Homoeo Clinic

Homoeo Clinic Homoeo clinic in Faridabad

A clinic with high quality treatment since 1981

07/12/2025

तेरे जहां में तेरी ही कदर न रही,
इन्सान ने पैसे को खुदा बना दिया
तेरे दर पर सजदे के बहाने
चन्द सिक्कों का वादा कर,
अपनी ख्वाहिश का सौदा
पा लिया

by Dead Poet

by Dead Poet

07/12/2025

तेरे जहां में तेरी ही कदर न रही,
इन्सान ने पैसे को खुदा बना दिया
तेरे दर पर सजदे के बहाने
चन्द सिक्कों का वादा कर,
अपनी ख्वाहिश का सौदा
पा लिया

में
by Dead Poet

07/12/2025

वो हसीं माहपारे कहां खो गए
सारे दिलकश नज़ारे कहां खो गए

जिनसे थी रौशनी ज़िंदगी में मेरी
वो मेरे नैन तारे कहां खो गए

साथ मिल कर जो हमने बुने थे कभी
ख़्वाब वो सब हमारे कहां खो गए

शम्स,अख़्तर, क़मर,गुल ,कली,ख़ुशबूएँ
ज़ीस्त के इस्तिआरे कहां खो गए

मेरी आँखों की झीलों में बहते थे जो
शोख़ियों के शिकारे कहां खो गए

अब किसी बात पर दिल मचलता नहीं
ख़्वाहिशों के पिटारे कहाँ खो गए

तन्हा तन्हा गुज़रता है अब हर सफ़र
रास्तों के सहारे कहां खो गए

बेसबब बह रही है यहाँ से वहाँ
इस नदी के किनारे कहाँ खो गए

जिनसे मंसूब थीं मेरी ख़ुशियाँ सभी
हाए ‘मधुमन’ वो सारे कहाँ खो गए

मधु मधुमन

02/12/2025

"आखिरकार, संगीत दो स्वरों के बीच की चुप्पी है। यदि यह एक सतत ध्वनि होती, तो कोई संगीत नहीं होता। दो स्वरों के बीच की चुप्पी ही उन स्वरों को जोर, सुंदरता देती है। ... इसी तरह, शब्दों के बीच की, विचारों के बीच की चुप्पी ही विचार को महत्वपूर्णता, अर्थ देती है।"

कृष्णमूर्ति,

01/12/2025

The darkest nights produce the brightest stars। Keep spreading positivity and light!... the soul always knows what to do to heal itself, the challenge is to silence the mind.The alternative to sorrow is satisfaction, not happiness. When satisfaction comes, sorrow automatically goes away.

15/11/2025

तुम्हें यह तय करना होगा कि क्या तुम अंधी भीड़ का हिस्सा बनकर जीना चाहते हो, या अपने विचारों को साफ़ करके, शब्दों की ताक़त से दुनिया पर असर डालना चाहते हो। चुनाव तुम्हारे हाथ में है। पढ़ो, सोचो, बोलो ,और खुद को सबसे ऊँचा उठाओ।

तुम सोचते हो कि ज़िंदगी को संभाल लोगे बिना पढ़े? गलत हो।

अगर तुम किताबें नहीं पढ़ते, तो तुम वही बोलोगे जो टीवी ने बताया, जो सोशल मीडिया ने फुसफुसाया, या जो तुम्हारे आस-पास की भीड़ ने कहा।और फिर तुम सोचोगे कि ये तुम्हारे विचार हैं।लेकिन असल में वे उधार लिए गए, खोखले विचार होंगे।

महान किताबें पढ़ना, इसका मतलब है कि तुम सीधे उन दिमाग़ों से बात कर रहे हो जिन्होंने दुनिया को बदला है।शेक्सपियर तुम्हें सिखाएगा कि भाषा कितनी गहरी हो सकती है।दोस्तोएव्स्की तुम्हें दिखाएगा कि इंसान के भीतर कितना अंधेरा और कितनी रोशनी छुपी होती है।नीत्शे तुम्हें चुनौती देगा कि अगर ईश्वर मर गया है तो जीवन का अर्थ कहाँ से आएगा।भगवद्गीता तुम्हें सिखाएगी कि कर्तव्य क्या है और साहस कैसा होना चाहिए।

