Astro Shiv Shankar Chaturvedi

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ॐ नमो भगते वासुदेवाय

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🍁सनातन: केवल इतिहास नहीं, एक जीवित चेतना — जागृति और संकल्प का समय"आज का समय केवल भागदौड़ का समय नहीं है, यह भ्रम का समय...
31/03/2026

🍁सनातन: केवल इतिहास नहीं, एक जीवित चेतना — जागृति और संकल्प का समय"

आज का समय केवल भागदौड़ का समय नहीं है, यह भ्रम का समय है।
मनुष्य ने बहुत कुछ पा लिया — धन, साधन, सुविधा, प्रतिष्ठा — लेकिन एक चीज़ खो दी: अपनी जड़ें।
और जब मनुष्य अपनी जड़ों से कट जाता है, तब उसके भीतर ऐसे प्रश्न उठते हैं —
“ईश्वर कहाँ है?”
“धर्म कहाँ है?”
“क्या सनातन आज भी जीवित है?”

सच तो यह है कि प्रश्न ईश्वर के होने का नहीं है,
प्रश्न यह है कि क्या हमारे भीतर उन्हें देखने की दृष्टि बची है?
प्रश्न धर्म के अस्तित्व का नहीं है,
प्रश्न यह है कि क्या हम धर्म को समझने, जीने और बचाने के लिए तैयार हैं?

🍁 ईश्वर कहीं दूर नहीं हैं, दूर हुई है हमारी चेतना 🍁

🌸 ईश्वर मंदिरों में भी हैं, वेदों में भी हैं, संतों की वाणी में भी हैं, भक्त के अश्रुओं में भी हैं, और उस हृदय में भी हैं जिसमें छल नहीं, समर्पण है।
🌸 परंतु जिस मन पर स्वार्थ, अहंकार, भय और मोह का पर्दा पड़ जाता है, उसे फिर ईश्वर दिखाई नहीं देते।
🌸 जैसे बंद आँखों वाला व्यक्ति सूर्य को दोष नहीं दे सकता, वैसे ही धर्म से दूर व्यक्ति ईश्वर के न होने का दावा नहीं कर सकता।

🙌 “भक्त्या मामभिजानाति।” — भगवान को तत्त्व से केवल भक्ति द्वारा जाना जा सकता है। 🙌

🌸 ईश्वर प्रमाण से नहीं, प्रेम से मिलते हैं।
🌸 तर्क से नहीं, श्रद्धा से प्रकट होते हैं।
🌸 जब हृदय निर्मल होता है, तब ईश्वर अनुभव होते हैं; और जब अंतःकरण स्वार्थ से भर जाता है, तब सत्य सामने होकर भी दिखाई नहीं देता।

🍁 इतिहास गवाह है — धर्म को मिटाने वाले स्वयं मिट गए 🍁

🌸 जब-जब अधर्म बढ़ा, तब-तब दुष्टों ने यही सोचा कि अब धर्म समाप्त हो जाएगा।
🌸 हिरण्यकशिपु ने सोचा कि वह प्रह्लाद की भक्ति तोड़ देगा।
🌸 कंस ने सोचा कि वह श्रीकृष्ण के प्राकट्य को रोक देगा।
🌸 रावण ने सोचा कि शक्ति और अभिमान ही अंतिम सत्य हैं।
🌸 परंतु हर बार हुआ यही — अहंकार हार गया, भक्ति जीत गई, अधर्म मिट गया और धर्म अडिग खड़ा रहा।

🙌 “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥” 🙌

🌸 यह केवल श्लोक नहीं, सनातन की उद्घोषणा है।
🌸 धर्म को कोई मनुष्य अकेला नहीं बचाता; धर्म की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
🌸 लेकिन भगवान उन्हीं के माध्यम से कार्य करते हैं, जो धर्म के लिए खड़े होने का साहस रखते हैं।

🍁 भूलें हमें जगाती हैं — अब उन्हें सुधारने का समय है 🍁

🌸 सदियों तक हमने कई भूलें कीं।
🌸 हमने सोचा धर्म अपने आप बचा रहेगा।
🌸 हमने सोचा कोई और खड़ा होगा।
🌸 हमने समझ लिया कि पूजा कर लेना ही पर्याप्त है।
🌸 हमने मौन को ही शांति मान लिया।
🌸 और यही भूलें हमें भीतर से कमजोर करती रहीं।

🌸 जब-जब समाज ने धर्म को केवल कर्मकांड समझा, उसकी आत्मा दुर्बल हुई।
🌸 जब-जब हमने स्वार्थ को धर्म से ऊपर रखा, हमारी एकता टूटी।
🌸 जब-जब हमने अपने बच्चों को धन कमाना सिखाया पर धर्म समझाना छोड़ दिया, तब-तब नई पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से दूर होती गईं।
🌸 जब-जब हमने अपमान सहकर “हमारा क्या जाता है” कहकर मौन धारण किया, तब-तब अधर्म का साहस बढ़ता गया।

🙌 जो भूलें कल हुईं, उन्हें आज निर्णय लेकर ही सुधारा जा सकता है। 🙌

🌸 और वह निर्णय क्या है?
🌸 धर्म को जानना।
🌸 धर्म को जीना।
🌸 धर्म को अपने स्वार्थ से ऊपर रखना।
🌸 और धर्म की रक्षा के लिए सजग, संगठित और तत्पर रहना।

🍁 धर्म की रक्षा करनी है, तो पहले धर्म को समझना होगा 🍁

🌸 आज बहुत लोग धर्म की बात तो करते हैं, पर धर्म को जानते नहीं।
🌸 याद रखिए — जिसे हम समझते नहीं, उसकी रक्षा भी सच्चे अर्थ में नहीं कर सकते।
🌸 धर्म केवल चिह्न नहीं है।
🌸 धर्म केवल वेश नहीं है।
🌸 धर्म केवल वाद-विवाद नहीं है।
🌸 धर्म केवल त्योहार नहीं है।
🌸 धर्म है — सत्य।
🌸 धर्म है — मर्यादा।
🌸 धर्म है — करुणा।
🌸 धर्म है — संयम।
🌸 धर्म है — कर्तव्य।
🌸 धर्म है — अपने से पहले सत्य को रखना।
🌸 धर्म है — निजी लाभ से पहले लोकमंगल को चुनना।
🌸 धर्म है — ईश्वर के बनाए नियमों के अनुसार जीवन जीना।

🙌 “धारणाद्धर्म इत्याहुः।” — जो धारण करे, संभाले, टिकाए रखे — वही धर्म है। 🙌

🌸 यदि धर्म हमें जोड़ता नहीं, तो हमने धर्म को ठीक से समझा नहीं।
🌸 यदि धर्म हमें विनम्र नहीं बनाता, तो हमने धर्म को भीतर उतारा नहीं।
🌸 यदि धर्म हमें कर्तव्य के लिए खड़ा नहीं करता, तो हमने धर्म को केवल शब्द बना दिया है।

