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14/01/2026
11/01/2026

Trees write their own “diary.” When a tree trunk is cut, circular rings appear inside. By counting these rings, scientists can determine the tree’s age.

Each ring represents one year of growth. It’s like a natural calendar that records the story of seasons, climate, and time.

10/01/2026

अपराजिता (श्वेत पुष्पा) (Clitoria ternatea Linn)

आस्फोता गिरिकर्णीस्याद्विष्णुक्रांताऽपराजिता।
अपराजिता कटु मेध्ये शीते कण्ठ्ये सुक्रदिृष्टिदे।।
कुष्ठ मूत्रत्रिदोषामशोथवृणविषापहे।
कषाये कटुके पाके तिक्ते च स्मृतिबुद्धिदे।।
(भा.प्र. १११-११२)

अपराजिता को आस्फोता, गिरिकर्णी, विष्णुक्रांता और श्वेत पुष्प आदि नामों से भी जाना जाता है। अपराजिता कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, मेधा बढ़ाने वाली, शीतवीर्य, कण्ठ स्वर को उत्तम बनाने वाली, देखने की शक्ति को बढ़ाने वाली तथा कुष्ठ, मूत्ररोग, त्रिदोष, आम, शोथ, वृण एवं विष को नष्ट करने वाली, विपाक में कटु रसयुक्त तथा बुद्धि को बढ़ाने वाली होती है।

श्वेत या नीले पुष्पों से युक्त कोमल वृक्ष आश्रित बेल, अपराजिता उद्यानों व घरों में शोभा बढ़ाने के लिये लगाई जाती है। पुष्पों का आकार गाय के कान के समान होने के कारण इसे गोकर्णी के नाम से भी जाना जाता है। इसे अपराजिता इसलिये कहा जाता है क्योंकि इसका प्रयोग करने से वैद्य कभी पराजित नहीं होता या इसका प्रयोग करने वाला वैद्य कभी असफल या अपराजित नहीं होता।

अपराजिता लैटिन भाषा में क्लाइटोरिया टर्नेशिया के नाम से जानी जाती है। यह फैबेसी (Fabaceae) कुल का पौधा है।

संस्कृत भाषा में नाम- अपराजिता को संस्कृत में गोकर्णी, गिरिकर्णी, योनिपुष्पा, विष्णुकान्ता आदि नामों से जाना जाता है।

प्रादेशिक भाषाओं में नाम- अपराजिता को विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में निम्नांकित नामों से जाना जाता है-
हिन्दी- अपराजिता, गिरिकर्णी, कोयल, कालीजार
उर्दू- मायेरीयुनीहिन्दी
उड़िया- ओपोराजिता
कन्नड़- शंखपुष्पाबल्ली, गिरिकर्णीबल्ली
कोकर्णी- काजुली
गुजराती- गणी,कोयल
तमिल- काक्कनाम, तरुगन्नी
तैलगू- दिन्तेना, नल्लावुसिनितिगे
बंगला- गोकरन, अपराजिता
नेपाली- अपराजिता
पंजाबी- धनन्तर
मराठी- गोकर्णी, गोकर्ण, काजली
मलयालम- अराल, कक्कनम् कोटि, शंखपुष्पम्
अंग्रेजी- Butterfly Pea, Blue Pea, Pigeon wings
फारसी- दरख्ते बिखेहयात
अरीबी- बजरूल्म जारियुन-ए हिन्दी

स्वरूप- अपराजिता की लता दो मी. से अधिक लम्बी, सुन्दर, शाखा-प्रशाखा युक्त होती है। इसके काण्ड पतले, मूसलाकार, कुछ अंश तक रोमिल तथा आरोही होते हैं। इसके पत्र छोटे और प्राय: गोल होते हैं। इसके पुष्प जल सीप के आकार वाले गोल, चमकीले, नीले अथवा श्वेत वर्ण के होते हैं। इसकी फली ५-१० से.मी. लम्बी, १ सेमी. चौड़ी, चपटी, नुकीली, थोड़ी मुड़ी हुई, मटर के आकार की एवं तलवार जैसी झुकी रहती है। एक फली में ६-१० अण्डाकार, चपटे, उड़द के दानों के समान कृष्ण वर्ण के चिकने बीज निकलते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जुलाई से मार्च तक होता है।

