुनिकता को अपनाने में कोई बुराई नही है लेकिन स्वयं को सकुशल रखने के लिए आयुर्वेदिक दावा का सेवन करें इससे देश की प्रगति भी होगी और लोगों को रोज़गार भी मिलेगा.

श्री सिद्धधाम आयुर्वेद, एक्यूपंक्चर, व जापानी चिकित्सा ज्योतिष, तंत्र, वास्तु, व शक्तिपात फोन 9837269234
7017070625

24/07/2021

*चेला तुम्बी भरके लाना...*
*तेरे गुरु ने मंगाई*

*चेला भिक्षा ले के आना...*
*गुरु ने मंगाई*

*पहली भिक्षा जल की लाना--*
कुआँ बावड़ी छोड़ के लाना
नदी नाले के पास न जाना
तुंबी भर के लाना

*दूजी भिक्षा अन्न की लाना*
गाँव नगर के पास न जाना
खेत खलिहान को छोड़के लाना
लाना तुंबी भर के
तेरे गुरु ने मंगाई

*तीजी भिक्षा लकड़ी लाना*
डांग-पहाड़ के पास न जाना
गीली सूखी छोड़ के लाना
लाना गठरी बनाके
तेरे गुरु ने मंगाई

*चौथी भिक्षा मांस की लाना*
जीव जंतु के पास न जाना
जिंदा मुर्दा छोड़ के लाना
लाना हंडी भर के
तेरे गुरु ने मंगाई.....
चेला तुंबी भरके लाना

कल यहां गाँव के लोगों से बिल्कुल देशी धुन में एक गीत सुना रात को

गुरु चेले की परीक्षा ले रहे हैं

चार चीजें मंगा रहे हैं :
जल, अन्न, लकड़ी, मांस

लेकिन शर्तें भी लगा दी हैं
अब देखना ये है कि चेला लेकर आता है या नहीं
इसी परीक्षा पर उसकी परख होनी है

जल लाना है, लेकिन बारिश का भी न हो, कुएं बावड़ी तालाब का भी न हो। अब तुममें से कोई नल मत कह देना या मटका या आरओ कह बैठो। सीधा मतलब किसी दृष्ट स्त्रोत का जल न हो।

अन्न भी ऐसा ही लाना है। किसी खेत खलिहान से न लाना, गाँव नगर आदि से भी भिक्षा नहीं मांगनी।

लकड़ी भी मंगा रहे हैं तो जंगल पहाड़ को छुड़वा रहे हैं, गीली भी न हो सूखी भी न हो, और बिखरी हुई भी न हो, यानी बंधी बंधाई, कसी कसाई हो।

मांस भी मंगा रहे हैं तो जीव जंतु से दूरी बनाने को कह रहे हैं और जिंदा या मुर्दा का भी नहीं होना चाहिए।

मैं चेला होता तो फेल होता परीक्षा में

लेकिन यह प्राचीन भारत के गुरुओं द्वारा तपा कर पका कर तैयार किया गया शिष्य है। आजकल के पढ़े लिखों से लाख बेहतर है।

गीत समाप्त होता है लेकिन रहस्य बना रहता है।

आज एक बुजुर्ग से पूछा तो खूब हंसे।

कहने लगे--अरे भगवन, क्यों मज़ाक करते हो। आपको तो सब पता है।

मेरी बालकों जैसी मनुहार पर रीझकर धीरे से बताते हैं-- *नारियल*

देखो पहले बर्तन नहीं रखते थे सन्त सन्यासी। लौकी होती है एक गोल तरह की, तुम्बा कहते हैं उसको। वही पात्र रखते थे। पहले तो उसको भर के लाने की कह रहे हैं।

अब नारियल को देखो, जल भी है इसमें और कुएं बावड़ी नदी झरने का भी नहीं है, अन्न भी है इसमें--(अद्द्यते इति अन्नम)--जो खाया जाए वह अन्न है, लेकिन खेत खलिहान, गाँव शहर का भी नहीं है।

तीसरी चीज लकड़ी भी है। ऊपर खोल पर, अंदर गीला भी है, बाहर सूखा भी है और एकदम बंधा हुआ भी है, कसकर।

