Vihangam Yog Gautam Budh Nagar

Vihangam Yog Gautam Budh Nagar Vihangam Yoga is a "scientific" meditation system founded by Sadguru Sadafaldeo Ji Maharaj.

Grand Celebration of Vihangam Yog Meditation session in Noida: A Surge of Spiritual Consciousness​Today, the land of Noi...
30/03/2026

Grand Celebration of Vihangam Yog Meditation session in Noida: A Surge of Spiritual Consciousness

​Today, the land of Noida witnessed a highly successful and vibrant Vihangam Yog Meditation session.

This sacred endeavor was made possible through the exceptional and commendable contribution of Guru Behen Smt. Khushbu Ji. With her expert techniques, she introduced new seekers to the subtle practices of Pranayama and provided profound insights into the First Step (Pratham Sopan) of Vihangam Yog meditation.

​A major highlight of the event was the dignified presence of Shri Subhash Chandra Ji, from Singapore. He articulated the esoteric principles of Vihangam Yog in an incredibly simple and logical manner. His powerful insights and spiritual experiences not only enriched the practitioners with knowledge but also ignited a renewed sense of zeal and enthusiasm toward achieving higher life goals.

27/03/2026

Happy Ramnavami

Jai Sadguru Deo!​It was an absolute pleasure to connect with Mr. Vishal Gautam Ji today, Director of eSilentfront Techno...
14/03/2026

Jai Sadguru Deo!

​It was an absolute pleasure to connect with Mr. Vishal Gautam Ji today, Director of eSilentfront Technologies.

Beyond his professional success, we found him to be a deeply spiritual seeker and a true disciple at heart.

​We are delighted to share that he and his family have been initiated into the first stage of of Vihangam Yog Meditation today. He has also received the Swarved, the divine encyclopedia of spirituality authored by Sadguru Sadafal Deo Ji Maharaj.

​We extend a heartfelt welcome to Shri Gautam Ji and his family as they join our Vihangam Yog family.

गुरु: मुक्ति का दिव्य आधार​गुरु का सार केवल 'समर्पण' है। अपने भय, अहंकार और कर्मों के फल को गुरु पर छोड़ दें। जब आप स्वयं...
10/03/2026

गुरु: मुक्ति का दिव्य आधार

​गुरु का सार केवल 'समर्पण' है। अपने भय, अहंकार और कर्मों के फल को गुरु पर छोड़ दें। जब आप स्वयं को पूरी तरह सौंप देते हैं, तो गुरु आपके जीवन की बागडोर संभाल लेते हैं। परमात्मा कहीं बाहर नहीं, आपके भीतर हैं। गुरु आपकी दृष्टि को बाहर के संसार से हटाकर आपके अंतर्मन की ओर मोड़ते हैं। गुरु एक सुरक्षा कवच और पुल के समान हैं, जो आपको आवागमन (जन्म-मरण) के चक्र से निकालकर सीधे परमात्मा में विलीन कर देते हैं। आप कभी अकेले नहीं हैं। गुरु की कृपा का कवच और उनका प्रेम ही वह शक्ति है, जो आपकी कमजोरियों को शक्ति में बदल देती है।
​गुरु का सानिध्य अज्ञान का अंत, अहंकार का विसर्जन और परमात्मा से एकाकार होने का एकमात्र मार्ग है। बस उन पर अविचल विश्वास रखें, शेष सब वे स्वयं पूर्ण कर देंगे।

समर्पण: एक आत्मिक यात्रा​अक्सर समर्पण को बाहरी त्याग—जैसे वेशभूषा, घर या परिवार छोड़ने—से जोड़कर देखा जाता है। किंतु विचार...
06/03/2026

समर्पण: एक आत्मिक यात्रा

​अक्सर समर्पण को बाहरी त्याग—जैसे वेशभूषा, घर या परिवार छोड़ने—से जोड़कर देखा जाता है। किंतु विचारणीय यह है कि क्या केवल बाहरी बदलाव से भीतर का रूपांतरण संभव है? वास्तव में, समर्पण का संबंध शरीर से नहीं, बल्कि आत्मिक धरातल से है।

समर्पण तब घटित होता है जब साधक का मन अपने उद्गम स्थान में लीन होकर शांत हो जाता है। जब अहंकार (मैं) मिट जाता है और आत्म-ज्ञान का प्रकाश होता है, तब वहीं से वास्तविक समर्पण की शुरुआत होती है।

महर्षि सद्गुरु सदाफल देव जी महाराज जी ने पहले आत्म-ज्ञान एवं परमात्म ज्ञान प्राप्त किया और तत्पश्चात नित्य अनादि सद्गुरु के आज्ञा के प्रति पूर्ण समर्पित होकर विश्व-कल्याण के लिए निकल पड़े। आज उसी समर्पण की धारा वर्तमान आचार्य सद्गुरु श्री स्वतंत्र देव जी महाराज के कुशल मार्गदर्शन में विश्व स्तर पर ब्रह्मविद्या का प्रचार कर रही है।

