आयुर्वेद समाधान

आयुर्वेद समाधान आयुर्वेद हमारे जीवन को बचा सकता है हमे

12/10/2023

आयुर्वेद अपनाएं स्वयं और अपने परिवार को स्वस्थ्य बनाएं ।

19/09/2023

वर्षा ऋतु खत्म होने के बाद महर्षि चरक ने कहा है लंघन करना चाहिए, अर्थात कम भोजन करना चाहिए जिससे हमारी पाचक अग्नि प्रदीप्त हो जाए ताकि हेमंत ऋतु में हम बहुत सारा खाना खा पाएं ,
जो ऐसा नहीं कर रहे हैं वह ज्वर को प्राप्त हो रहे हैं ,
अर्थात उन्हें बुखार आ रहा है ।
इसीलिए हमारे पूर्वज और आयुर्वेद महर्षियों ने शरद ऋतु के शुरुआत में शारदीय नवरात्र का आयोजन किया था ताकि लोग उपवास करें, और अपनी जठराग्नि को प्रदीप्त करें ।

डॉ आलोक शर्मा
आयुर्वेदाचार्य

16/04/2022

यदि आप एक लोटा भर के गर्म पानी पी लेते हो तब क्या होगा ??
अग्नि अर्थात जठराग्नि अपने कार्य से विमुख हो जाएगी, इसलिए आचार्यों ने कहा है अधिक मात्रा में पिया हुआ उष्ण जल मधुर विपाक और शीत वीर्य होता है, जाहिर है, क्योंकि अग्नि विमुख होगी तब उस उष्ण जल का भी सम्यक पाचन ना होकर वह अपने लघुत्व गुण को खो देगा और वह भी भारी हो जाएगा,
जबकि अग्निमंध (अर्थात गुरु अन्न का सेवन करने पर ) हमें कोष्ण जल का पान करना चाहिए जिससे अन्न का क्लेदन हो सके, किंतु यहां पर भी उतना ही जल पीना चाहिए जिससे अग्निमांद्य पुनः ना हो जाए इसीलिए ऐसी स्थिति में थोड़ा-थोड़ा कोष्ण जल थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर पीना चाहिए ।
एक बात और कुएं का पानी पीने के बाद हैंडपंप का पानी नहीं पीना चाहिए, हालांकि ऐसा हम सब आजकल नहीं करते हैं लेकिन मिनरल वाटर पीने के बाद हमें सामान्य जल नहीं पीना चाहिए जब तक पहले पिया हुआ जल पच ना जाए तब तक दूसरा पानी नहीं पीना चाहिए , एक जैसा जल ही यदि आप पीते हैं जैसे RO का पानी, मिनरल वाटर या कुए का पानी, या हैंडपंप का पानी या नॉर्मल सप्लाई का पानी, तब भी आपको पुनः नहीं पीना चाहिए जब तक बीच में कुछ अन्न का सेवन ना करें!!!!! अर्थात यदि अभी आप ने पानी पिया तब जाहिर है आपको 3 से 4 घंटे बाद पानी पीने की आवश्यकता होगी फिर उसके बीच में आपने यदि कुछ नहीं खाया है यह गलत है पहले आप खाएं फिर उसके बाद वही पानी पी सकते हैं, 4 घंटे तक यदि आप कुछ खा नहीं रहे हैं और फिर से पानी ही पी रहे हैं तो यह भी तो स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं है और ना ही हमारी पाचक अग्नि के लिए ।

