17/02/2026
कभी कल्पना करना कि उस दौर में जब किसी दलित की छाया से भी लोग परहेज़ करते थे; एक अकेला शख्स कैसे लड़ा होगा सबसे? कैसे हासिल किए होंगे वो मानक जो एक बड़े समाज को इंसान तक मानने के लिए तैयार नहीं थे। तमाम पूर्वाग्रहों को त्यागकर समझना जिसको आज भी यह व्यवस्था स्वीकारने को राजी नहीं तब क्या ही आलम रहा होगा।
बाकी विमर्श सब अपनी जगह है लेकिन एक बार काशी के धर्मगुरु कृपात्री महाराज की उन तमाम बातों को पढ़ और जान लेना जिन्होंने डॉ अंबेडकर जी को यहां तक कहा कि अब क्या एक शूद्र व्यक्ति द्विजों के लिए नियम, कानून बनाएगा। वो इतने दुःखी थे कि नेहरू जी को बात–बात पर सीधी चुनौती दिया करते थे और कई बार नेहरू जी कमज़ोर पड़े भी।
अंत में कृपात्री महाराज ने हिंदू कोड बिल पर नेहरू जी से कहा कि अनर्थ मत कीजिए अब कम से कम इसको पेश तो किसी ब्राह्मण व्यक्ति से करवाइए। इतनी असहनीय पीड़ा जिनकी रही होगी क्या वो स्वीकार करेंगे? मदन मोहन मालवीय जी, बाबा साहेब के हाथों एक गिलास पानी नहीं पी सके और देश में विमर्श है कि सालों से इन्हें पानी नहीं मिला।
हाशिए के लोगों को कड़वे घूंट पीने पड़ेंगे क्योंकि भारत की महानतम खोजों में से जाति एक है। अब इतनी बड़ी उपलब्धि को कोई दरकिनार कैसे कर सकते हैं?आज बड़ी तादाद में ये वंचित लोग आगे जरूर निकल गए हैं लेकिन इसके पीछे असंख्य संघर्ष रहें है। उन संघर्षों की कल्पना करना कभी क्योंकि अनुभूति करना मुश्किल है। आपको नफरतों की वजह समझ आएगी।
ी_विशाल