रासायनिक संघटन- इसके पंचाङ्ग में टेरेक्सेरॉल, टेरेक्सेरॉन, टैनिन, रेजिन, स्टार्च, ग्लूकोसाइड, सिटोस्टेरॉल, हाइड्रोक्सी सिनामिक अम्ल पाया जाता है। इसके बीज के तैल में पामिटिक अम्ल, ओलिक अम्ल, लिनोलिक अम्ल तथा लिनोलेनिक अम्ल पाया जाता है। इसके पत्र में अपराजितिन, सिटोस्टेरॉल, वसीय अम्ल तथा केम्फेरॉल पाया जाता है।
गणवर्गीकरण - भावप्रकाश- गुडिच्यादि वर्ग धन्वन्तरि निघण्टु- करवीरादि वर्ग राज निघण्टु- गुडिच्यादि वर्ग वैâकयदेव निघण्टु- औषधि वर्ग
जाति भेद- अपराजिता सफेद और नीले पुष्पों के भेद से दो प्रकार की पायी जाती है। नीले फूल वाली इकहरे और दोहरे फूल वाली होती है।
उत्पत्ति स्थान- इसकी लता पूरे भारत में पायी जाती है।
रस पंचक-
रस- कटु, तिक्त तथा कषाय
गुण- भेदन, मूत्रल
वीर्य- शीत वीर्य
विपाक- कटु
प्रभाव- बल्य
दोषघ्नता- त्रिदोषशामक
कर्मघ्नता- स्मृति, बुद्धिवर्धक, विषघ्न, कण्ठ्य, चक्षुष्य, विरेचक, कासघ्न, मूत्रल तथा वेदना शामक।
रोगघ्नता- कुष्ठ, मूत्रदोष, आमदोष, सूजन, व्रण, विष, अर्बुद, शोथ, जलोदर तथा यकृत में उपयोगी है।
प्रयोज्याङ्ग- मूल, मूल त्वक्, पत्र, पुष्प तथा बीज।

रोगानुसार प्रयोग

शिरो रोग में- अपराजिता की फली के २-४ बूँद रस का नस्य अथवा मूल के रस का नस्य प्रात: खाली पेट, सूर्योदय के पूर्व देने से शिर दर्द दूर हो जाता है। इसकी जड़ को कान से बाँधने से भी लाभ होता है। अपराजिता के बीजों के रस को २-२ बूँद नासिका में टपकाने पर आधा सीसी दर्द दूर हो जाता है।

- अपराजिता के बीज ठण्डे और विषघ्न होते हैं। बीज और जड़ का सम भाग लेकर जल के साथ पीसकर नस्य देने से माइग्रेन में लाभ होता है।

नेत्र रोग में- सफेद अपराजिता तथा पुनर्नवा के मूल कल्क में समभाग जौ का चूर्ण मिलाकर, अच्छी तरह घोंटकर, बत्ती बनाकर जल के साथ घिसकर अंजन करने से नेत्रगत विकार दूर हो जाते हैं।

कान दर्द में- अपराजिता के पत्तों के स्वरस को सुखोष्ण कर कान के चारों तरफ लेप करने से कर्णशूल का शमन हो जाता है।

दांतो के दर्द में- अपराजिता की जड़ के कल्क में काली मिर्च चूर्ण को मिलाकर मुख में धारण से दांत के दर्द में राहत मिलती है।

गले के रोगों में- सफेद अपराजिता की जड़ के १ ग्राम से २ ग्राम चूर्ण को घी में मिलाकर खाने से या कटु फल के चूर्ण को गले के अन्दर मालिश करने से गलगण्ड रोग दूर हो जाता है।
तुण्डिकेरी शोथ में- १० ग्राम अपराजिता के पत्तों का ५०० मिली. जल में क्वाथ बनाकर, आधा शेष रहने पर सुबह-शाम गरारा करने से टांसिल, गले के व्रण तथा स्वर भंग में लाभ होता है।

गलगण्ड में- सफेद अपराजिता की जड़ के कल्क में घी या गोमूत्र मिलाकर सेवन करने से गलगण्ड में लाभ होता है। श्वेत अपराजिता की जड़ को घृतकुमारी के रेशों के सूत्र से हाथ में बांधने से अचानक उत्पन्न होने वाली गण्डमाला का शमन होता है। सफेद अपराजिता की १ ग्राम जड़ को प्रात: पीसकर पीने तथा स्निग्ध भोजन पान करने से गलगण्ड में लाभ होता है।

अपची में- पुष्य नक्षत्र में श्वेत अपराजिता की जड़ को उखाड़ कर गले में बांधने से तथा मूल के चूर्ण को प्रति दिन गोदुग्ध या गोघृत के साथ खाने से अपची रोग में शीघ्र लाभ होता है।

कास श्वास में- अपराजिता की जड़ का शर्बत थोड़ा पीने से

कास- श्वास और बालकों की कुक्कुर खांसी में लाभ होता है।

जलोदर में- आधा ग्राम अपराजिता के भुने हुये बीज के चूर्ण को गर्म पानी के साथ दिन में दो बार सेवन करने से जलोदर, कामला और बच्चे के निमोनिया में लाभ होता है।

बालकों के पेट दर्द में- अपराजिता के एक-दो बीजों को आग पर भून कर, बकरी के दूध या घी के साथ चटाने से अफारा और पेट दर्द में आराम मिलता है।