डॉ आलोक शर्मा
आयुर्वेदाचार्य

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

15/04/2022

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें इतनी तेज होती हैं कि शरीर से पानी को खींच लेती हैं उससे शरीर का तापमान बढ़ जाता है इसका सीधा सा कारण है यदि शरीर का पानी कम होगा तो पित्त और शरीर की उष्मा बढ़ जाएगी जिससे हमें ज्वर की अनुभूति होती है, और ग्रीष्म काल में वायु भी उष्ण होती है , इसीलिए ग्रीष्म काल में शरीर रितु अनुसार स्वयं को बदलने का प्रयास करता है किंतु हम शरीर के साथ चीटिंग करते हैं भोजन द्वारा बिहार द्वारा, हम शीत ऋतु का अनुपालन ग्रीष्म ऋतु में भी करना चाहते हैं इसीलिए हम रोगी बन जाते हैं और यदि आप शीत ऋतु परिचर्या ही अपनाएंगे तब आप निश्चित रूप से रोगी बन जाएंगे , ग्रीष्म ऋतु में बच्चे पैदा कम होते हैं क्यों क्योंकि प्रकृति को गर्भिणी का भी ख्याल रखना है, ये सारी चीजें एकदम मैथमेटिकली हैं आयुर्वेद जो कहता है वह, और प्रकृति जिसने हमारे आचार्यों को इस सिद्धांत को बनाने के लिए प्रेरित किया वह भी, ये आसान नहीं था, बहुत सालों बाद आचार्यों ने रितु को समझा, दिन को समझा, भोजन को समझा, यह रिसर्च आज हम नहीं कर सकते ,यही सोचकर ऋतु चर्या बनाई है, दिनचर्या बनाई है, रात्रि चर्या बनाई है । प्रणाम हमारे पूर्वजों को हमारे ऋषियों को जो यह ज्ञान जिसका आज हम इस्तेमाल कर रहे हैं वह भी केवल संक्षिप्त रूप से,
किंतु वह भी बहुत सटीक हैं,
स्वस्थ रखने वाला है बीमारियों से मुक्त करने वाला है और आज के परिदृश्य में व्यवहारिक भी है जिसका लोहा आज सब मान रहे हैं ।
इसलिए यदि सामान्य कोई मरीज है तो हम कोई ऐसी औषधि ना दें जिससे पित्त बड़े ,
अब हमें ऋतु के अनुसार भोजन का सेवन करना चाहिए जिससे शरीर में दाह ना हो।
हमें पित्त नहीं बढ़ाना है वह तो शीत ऋतु में बढ़ा हुआ था पहले से ही, एक और महत्वपूर्ण बात बताता हूं शीत ऋतु में पित्त बढ़ा हुआ था किंतु वहां पर कफ भी बढ़ रहा था उसका संचय हो रहा था इसलिए हमारे शरीर में दाह महसूस नहीं हो रहा था, और अब ग्रीष्म ऋतु में उसका अग्नि गुण बड़ गया है ।
इसलिए हमें ग्रीष्म ऋतु में उस मरीज में जिसमें दाह है ज्वर है , वहां पर सोम गुण बढ़ाना है अर्थात जलीय गुण बढ़ाना है ग्रीष्म ऋतु में जल की कमी होने पर शरीर में पित्त शरीर के अंदर दाह पैदा करता है और ज्वर की उत्पत्ति करता है, मॉडर्न साइंस के अनुसार भी डिहाइड्रेशन ग्रीष्म ऋतु में ही होता है शीत ऋतु में क्यों नहीं होता ? उनकी चिकित्सा भी यहां पर एक रूप लगती है, इसीलिए हमें अपने बच्चों को धूप से बचाना है सर पर कुछ बांधना है यदि वह धूप में जा रहे हैं और उन्हें निश्चित मात्रा में जल का सेवन कराना है और ऋतु के अनुसार जो फल सब्जियां फलों के शरबत उनका सेवन कराना है,
पास्ता मैगी नूडल्स से काम नहीं चलेगा ।
धन्यवाद🙏🏻🙏🏻🙏🏻

कचनार कली की सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट होती है हालांकि कांचनार की कलियां मार्च माह में लगती हैं और अप्रैल में तो फूल में ब...
28/12/2021

कचनार कली की सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट होती है हालांकि कांचनार की कलियां मार्च माह में लगती हैं और अप्रैल में तो फूल में बदल जाती हैं, ऋतु परिवर्तन की वजह से कहीं कहीं पर आज भी कांचनार की कलियां मिल रही है, कचनार की सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट होती है मेद का नष्ट करने वाली होती है , प्रकृति मनुष्य को स्वस्थ रखने के लिए स्वयं को सदैव तत्पर रखती है , चूंकि शीत ऋतु में मनुष्य घी तैल बसा मज्जा का इतना सेवन कर चुका होता है जिससे शरीर में मेद का संचय और उससे ग्रंथियों की संरचना बनने की संभावना बढ़ जाती है, इसीलिए कचनार की कली और कचनार के फूल शीत ऋतु के पश्चात ही आते हैं ताकि मनुष्य कांचनार कलियों का सेवन करके शीत ऋतु में मेद वर्धक आहार विहार से संचित मेद का पाचन कर सके ।