🍁 गीता और पुराणिक ग्रंथ हमें धर्म का वास्तविक स्वरूप बताते हैं 🍁

🌸 हमारे शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि धर्म केवल बाहरी आचार का नाम नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन, सत्य, आत्मसंयम, कर्तव्य और भगवद्भक्ति का नाम है।
🌸 यदि धर्म मनुष्य को ईश्वर से न जोड़े, यदि वह करुणा, संयम और लोकमंगल न सिखाए, तो वह केवल रूप रह जाता है, सार नहीं।

🙌 “श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।” —

🌸 गीता का यह संदेश केवल युद्धभूमि के लिए नहीं, जीवन के लिए है।
🌸 मनुष्य को अपने कर्तव्य, अपनी मर्यादा और अपने सत्य पर स्थिर रहना चाहिए, चाहे मार्ग कठिन ही क्यों न हो।

🙌 “स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।” — अपने धर्म और कर्तव्य को देखकर तुझे विचलित नहीं होना चाहिए। 🙌

🌸 श्रीमद्भागवत महापुराण धर्म का उच्चतम स्वरूप बताता है — वह धर्म जो भगवान के प्रति निष्काम भक्ति जगाए।
🌸 केवल कर्मकांड, केवल वाद-विवाद, केवल बाहरी प्रदर्शन धर्म की पूर्णता नहीं है; धर्म वहाँ पूर्ण होता है जहाँ भक्ति, विनम्रता और आत्मिक जागरण हो।

🙌 “स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।” — मनुष्यों का परम धर्म वही है, जिससे भगवान के प्रति भक्ति उत्पन्न हो। 🙌

🌸 महाभारत यह सिखाता है कि धर्म केवल पुस्तक में लिखी शिक्षा नहीं, संकट की घड़ी में लिया गया सही निर्णय भी है।
🌸 विष्णु पुराण और अन्य ग्रंथों का संकेत भी यही है कि धर्म वही है जो जीवन को धारण करे, समाज को संतुलित रखे और मनुष्य को अधःपतन से बचाकर दिव्यता की ओर ले जाए।

🙌 धर्म वह नहीं जो केवल दिखे; धर्म वह है जो भीतर से जीवन को ईश्वर की ओर मोड़ दे। 🙌

🍁 अपने स्वार्थ से पहले धर्म को रखना होगा 🍁

🌸 यहीं सबसे बड़ी परीक्षा है।
🌸 जब तक धर्म हमारे भाषण में रहेगा, जीवन में नहीं — तब तक समाज नहीं बदलेगा।
🌸 जब तक हम अपने स्वार्थ, सुविधा, डर, पद, लाभ और मोह को धर्म से ऊपर रखते रहेंगे, तब तक धर्म कमजोर दिखेगा।
🌸 सच यह है कि धर्म बाहर से नहीं हारता; धर्म तब हारता हुआ दिखाई देता है जब धर्मावलंबी भीतर से कमजोर पड़ जाते हैं।

🌸 हमें स्वयं से पूछना होगा —
🌸 क्या मैं सुविधा के लिए सत्य छोड़ देता हूँ?
🌸 क्या मैं लाभ के लिए मौन हो जाता हूँ?
🌸 क्या मैं धर्म का सम्मान केवल शब्दों में करता हूँ, जीवन में नहीं?
🌸 क्या मैं अपनी अगली पीढ़ी को आधुनिकता तो दे रहा हूँ, पर संस्कार नहीं?
🌸 क्या मैं अपने स्वार्थ के लिए समाज और धर्म को पीछे छोड़ रहा हूँ?

🙌 “धर्मो रक्षति रक्षितः।” — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। 🙌

🌸 पर यह रक्षा केवल नारे से नहीं होगी।
🌸 यह रक्षा तब होगी जब हम धर्म को अपने स्वार्थ से ऊपर स्थान देंगे।

🍁 महाभारत और श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं — जब धर्म पर संकट हो, तब मौन भी अपराध बन जाता है 🍁

🌸 महाभारत केवल एक राजवंश का युद्ध नहीं था; वह धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय, मर्यादा और अहंकार के बीच का निर्णायक संघर्ष था।
🌸 दुर्योधन के पास शक्ति थी, राज्य था, सेना थी, अभिमान था; पर उसके पास धर्म नहीं था।
🌸 पाण्डवों के पास कष्ट थे, वनवास था, अपमान था, संघर्ष था; पर उनके साथ धर्म था।

🙌 “यतो धर्मस्ततो जयः।” — जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। 🙌

🌸 जब अर्जुन अपने ही संबंधियों, गुरुजनों और प्रियजनों को सामने देखकर मोह से भर गए, तब उन्होंने शस्त्र छोड़ने की बात कही।
🌸 उस समय श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध की प्रेरणा नहीं दी, बल्कि धर्म का बोध कराया।
🌸 उन्होंने समझाया कि जब अन्याय सामने खड़ा हो, तब केवल कोमलता दिखाना करुणा नहीं, कर्तव्य से पलायन भी हो सकता है।

🙌 “क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ।” — हे पार्थ, कायरता को मत अपनाओ। 🙌

🌸 श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह नहीं कहा कि क्रोध में युद्ध करो; उन्होंने कहा कि आसक्ति, मोह और भ्रम से ऊपर उठकर धर्म के लिए खड़े हो।
🌸 गीता का उपदेश यह है कि यदि सत्य, मर्यादा, स्त्री-सम्मान, समाज-न्याय और धर्म पर आघात हो, तो तटस्थ रहना भी अधर्म को बल देता है।
🌸 इसलिए महाभारत हमें सिखाता है कि धर्म केवल पूजा का विषय नहीं, निर्णय का विषय भी है; केवल नम्रता का नहीं, उचित समय पर दृढ़ता का भी है।

🙌 जब धर्म पर आघात हो, तब निष्क्रियता भी पाप बन जाती है। 🙌

🍁 किसी का अहित नहीं — लेकिन अपनी और धर्म की रक्षा के लिए तैयार रहना होगा 🍁

🌸 सनातन कभी अन्याय, क्रूरता या निर्दोष के अहित की शिक्षा नहीं देता।
🌸 हमारा मार्ग द्वेष का नहीं, करुणा का है।
🌸 हमारा मार्ग विनाश का नहीं, संतुलन का है।
🌸 लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं होता।
🌸 क्षमा का अर्थ दुर्बलता नहीं होता।
🌸 और शांति का अर्थ यह नहीं कि हम अधर्म को खुली छूट दे दें।