ये किताबें तुम्हें आराम देने के लिए नहीं हैं।
ये तुम्हें हिलाने के लिए हैं।ये तुम्हें असुविधा में डालेंगी।तुम्हें लगेगा कि ये कठिन हैं।
लेकिन याद रखो ,आसान चीज़ें तुम्हें ऊँचाई पर नहीं ले जातीं।

अगर तुम रोज़ थोड़ी देर भी महान किताबों के साथ बैठोगे, तो धीरे-धीरे तुम्हारा दिमाग़ तेज़ होगा।तुम्हारे शब्द गहरे होंगे।
तुम्हारी सोच मजबूत होगी।और यही तुम्हें बाक़ी सब से अलग बनाएगा।

क्योंकि सुन लो ,अगर तुमने पढ़ना नहीं सीखा, तो तुम सोच भी नहीं पाओगे। और अगर सोच नहीं पाओगे, तो तुम्हारा जीवन दूसरों के आदेशों पर गुज़रेगा।
—-

तुम सोचते हो कि पढ़ लिया तो काफी है?
नहीं।

पढ़ना शुरुआत है, लेकिन अगर तुमने पढ़कर सोचा नहीं, तो तुम सिर्फ़ एक तोते हो।शब्द दुहराना आसान है।लेकिन सवाल करना मुश्किल है।

सोचना का मतलब है किताब पढ़कर खुद से पूछना,
“क्या यह सच है?”
“क्यों सच है?”
“क्या इसका उल्टा भी संभव है?”

अगर तुम ये सवाल नहीं पूछते, तो दूसरों की सोच तुम्हारे दिमाग़ में घर कर लेगी।
और तुम समझोगे कि यह तुम्हारी सोच है, जबकि तुम सिर्फ़ नक़ल कर रहे हो।

विचार को धार देना मतलब है उसे परखना।हर वाक्य, हर तर्क को कसौटी पर चढ़ाओ।गलत लगे तो खारिज करो, सही लगे तो गहराई से समझो।सोचना मेहनत है।यह तुम्हें थकाएगा।लेकिन यही मेहनत तुम्हें भीड़ से अलग करेगी।

याद रखो,जिसने सोचना सीख लिया, वही सचमुच स्वतंत्र है।बाक़ी सब भीड़ का हिस्सा हैं।

अगर तुम नहीं सोचोगे, तो कोई और तुम्हारे लिए सोचेगा।वह तुम्हें बताएगा कि क्या मानना है, क्या करना है, किसे चुनना है।
और तुम वही करोगे।

इसलिए,सोचना सीखो।
हर किताब, हर बात, हर अनुभव को सवाल बनाओ।तुम्हारे विचार जितने साफ़ होंगे, तुम्हारी ज़िंदगी उतनी मज़बूत होगी।

क्योंकि ,सोचना आलसियों का काम नहीं है। यह बहादुरों का काम है।
—-

पढ़ना सीख लिया, सोचना सीख लिया ,लेकिन अगर तुम बोल नहीं सकते, तो सब बेकार है।

क्यों?
क्योंकि दुनिया तुम्हारे दिमाग़ के अंदर झाँक नहीं सकती। अगर तुम अपने विचार शब्दों में नहीं ढाल पाए, तो वे विचार मर जाते हैं।

याद रखो ,इंसान की सबसे ऊँची क्षमता है स्पष्ट भाषा में बोलना।जानवर खा सकते हैं, सो सकते हैं, लड़ सकते हैं।
लेकिन बोलना?
साफ़, गूंजदार, धारदार बोलना, यह सिर्फ इंसान के पास है।