22/11/2021

शीत ऋतू मैं नवजात शिशुओं की देखभाल ध्यान पूर्वक करना चाहिये ,नवजात बोल नहीं सकते, खांस नहीं सकते, छींक नहीं सकते, और चल नहीं सकते इसलिए उनके फेपड़ों (LUNGS ) मैं अत्यधिक मात्रा मैं कफ जमा होने से उन्हें चेस्ट इन्फेक्शन हो जाता है जिसे निमोनिया कहते हैं और हजारों नवजात शिशुओं की जान केवल इसी वजह से चली जाती है, नवजात को कभी भी जमीन पर नहीं लिटाना चाहिए क्योकि शीतल वायु जमीन को स्पर्श करती हुई बहती है ,जो शिशु के तापमान को कम कर देती है ,नवजात को सदैव माँ के आलिंगन मैं शयन करना चाहिए ,क्योंकि माँ के शरीर का तापमान नवजात का शीतल वायु से वचाव करेगा ,और दीर्गाऊ प्रदान करेगा .

13/11/2021

आंवला_नवमी हैं
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मैं आंवला हूँ,
विटामिन c का भंडार हूँ...तीन ऋतुओं को सहकर पूर्ण फल बनता हूँ....इस कारण हर ऋतु के ऋतुजन्य रोगों से लड़ने की क्षमता मेरे अंदर होती है ...।

मुझे गला दो,
सेक लो,
चाहे मुझे पीस लो,
मेरे औषधि तत्व कम नहीं होते .....।

कार्तिक मास में मेरे नीचे आ जाने मात्र से मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती हैं...।

में- दाह, पांडु, रक्तपित्त, अरूचि, त्रिदोष, दमा, खांसी, श्वांस रोग, कब्ज, क्षय, छाती के रोग, हृदय रोग, मूत्र विकार आदि अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति रखता हुँ..पौरूष को बढ़ाता हुँ -में आंवला हूँ..।।

आयुर्वेद में मेरे बारे लिखा है...

वयस्यामलकी वृष्या जाती फलरसं शिवम्॥३७॥
धात्रीफलं श्रीफलं च तथामृतफलंस्मृतम्।
त्रिष्वामलकमाख्यातं धात्री तिष्यफलामृता॥३८॥
हरीतकीसमं धात्रीफलं किंतु विशेषतः।
रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम्॥३९॥
हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः।
कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित्॥४०॥

अर्थात-वयस्या, आमलकी, वृष्या, जातीफलरसा, शिव, धात्रीफल, श्रीफल, अमृतफल, तिष्यफल, अमृत
जो गुण हरड़ के हैं वही गुण मुझमे हैं... में रक्तपित्त व प्रमेह को हरने वाला एवं अत्यधिक धातुवर्द्धक वा रसायन हूँ ...में आमला- अम्लरस से वायु को, मधुरस व शीत होने से पित्त को, रूक्ष वा कषाय होने से कफ को जीतता हूँ...।

