Foot Prints of the Buddha

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13/02/2024
14/11/2023
28/07/2021

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे के रोने की जो कला है, वह उसके तनाव से मुक्त होने की व्यवस्था है और बच्चे पर बहुत तनाव है। बच्चे को भूख लगी है और मां दूर है या काम में उलझी है। बच्चे को भी क्रोध आता है। और अगर बच्चा रो ले, तो उसका क्रोध बह जाता है और बच्चा हलका हो जाता है, लेकिन मां उसे रोने नहीं देगी।

मनसविद्‍ कहते हैं कि उसे रोने देना; उसे प्रेम देना, लेकिन उसके रोने को रोकने की कोशिश मत करना। हम क्या करेंगे? बच्चे को खिलौना पकड़ा देंगे कि मत रोओ। बच्चे का मन डाइवर्ट हो जाएगा। वह खिलौना पकड़ लेगा, लेकिन रोने की जो प्रक्रिया भीतर चल रही थी, वह रुक गई और जो आंसू बहने चाहिए थे, वे अटक गए और जो हृदय हलका हो जाता बोझ से, वह हलका नहीं हो पाया। वह खिलौने से खेल लेगा, लेकिन यह जो रोना रुक गया, इसका क्या होगा? यह विष इकट्ठा हो रहा है।

मनसविद्‍ कहते हैं कि बच्चा इतना विष इकट्ठा कर लेता है, वही उसकी जिंदगी में दु:ख का कारण है। और वह उदास रहेगा। आप इतने उदास दिख रहे हैं, आपको पता नहीं कि यह उदासी हो सकता था न होती; अगर आप हृदयपूर्वक जीवन में रोए होते, तो ये आंसू आपकी पूरी जिंदगी पर न छाते; ये निकल गए होते। और सब तरह का रोना थैराप्यूटिक है। हृदय हलका हो जाता है।

रोने में सिर्फ आंसू ही नहीं बहते, भीतर का शोक, भीतर का क्रोध, भीतर का हर्ष, भीतर के मनोवेश भी आंसुओं के सहारे बाहर निकल जाते हैं। और भीतर कुछ इकट्ठा नहीं होता है। तो स्क्रीम थैरेपी के लोग कहते हैं कि जब भी कोई आदमी मानसिक रूप से बीमार हो, तो उसे इतने गहरे में रोने की आवश्यकता है कि उसका रोआं-रोआं, उसके हृदय का कण-कण, श्वास-श्वास, धड़कन-धड़कन रोने में सम्मिलित हो जाए; एक ऐसे चीत्कार की जरूरत है, जो उसके पूरे प्राणों से निकले, जिसमें वह चीत्कार ही बन जाए।

हजारों मानसिक रोगी ठीक हुए हैं चीत्कार से। और एक चीत्कार भी उनके न मालूम कितने रोगों से उन्हें मुक्त कर जाती है। लेकिन उस चीत्कार को पैदा करवाना बड़ी कठिन बात है। क्योंकि आप इतना दबाए हैं कि आप अगर रोते भी हैं तो रोना भी आपका झूठा होता है। उसमें आपके पूरे प्राण सम्मिलित नहीं होते। आपका रोना भी बनावटी होता है। ऊपर-ऊपर रो लेते हैं।

आंख से आंसू बह जाते हैं, हृदय से नहीं आते। लेकिन चीत्कार ऐसी चाहिए, जो आपकी नाभि से उठे और आपका पूरा शरीर उसमें समाविष्ट हो जाए। आप भूल ही जाएं कि आप चीत्कार से अलग हैं; आप एक चीत्कार ही हो जाएं। तो कोई तीन महीने लगते हैं मनोवैज्ञानिकों को आपको रुलाना सिखाने के लिए। तीन महीने निरंतर प्रयोग करके आपको गहरा किया जाता है।

करते क्या हैं इस थैरेपी वाले लोग? आपको छाती के बल लेटा देते हैं जमीन पर। आपसे कहते हैं कि जमीन पर लेटे रहें और जो भी दु:ख मन में आता हो, उसे रोकें मत, उसे निकालें। रोने का मन हो रोएं; चिल्लाने का मन हो चिल्लाएं।