समर्पण एक परम आनंद है। समर्पण से मन की चंचलता समाप्त होकर परम तृप्ति मिलती है। समर्पण से गुरु की शक्ति शिष्य के माध्यम से कार्य करने लगती है। यह जीवन में शुद्धता, सत्यता और शिष्यत्व के गुणों का संचार करता है।

समर्पण का अर्थ है स्वयं को गुरु-सत्ता में विलीन कर देना। जब शिष्य गुरु के चरणों में समर्पित होता है, तो वह अकेला नहीं रहता, बल्कि साक्षात ईश्वरीय शक्ति उसके साथ कार्य करने लगती है।

योग: प्रदर्शन नहीं, आत्म एवं परमात्म दर्शन​आज का 'योगा' केवल शरीर को मोड़ने की कला बनकर रह गया है, जबकि 'योग' आत्मा एवं प...
04/03/2026

योग: प्रदर्शन नहीं, आत्म एवं परमात्म दर्शन

​आज का 'योगा' केवल शरीर को मोड़ने की कला बनकर रह गया है, जबकि 'योग' आत्मा एवं परमात्मा को जोड़ने का विज्ञान है। बाज़ारीकरण के इस दौर में हमने योग की गहराई को छोड़कर उसकी सतह (सिर्फ आसन) को पकड़ लिया है।

कसरत शरीर को थकाती है, लेकिन योग मन को शांत करता है। यदि शरीर आसन में है और मन कल की चिंता में, तो वह योग नहीं, केवल शारीरिक श्रम है।

महर्षि पतंजलि के अनुसार "स्थिरसुखमासनम्"—अर्थात जहाँ स्थिरता और सुख हो, वही आसन है। जबरदस्ती शरीर को कष्ट देना योग के 'अहिंसा' सिद्धांत के विरुद्ध है। यम, नियम, प्राणायाम और ध्यान के बिना 'आसन' केवल एक व्यायाम है। योग पसीना बहाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को जानने के लिए है।

संसार के इस बाज़ार में योग की कई दुकानें सजी हैं। यह साधक के विवेक पर निर्भर है कि वह केवल 'फिटनेस' खरीदता है या 'परमानंद'। योग का प्रमाण पसीने से भीगी टी-शर्ट नहीं, बल्कि आपका शांत चेहरा और संतुलित व्यवहार है।

जैसा कि सद्गुरु सदाफल देव जी ने 'स्वर्वेद' में संकेत दिया है, असली योग वह है जो ऊर्जा को अधोमुखी (नीचे) से ऊर्ध्वमुखी (ऊपर) की ओर ले जाए।

“योग योग सब कोई कहे, योग न जाना कोय।
अर्ध धार उरध चले, योग कहावे सोय॥”

​"शरीर को लचीला बनाना 'योगा' है, लेकिन जीवन को सहज बनाना 'योग' है।"

योग को पूर्ण रूप से जानने के लिए विहंगम योग से जुड़े:
www.vihangamyoga.org

03/03/2026
हिमालय की शून्य शिखर कंदरा: दिव्य ज्ञान का उद्गम स्थल​हिमालय की गोद में स्थित यह 'शून्य शिखर कंदरा' कोई साधारण गुफा नहीं...
02/03/2026

हिमालय की शून्य शिखर कंदरा: दिव्य ज्ञान का उद्गम स्थल
​हिमालय की गोद में स्थित यह 'शून्य शिखर कंदरा' कोई साधारण गुफा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का वह पुंज है जहाँ सदगुरु श्री सदाफल देव जी महाराज ने 17 वर्षों तक अनवरत और कठोर साधना की। यह गुफा मानव निर्मित नहीं, बल्कि प्रकृति की एक अनमोल देन है, जो आज भी अपनी दिव्यता को संजोए हुए है।

स्वामी जी औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थे, किंतु समाधि की उच्चतम अवस्था में उन्हें जो ईश्वरीय बोध हुआ, वही 'स्वर्वेद' के रूप में प्रकट हुआ। क्योंकि स्वामी जी ने किसी ग्रंथ को पढ़कर यह नहीं लिखा, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार का 'मिश्रित ज्ञान' नहीं है। यह परमात्मा का साक्षात और शुद्धतम ज्ञान है।

स्वर्वेद में कुल 3,137 दोहे हैं, जो आत्मा, परमात्मा और ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करते हैं।