27/08/2021

चतुर्मास या चौमासा,
हमारी भारतीय संस्कृति में वर्षा ऋतु के महीनों को इन नामों से जाना जाता है अब इन 4 महीनों में कौन सी व्याधियों उत्पन्न होती हैं और उनसे हमें कैसे बचाव करना है इस बारे में भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है अब इसके लिए कोई यह कहे कि आपके पास कोई रिसर्च पेपर है तब मैं उस उस बात का क्या जवाब दूं हमें तो केवल हंसी ही आएगी, रिसर्च पेपर उस चीज के लिए होता है जो हमारे जीवन में पहली बार आती है ऋतु के अनुसार रोग सदियों से आते रहे हैं उसी के अनुसार पूर्वज बच्चों को क्या खाना है कैसे रहना है यह भी सिखाते रहे हैं, फिर मॉडर्न साइंस के पैदा हुए कुछ बच्चे अपने मां-बाप से रिसर्च पेपर क्यों नहीं मांगते , विदेशों की परंपरा कुछ भी हो हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन भारतीय परंपरा में, और भारतीय ज्ञान आयुर्वेद में यह सब कुछ लिखा है और वह व्यवहारिक है तभी हमारे पूर्वज हमें बताते आए और हमें सिखाते हैं, आज मॉडर्न साइंस के कुछ चाटुकार इस बात को क्यों नकारते हैं मेरी समझ से परे है, खैर जो मैं अपनी बात कह रहा था वह यह है चतुर्मास, चौमासा अर्थात वर्षा ऋतु के 4 महीने इन ऋतु में शरीर व्याधि ग्रस्त हो जाता है जैसे खांसी जुकाम बुखार पूरे शरीर में दर्द काम करने का मन ना करना अब ऐसा क्यों, आयुर्वेद में इसके लिए भी बताया गया है क्योंकि इस ऋतु में पाचन क्रिया मंद हो जाती है और मनुष्य इतना ज्यादा आधुनिक हो गया है कि अपने भोजन में ऋतुओं का महत्व नहीं करता कुछ भी खाता है वर्षा ऋतु का भोजन शीत ऋतु में खाता है शीत ऋतु का भोजन वर्षा ऋतु में खाता है ग्रीष्म ऋतु का भोजन शरद ऋतु में खाता है इसीलिए रोग उत्पन्न हो जाते हैं, यदि मनुष्य सिर्फ भोजन को ही संयमित कर ले तो वह बीमारियों के उत्कलेष अर्थात तीव्रता से बच सकता है, आयुर्वेद में वर्षा ऋतु में ज्यादा से ज्यादा व्रत करने का विधान बताया गया है इसलिए इस ऋतु में त्यौहार भी आते हैं जिसमें व्रत किया जाता है यानी संयमित भोजन ही करना चाहिए और यदि कोई व्यक्ति रोगी हो जाता है तब उसे दीपन पाचन औषधियों का सेवन करना चाहिए यानी कि कम खाना और उस कम खाने को बचाने वाली चीजों का भी सेवन करना चाहिए जैसे अनार का जूस पीना चाहिए उष्ण जल अर्थात गर्म पानी पीना चाहिए चिकनाई युक्त भोजन से परहेज करना चाहिए शीतल जल का सेवन नहीं करना चाहिए आइसक्रीम नहीं खानी चाहिए देर से पचने वाली चीजें नहीं खानी चाहिए, ऐसा करने मात्र से यह चौमासा अर्थात वर्षा ऋतु आपको प्रत्येक व्याधि से मुक्त कर देगी और आप स्वस्थ रहेंगे

डॉ आलोक शर्मा
आयुर्वेदाचार्य

26/08/2021

जानिए बर्फ के आश्चर्यजनक लाभ

1-कड़वी दवाई खाने से पहले मुंह में बर्फ का टुकड़ा रख लें, दवाई कड़वी ही नहीं लगेगी।
2- इंजेक्शन लगने पर या पैर में मोच आने पर बर्फ मलने से दर्द, सूजन व खुजली कम होती है।
3- जल जाने के तुरंत बाद बर्फ का टुकड़ा जले हुए स्थान पर लगाने से छाले और जलन शांत होती है। और निशान भी गहरा नही पड़ेगा।
4- प्लास्टिक में बर्फ का टुकड़ा लपेटकर सिर पर रखने से सिरदर्द में राहत मिलती है।
5- यदि आपको शरीर में कहीं पर भी चोट लग गई है और खून निकल रहा है तो उस जगह बर्फ मसलने से खून बहना बंद हो जाता है।
6- कांटा चुभने पर बर्फ लगाकर उस हिस्से को सुन्न कर ले, कांटा या फांस आसानी से निकल जाएगा और दर्द भी नहीं होगा।
7- अंदरुनी यानी गुम चोट लगने पर बर्फ लगाने से खून नहीं जमता व दर्द भी कम होता है।
8- नाक से खून आने पर बर्फ को कपड़े में लेकर नाक के ऊपर चारों और रखें, थोड़ी देर में खून निकलना बंद हो जाएगा।
9- धीरे-धीरे बर्फ का टुकड़ा चूसने से उल्टी बंद हो जाती है।
10- पैरों की एड़ियों में बहुत ज्यादा तीखा दर्द हो तो बर्फ की क्यूब मलने से आराम मिलेगा।
11- आंखों के काले घेरे दूर करने के लिए खीरे के रस और गुलाब जल को मिलाकर बर्फ जमा लीजिए, फिर उस टुकड़े से काले घेरों पर मालिश करे, बहुत जल्द आपकी समस्या दूर होगी। और यदि ज्यादा देर मोबाइल या कंप्यूटर चलाने के बाद आपकी आंखें दर्द कर रही हैं तो बर्फ के टुकड़े को अपनी आंखों पर रखिए, जल्द ही राहत मिलेगी।
12- यदि आइब्रो बनवाते समय दर्द होता है तो एक बर्फ का टुकड़ा आइब्रो के चारों और घिस लीजिए, इससे यह हिस्सा थोड़ी देर के लिए सुन्न हो जाएगा और आपको दर्द भी नहीं होगा। यही तरीका शरीर के किसी और हिस्से पर भी लागू कर सकते हैं।
13- बर्फ का टुकड़ा गले के बाहर धीरे-धीरे मलने से गले की खराश ठीक हो जाती है।
14- यदि आपके पास मेकअप का भी समय नहीं है या आपकी त्वचा ढीली पड़ती जा रही है तो एक बर्फ का छोटा-सा टुकड़ा लेकर उसे किसी कपड़े में (हो सके तो मखमल का) लपेट चेहरे पर लगाइए। इससे आपके चेहरे की त्वचा टाइट होगी और यह टुकड़ा आपकी त्वचा में ऐसा निखार ला देगा जो और कहीं नहीं मिलेगा।