अगर तुम आर्टिक्यूलेट नहीं हो, तो लोग तुम्हें गंभीरता से नहीं लेंगे।
तुम्हारे पास सबसे अच्छा विचार हो सकता है, लेकिन अगर तुम हकलाते हुए, अधूरे शब्दों में उसे रखोगे, तो वह विचार बर्बाद हो जाएगा।

इसलिए बोलना सीखो।अपनी आवाज़ को साधो।शब्दों को चुनो।धीरे-धीरे कहो।
ताकि हर शब्द तीर की तरह सामने वाले के दिल और दिमाग़ में लगे।

गलतियाँ होंगी, शुरुआत में।लोग हँसेंगे भी शायद।पर यही अभ्यास तुम्हें मजबूत करेगा।हर बार तुम और साफ़, और धारदार बोलोगे।

याद रखो,
अगर तुम बोल नहीं सकते, तो तुम सोच भी साफ़ नहीं सकते।
और अगर तुम सोच साफ़ नहीं कर सकते, तो तुम दूसरों के आदेश पर जीओगे।

लेकिन जब तुम बोलना सीख लेते हो,
तो तुम्हारी आवाज़ हथियार बन जाती है।
लोग तुम्हें सुनते हैं।
तुम उन्हें बदल सकते हो।
तुम अपने जीवन का रास्ता खुद बना सकते हो।

बोलना सीखो। साफ़। स्पष्ट। धारदार।
क्योंकि यही तुम्हारी असली ताक़त है।
—-
याद रखो,शब्द सिर्फ़ आवाज़ नहीं हैं।
शब्द हथियार हैं।शब्द औज़ार हैं।
शब्द वह ताक़त हैं जो दुनिया को बदल सकती है।

एक गलत शब्द युद्ध शुरू कर सकता है।
एक सही शब्द शांति ला सकता है।
एक प्रेरक वाक्य किसी निराश इंसान की ज़िंदगी बदल सकता है।

इतिहास गवाह है।बुद्ध के शब्दों ने एशिया की सोच बदल दी।कृष्ण के शब्दों ने अर्जुन को युद्ध के बीच खड़ा कर दिया।यीशु के शब्दों ने सदियों की नैतिकता गढ़ी।चर्चिल के शब्दों ने पूरी कौम को हार से जीत की ओर मोड़ दिया।

क्या इनके पास तलवारें थीं? बंदूकें थीं?
नहीं।इनके पास था ,शब्द।

अगर तुम्हारे शब्द कमजोर हैं, तो तुम दूसरों की सोच के गुलाम हो।अगर तुम्हारे शब्द धारदार हैं, तो तुम अपने भविष्य के मालिक हो।

इसलिए शब्दों को हल्के में मत लो।
तुम्हारा हर वाक्य तुम्हें या तो ऊँचाई पर ले जाएगा, या नीचे गिरा देगा।सीखो अपने शब्दों को चुनना।सीखो उन्हें सही ढंग से इस्तेमाल करना।

क्योंकि, शब्द ताक़त हैं। और अगर तुमने इस ताक़त पर काबू पा लिया, तो कोई तुम्हें रोक नहीं सकता।
—-

तुम सोचते हो आर्टिक्यूलेट बनना आसान है? नहीं। यह खेल बच्चों का नहीं है। यह कठिन अनुशासन मांगता है।

अगर तुम आसान रास्ता चुनोगे, तो तुम्हारी ज़िंदगी भी आसान और औसत रह जाएगी। लेकिन अगर तुम कठिन रास्ता चुनोगे तो वहीं से महानता शुरू होती है।

कठिन किताबें पढ़ो। जो पहली बार में समझ न आए, उन्हें दूसरी बार पढ़ो।
फिर भी न समझो, तो तीसरी बार पढ़ो।
दिमाग़ की मांसपेशियाँ तभी मजबूत होती हैं जब तुम उसे कठिन अभ्यास से गुज़ारो।

लिखना रोज़ का काम बनाओ।एक पन्ना, दो पन्ने, चाहे छोटे ही सही ,लेकिन रोज़।
ताकि तुम्हारी सोच शब्दों में ढलने की आदत डाले।