यकृत प्लीहा में- अपराजिता की जड़ को अन्य रेचक और मूत्र जनक औषधियों के साथ देने से बढ़ी हुई तिल्ली और जलोदर आदि रोग मिटते हैं। मूत्राशय की दाह मिटती है।

कामला में- ३-६ ग्राम अपराजिता मूल के चूर्ण को छाछ के साथ देने से कामला में लाभ होता है।

मूत्रकृच्छ्र में- १-२ ग्राम अपराजिता मूल के चूर्ण को गर्म पानी या दूध के साथ दिन में २-३ बार प्रयोग करने से गठिया, मूत्राशय की जलन और मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।

अश्मरी में- ५ ग्राम अपराजिता की जड़ को चावलों के धोवन के साथ पीस-छानकर कुछ दिन प्रात: सायं सेवन करने से मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है।
अण्डकोष वृद्धि में- अपराजिता के बीजों को पीसकर गर्म लेप करने से अण्ड कोष की सूजन में लाभ होता है।

गर्भ स्थापन में- ५ ग्राम श्वेत अपराजिता की छाल या पत्तों को बकरी के दूध में पीस-छान कर शहद के साथ पिलाने से गिरता हुआ गर्भ ठहर जाता है तथा कोई पीड़ा नहीं होती है।

¬ १ ग्राम अपराजिता की जड़ को दिन में दो बार बकरी के दूध में पीस छानकर, शहद मिलाकर कुछ दिनों तक खिलाने से गिरता हुआ गर्भ ठहर जाता है।

सुख प्रसव के लिये- अपराजिता की बेल को स्त्री के कमर में लपेट देने से शीघ्र ही प्रसव होकर पीड़ा शान्त हो जाती है।

पूयमेह में- ३-६ ग्राम अपराजिता की जड़ की छाल, १.५ ग्राम शीतल चीनी तथा १ नग काली मिर्च को जल के साथ पीसकर, छानकर सुबह-शाम ७ दिन तक पिलाने से तथा पंचाङ्ग के क्वाथ में रोगी को बिठाने से या मूत्रेन्द्रिय को उसमें डुबाने से पूयमेह में शीघ्र लाभ होता है।

सन्धि शोथ में- अपराजिता की जड़ के कल्क को जोड़ों पर लगाने से संधि शोथ में लाभ होता है।

श्लीपद में- १०-२० ग्राम अपराजिता की जड़ को थोड़े के जल के साथ पीसकर, गर्म लेप करने से तथा ८-१० पत्तों के कल्क की पोटली बना कर सेंकने से श्लीपद या नारू में लाभ होता है।
¬ धव, अर्जुन, कदम्ब, अपराजिता और बन्दाक की जड़ के कल्क का लेप करने से वल्मीक तथा श्लीपद में लाभ होता है।

व्रण में- हथेली या उंगलियों में होने वाले अत्यन्त पीड़ा युक्त व्रण पर अपराजिता के १०-२० पत्तों की लुगदी बांधकर ऊपर से ठण्डा पानी छिड़कते रहने से अतिशीघ्र लाभ होता है।
फोड़ा में- १०-२० ग्राम अपराजिता की जड़ को कांजी या सिरके के साथ पीसकर लेप करने पके हुये फोड़े ठीक हो जाते हैं।

श्वित्र में- श्वेत अपराजिता की जड़ को शीतल जल में घिसकर लेप करने से १५-३० दिनों में ही श्वित्र में लाभ हो जाता है।

श्वेत कुष्ठ में- दो भाग अपराजिता की जड़ तथा १ भाग चक्रमर्द की जड़ को पानी के साथ पीसकर, लेप करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है। इसके साथ साथ अपराजिता के बीजों को घी में भून कर प्रात: सायं घी के साथ सेवन करने से डेढ़-दो माह में ही श्वेत कुष्ठ में लाभ हो जाता है। अपराजिता की जड़ की राख या भस्म को मक्खन में घिसकर लेप करने से मुँह की झांई दूर हो जाती है।

भूतोन्माद में- चावल के धोवन से श्वेत अपराजिता को पीसकर बकरी के दूध का घी मिलाकर नस्य लेने से भूतोन्माद में लाभ होता है।

ज्वर में- अपराजिता की बेल को कमर में बांधने से तीसरे दिन आने वाले से घी को पकाकर उसमें सोंठ, मंगरा, वच तथा हींग मिलाकर छाछ के साथ देने से सर्प विषजन्य प्रमुखों का शमन हो जाता है।

08/01/2026

From Rajasthan’s desert soils to the world’s wellness shelves, Nagauri Ashwagandha is now officially on the global map.
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07/01/2026
31/12/2025
31/12/2025

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MS_Shalya, MS_shalakya

28/12/2025

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