🌸 यदि कोई हमारे घर, हमारी संस्कृति, हमारे देवालय, हमारी मातृभूमि, हमारे मानबिंदुओं, हमारे संतों और हमारे धर्म पर प्रहार करे,
🌸 तो चुप रहना उदारता नहीं, दायित्व से पलायन है।
🌸 हमें किसी का अहित नहीं करना,
🌸 लेकिन अपनी रक्षा और धर्म की रक्षा के लिए मन से, वचन से, संगठन से और आवश्यकता पड़े तो साहस से भी तैयार रहना होगा।

🌸 भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्ध इसलिए नहीं कराया कि वे हिंसा चाहते थे,
🌸 बल्कि इसलिए कि धर्म की रक्षा के समय पलायन भी अधर्म का साथ बन सकता है।

🍁 हमारे संतों, ऋषि-मुनियों और वीर सनातनियों का बलिदान कभी नहीं भूलना चाहिए 🍁

🌸 यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि सनातन धर्म केवल ग्रंथों से नहीं बचा; वह तप से बचा, त्याग से बचा, बलिदान से बचा, और असंख्य संतों, ऋषियों, आचार्यों और वीरों की निष्ठा से बचा।
🌸 हमारे ऋषि-मुनियों ने वन-वन तप किया, वेदों की रक्षा की, ज्ञान की परंपरा को जीवित रखा और समाज को धर्म का मार्ग दिखाया।
🌸 ऋषि दधीचि का त्याग हमें बताता है कि धर्म और लोककल्याण के लिए देह भी छोटी है।

🙌 ऋषियों ने तप से धर्म बचाया, संतों ने वाणी से धर्म बचाया, और वीरों ने अपने रक्त से धर्म बचाया। 🙌

🌸 जब मंदिरों पर आक्रमण हुए, जब गुरुकुलों को जलाया गया, जब संस्कृति और आस्था पर प्रहार हुए, तब असंख्य संतों, नागा साधुओं, राजाओं, वीरों और सामान्य सनातनियों ने अपने प्राण देकर भी धर्म-ज्योति बुझने नहीं दी।
🌸 वीर महाराणा प्रताप ने सुख नहीं, स्वाभिमान चुना।
🌸 छत्रपति शिवाजी महाराज ने केवल राज्य नहीं बनाया, धर्म, संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा का आदर्श खड़ा किया।
🌸 गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान इस भूमि की धर्म-स्वातंत्र्य चेतना का अमर प्रतीक है।
🌸 असंख्य ज्ञात-अज्ञात संतों, माताओं, वीरों और साधकों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया ताकि आने वाली पीढ़ियाँ राम, कृष्ण, गीता, वेद, मंदिर और सनातन पहचान को जीवित देख सकें।

🙌 जो धर्म आज हमें सहज मिला है, वह किसी के तप, किसी के त्याग, किसी के आँसू और किसी के रक्त से सींचा गया है। 🙌

🌸 इसलिए धर्म पर गर्व करना पर्याप्त नहीं है; उसके लिए कृतज्ञ होना भी आवश्यक है।
🌸 जिन संतों ने तप किया, जिन ऋषियों ने ज्ञान दिया, जिन वीरों ने शीश कटाए — उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम धर्म को जानें, जिएँ, बचाएँ और अगली पीढ़ी तक अक्षुण्ण पहुँचाएँ।

🙌 सनातन आज जीवित है, क्योंकि किसी ने इसके लिए केवल प्रवचन नहीं दिया — अपने जीवन का सर्वस्व अर्पित किया। 🙌

🍁 धर्म की रक्षा केवल शस्त्र से नहीं, सबसे पहले चरित्र से होती है 🍁

🌸 धर्म की रक्षा सबसे पहले हमारे आचरण से होती है।
🌸 यदि घर में झूठ है, स्वार्थ है, अपमान है, संस्कारों की उपेक्षा है, तो बाहर धर्म की रक्षा का दावा अधूरा है।
🌸 धर्म की रक्षा तब होती है जब माता-पिता बच्चों को संस्कार देते हैं।
🌸 जब घर में ईश्वर का स्मरण होता है।
🌸 जब संतों का सम्मान होता है।
🌸 जब हम अपनी परंपरा पर शर्म नहीं, गर्व करते हैं।
🌸 और जब हम सत्य के पक्ष में अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।

🌸 मंदिरों की रक्षा आवश्यक है, पर उससे पहले मन के मंदिर को जागृत करना आवश्यक है।
🌸 शास्त्रों का सम्मान आवश्यक है, पर उससे पहले शास्त्र के अनुसार चलना आवश्यक है।

🍁 अब निर्णय लेना होगा — तटस्थ रहने का समय बीत चुका है 🍁

🌸 अब समय यह कहकर निकल जाने का नहीं कि “मुझे क्या?”
🌸 अब समय केवल भावुक होने का नहीं, जागरूक होने का है।
🌸 अब समय केवल श्रद्धा रखने का नहीं, श्रद्धा को चरित्र में उतारने का है।
🌸 हमें निर्णय लेना होगा कि हम अपनी अगली पीढ़ी को जड़ों से जोड़ेंगे।
🌸 हम धर्म को जानेंगे, पढ़ेंगे, समझेंगे।
🌸 हम समाज में एकता और जागरण का कार्य करेंगे।
🌸 हम अपने निजी स्वार्थ से ऊपर धर्म को रखेंगे।
🌸 और हम किसी से द्वेष नहीं करेंगे — लेकिन अधर्म के सामने झुकेंगे भी नहीं।

🙌 यही सच्चा सनातनी भाव है। यही धर्म की रक्षा है। यही आत्मजागरण है। 🙌

🍁 एक जीवित प्रमाण आज भी हमारे सामने खड़ा है 🍁

🌸 सोचिए — कितने साम्राज्य आए और चले गए।
🌸 कितनी तलवारें उठीं और जंग खा गईं।
🌸 कितने अत्याचारी इतिहास में दफन हो गए।
🌸 लेकिन आज भी वृंदावन की गलियों में “राधे-राधे” गूँजता है। और श्री राम जन्म भूमि में राम लला एक भव्य मंदिर में विराजमान होते हैं ,
🌸 आज भी प्रत्येक मंदिर में दीपक जलता है।
🌸 आज भी किसी माँ के होंठों पर “राम-राम” है।
🌸 आज भी किसी संत की वाणी सुनकर कठोर हृदय पिघल जाता है।
🌸 आज भी गीता संकट में पड़े मनुष्य को मार्ग देती है।
🌸 आज भी हरिनाम टूटे हुए जीवन को संभाल लेता है।

🙌 यही प्रमाण है — सनातन केवल इतिहास नहीं, आज भी जीवित चेतना है। 🙌

🌸 जिसे मिटाने के लिए आंधियाँ चलीं, वह आज भी खड़ा है।
🌸 और जो उसे मिटाने निकले थे, उनका नाम तक स्मृति से धुँधला गया।

🍁 आँखें खोल देने वाली बात — यदि आज भी नहीं जागे, तो कल उत्तर देना कठिन होगा 🍁

🌸 यदि हम आज भी धर्म को केवल उत्सव समझते रहे,
🌸 यदि हम आज भी स्वार्थ के कारण मौन रहे,
🌸 यदि हम आज भी अपनी संतानों को धर्म से दूर रखते रहे,
🌸 तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे अवश्य पूछेंगी —
🌸 “जब धर्म पर प्रहार हो रहे थे, तब आप क्या कर रहे थे?”
🌸 “जब संस्कृति कमजोर हो रही थी, तब आपने क्या बचाया — केवल अपना स्वार्थ?”

