28/02/2026
ध्यान: अंतरात्मा की ओर एक आंतरिक यात्रा
ध्यान कोई बाहरी क्रियाकलाप नहीं, बल्कि हमारी बिखरी हुई चेतन शक्ति को समेटकर अपने केंद्र की ओर लौटने की प्रक्रिया है। वर्तमान में हमारी चेतना मन के माध्यम से इंद्रियों में बह रही है और संसार में बिखरी हुई है।
जिस प्रकार सूर्य की किरणें जब एक लेंस (Magnifying Glass) के माध्यम से एक बिंदु पर केंद्रित होती हैं, तो वे अग्नि प्रज्वलित कर देती हैं, ठीक उसी प्रकार जब हम अपनी बिखरी हुई मानसिक शक्तियों को इंद्रियों से खींचकर मन पर और मन से आत्मा पर केंद्रित करते हैं, तब स्व-दर्शन का मार्ग प्रशस्त होता है।
जैसे अशांत और तरंगित जल में व्यक्ति अपना प्रतिबिंब नहीं देख सकता, वैसे ही चंचल मन और बिखरी हुई चेतना में आत्म-साक्षात्कार संभव नहीं है।
आज के युग में ध्यान के नाम पर कई भ्रांतियां प्रचलित हैं। हमें यह समझना अनिवार्य है कि:
• ध्यान व्यायाम नहीं है: यह केवल शरीर को मोड़ना या कसरत करना नहीं है।
• ध्यान केवल जप नहीं है: यह वाणी का विषय नहीं, बल्कि मौन की गहराई है।
• ध्यान कल्पना नहीं है: यह किसी दृश्य को मन में गढ़ना नहीं, बल्कि जो 'है' उसे देखना है।
• ध्यान संगीत या नृत्य नहीं है: ये मनोरंजन के साधन हो सकते हैं, लेकिन ध्यान इनसे परे इंद्रिय-अतीत अवस्था है।
योग का अर्थ 'जोड़' है। यह मेल है आत्मा का परमात्मा से। लेकिन परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग आत्मा से होकर ही गुजरता है। जब तक हम स्वयं को नहीं जानते, हम उस परम सत्ता को कैसे जान सकते हैं?
आज विश्व में जहाँ लोग बाहरी क्रियाओं में ध्यान खोज रहे हैं, वहीं विहंगम योग इस सत्य को उद्घाटित करता है कि "ध्यान शरीर नहीं, आत्मा करती है।" यह पद्धति हमें सिखाती है कि कैसे मन, बुद्धि और इंद्रियों के घेरे से ऊपर उठकर, शब्द और वाणी से परे होकर उस शून्य और निशब्द अवस्था में प्रवेश किया जाए जहाँ केवल 'स्व' का बोध बचता है।
अंदर प्रवेश करने के लिए हमें 'चेतन मार्ग' की आवश्यकता है। इसके लिए कुछ चरण महत्वपूर्ण हैं:
• प्रत्याहार: इंद्रियों के विषयों से मोह कम करना।
• सद्गुरु का सानिध्य: विहंगम योग जैसे मार्ग में गुरु की प्रधानता होती है जो उस 'अंदरूनी द्वार' की कुंजी देते हैं।
• अभ्यास और वैराग्य: निरंतर अंतर्मुखी होने का प्रयास और बाहरी आकर्षणों के प्रति उपेक्षा।
• लय की अवस्था: जब मन लय हो जाता है, तब कर्ता भाव समाप्त हो जाता है और केवल दृष्टा भाव बचता है। यही वह क्षण है जहाँ आत्मा का साक्षात्कार होता है।
निष्कर्ष:
ध्यान बाहर से कुछ पाने का नाम नहीं, बल्कि भीतर जो छिपा है उसे उघाड़ने का नाम है। जब मन शांत और लयबद्ध हो जाता है, तब जो शेष बचता है, वही हमारी वास्तविक सत्ता है।