तीन महीने तक ऐसा बच्चे की भांति आदमी लेटा रहता है जमीन पर रोज घंटे, दो घंटे। एक दिन, किसी दिन वह घड़ी आ जाती है कि उसके हाथ-पैर कंपने लगते हैं विद्युत के प्रवाह से। वह आदमी आंख बंद कर लेता है, वह आदमी जैसे होश में नहीं रह जाता, और एक भयंकर चीत्कार उठनी शुरू होती है। कभी-कभी घंटों चीत्कार चलती है। आदमी बिलकुल पागल मालूम पड़ता है, लेकिन उस चीत्कार के बाद उसकी जो-जो मानसिक तकलीफें थीं, वे सब तिरोहित हो जाती हैं।

यह जो ध्यान का प्रयोग मैं आपको कहा हूं, ये आपके जब तक मनावेग-रोने के, हंसने के, नाचने के, चिल्लाने के, चीखने के, पागल होने के- इनका निरसन नहो जाए, तब तक आप ध्यान में जा नहीं सकते। यही तो बाधाएं हैं।

आप शांत होने की कोशिश कर रहे हैं और आपके भीतर वेग भरे हुए हैं, जो बाहर निकलना चाहते हैं। आपकी हालत ऐसी है, जैसे केतली चढ़ी है चाय की। ढक्कन बंद है। ढक्कन पर पत्थर रखे हैं। केतली का मुंह भी बंद किया हुआ है और नीचे से आग भी जल रही है। वह जो भाप इकट्ठी हो रही है, वह फोड़ देगी केतली को। विस्फोट होगा। दस-पांच लोगों की हत्या भी हो सकती है। इस भाप को निकल जाने दें। इस भाप के निकलते ही आप नए हो जाएंगे और तब ध्यान की तरफ प्रयोग शुरू हो सकता है।

साभार :गीता दर्शन
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

स्वास्थ्य की दृष्टि से बिना पालिश किया हुआ चावल उत्तम है .
31/01/2019

स्वास्थ्य की दृष्टि से बिना पालिश किया हुआ चावल उत्तम है .

चावल जिसे संस्कृत में तंडुल या व्रीहि कहा जाता है , हमारे देश में सैकड़ो साल से उपयोग में लाया जाता है . वैसे विश्व की आधी से ज्यादा जनसँख्या चावल पर निर्भर है . चावल को सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है

आयुर्वेद में श्लोक है
रसे पाके स्वादु पवनकफपितप्रशमनों ज्वारे जीर्णे पथ्यः सकल जठर क्षोभहरं
शिशुनां वृद्धनाम नृपतिसुकुमारातीस्त्रिणाम
अयं सेव्यो रक्तो भवति ही महाशालीरमलः ।

चावल की प्रकृति मधुर , स्वाद में मीठा , वात पित्त को कम करने वाला तथा कफ को थोड़ा बढ़ने वाला होता है . यह बलवर्धक , पचने में हल्का , स्वादिष्ट होता है . न्यूट्रिशिएंट वैल्यू देखि जाये तो चावल में90% कार्ब , 8 % प्रोटीन , 2% फैट होता है साथ में थोड़ी मात्रा में magnesium, phosphorus, manganese, selenium, iron, folic acid, thiamine and niacin भी होता है .

वैसे बासमती चावल प्रिय होता है , लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से बिना पोलिश किया हुआ चावल उत्तम है . आजकल ऐसा प्रचारित किया जाता है की चावल खाने से मोटापा बढ़ता है . जो लोग मोठे होते है ,उन्हें डाइटिंग में सबसे पहले चावल ही मना किया जाता है , डायबटीज के पेशेंट के लिए भी चावल का परहेज होता है

ये सही भी है , ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है , ज्यादा मात्रा में कार्ब होने से ये मोटापा को बढ़ाता है , लेकिन सोचिये ................................... जिस चीज को सकैडो सालो से खाया जा रहा है ,अचानक से उसमे इतना दोष कहाँ से आ गया ? क्या पहले लोग मोठे होते थे . क्या पहले डायबटीज नहीं होता था ?