अंतिम में कहते हैं मांस भी लाना--यानी कोई गूदेदार फल। इस मांस शब्द के कारण शास्त्रों के अर्थों के खूब अनर्थ हुए हैं, बालबुद्धि लोगों द्वारा। आयुर्वेद में एक जगह प्रसंग है कि फलानी बीमारी में कुमारी का मांस बहुत फायदेमंद है, तीन महीने तक सेवन करें।

आज़कल के बुद्धिजीवी यानी बिना बुद्धि के लोग कह देंगे कि देखो, कैसे कुंवारी लड़कियों के मांस खाने का विधान है शास्त्रों में। जबकि कुमारी से वहां *घृतकुमारी यानी ग्वारपाठा यानी एलोवेरा* के गूदे को कहा गया है। हर गूदेदार फल को मांस कहा गया है। यदा कदा तो गुरु भी यही मंगा रहे हैं कोई गूदेदार फल।

चेला नारियल लेकर आता है और गुरु का प्रसाद पाता है आशीर्वाद रूप में।

कितना रहस्य छुपा हुआ है पुरानी कहावतों एवं लोकगीतों में।

*बुजुर्गों के पास बैठकर यह सब सुनना चाहिए, इससे पहले कि यह अंतिम पवित्र पीढ़ी इस दुनिया को अलविदा कहे*

*चेला तुंबी भर के लाना*
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05/05/2021

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01/05/2021

कुशा का आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्त्व??

अध्यात्म और कर्मकांड शास्त्र में प्रमुख रूप से काम आने वाली वनस्पतियों में कुशा का प्रमुख स्थान है।

इसको कुश ,दर्भअथवा ढाब भी कहते हैं। जिस प्रकार अमृतपान के कारण केतु को अमरत्व का वर मिला है, उसी प्रकार कुशा भी अमृत तत्त्व से युक्त है। यह पौधा पृथ्वी लोक का पौधा न होकर अंतरिक्ष से उत्पन्न माना गया है।

मान्यता है कि जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं तो राम जी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। ये केश राशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई।

इसके सिरे नुकीले होते हैं उखाडते समय सावधानी रखनी पडती है कि जड सहित उखडे और हाथ भी न कटे। कुशल शब्द इसीलिए बना ।" ऊँ हुम् फट " मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तराभिमुख होकर कुशा उखाडी जाती है ।

भारत में हिन्दू लोग इसे पूजा /श्राद्ध में काम में लाते हैं। श्राद्ध तर्पण विना कुशा के सम्भव नहीं हैं ।
कुशा से बनी अंगूठी पहनकर पूजा /तर्पण के समय पहनी जाती है जिस भाग्यवान् की सोने की अंगूठी पहनी हो उसको जरूरत नहीं है। कुशा प्रत्येक दिन नई उखाडनी पडती है लेकिन अमावाश्या की तोडी कुशा पूरे महीने काम दे सकती है और भादों की अमावश्या के दिन की तोडी कुशा पूरे साल काम आती है। इसलिए लोग इसे तोड के रख लते हैं।

केतु शांति विधानों में कुशा की मुद्रिका और कुशा की आहूतियां विशेष रूप से दी जाती हैं। रात्रि में जल में भिगो कर रखी कुशा के जल का प्रयोग कलश स्थापना में सभी पूजा में देवताओं के अभिषेक, प्राण प्रतिष्ठा, प्रायश्चित कर्म, दशविध स्नान आदि में किया जाता है।

केतु को अध्यात्म और मोक्ष का कारक माना गया है। देव पूजा में प्रयुक्त कुशा का पुन: उपयोग किया जा सकता है, परन्तु पितृ एवं प्रेत कर्म में प्रयुक्त कुशा अपवित्र हो जाती है। देव पूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत, ग्रहशांति पूजन कार्यो में रुद्र कलश एवं वरुण कलश में जल भर कर सर्वप्रथम कुशा डालते हैं।

कलश में कुशा डालने का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कलश में भरा हुआ जल लंबे समय तक जीवाणु से मुक्त रहता है। पूजा समय में यजमान अनामिका अंगुली में कुशा की नागमुद्रिका बना कर पहनते हैं।

कुशा आसन का महत्त्व : - कहा जाता है कि कुश के बने आसन पर बैठकर मंत्र जप करने से सभी मंत्र सिद्ध होते हैं। नास्य केशान् प्रवपन्ति, नोरसि ताडमानते। -देवी भागवत 19/32 अर्थात कुश धारण करने से सिर के बाल नहीं झडते और छाती में आघात यानी दिल का दौरा नहीं होता।