बोलने का अभ्यास करो।लोगों के सामने खड़े हो, अपनी बात रखो।हाँ, गलती होगी।
हाँ, लोग हँसेंगे।पर यही असली ट्रेनिंग है।

अनुशासन मतलब है,हर दिन थोड़ा-थोड़ा प्रगति।कोई शॉर्टकट नहीं। कोई जादू नहीं।

तुम्हें यह याद रखना होगा ,हर रोज़ की छोटी मेहनत, सालों बाद तुम्हारी आवाज़ को तलवार बना देती है।

और अगर तुममें धैर्य नहीं है, तो तुम कभी वह ताक़त हासिल नहीं करोगे।

कठिन रास्ता चुनो, कठोर अनुशासन अपनाओ।क्योंकि आसान रास्ता हमेशा भीड़ की ओर जाता है।कठिन रास्ता ही ऊँचाई की ओर जाता है।
—-

जानवर खाते हैं।जानवर सोते हैं।
जानवर प्रजनन करते हैं।लेकिन इंसान?
इंसान की ऊँचाई सिर्फ़ इनसे नहीं मापी जाती।

इंसान की सबसे बड़ी ताक़त है ,स्पष्ट भाषा में सोचना और बोलना।

यही क्षमता हमें बाकी सारी सृष्टि से अलग बनाती है।अगर तुमने इसे अनदेखा किया, तो तुम भीड़ में सिर्फ़ एक चेहरा हो।लेकिन अगर तुमने इसे साध लिया, तो तुम्हारी आवाज़ दूर तक गूँजेगी।

सोचो,
कितने ही लोग ज़िंदा रहे, लेकिन दुनिया उन्हें भूल गई।
क्यों?
क्योंकि वे आर्टिक्यूलेट नहीं थे।
वे अपने विचारों को बोल नहीं पाए।

और फिर देखो उन लोगों को जिनकी आवाज़ सदियों तक सुनाई देती रही ,गांधी, लिंकन, बुद्ध, कृष्ण, यीशु।
इनके पास सेना नहीं थी, पैसा नहीं था, ताक़तवर हथियार नहीं थे।
लेकिन इनके पास था ,शब्द।
और वही शब्द आज भी इंसानों की दिशा तय कर रहे हैं।

तुम्हें तय करना होगा कि तुम कौन हो।
भीड़ का हिस्सा? या वह इंसान जिसकी आवाज़ मायने रखती है?

अगर तुम महान किताबें पढ़ते हो, सोचते हो, और साफ़ बोलते हो, तो तुम अपने भविष्य के मालिक हो।
तुम्हारी आवाज़ सुनी जाएगी।
तुम्हारा असर गहरा होगा।

तो याद रखो ,
पढ़ो। सोचो। बोलो।
क्योंकि यही इंसान की असली ऊँचाई है।

“Read great books, Learn to read,learn to think, learn to speak. The highest faculty of human beings is articulated speech.”

15/11/2025

विवेकानंद अमरीका जाते थे। रामकृष्ण की तो मृत्यु हो गई थी। रामकृष्ण की पत्नी शारदा से वे आशा मांगने गए कि मैं जाता हूं परदेश, खबर ले जाना चाहता हूं धर्म की, सत्य की। मुझे आशीर्वाद दें कि मैं सफल होऊं।

शारदा तो ग्रामीण स्त्री थी। वे उससे आशीर्वाद लेने गए। उन्होंने सोचा भी न था कि शारदा आशीर्वाद देने में भी सोच विचार करेगी। उसने विवेकानंद को नीचे से ऊपर तक देखा। वह अपने चौके में खाना बनाती थी। फिर बोली सोच कर बताऊंगी।

विवेकानंद ने कहा सिर्फ आशीर्वाद मांगने आया हूं शुभाशीष चाहता हूं तुम्हारी मंगलकामना कि मैं जाऊं और सफल होऊं।