​स्वामी जी स्वयं को 'परमाणु विज्ञान का पूर्ण ज्ञाता' कहते थे। उनका यह विज्ञान भौतिक विज्ञान से कहीं अधिक सूक्ष्म और प्रभावशाली है। स्वामी जी ने बताया कि वे परमाणु विज्ञान के माध्यम से विश्व में कहीं भी बैठे किसी भी व्यक्ति की मानसिक दशा को बदल सकते हैं।

आज भी जब भक्त इस गुफा में प्रवेश करते हैं, तो वहां की तरंगों (Vibrations) के कारण शरीर में स्वतः ही एक विशेष एकाग्रता और दिव्य कंपन उत्पन्न होने लगता है।स्वामी जी इसी सूक्ष्म विज्ञान का प्रयोग कर विश्व भर में शांति और आध्यात्मिक चेतना का प्रचार कर रहे हैं।

​यह गुफा आज भी साधना के लिए एक जाग्रत स्थल है। यहाँ बैठकर ध्यान करने से साधक को उसी शांति और ऊर्जा की अनुभूति होती है, जो स्वामी जी की उपस्थिति में होती थी। यह स्थान सिद्ध करता है कि परम ज्ञान किताबों से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की गहराइयों से प्राप्त होता है।

​"मैं परमाणु विज्ञान का पूर्ण ज्ञाता हूँ... अपने स्थान पर बैठे-बैठे ही परमाणु विज्ञान के प्रयोग से किसी के भी मन की दशा को बदल सकता हूँ।" — सदगुरु सदाफल देव जी

In the stillness of the breath, the soul finds its compass. A divine evening of Vihangam Yog meditation at Delhi, guided...
01/03/2026

In the stillness of the breath, the soul finds its compass. A divine evening of Vihangam Yog meditation at Delhi, guided by the grace of Sant Pravar Shri Vigyan Dev Ji Maharaj.

ध्यान: अंतरात्मा की ओर एक आंतरिक यात्रा​ध्यान कोई बाहरी क्रियाकलाप नहीं, बल्कि हमारी बिखरी हुई चेतन शक्ति को समेटकर अपने...
28/02/2026

ध्यान: अंतरात्मा की ओर एक आंतरिक यात्रा
​ध्यान कोई बाहरी क्रियाकलाप नहीं, बल्कि हमारी बिखरी हुई चेतन शक्ति को समेटकर अपने केंद्र की ओर लौटने की प्रक्रिया है। वर्तमान में हमारी चेतना मन के माध्यम से इंद्रियों में बह रही है और संसार में बिखरी हुई है।

​जिस प्रकार सूर्य की किरणें जब एक लेंस (Magnifying Glass) के माध्यम से एक बिंदु पर केंद्रित होती हैं, तो वे अग्नि प्रज्वलित कर देती हैं, ठीक उसी प्रकार जब हम अपनी बिखरी हुई मानसिक शक्तियों को इंद्रियों से खींचकर मन पर और मन से आत्मा पर केंद्रित करते हैं, तब स्व-दर्शन का मार्ग प्रशस्त होता है।

​जैसे अशांत और तरंगित जल में व्यक्ति अपना प्रतिबिंब नहीं देख सकता, वैसे ही चंचल मन और बिखरी हुई चेतना में आत्म-साक्षात्कार संभव नहीं है।

​आज के युग में ध्यान के नाम पर कई भ्रांतियां प्रचलित हैं। हमें यह समझना अनिवार्य है कि:
• ​ध्यान व्यायाम नहीं है: यह केवल शरीर को मोड़ना या कसरत करना नहीं है।
• ​ध्यान केवल जप नहीं है: यह वाणी का विषय नहीं, बल्कि मौन की गहराई है।
• ​ध्यान कल्पना नहीं है: यह किसी दृश्य को मन में गढ़ना नहीं, बल्कि जो 'है' उसे देखना है।
• ​ध्यान संगीत या नृत्य नहीं है: ये मनोरंजन के साधन हो सकते हैं, लेकिन ध्यान इनसे परे इंद्रिय-अतीत अवस्था है।

​योग का अर्थ 'जोड़' है। यह मेल है आत्मा का परमात्मा से। लेकिन परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग आत्मा से होकर ही गुजरता है। जब तक हम स्वयं को नहीं जानते, हम उस परम सत्ता को कैसे जान सकते हैं?