दरसल अब दो बाते हो गयी है , एक जीवनशैली आलस्य पूर्ण हो गयी है , साथ में चावल बनाने का तरीका बदल गया है

चावल को आज कल प्रेशर कुकर में बनाया जाता है . प्रेशर कुकर में दबाव , सामान्य से 15 psi ज्यादा तथा तापमान121 डिग्री तक हो जाता है . इतने तापमान पर चावल बनाना जो खुद इतना हल्का होता है की 2 घंटे भिगो के रख दो तो कच्चा चबा लो ,

प्रेशर कुकर में चावल बनाना ठीक नहीं है , आयुर्वेदिक तरीके में चावल को बनाने से पहले कम से कम आधा घंटा भिगो ले , फिर चावल से कम से कम ३ गुना पानी खौलाएं , खौलते पानी में चावल को डाल के माध्यम आंच पर रखे फिर धीमी आंच पर , जब 1-2 दाना निकल के देख लीजिये की चावल हो गया है , तो उसे छान ले . छानने के बाद चावल को एक तरफ रख दे ,और उस पानी को जिसे मांड कहाँ जाता है

जिसमे बहुत अच्छी मात्रा में कार्ब होता है , उसे तरी वाली सब्जी में पानी की तरह उपयोग करे , सुप में उस पानी का प्रयोग करे , जिसे दस्त आ रही हो उसे पिने को दे , बच्चो को पीने को दे , क्यों की ये पानी बहुत पौष्टिक होता है . आप इससे बाल भी धो सकती है , ये नेचुरल कंडीशनर की तरह काम करता है

अब कुछ ख़ास बाते नोट कर ले , जिसे वात रोग है (गैस बनती है ), वो चावल बनांते समय पानी में थोड़ी कालीमिर्च , दालचीनी , मुलेठी और तेजपत्ता डाल दे , इन मसलो को डालने से चावल मेदोहर यानि की वजन नहीं बढ़ाता है स्वादिस्ट हो जाता है . कफ के मरीज ( नजला जुकाम बलगम हुआ हो ) वो भी इन मसलो के साथ बने चावल को दोपहर में जब सूर्य निकला हो , प्रयोग कर सकते है

डायबटीज के मरीज ,जिनक शुगर दवाई से अच्छे से कंट्रोल है , वो भी इन मसलो के साथ थोड़ी मात्रा में चावल ले सकते है . हलाकि अपने डाक्टर से इस पर राय जरूर ले

इस विधि से बने चावल पर ऊपर से देशी घी डाल के खाने से स्वाद बढ़ता है , खाना जल्दी पचता है , IBS के रोगी के लिए अच्छा है , जिसे एसिडिटी होती है , हाजमा ख़राब रहता है , उनके लिए ये पथ्य है . कमजोर शरीर वाले इसी प्रकार पानी में गुड़ या खांड डाल के चावल बनाये तो ये वजन को सही रूप में बढ़ाता है

खीर बनाने का भी ये तरीका है , पहले इस विधि से चावल बनाये फिर खौलते दूध में डाले , इससे खीर हलकी और सुपाच्य होती है
जो लोग इंटेंस एक्सरसाइज करते है , जिम जाते है , उन्हें भी जिम के बाद थोड़ी मात्रा में चावल खाने की सलाह दी जाती है , क्यों की कार्ब हमारे शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है .
अब ये बात भी आती है ,कि चावल कि कितनी मात्रा खायी जाए . इसका जवाब ये है कि हर व्यक्ति कि अपनी जरुरत होती है , लाइफ स्टाइल होती है , अपने हिसाब से देख ले , या फिर डायटीशियन से अपना डाइट प्लान बना ले . वैसे एक नार्मल साइज कि कटोरी भर चावल पर्याप्त होता है
चावल को जब दाल के साथ मिला के खिचड़ी बनायीं जाती है , उसे भी इसी विधि से बनाये , साबुत , छिलका सहित दाल को आठ गुने पानी में उबाले जब दाल पाक जाये तू उसमे भीगा चावल डाले . ये पौष्टिक खिचड़ी बनती है .
मै प्रेशर कुकर के विरुद्ध नहीं हूँ , बस जो चीजे ज्यादा समय लेती है , जैसे दाल , छोले ,चने , राजमा आदि कुकर में पकाना ठीक है , चावल तो बहुत आसानी से पक जाता है . अगर वजन नहीं बढ़ाना है और चावल भी खाना है फिर तो यही तरीका अच्छा है . वैसे दाल के साथ या तो रोटी खाइये या फिर चावल , दोनों को एक साथ खाना से भी वजन बढ़ता है , क्यों कि दोनों ही चीजों में ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है

मुझे सादी दाल , चावल ,घी , दही बहुत पसंद है

पोस्ट पसंद आयी हो तो इस विधि का प्रयोग करे , मुझे कमेंट बॉक्स में उत्साहवर्धन करे . पोस्ट को अपने वाल पर पब्लिक सेटिंग में शेयर , कॉपी पेस्ट करे ................ आकाँक्षा शर्मा

30/05/2018

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