🌸 उस दिन उत्तर देना कठिन होगा।
🌸 इसलिए आज ही जागिए, आज ही समझिए, आज ही निर्णय लीजिए — क्योंकि कल बहुत देर भी हो सकती है।

उपसंहार

🍁 धर्म को जानो, धर्म को जियो, धर्म के लिए खड़े हो जाओ 🍁

🌸 धर्म केवल पूजा करने की वस्तु नहीं, जीने की प्रतिज्ञा है।
🌸 धर्म केवल माथे का तिलक नहीं, चरित्र की ज्योति है।
🌸 धर्म केवल नाम लेने की चीज़ नहीं, आत्मा की जिम्मेदारी है।

🙌 ईश्वर को खोजना है तो हृदय को निर्मल करो। 🙌
🙌 धर्म को बचाना है तो पहले धर्म को समझो। 🙌
🙌 समाज को जगाना है तो पहले स्वयं जागो। 🙌
🙌 रक्षा चाहिए तो पहले धर्म की रक्षा का संकल्प लो। 🙌

🙌 धर्मो रक्षति रक्षितः। जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। 🙌

🌸 आइए संकल्प लें —
🌸 हम किसी का अहित नहीं करेंगे।
🌸 लेकिन अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने आत्मसम्मान और अपनी आने वाली पीढ़ियों की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहेंगे।
🌸 हम अपने स्वार्थ से पहले धर्म को रखेंगे।
🌸 हम इतिहास की भूलों को दोहराएँगे नहीं।
🌸 हम जागेंगे, जगाएँगे और सनातन के प्रकाश को आगे बढ़ाएँगे।

🙌 क्योंकि धर्म बचेगा तो ही संस्कृति बचेगी, संस्कृति बचेगी तो ही समाज बचेगा, और समाज बचेगा तो ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचेगा। 🙌

जय श्री राधे! 🙏🌺
सत्य सनातन जय सनातन धर्म! 🚩

31/03/2026
31/03/2026
26/03/2026

*भगवान शंकर ने ही (हलाहल) विष, को क्यों ? पीया कोई और देव भी पी सकते थे l**समुद्र मंथन के दौरान जब 'हलाहल' विष निकला, तो...
25/03/2026

*भगवान शंकर ने ही (हलाहल) विष, को क्यों ? पीया कोई और देव भी पी सकते थे l*

*समुद्र मंथन के दौरान जब 'हलाहल' विष निकला, तो उसकी तीव्रता इतनी अधिक थी कि वह पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकता था। भगवान शिव द्वारा इसे पीने के मुख्य पौराणिक और आध्यात्मिक कारण निम्नलिखित हैं:*

*सृष्टि की रक्षा की क्षमता: शिव पुराण के अनुसार, केवल भगवान शिव में ही उस कालकूट या हलाहल विष की प्रचंड अग्नि और शक्ति को सहन करने का सामर्थ्य था। अन्य देवता और असुर इसकी गंध और ताप से ही मूर्छित होने लगे थे।*

*विष्णु और ब्रह्मा की अन्य भूमिकाएँ: समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने 'कूर्म अवतार' धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला हुआ था, जबकि ब्रह्मा जी संतुलन बनाए रखने में व्यस्त थे। ऐसे में केवल शिव ही उस समय उस संकट को दूर करने के लिए उपलब्ध और सक्षम थे।*

*परम संहारक और करुणा: शिव को 'संहारक' माना जाता है, जो नकारात्मकता को नष्ट या समाहित करने की शक्ति रखते हैं उन्होंने किसी व्यक्तिगत लाभ या प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रति अपनी 'अनंत करुणा' और कर्तव्य के कारण इसे पीना स्वीकार किया।*

*अजन्मा और अनादि तत्व: आध्यात्मिक रूप से शिव को 'अजन्मा' और 'अनादि' माना जाता है, जिन पर जीवन और मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे अग्नि स्वरूप (रुद्र) हैं, जो किसी भी तत्व को भस्म या समाहित कर सकते हैं।*

*नियति और वेदों की वाणी: यजुर्वेद में शिव को 'नीलकंठ' (नीले गले वाला) बताया गया है। इस पौराणिक घटना ने उस वैदिक कथन को सत्य सिद्ध किया, क्योंकि यह पहले से ही नियति में निर्धारित था।*

*भगवान शिव ने विष को पूरी तरह निगला नहीं था, बल्कि माता पार्वती के सहयोग से उसे अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया था, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।*

*भगवान शिव का जलाभिषेक केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व है:*

*विष की ज्वाला को शांत करना: समुद्र मंथन के दौरान जब शिवजी ने हलाहल विष पिया, तो उनके शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया और कंठ में तीव्र जलन होने लगी। इस ताप को कम करने और उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए सभी देवताओं ने उन पर गंगाजल अर्पित किया था।*

*निरंतर शीतलता (गलंतिका): मंदिरों में शिवलिंग के ऊपर पानी का एक कलश लटका होता है जिससे बूंद-बूंद जल गिरता रहता है, जिसे 'गलंतिका' कहते हैं। इसका उद्देश्य शिवजी के शरीर के तापमान को सामान्य बनाए रखना है।*

*संकट हरने का प्रतीक: मान्यता है कि जलाभिषेक से प्रसन्न होकर महादेव भक्त के जीवन के 'विष' (कष्ट और पाप) को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं और उसे सुख-शांति का आशीर्वाद देते हैं।*

*सावन का विशेष महत्व: चूंकि विषपान की घटना श्रावण मास में हुई थी, इसलिए इस महीने में जलाभिषेक का फल अश्वमेध यज्ञ के समान माना जाता है।*

*आध्यात्मिक शुद्धि: यह अनुष्ठान भक्त के मन और आत्मा की शुद्धि तथा अहंकार के त्याग का प्रतीक है।*

*शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।*

*भगवान शिव को माता अन्नपूर्णा से भिक्षा क्यों माँगनी पड़ी?**क्या आपने कभी सोचा है कि जो भगवान शिव पूरे संसार के स्वामी ह...
24/03/2026

*भगवान शिव को माता अन्नपूर्णा से भिक्षा क्यों माँगनी पड़ी?*

*क्या आपने कभी सोचा है कि जो भगवान शिव पूरे संसार के स्वामी हैं, उन्हें अन्न की भिक्षा माँगनी क्यों पड़ी? 🍚🕉️*

*यह कथा केवल भूख की नहीं, बल्कि अहंकार, ज्ञान और अन्न के महत्व को समझाने वाली एक गूढ़ कथा है।*

*🌸 कथा एक बार भगवान शिव ने वैराग्य की अवस्था में कहा कि “यह सारा संसार मिथ्या है और अन्न का भी कोई विशेष महत्व नहीं है।” यह बात माता पार्वती को उचित नहीं लगी। माता ने सोचा कि “जिस अन्न से समस्त जीवों का जीवन चलता है, उसका अपमान कैसे किया जा सकता है?”*

*तब माता पार्वती ने काशी नगरी से अन्न को अदृश्य कर देने का संकल्प लिया।*

*कुछ ही समय में काशी में न भोजन रहा, न पकवान, न दान। पूरा नगर भूख और कष्ट से व्याकुल हो गया।*

*जब भगवान शिव ने देखा कि अन्न के बिना जीवन संभव नहीं है, तब उन्हें अपने कथन का वास्तविक अर्थ समझ में आया।*

*उन्होंने भिक्षुक का रूप धारण किया, हाथ में भिक्षा पात्र लिया और माता अन्नपूर्णा के द्वार पर पहुँचे।*

*माता अन्नपूर्णा ने स्वयं भगवान शिव को अन्न का दान दिया और कहा—*

*“ज्ञान तभी पूर्ण होता है, जब अन्न का सम्मान किया जाए।”*

*इसी घटना के बाद माता पार्वती माता अन्नपूर्णा के नाम से विख्यात हुईं,*

*जो समस्त संसार को अन्न और जीवन प्रदान करती हैं।*

*🌼 कथा से मिलने वाला संदेश अन्न के बिना ज्ञान और तपस्या अधूरी है*

*अहंकार का त्याग ही सच्चा ज्ञान है*

*अन्नदान सबसे महान दान माना गया है*

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*पंचकन्याओं का रहस्य*===============पुराणानुसार ये पाँच स्त्रियाँ जो विवाहिता होने पर भी कन्याओं के समान ही पवित्र मानी ...
24/03/2026

*पंचकन्याओं का रहस्य*
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पुराणानुसार ये पाँच स्त्रियाँ जो विवाहिता होने पर भी कन्याओं के समान ही पवित्र मानी गई है। अहल्या, द्रौपदी, कुन्ती, तारा और मंदोदरी

हिन्दू धर्म से जुड़ी पौराणिक कथाओं में ज्यादातर प्रसिद्ध पात्र पुरुषों के ही हैं। पुरुषों को ही महायोद्धा, अवतार आदि का दर्जा दिया गया और उन्हीं से जुड़े चमत्कारों का भी वर्णन हुआ। लेकिन उनके जीवन से जुड़ी महिलाएं, जिनके बिना उनका अपने उद्देश्यों को प्राप्त करना तक मुश्किल था, उन्हें मात्र एक भूमिका में लाकर छोड़ दिया गया।

पौराणिक स्त्रियां यही वजह है कि मंदोदरी को असुर सम्राट रावण की अर्धांगिनी के तौर तारा को वाली की पत्नी के तौर पर, अहिल्या को गौतम ऋषि की पत्नी के रूप में, कुंती और द्रौपदी को पांडवों की माता और पत्नी के रूप में ही जाना जाता है।

पंचकन्या हिन्दू धर्म में इन पांचों स्त्रियों को पंचकन्याओं का दर्जा दिया गया है। जिस स्वरूप में हम अपने पौराणिक इतिहास को देखते हैं, उसे विशिष्ट स्वरूप को गढ़ने का श्रेय इन स्त्रियों को देना शायद अतिश्योक्ति नहीं कहा जाएगा।

पंचकन्याओं का जीवन मंदोदरी, अहिल्या और तारा का संबंध रामायण काल से है, वहीं द्रौपदी और कुंती, महाभारत से संबंधित हैं। ये पांचों स्त्रियां दिव्य थीं, एक से ज्यादा पुरुषों के साथ संबंध होने के बाद भी इन्हें बेहद पवित्र माना गया। आइए जानते हैं कौन थी ये पंचकन्याएं और क्या था इनका जीवन।

अहिल्या गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को अहल्या नाम से भी जाना जाता है। बहुत से लोग अहिल्या को पंचकन्याओं में सबसे प्रमुख मानते हैं। कई दस्तावेजों में यह उल्लिखित है कि अहिल्या को स्वयं ब्रह्मा ने बनाया था, वहीं कुछ दस्तावेज यह कहते हैं कि उनका संबंध सोमवंश से था।

अहिल्या की खूबसूरती से स्वयं देवता इन्द्र भी खुद को बचा नहीं पाए और एक बार उन्होंने ऐसा किया जिसका खामियाजा स्वयं अहिल्या को भुगतना पड़ा।

इन्द्र का जाल एक बार गौतम ऋषि की अनुपस्थिति में देवराज इन्द्र उनका वेश लेकर आश्रम में प्रवेश कर, अहिल्या के सामने प्रणय निवेदन करते हैं। अहिल्या, इन्द्र की असलियत जानने के बाद भी उनके साथ संबंध स्थापित करती हैं।

अहिल्या का घमंड कई जगह इस बात का उल्लेख है कि जब अहिल्या यह जान लेती हैं कि उनके पति के वेश में इन्द्र उनके सामने प्रणय निवेदन कर रहे हैं, तो उन्हें इस बात पर घमंड होने लगता है कि स्वयं इन्द्र उनके प्रति आकर्षित हुए हैं। इसी कारण वे संबंध स्थापित करने की अनुमति दे देती हैं। वहीं कुछ दस्तावेज यह कहते हैं देवी अहिल्या ने इन्द्र को अपना पति मानकर ही उनके साथ संबंध स्थापित किए थे।

गौतम ऋषि का क्रोध जब गौतम ऋषि ने इन्द्र को अपने ही वेश में अपने आश्रम से निकलते हुए देखा तब वह सारी बात समझ गए। क्रोधावेग में उन्होंने अपनी पत्नी अहिल्या को पत्थर बन जाने का श्राप दिया और कहा कि जब तक स्वयं भगवान राम अपने पैरों से उन्हें नहीं छुएंगे, तब तक अहिल्या इंसानी रूप धारण नहीं कर पाएगी। यह श्राप देकर गौतम ऋषि तप करने के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए।