उल्लेखनीय है कि वेद ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।

इसपर बैठकरसाधना करने से आरोग्य, लक्ष्मी प्राप्ति, यश और तेज की वृद्घि होती है। साधक की एकाग्रता भंग नहीं होती। कुशा की पवित्री उन लोगों को जरूर धारण करनी चाहिए, जिनकी राशि पर ग्रहण पड़ रहा है। कुशा मूल की माला से जाप करने से अंगुलियों के एक्यूप्रेशर बिंदु दबते रहते हैं, जिससे शरीर में रक्त संचार ठीक रहता है।

कुशा की पवित्री का महत्त्व : - कुश की अंगूठी बनाकर अनामिका उंगली में पहनने का विधान है, ताकि हाथ द्वारा संचित आध्यात्मिक शक्ति पुंज दूसरी उंगलियों में न जाए, क्योंकि अनामिका के मूल में सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य की उंगली है।

सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश प्राप्त होता है। दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकना भी है। कर्मकांड के दौरान यदि भूलवश हाथ भूमि पर लग जाए, तो बीच में कुश का ही स्पर्श होगा। इसलिए कुश को हाथ में भी धारण किया जाता है। इसके पीछे मान्यता यह भी है कि हाथ की ऊर्जा की रक्षा न की जाए, तो इसका दुष्परिणाम हमारे मस्तिष्क और हृदय पर पडता है।

कुशा जिसे सामन्य घांस समझा जाता है उसका बहुत ही बड़ा महत्व है , कुशा के अग्र भाग जोकी बहुत ही तीखा होता है इसीलिए उसे कुशाग्र कहते हैं l

तीक्ष्ण बुद्धि वालो को भी कुशाग्र इसीलिए कहा जाता है.

कुशा महिलाओं की सुरक्षा करनें में राम बाण है जब लंका पति रावण माता सीता का हरण कर उन्हें अशोक वाटिका ले गया , उसके बाद वह बार बार उन्हें प्रलोभित करने जाता था और माता सीता "इस कुशा को अपना सुरक्षा कवच बनाकर "" उससे बात करती थी , जिसके कारण रावण सीता के निकट नहीं पहुँच सका l

आज भी मातृ शक्ति अपने पास कुशा रखे तो अपने सतीत्व की रक्षा सहज रूप से कर सकती है क्योंकि कुशा में वह शक्ति विद्यमान है जो माँ बहिनों पर कुदृष्टि रखने वालों को उनके निकट पहुंचने भी नहीं देती l

जो माँ या बहिन मासिक विकार से परेशान है उन्हें कुशा के आसन और चटाई का विशेष दिनों में प्रयोग करना चाहीये .

पूजा-अर्चना आदि धार्मिक कार्यों में कुश का प्रयोग प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है। यह एक प्रकार की घास है, जिसे अत्यधिक पावन मान कर पूजा में इसका प्रयोग किया जाता है।

महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थीं। एक का नाम कद्रू था और दूसरी का नाम विनता। कद्रू और विनता दोनों महार्षि कश्यप की खूब सेवा करती थीं।

महार्षि कश्यप ने उनकी सेवा-भावना से अभिभूत हो वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने कहा, मुझे एक हजार पुत्र चाहिए। महार्षि ने ‘तथास्तु’ कह कर उन्हें वरदान दे दिया। विनता ने कहा कि मुझे केवल दो प्रतापी पुत्र चाहिए। महार्षि कश्यप उन्हें भी दो तेजस्वी पुत्र होने का वरदान देकर अपनी साधना में तल्लीन हो गए।

कद्रू के पुत्र सर्प रूप में हुए, जबकि विनता के दो प्रतापी पुत्र हुए। किंतु विनता को भूल के कारण कद्रू की दासी बनना पड़ा।

विनता के पुत्र गरुड़ ने जब अपनी मां की दुर्दशा देखी तो दासता से मुक्ति का प्रस्ताव कद्रू के पुत्रों के सामने रखा। कद्रू के पुत्रों ने कहा कि यदि गरुड़ उन्हें स्वर्ग से अमृत लाकर दे दें तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे।