14/05/2021

भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद है और आयुर्वेद भारत के लोगों को अपनी मौलिक चिकित्सा पद्धति, जो सदैव महामारी से बचाती आई है इसलिए आयुर्वेद किसी भी महामारी से मुक्त करने के लिए सक्षम है, पता नहीं कब इस बात को सरकार समझेगी।

16/03/2021

आधुनिक जीवनशैली और अनियमित खानपान के कारण युवाओं में एसिडिटी की समस्या आम है। आयुर्वेद में इसे समूल नष्ट करने के लिए औषधियाँ सुझाई गई हैं। औषधियां तात्कालिक तौर पर भले ही पेट की जलन से छुटकारा दिला दें लेकिन एसिडिटी कभी न हो इसके लिए जिंदगी से तनाव को हमेशा के लिए दूर रखा जाए साथ ही जीवन शैली भी इस तरह बनाई जाए जो न सिर्फ एसिडिटी बल्कि दूसरे अन्य रोगों की चपेट में भी न आने दे।

आयुर्वेद में एसिडिटी अम्लपित्त के नाम से वर्णित की गई है। यह रोग, रोगी के आहार या भोजन की अनियमितता एवं मानसिक तनाव के रहने के कारण होने वाला रोग है। अम्लपित्त रोग को औषध के साथ-साथ इसके कारणों को दूर करके नष्ट किया जा सकता है।

आयुर्वेद में अम्लपित्त (एसिडिटी) के कारण
पित्त को बढ़ाने या प्रकुपित करने वाले अन्ना (अधिक मिर्च-मसाले वाले पदार्थ, अत्यधिक मद्यपान, नवीन चावल आदि) अधिक समय से निरंतर सेवन करते रहना या अधिक सेवन करने से एसिडिटी होती है।

* भोजन का समय पर न करना।
* अजीर्ण होने पर भी गरिष्ठ भोजन करना।
*भोजन करने के बाद दिन में सोना।
* भोज्य पदार्थों का भोजन के अतिरिक्त दिन में अत्यधिक बार-बार सेवन करते रहना।
* अधिक समय तक मानसिक तनावग्रस्त।
* अधिक समय तक बार-बार भूखे रहना।

एसिडिटी के सामान्य लक्षण
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एसिडिटी होने के साथ ही सबसे पहले पेट में जलन होने लगती है। अपच रहता है और कड़वी तथा खट्टी डकारें आने लगती हैं। पेट में एसिड बढ़ने के कारण तीव्र सिरदर्द की भी शिकायत हो जाती है।

* भोजन का पाचन न होना।
*कड़वी एवं खट्टी डकार आना।
* गले या छाती में जलन होना।
* शरीर व सिर में भारीपन।
* भोजन में रुचि न होना

अम्लपित्त रोग में चिकित्सा
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आयुर्वेद चिकित्सा में पित्त के अम्लता होने के कारण अम्लता के विपरीत जैसे क्षार का प्रयोग करें। इसमें सर्जिका क्षार (सोडा बाइकार्ब), शंख भस्म, मुक्ताभस्म, प्रवालभस्म, चूने का पानी आदि का प्रयोग किया जाता है। क्षार, अम्ल से मिलकर उसे मधुर (न्यूट्रल) करता है।