​आज विश्व में जहाँ लोग बाहरी क्रियाओं में ध्यान खोज रहे हैं, वहीं विहंगम योग इस सत्य को उद्घाटित करता है कि "ध्यान शरीर नहीं, आत्मा करती है।" यह पद्धति हमें सिखाती है कि कैसे मन, बुद्धि और इंद्रियों के घेरे से ऊपर उठकर, शब्द और वाणी से परे होकर उस शून्य और निशब्द अवस्था में प्रवेश किया जाए जहाँ केवल 'स्व' का बोध बचता है।

​अंदर प्रवेश करने के लिए हमें 'चेतन मार्ग' की आवश्यकता है। इसके लिए कुछ चरण महत्वपूर्ण हैं:
• ​प्रत्याहार: इंद्रियों के विषयों से मोह कम करना।
• ​सद्गुरु का सानिध्य: विहंगम योग जैसे मार्ग में गुरु की प्रधानता होती है जो उस 'अंदरूनी द्वार' की कुंजी देते हैं।
• ​अभ्यास और वैराग्य: निरंतर अंतर्मुखी होने का प्रयास और बाहरी आकर्षणों के प्रति उपेक्षा।
• ​लय की अवस्था: जब मन लय हो जाता है, तब कर्ता भाव समाप्त हो जाता है और केवल दृष्टा भाव बचता है। यही वह क्षण है जहाँ आत्मा का साक्षात्कार होता है।

​निष्कर्ष:
ध्यान बाहर से कुछ पाने का नाम नहीं, बल्कि भीतर जो छिपा है उसे उघाड़ने का नाम है। जब मन शांत और लयबद्ध हो जाता है, तब जो शेष बचता है, वही हमारी वास्तविक सत्ता है।

सद्गुरु: एक शाश्वत चैतन्य धारा​सद्गुरु कोई साधारण स्त्री या पुरुष नहीं, बल्कि एक अनंत ऊर्जा और ईश्वरीय शक्ति का नाम है। ...
26/02/2026

सद्गुरु: एक शाश्वत चैतन्य धारा

​सद्गुरु कोई साधारण स्त्री या पुरुष नहीं, बल्कि एक अनंत ऊर्जा और ईश्वरीय शक्ति का नाम है। जिस प्रकार परमात्मा सर्वव्यापी है, उसी प्रकार सद्गुरु की सत्ता भी संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। यद्यपि ईश्वर और सद्गुरु एक ही तत्व हैं, किंतु उनकी कार्य-धाराएं भिन्न हैं: जहाँ ईश्वर का कार्य सृष्टि का संचालन करना है, वहीं सद्गुरु का पावन उत्तरदायित्व भटकी हुई आत्माओं को पुनः परमात्मा से मिलाना है।

​सद्गुरु की अलौकिक सत्ता और प्राकट्य

​सद्गुरु अजन्मा हैं; वे किसी नश्वर गर्भ से जन्म नहीं लेते। वे परमाणु विज्ञान (Science of Atoms) के पूर्ण ज्ञाता हैं। कबीर साहब का अवतरण इसी अलौकिक विज्ञान का प्रमाण था, जिन्होंने पंचतत्वों के मेल से स्वयं के शरीर का सृजन किया और समय पूर्ण होने पर 'मृत्यु' को प्राप्त होने के बजाय, स्वयं को पुनः अणुओं में विलीन (Disappear) कर लिया। यह परमाणुओं का केवल एक संयोजन और वियोजन (Arrangement and Derangement) मात्र था।

​युग-युगांतर का ज्ञान-प्रवाह

​सद्गुरु की सत्ता चारों युगों में विद्यमान रहती है। वे सत्य ज्ञान के प्रचार हेतु दो मार्ग चुनते हैं:
• ​स्वयं का प्राकट्य: जब वे साक्षात रूप धरकर ज्ञान की गंगा प्रवाहित करते हैं।
• ​माध्यम का चयन: जब वे किसी सुपात्र एवं पवित्र आत्मा को चुनकर उसके माध्यम से लोक-कल्याण करते हैं।

​इतिहास साक्षी है कि आज तक जितने भी ऋषियों, महर्षियों और संतों को आत्म-साक्षात्कार या बोधि (Enlightenment) प्राप्त हुआ है, वह सद्गुरु की कृपा के बिना संभव नहीं था।

​विहंगम योग और वर्तमान प्रासंगिकता

​कलियुग में वही 'सद्गुरु सत्ता' कबीर के रूप में प्रकट हुई और वर्तमान में उसी अविनाशी ज्ञान की धारा विहंगम योग के माध्यम से प्रवाहित हो रही है। सद्गुरु कबीर ने स्वयं प्रकट होकर अनंत श्री सद्गुरु सदाफल देव जी महाराज को आत्मज्ञान की दीक्षा दी और उन्हें विश्व पटल पर 'ब्रह्मविद्या' के प्रचार का आदेश दिया।

​आज विहंगम योग के माध्यम से वही आदि-ज्ञान (Original Knowledge) जन-मानस के लिए सुलभ है, जिससे साधक ब्रह्म का साक्षात्कार कर जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर रहे हैं।

25/02/2026

Swarved Mahamandir Dham Varanasi

Address

GautamBudh Nagar
Greater Noida
201306

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