16/03/2021
आधुनिक जीवनशैली और अनियमित खानपान के कारण युवाओं में एसिडिटी की समस्या आम है। आयुर्वेद में इसे समूल नष्ट करने के लिए औषधियाँ सुझाई गई हैं। औषधियां तात्कालिक तौर पर भले ही पेट की जलन से छुटकारा दिला दें लेकिन एसिडिटी कभी न हो इसके लिए जिंदगी से तनाव को हमेशा के लिए दूर रखा जाए साथ ही जीवन शैली भी इस तरह बनाई जाए जो न सिर्फ एसिडिटी बल्कि दूसरे अन्य रोगों की चपेट में भी न आने दे।
आयुर्वेद में एसिडिटी अम्लपित्त के नाम से वर्णित की गई है। यह रोग, रोगी के आहार या भोजन की अनियमितता एवं मानसिक तनाव के रहने के कारण होने वाला रोग है। अम्लपित्त रोग को औषध के साथ-साथ इसके कारणों को दूर करके नष्ट किया जा सकता है।
आयुर्वेद में अम्लपित्त (एसिडिटी) के कारण
पित्त को बढ़ाने या प्रकुपित करने वाले अन्ना (अधिक मिर्च-मसाले वाले पदार्थ, अत्यधिक मद्यपान, नवीन चावल आदि) अधिक समय से निरंतर सेवन करते रहना या अधिक सेवन करने से एसिडिटी होती है।
* भोजन का समय पर न करना।
* अजीर्ण होने पर भी गरिष्ठ भोजन करना।
*भोजन करने के बाद दिन में सोना।
* भोज्य पदार्थों का भोजन के अतिरिक्त दिन में अत्यधिक बार-बार सेवन करते रहना।
* अधिक समय तक मानसिक तनावग्रस्त।
* अधिक समय तक बार-बार भूखे रहना।
एसिडिटी के सामान्य लक्षण
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एसिडिटी होने के साथ ही सबसे पहले पेट में जलन होने लगती है। अपच रहता है और कड़वी तथा खट्टी डकारें आने लगती हैं। पेट में एसिड बढ़ने के कारण तीव्र सिरदर्द की भी शिकायत हो जाती है।
* भोजन का पाचन न होना।
*कड़वी एवं खट्टी डकार आना।
* गले या छाती में जलन होना।
* शरीर व सिर में भारीपन।
* भोजन में रुचि न होना
अम्लपित्त रोग में चिकित्सा
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आयुर्वेद चिकित्सा में पित्त के अम्लता होने के कारण अम्लता के विपरीत जैसे क्षार का प्रयोग करें। इसमें सर्जिका क्षार (सोडा बाइकार्ब), शंख भस्म, मुक्ताभस्म, प्रवालभस्म, चूने का पानी आदि का प्रयोग किया जाता है। क्षार, अम्ल से मिलकर उसे मधुर (न्यूट्रल) करता है।
* मुलेठी का चूर्ण या काढ़ा बनाकर उसका प्रयोग रोग को नष्ट करता है।
* नीम की छाल का चूर्ण या रात में भीगाकर रखी छाल का पानी छानकर पीना रोग को शांत करता है।
* अम्लपित्त रोग में मृदु विरेचन (माइल्ड लेक्सेटिव) देना चाहिए। इस हेतु त्रिफला का प्रयोग या दूध के साथ गुलकंद का प्रयोग या दूध में मुनक्का उबालकर सेवन करना चाहिए।
* मानसिक तनाव कम करने हेतु योग, आसन एवं औषध का प्रयोग करें।
अम्लपित्त रोग में क्या खाएँ
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अम्लपित्त रोगी को मिश्री, आँवला, गुलकंद, मुनक्का आदि मधुर द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए। बथुआ, चौलाई, लौकी, करेला, धनिया, अनार, केला आदि शाक व फलों का प्रयोग करें। दूध का प्रयोग नियमित रूप से करें।
अम्लपित्त रोग में क्या न खाएँ
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नए धान्य, अधिक मिर्च-मसालों वाले खाद्य पदार्थ, मछली, मांसाहार, मदिरापान, गरिष्ट भोजन, गर्म चाय-कॉफी, दही एवं छाछ का प्रयोग, साथ ही तुवर दाल एवं उड़द दाल का प्रयोग कदापि न करें।
अम्लपित्त रोग, रोगी के आहार-विहार से उत्पन्ना होने वाला रोग है। वर्षा ऋतु में यह स्वाभाविक उत्पन्ना होने वाला रोग है अतः अम्लपित्त रोगी इस ऋतु में पच्य-अपच्य का पालन आवश्यक रूप से करें। अम्लपित्त रोग की समय रहते चिकित्सा न करवाने या रोग को अनदेखा करनेपर रोग 'अल्सर' का रूप धारण करता है। आयुर्वेद में अम्लपित्त को दूर करने हेतु अनेक औषधियाँ हैं, अपने चिकित्सक से सलाह लेकर इनका सेवन करें।