राम द्वारा उद्धार गुरू विश्वामित्र के साथ विचरण करते हुए राम ने गौतम ऋषि के सुनसान पड़े आश्रम पहुंचे। जहां उन्हें अहिल्या रूपी पत्थर दिखा। विश्वामित्र ने राम को सारी घटना बताई, जिसे सुनकर राम ने अहिल्या का उद्धार किया।

तारा किष्किंधा की महारानी और वालि की पत्नी तारा का पंचकन्याओं में दूसरा स्थान है। कुछ ग्रंथों के अनुसार तारा, बृहस्पति की पौत्री थीं तो कुछ के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकली मणियों में से एक मणि तारा थी। तारा इतनी खूबसूरत थी कि देवता और असुर सभी उनसे विवाह करना चाहते थे।

वालि की पत्नी वालि और सुषेण, मंथन में देवताओं के सहायक के तौर पर मौजूद थे। जब तारा क्षीर सागर से निकली तब दोनों ने ही उनसे विवाह करने की इच्छा प्रकट की। वालि, तारा के दाहिनी तरफ खड़ा था और सुषेण उनकी बाईं ओर। तब विष्णु ने इस समस्या का हल किया कि जो व्यक्ति कन्या की दाहिनी ओर खड़ा होता है वह उसका पति और बाईं ओर खड़ा होने वाला उसका पिता होता है। ऐसे में वालि को तारा का पति घोषित किया गया।

सुग्रीव के साथ युद्ध असुरों के साथ युद्ध के दौरान वालि के मृत्यु को प्राप्त जैसी अफवाह उड़ने पर सुग्रीव ने वालि की पत्नी के साथ विवाह कर खुद को किष्किंधा का सम्राट घोषित कर दिया। लेकिन जब वालि वापस आया तब उसने अपने भाई से राज्य और अपनी पत्नी को हासिल करने के लिए आक्रमण कर दिया।

वालि ने सुग्रीव को अपने राज्य से बाहर कर दिया और साथ ही उसकी प्रिय पत्नी रुमा को अपने पास ही रखा। जब सुग्रीव को राम का साथ प्राप्त हुआ तब उसने वापस आकर फिर वालि को युद्ध के लिए ललकारा।

तारा का सुझाव तारा समझ गई कि सुग्रीव के पास अकेले वालि का सामना करने की ताकत नहीं है इसलिए हो ना हो उसे राम का समर्थन प्राप्त हुआ है। उसने वालि को समझाने की कोशिश भी की लेकिन वालि ने समझा कि सुग्रीव को बचाने के लिए तारा उसका पक्ष ले रही है। वालि ने तारा का त्याग कर दिया और सुग्रीव से युद्ध करने चला गया।

वालि का कथन जब राम की सहायता से सुग्रीव ने वालि का वध किया तो मृत्यु शैया पर रहते हुए वाली ने अपने भाई सुग्रीव से कहा कि वे हर मामले में तारा का सुझाव अवश्य ले, तारा के परामर्श के बिना कोई भी कदम उठाना भारी पड़ सकता है।

मंदोदरी तीसरा नाम है असुर सम्राट रावण की पत्नी मंदोदरी का, जिसने रावण की हर बुरे कदम पर खेद प्रकट किया और उसे हर बुरा काम करने से रोका। हिन्दू धर्म से जुड़े दस्तावेजों में मंदोदरी को एक ऐसी स्त्री के रूप में दर्शाया गया है जो हमेशा सत्य के मार्ग पर चली। मंदोदरी, असुर राजा मयासुर और हेमा नामक अप्सरा की पुत्री थी। मंदोदरी की सुंदरता पर मुग्ध होकर रावण ने उससे विवाह किया था।

रावण की नजरअंदाजगी पंच कन्याओं में से एक मंदोदरी को चिर कुमारी के नाम से भी जाना जाता है। मंदोदरी अपने पति द्वारा किए गए बुरे कार्यों से अच्छी तरह वाकिफ थी, वह हमेशा रावण को यही सलाह देती थी कि बुराई के मार्ग को त्याग कर सत्य की शरण में आ जाए, लेकिन अपनी ताकत पर गुमान करने वाले रावण ने कभी मंदोदरी की बात को गंभीरता से नहीं लिया।

सीता को श्राप रावण की मृत्यु के पश्चात, भगवान राम के कहने पर विभिषण ने मंदोदरी से विवाह किया था। कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि मंदोदरी ने सीता को यह श्राप दिया था कि उनका पति उन्हें त्याग देगा।

कुंती रामायण काल के बाद चौथा नाम आता है कुंती का। हस्तिनापुर के राजा पांडु की पत्नी और तीन ज्येष्ठ पांडवों की माता, कुंती को ऋषि दुर्वासा ने एक ऐसा मंत्र दिया था, जिसके अनुसार वह जिस भी देवता का ध्यान कर उस मंत्र का जाप करेंगी, वह देवता उन्हें पुत्र रत्न प्रदान करेगा।

मंत्र का प्रभाव कुंती को इस मंत्र के प्रभावों को जानना था इसलिए एक दिन उन्होंने भगवान सूर्य का ध्यान कर उस मंत्र का जाप आरंभ किया। सूर्य देव ने प्रकट हुए और उन्हें एक पुत्र प्रदान किया। वह पुत्र कर्ण था, लेकिन उस समय कुंती अविवाहित थी इसलिए उन्हें कर्ण का त्याग करना पड़ा।

पांडु की मौत स्वयंवर में कुंती और पांडु का विवाह हुआ। पांडु को एक ऋषि द्वारा यह श्राप मिला हुआ था कि जब भी वह किसी स्त्री का स्पर्श करेगा, उसकी मृत्यु हो जाएगी। पांडु की मृत्यु के पश्चात कुंती ने धर्म देव को याद कर उनसे युद्धिष्ठिर, वायु देव से भीम और इन्द्र देव से अर्जुन को प्राप्त किया।

मादरी की प्रार्थना पांडु की दूसरी पत्नी मादरी ने कुंती से इस मंत्र का जाप कर पुत्र प्राप्त करने की अनुमति मांगी, जिसे कुंती ने स्वीकार कर लिया। अश्विनी कुमार को याद कर मादरी ने उनसे नकुल और सहदेव को प्राप्त किया।

द्रौपदी महाभारत की नायिका द्रौपदी भी पंच कन्याओं में से एक हैं। पांच पतियों की पत्नी बनने वाली द्रौपदी का व्यक्तित्व काफी मजबूत था। स्वयंवर में के दौरान अर्जुन को अपना पति स्वीकार करने वाली द्रौपदी को कुंती के कहने पर पांचों भाइयों की पत्नी बनकर रहना पड़ा।