गरुड़ ने उनकी बात स्वीकार कर अमृत कलश स्वर्ग से लाकर दे दिया और अपनी मां विनता को दासता से मुक्त करवा लिया।

यह अमृत कलश ‘कुश’ नामक घास पर रखा था, जहां से इंद्र इसे पुन: उठा ले गए तथा कद्रू के पुत्र अमृतपान से वंचित रह गए।

उन्होंने गरुड़ से इसकी शिकायत की कि इंद्र अमृत कलश उठा ले गए। गरुड़ ने उन्हें समझाया कि अब अमृत कलश मिलना तो संभव नहीं, हां यदि तुम सब उस घास (कुश) को, जिस पर अमृत कलश रखा था, जीभ से चाटो तो तुम्हें आंशिक लाभ होगा।

कद्रू के पुत्र कुश को चाटने लगे, जिससे कि उनकी जीभें चिर गई इसी कारण आज भी सर्प की जीभ दो भागों वाली चिरी हुई दिखाई पड़ती है.l

‘कुश’ घास की महत्ता अमृत कलश रखने के कारण बढ़ गई और भगवान विष्णु के निर्देशानुसार इसे पूजा कार्य में प्रयुक्त किया जाने लगा।

जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर समुद्रतल में छिपे महान असुर हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को उससे मुक्त कराकर बाहर निकले तो उन्होंने अपने बालों को फटकारा। उस समय कुछ रोम पृथ्वी पर गिरे। वहीं कुश के रूप में प्रकट हुए।

कुश ऊर्जा की कुचालक है। इसलिए इसके आसन पर बैठकर पूजा-वंदना, उपासना या अनुष्ठान करने वाले साधन की शक्ति का क्षय नहीं होता। परिणामस्वरूप कामनाओं की अविलंब पूर्ति होती है।

वेदों ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।

कुश का प्रयोग पूजा करते समय जल छिड़कने, ऊंगली में पवित्री पहनने, विवाह में मंडप छाने तथा अन्य मांगलिक कार्यों में किया जाता है। इस घास के प्रयोग का तात्पर्य मांगलिक कार्य एवं सुख-समृद्धिकारी है, क्योंकि इसका स्पर्श अमृत से हुआ है।

हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्म-कांडों में अक्सर कुश (विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है। इसका धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक कारण भी है।

कुश जब पृथ्वी से उत्पन्न होती है तो उसकी धार बहुत तेज होती है। असावधानी पूर्वक इसे तोडऩे पर हाथों को चोंट भी लग सकती है।

पुरातन समय में गुरुजन अपने शिष्यों की परीक्षा लेते समय उन्हें कुश लाने का कहते थे। कुश लाने में जिनके हाथ ठीक होते थे उन्हें कुशल कहा जाता था अर्थात उसे ही ज्ञान का सद्पात्र माना जाता था।

वैज्ञानिक शोधों से यह भी पता चला है कि कुश ऊर्जा का कुचालक है। इसीलिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय इसे भोजन तथा पानी में डाल दिया जाता है जिससे ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुश से टकराकर परावर्तित हो जाती हैं तथा भोजन व पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता।

पांच वर्ष की आयु के बच्चे की जिव्हा पर शुभ मुहूर्त में कुशा के अग्र भाग से शहद द्वारा सरस्वती मन्त्र लिख दिया जाए तो वह बच्चा कुशाग्र बन जाता है।

कुश से बने आसन पर बैठकर तप, ध्यान तथा पूजन आदि धार्मिक कर्म-कांडों से प्राप्त ऊर्जा धरती में नहीं जा पाती क्योंकि धरती व शरीर के बीच कुश का आसन कुचालक का कार्य करता है।

कुशोत्पाटिनी या कुशाग्रहणीअमावस्या !
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अमावस्या को शास्त्रों में कुशाग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है। खास बात ये है कि कुश उखाडऩे से एक दिन पहले बड़े ही आदर के साथ उसे अपने घर लाने का निमंत्रण दिया जाता है। हाथ जोड़कर प्रार्थना की जाती है।