* मुलेठी का चूर्ण या काढ़ा बनाकर उसका प्रयोग रोग को नष्ट करता है।
* नीम की छाल का चूर्ण या रात में भीगाकर रखी छाल का पानी छानकर पीना रोग को शांत करता है।
* अम्लपित्त रोग में मृदु विरेचन (माइल्ड लेक्सेटिव) देना चाहिए। इस हेतु त्रिफला का प्रयोग या दूध के साथ गुलकंद का प्रयोग या दूध में मुनक्का उबालकर सेवन करना चाहिए।
* मानसिक तनाव कम करने हेतु योग, आसन एवं औषध का प्रयोग करें।

अम्लपित्त रोग में क्या खाएँ
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अम्लपित्त रोगी को मिश्री, आँवला, गुलकंद, मुनक्का आदि मधुर द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए। बथुआ, चौलाई, लौकी, करेला, धनिया, अनार, केला आदि शाक व फलों का प्रयोग करें। दूध का प्रयोग नियमित रूप से करें।

अम्लपित्त रोग में क्या न खाएँ
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नए धान्य, अधिक मिर्च-मसालों वाले खाद्य पदार्थ, मछली, मांसाहार, मदिरापान, गरिष्ट भोजन, गर्म चाय-कॉफी, दही एवं छाछ का प्रयोग, साथ ही तुवर दाल एवं उड़द दाल का प्रयोग कदापि न करें।

अम्लपित्त रोग, रोगी के आहार-विहार से उत्पन्ना होने वाला रोग है। वर्षा ऋतु में यह स्वाभाविक उत्पन्ना होने वाला रोग है अतः अम्लपित्त रोगी इस ऋतु में पच्य-अपच्य का पालन आवश्यक रूप से करें। अम्लपित्त रोग की समय रहते चिकित्सा न करवाने या रोग को अनदेखा करनेपर रोग 'अल्सर' का रूप धारण करता है। आयुर्वेद में अम्लपित्त को दूर करने हेतु अनेक औषधियाँ हैं, अपने चिकित्सक से सलाह लेकर इनका सेवन करें।

25/08/2020

कोविड-19 को लेकर आम जनमानस में एक भय का माहौल व्याप्त है छोटी सी भी परेशानी या लक्षणों को वह गंभीरता से ले रहा है किंतु वह सरकारी अस्पताल में अपनी जांच कराने या परामर्श लेने से भी बच रहा है,
इस प्रकार के भय को दूर करने के लिए, मैं और मेरी टीम एक छोटा सा प्रयास कर रही हैं ,
नीचे लिखे नंबर पर आप व्हाट्सएप के द्वारा अपने लक्षण या पुरानी कोई जांच रिपोर्ट है उसे भेज कर अपनी शंका का समाधान कर सकते हैं साथ ही साथ आप किसी भी सामान्य व्याधि (बीमारी) के संदर्भ में भी निःशुल्क परामर्श प्राप्त कर सकते हैं ,
भारत के विभन्न जिलों में आयुर्वेद सेवारत कुशल अनुभवी और वरिष्ठ चिकित्सकों द्वारा जो आयुर्वेद चिकित्सा की विभिन्न विधाओं में सर्वोच्च करने का प्रयास कर रहे हैं उनके द्वारा आपकी चाही गई किसी भी आयुर्वेदिक चिकित्सकीय सहायता को गंभीरता पूर्वक प्राथमिकता से स्वयं फोन करके मदद की जाएगी ।

साथ ही साथ आप पारिवारिक सामाजिक समस्याओं के लिए भी परामर्श अथवा काउंसलिंग के लिए भी निवेदन कर सकते हैं क्योंकि आयुर्वेद एक जीवन शैली है जो हर उस कारण को जो व्यक्ति को रोगी या अवसादग्रस्त बनाता है आयुर्वेद और आयुर्वेद के अनुभवी चिकित्सक उसे दूर करने में सदैव आपके साथ हैं

हमारा उद्देश्य आपके स्वास्थ्य की रक्षा और आपके चेहरे पर खुशी लाना ही है और कुछ नहीं,
बस एक कॉल करते ही हो सकता है आप जो सोच रहे हैं, वह तनाव जो अनावश्यक है ,

दूर हो जाए

आयुर्वेद समाधान
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