काली का अवतार द्रौपदी को वेद व्यास ने यह वरदान दिया था कि पांचों भाइयों की पत्नी होने के बाद भी उसका कौमार्य कायम रहेगा। प्रत्येक पांडव से द्रौपदी को एक-एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। चौपड़ के खेल में हारने के बाद जब पांडवों को अज्ञातवास और वनवास की सजा हुई, तब द्रौपदी ने भी उनके साथ सजा का पालन किया। कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने पुत्र, पिता और भाई को खोने वाली द्रौपदी को कुछ ग्रंथों में मां काली तो कुछ में धन की देवी लक्ष्मी का अवतार भी कहा जाता है।

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उज्जैन के राजा, अधिपति महाकाल। दुनिया का इकलौता ज्योतिर्लिंग जो 'दक्षिणमुखी' है। लेकिन सबसे ज्यादा जिज्ञासा बाबा की 'भस्...
20/03/2026

उज्जैन के राजा, अधिपति महाकाल। दुनिया का इकलौता ज्योतिर्लिंग जो 'दक्षिणमुखी' है। लेकिन सबसे ज्यादा जिज्ञासा बाबा की 'भस्म आरती' को लेकर होती है। लोग महीनों पहले इसकी बुकिंग कराते हैं, पर क्या आपने कभी सोचा है कि यह आरती इतनी सुबह ही क्यों होती है और इसके पीछे का गहरा रहस्य क्या है?

​1. काल के भी काल 'महाकाल'

सनातन धर्म में सुबह 4 से 6 बजे का समय 'ब्रह्म मुहूर्त' माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस समय पूरा ब्रह्मांड जागृत होता है। महाकाल 'मृत्यु के देवता' भी हैं और 'समय' (Time) के स्वामी भी। सुबह की पहली आरती ताजी भस्म से इसलिए की जाती है क्योंकि भस्म इस संसार का अंतिम सत्य है—सब कुछ जलकर राख होना है।

​2. क्या कभी भस्म आरती रुकी है? (The Unbroken Tradition)

एक ऐसा तथ्य जो शायद ही किसी को पता हो: सैकड़ों सालों से, युद्ध हुए, अकाल पड़े, और यहाँ तक कि कोरोना काल में भी महाकाल की भस्म आरती कभी नहीं रुकी। भले ही भक्तों का प्रवेश वर्जित रहा हो, लेकिन बाबा की सेवा और भस्म चढ़ाने की प्रक्रिया एक दिन के लिए भी खंडित नहीं हुई। यह अटूट परंपरा महाकाल की अमरता का प्रतीक है।

​3. ताजी भस्म का रहस्य

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, पहले यह भस्म श्मशान की ताजी चिता से लाई जाती थी। आज यह परंपरा 'कंडे' (गाय के गोबर के उपले), शमी, पीपल और अन्य पवित्र लकड़ियों की भस्म से पूरी की जाती है। यह आरती हमें याद दिलाती है कि अंत में सब मिट्टी है, इसलिए अहंकार किस बात का?

​अद्भुत तथ्य: बाबा महाकाल को 'उज्जैन का राजा' माना जाता है, इसलिए आज भी कोई मुख्यमंत्री या बड़ा नेता रात के समय उज्जैन में नहीं रुकता। कहते हैं कि एक राज्य में दो राजा एक साथ नहीं रह सकते!

​क्या आप कभी भस्म आरती में शामिल हुए हैं? जय महाकाल लिखकर बाबा का आशीर्वाद लें! 🚩🔱

🙏श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा🙏एक समय बृहस्पति जी ब्रह्माजी से बोले- हे ब्रह्मन श्रेष्ठ! चैत्र व आश्विन मास के शुक्लपक्ष...
19/03/2026

🙏श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा🙏
एक समय बृहस्पति जी ब्रह्माजी से बोले- हे ब्रह्मन श्रेष्ठ! चैत्र व आश्विन मास के शुक्लपक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? इस व्रत का क्या फल है, इसे किस प्रकार करना उचित है? पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहिये।

बृहस्पतिजी का ऐसा प्रश्न सुन ब्रह्माजी ने कहा- हे बृहस्पते! प्राणियों के हित की इच्छा से तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेव, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। यह नवरात्र व्रत संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र की कामना वाले को पुत्र, धन की लालसा वाले को धन, विद्या की चाहना वाले को विद्या और सुख की इच्छा वाले को सुख मिलता है।

इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है। मनुष्य की संपूर्ण विपत्तियां दूर हो जाती हैं और घर में समृद्धि की वृद्धि होती है, बन्ध्या को पुत्र प्राप्त होता है। समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है और मन का मनोरथ सिद्ध हो जाता है।

जो मनुष्य इस नवरात्र व्रत को नहीं करता वह अनेक दुखों को भोगता है और कष्ट व रोग से पीड़ित हो अंगहीनता को प्राप्त होता है, उसके संतान नहीं होती और वह धन-धान्य से रहित हो, भूख और प्यास से व्याकूल घूमता-फिरता है तथा संज्ञाहीन हो जाता है।

जो सधवा स्त्री इस व्रत को नहीं करती वह पति सुख से वंचित हो नाना दुखों को भोगती है। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और दस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा का श्रवण करे।

हे बृहस्पते! जिसने पहले इस महाव्रत को किया है वह कथा मैं तुम्हें सुनाता हूं तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्माण मनुष्यों का कल्याम करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण में आए हुए मुझ पर कृपा करो।

ब्रह्माजी बोले- प्राचीन काल में मनोहर नगर में पीठत नाम का एक अनाथ ब्राह्मण रहता था, वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके संपूर्ण सद्गुणों से युक्त सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई।

वह कन्या सुमति अपने पिता के घर बाल्यकाल में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन जब दुर्गा की पूजा करके होम किया करता, वह उस समय नियम से वहां उपस्थित रहती। एक दिन सुमति अपनी सखियों के साथ खेल में लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई।

उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और वह पुत्री से कहने लगा अरी दुष्ट पुत्री! आज तूने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ट रोगी या दरिद्र मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।

पिता का ऐसा वचन सुन सुमति को बड़ा दुख हुआ और पिता से कहने लगी- हे पिता! मैं आपकी कन्या हूं तथा सब तरह आपके आधीन हूं जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। राजा से, कुष्टी से, दरिद्र से अथवा जिसके साथ चाहो मेरा विवाह कर दो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है, मेरा तो अटल विश्वास है जो जैसा कर्म करता है उसको कर्मों के अनुसार वैसा ही फल प्राप्त होता है क्योंकि कर्म करना मनुष्य के आधीन है पर फल देना ईश्वर के आधीन है।

जैसे अग्नि में पड़ने से तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं। इस प्रकार कन्या के निर्भयता से कहे हुए वचन सुन उस ब्राह्मण ने क्रोधित हो अपनी कन्या का विवाह एक कुष्टी के साथ कर दिया और अत्यन्त क्रोधित हो पुत्री से कहने लगा-हे पुत्री!