ऐसे दें कुश को निमंत्रण

कुश के पास जाएं और श्रद्धापूर्वक उससे प्रार्थना करें, कि हे कुश कल मैं किसी कारण से आपको आमंत्रित नहीं कर पाया था जिसकी मैं क्षमा चाहता हूं। लेकिन आज आप मेरे निमंत्रण को स्वीकार करें और मेरे साथ मेरे घर चलें। फिर आपको ऊं ह्रूं फट् स्वाहा इस मंत्र का जाप करते हुए कुश को उखाडऩा है उसे अपने साथ घर लाना है और एक साल तक घर पर रखने से आपको शुभ फल प्राप्त होंगे।
पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि।
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया।।
अत: प्रत्येक गृहस्थ को इस दिन कुश का संचय करना चाहिए।

दस प्रकार के होते हैं कुश

शास्त्रों में दस प्रकार के कुशों का वर्णन मिलता है-
कुशा, काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका।
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा, सबल्वजा।।
यानि कुश, काश , दूर्वा, उशीर, ब्राह्मी, मूंज इत्यादि कोई भी कुश आज उखाड़ी जा सकती है और उसका घर में संचय किया जा सकता है। लेकिन इस बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि हरी पत्तेदार कुश जो कहीं से भी कटी हुई ना हो , एक विशेष बात और जान लीजिए कुश का स्वामी केतु है लिहाज़ा कुश को अगर आप अपने घर में रखेंगे तो केतु के बुरे फलों से बच सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के नज़रिए से कुश को विशेष वनस्पति का दर्जा दिया गया है। इसका इस्तेमाल ग्रहण के दौरान खाने-पीने की चीज़ों में रखने के लिए होता है, कुश की पवित्री उंगली में पहनते हैं तो वहीं कुश के आसन भी बनाए जाते हैं।

कौन सा कुश उखाड़ेंं

कुश उखाडऩे से पूर्व यह ध्यान रखें कि जो कुश आप उखाड़ रहे हैं वह उपयोग करने योग्य हो। ऐसा कुश ना उखाड़ें जो गन्दे स्थान पर हो, जो जला हुआ हो, जो मार्ग में हो या जिसका अग्रभाग कटा हो, इस प्रकार का कुश ग्रहण करने योग्य नहीं होता है।

संयम, साधना और तप के लिए आज का दिन श्रेष्ठ

कुशाग्रहणी अमावस्या के दिन तीर्थ, स्नान, जप, तप और व्रत के पुण्य से ऋण और पापों से छुटकारा मिलता है. इसलिए यह संयम, साधना और तप के लिए श्रेष्ठ दिन माना जाता है. पुराणों में अमावस्या को कुछ विशेष व्रतों के विधान है। भगवान विष्णु की आराधना की जाती है यह व्रत एक वर्ष तक किया जाता है. जिससे तन, मन और धन के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

कुशाग्रहणी अमावस्या का विधि-विधान

कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन साल भर के धार्मिक कृत्यों के लिये कुश एकत्र लेते हैं. प्रत्येक धार्मिक कार्यो के लिए कुशा का इस्तेमाल किया जाता है. शास्त्रों में भी दस तरह की कुशा का वर्णन प्राप्त होता है. जिस कुशा का मूल सुतीक्ष्ण हो, इसमें सात पत्ती हो, कोई भाग कटा न हो, पूर्ण हरा हो, तो वह कुशा देवताओं तथा पितृ दोनों कृत्यों के लिए उचित मानी जाती है. कुशा तोड़ते समय हूं फट मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
अघोर चतुर्दशी के दिन तर्पण कार्य भी किए जाते हैं मान्यता है कि इस दिन शिव के गणों भूत-प्रेत आदि सभी को स्वतंत्रता प्राप्त होती है. कुश अमावस्या के दिन किसी पात्र में जल भर कर कुशा के पास दक्षिण दिशाकी ओर अपना मुख करके बैठ जाएं तथा अपने सभी पितरों को जल दें, अपने घर परिवार, स्वास्थ आदि की शुभता की प्रार्थना करनी चाहिए।

कुशाग्रहणी अमावस्या का पौराणिक महत्व
शास्त्रों में में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है. इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का महत्व है। शास्त्रोक्त विधि के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष में चलने वाला पन्द्रह दिनों के पितृ पक्ष का शुभारम्भ भादों मास की अमावस्या से ही हो जाती है
प्रतिलिपी संकलित

*वेदिका*

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