उसने फिर उन्हें गौर से देखा और उसने कहा ठीक है। सोच कर कहूंगी।

विवेकानंद तो खड़े रह गए अवाक। कभी आशीर्वाद भी किसी ने सोच कर दिए हों और आशीर्वाद सिर्फ मांगते थे शिष्टाचारवश। वह कुछ सोचती रही और फिर उसने कहा विवेकानंद को कि नरेन्द्र, वह जो सामने पड़ी हुई छुरी है, वह उठा लाओ। सामने पड़ी हुई छुरी विवेकानंद उठा लाए और शारदा के हाथ में दी। हाथ में देते ही वह हंसी और उसकी हंसी से उन्हें आशीर्वाद बरस गए उनके ऊपर। उसने कहा कि जाओ। जाओ, तुमसे सबका मंगल ही होगा। विवेकानंद कहने लगे कि इस छुरी के उठाने में और तुम्हारे आशीर्वाद देने में कोई संबंध था क्या?

शारदा ने कहा संबंध था। मैं देखती थी कि छुरी उठा कर तुम किस भांति मुझे देते हो। मूठ तुम पकड़ते हो कि फलक तुम पकड़ते हो। मूठ मेरी तरफ करते हो कि फलक मेरी तरफ करते हो। और आश्चर्य कि विवेकानंद ने फलक अपने हाथ में पकड़ा था छुरी का और मूठ लकड़ी की शारदा की तरफ की थी। आमतौर से शायद ही कोई फलक को पकड़ कर और मूठ दूसरे की तरफ करे। मूठ कोई पकड़ेगा सहज, खुद। शारदा कहने लगी तुम्हारे मन में मैत्री का भाव है, तुम जाओ, तुमसे कल्याण होगा। तुमने फलक अपनी तरफ पकड़ा, मूठ मेरी तरफ। अपने को असुरक्षा में डाला। हाथ में चोट लग सकती है और मेरी सुरक्षा की फिकर की। तुम जाओ, आशीर्वाद मेरे तुम्हारे साथ हैं।

इतनी सी, छोटी सी घटना में मैत्री प्रकट होती है, साकार बनती है। बहुत छोटी सी घटना है! क्या है मूल्य इसका कि क्या पकड़ा आपने, फलक या मूठ? शायद हम सोचते भी नहीं। और सौ में निन्यानबे मौके पर कोई भी मूठ ही पकड़ता है। वह सहज मालूम होता है। अपनी रक्षा सहज मालूम होती है, आत्मरक्षा सहज मालूम होती है।

मैत्री आत्मरक्षा से भी ऊपर उठ जाती है। दूसरे की रक्षा, वह जो जीवन है हमारे चारों तरफ, उसकी रक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है। मैत्री का अर्थ है. मुझसे भी ज्यादा मूल्यवान है सब कुछ जो है। वैर का अर्थ है मैं सबसे ज्यादा मूल्यवान हूं। सारा जगत मिट जाए, लेकिन मेरी रक्षा जरूरी है। मैं हूं केंद्र जगत का। वैर भाव का आधार है मैं हूं केंद्र जगत का। वैर भाव ईगोसेंट्रिक है। वह अहंकेंद्रित है। मैं हूं जगत का केंद्र। सारा जगत चलता है मेरे लिए, सारा जगत मिट जाए, लेकिन मैं बचूं।

मैत्री का केंद्र मैं नहीं हूं सर्व है। मैं मिट जाऊं, सब बचे। मैं खो जाऊं, सब रहे। मैत्री है मंगल की कामना, सर्वमंगल की। कामना ही नहीं, सक्रिय जीवन भी। उठूं, बैठूं, चलूं और मेरा उठना, बैठना, चलना, मेरा श्वास लेना भी सर्वमंगल के लिए समर्पित हो जाए; तो मनुष्य परमात्मा के दूसरे द्वार में प्रवेश पाता है।

ओशो

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Shop No. 33 Sector 30 HUDA Marke Sector 30 Faridabadt
Faridabad
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6:30pm - 8:30pm
Tuesday 10am - 12:30pm
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