अपने कर्म का फल भोगो, देखें भाग्य के भरोसे रहकर क्या करती हो? पिता के ऐसे कटु वचनों को सुन सुमति मन में विचार करने लगी- अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह कन्या अपने पति के साथ वन में चली गई और डरावने कुशायुक्त उस निर्जन वन में उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की।

उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देख देवी भगवती ने पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रगट हो सुमति से कहा- हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुझसे प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो सो वरदान मांग सकती हो। भगवती दुर्गा का यह वचन सुन ब्राह्मणी ने कहा- आप कौन हैं वह सब मुझसे कहो?

ब्राह्मणी का ऐसा वचन सुन देवी ने कहा कि मैं आदि शक्ति भगवती हूं और मैं ही ब्रह्मविद्या व सरस्वती हूं। प्रसन्न होने पर मैं प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।

तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतांत सुनाती हूं सुनो! तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया।

उन लोगों ने तुझको और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न जल ही पिया इस प्रकार नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ, इस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर मैं तुझे मनोवांछित वर देती हूं, तुम्हारी जो इच्छा हो सो मांगो।

इस प्रकार दुर्गा के वचन सुन ब्राह्मणी बोली अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे। मैं आपको प्रणाम करती हूं कृपा करके मेरे पति का कोढ़ दूर करो। देवी ने कहा- उन दिनों तुमने जो व्रत किया था उस व्रत का एक दिन का पुण्य पति का कोढ़ दूर करने के लिए अर्पण करो, उस पुण्य के प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से मुक्त हो जाएगा।

ब्रह्मा जी बोले- इस प्रकार देवी के वचन सुन वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से जब उसने तथास्तु (ठीक है) ऐसा वचन कहा, तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ट रोग से रहित हो अति कान्तिवान हो गया।

वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देख देवी की स्तुति करने लगी- हे दुर्गे! आप दुर्गति को दूर करने वाली, तीनों लोकों का सन्ताप हरने वाली, समस्त दु:खों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न हो मनोवांछित वर देने वाली और दुष्टों का नाश करने वाली जगत की माता हो।

हे अम्बे! मुझ निरपराध अबला को मेरे पिता ने कुष्टी मनुष्य के साथ विवाह कर घर से निकाल दिया। पिता से तिरस्कृत निर्जन वन में विचर रही हूं, आपने मेरा इस विपदा से उद्धार किया है, हे देवी। आपको प्रणाम करती हूं। मेरी रक्षा करो।

ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! उस ब्राह्मणी की ऐसी स्तुति सुन देवी बहुत प्रसन्न हुई और ब्राह्मणी से कहा- हे ब्राह्मणी! तेरे उदालय नामक अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीध्र उत्पन्न होगा।

ऐसा वर प्रदान कर देवी ने ब्राह्मणी से फिर कहा कि हे ब्राह्मणी! और जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मांग ले। भगवती दुर्गा का ऐसा वचन सुन सुमति ने कहा कि हे भगवती दुर्गे! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्र व्रत की विधि और उसके फल का विस्तार से वर्णन करें।

महातम्य- इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुन दुर्गा ने कहा- हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हें संपूर्ण पापों को दूर करने वाले नवरात्र व्रत की विधि बतलाती हूं जिसको सुनने से मोक्ष की प्राप्ति होती है- आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करें।

विद्वान ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापन करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचें। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवी की मूर्तियां स्थापित कर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से विधिपूर्वक अर्घ्य दें।

बिजौरा के फल से अर्घ्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से अर्घ्य देने से कीर्ति, दाख से अर्घ्य देने से कार्य की सिद्धि होती है, आंवले से अर्घ्य देने से सुख की प्राप्ति और केले से अर्घ्य देने से आभूषणों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार पुष्पों व फलों से अर्घ्य देकर व्रत समाप्त होने पर नवें दिन यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, शहद, जौ, तिल, बिल्व (बेल), नारियल, दाख और कदम्ब आदि से हवन करें।

गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, खीर एवं चम्पा के पुष्पों से धन की और बेल पत्तों से तेज व सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति की और केले से पुत्र की, कमल से राज सम्मान की और दाखों से संपदा की प्राप्ति होती है। खांड, घी, नारियल, शहद, जौ और तिल तथा फलों से होम करने से मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है।

व्रत करने वाला मनुष्य इस विधि विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस प्रकार बताई हुई विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना फल मिलता है। इस नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मंदिर अथवा घर में विधि के अनुसार करें।

ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अर्न्तध्यान हो गई। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूवर्क करता है वह इस लोक में सुख प्राप्त कर अन्त में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता है।

हे बृहस्पते! यह इस दुर्लभ व्रत का महात्म्य है जो मैंने तुम्हें बतलाया है। यह सुन बृहस्पति जी आनन्द से प्रफुल्लित हो ब्राह्माजी से कहने लगे कि हे ब्रह्मन! आपने मुझ पर अति कृपा की जो मुझे इस नवरात्र व्रत का महात्6य सुनाया।

ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते! यह देवी भगवती शरक्ति संपूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है? बोलो देवी भगवती की जय।

व्रत की विधि प्रात: नित्यकर्म से निवृत हो, स्नान कर, मंदिर में या घर पर ही नवरात्र में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा करनी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष लाभदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विध्न दूर हो जाते हैं तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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प्रार्थना

हे परमेश्वरी! मेरे द्वारा रात दिन सहस्त्रों अपराध होत हैं 'यह मेरा दास है' समझ कर मेरे अपराधों को क्षमा करो। हे परमेश्वरी! मैं आह्वान, विसर्जन और पूजन करना नहीं जानता, मुझे क्षमा करो। हे सुरेश्वरी! मैंने जो मंत्रहीन, क्रियाहीन, भक्तयुक्त पूजन किया है वह स्वीकार करो। हे परमेश्वरी! अज्ञान से, भूल से अथवा बुद्धि भ्रान्ति से जो न्यूनता अथवा अधिकता हो गई है उसे क्षमा करिये तथा प्रसन्न होईये।

जाप मंत्र- ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नम:। मनोकामना सिद्धि के लिए इस मंत्र को 108 बार या सुविधा अनुसार जाप करें।. आचार्य दया शंकर चतुर्वेदी

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