Shri Vishva Prangana Ayurveda Clinic and Panchakarma center

Shri Vishva Prangana Ayurveda Clinic and Panchakarma center This page belongs to an authentic Maharashtrian Ayurvedic clinic and Panchakarma center launching first time in Uttarakhand.

Nadi Vaidya Dr. Rahul Gupta has passed his BAMS from Uttranchal Ayurvedic College Dehradun and has done his MD (Ayurveda) from Government Ayurved College Nanded, Maharashtra. He got his traditional ayurveda knowledge from very famous guru shishya parampara “VISHVA PARAMPARA, Maharashtra”. He is a proficient Nadi Vaidya and got his diksha for the same from Vishva Pandhari Ashram Kolhapur. He is hav

ing more than 10 years of expertise. Many patients in India & abroad have been benefited from his pulse diagnosis, ayurveda and panchakarma treatment. He has participated and presented his papers in many international conferences. His articles on various subject are published in national – international journals, magazines and newspapers.

06/05/2026

🏥 20 साल पुराने यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर से मिली मुक्ति: स्विस नागरिक ने चुनी भारतीय आयुर्वेद की राह! 🇮🇳✨

क्या आप जानते हैं कि जिस समस्या के लिए आधुनिक चिकित्सा में बार-बार सर्जरी ही एकमात्र रास्ता बताई जाती है, उसका समाधान आयुर्वेद में संभव है?

स्विट्जरलैंड के 53 वर्षीय नर्सिंग प्रोफेशनल, स्फाकियानाकिस इओनिस, पिछले 20 वर्षों से यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर (पेशाब की नली में रुकावट) की गंभीर समस्या से जूझ रहे थे। स्विट्जरलैंड और जर्मनी में दो बड़ी सर्जरियों (Internal Urethrotomy & Optilume Dilatation) के बाद भी उन्हें आराम नहीं मिला और उन्हें तीसरी सर्जरी की सलाह दी गई।

खोज और समाधान 🔍
निराशा के बीच उन्होंने वैकल्पिक चिकित्सा की तलाश की और उनका संपर्क मुझसे हुआ। 'हील इन इंडिया' कार्यक्रम के तहत ऑनलाइन परामर्श लेकर उन्होंने अपना इलाज शुरू किया।

आयुर्वेद ने कैसे किया कमाल?
हमारी आयुर्वेद दवाएं पेशाब के रास्ते से गुजरते समय:
✅ यूरेथ्रा के प्रभावित हिस्से को प्राकृतिक रूप से अंदर से रिपेयर करती हैं।
✅ नली की इलास्टिसिटी (लचीलापन) वापस लाती हैं।
✅ बार-बार कैथेटर डालने के दर्द और ब्लीडिंग से छुटकारा दिलाती हैं।

परिणाम 📊
मात्र एक वर्ष के आयुर्वेदिक उपचार के बाद, रुग्ण अब पूरी तरह स्वस्थ हैं! न केवल स्ट्रिक्चर ठीक हुआ, बल्कि उनके प्रोस्टेट वॉल्यूम में भी जबरदस्त सुधार देखा गया। रुग्ण का वीडियो फीडबैक साझा कर रहे है।
"श्री विश्व प्रांगण आयुर्वेद चिकित्सालय" (हल्द्वानी) पिछले 20 वर्षों से दुनिया के 25 से अधिक देशों में अपनी सेवाएं दे रहा है।

स्वस्थ भविष्य हेतु संकल्पित:
नाड़ी वैद्य राहुल गुप्ता (BAMS, MD)
📍 श्री: विश्व प्रांगण आयुर्वेद चिकित्सालय एवं पंचकर्म केंद्र
हल्द्वानी, उत्तराखंड
📞 78953-72936

India

स्वदेशी तेल: आयुर्वेद का सुरक्षा चक्र"क्या आप जानते हैं कि आपकी रसोई में रखा कुकिंग ऑयल आपको लंबी उम्र दे सकता है या बीम...
29/04/2026

स्वदेशी तेल: आयुर्वेद का सुरक्षा चक्र

"क्या आप जानते हैं कि आपकी रसोई में रखा कुकिंग ऑयल आपको लंबी उम्र दे सकता है या बीमारियों के जाल में फंसा सकता है? आज के चमकदार 'हार्ट फ्रेंडली' विज्ञापनों ने हमें अपनी जड़ों से काटकर नसों के सूखेपन की ओर धकेल दिया है। आइए, आयुर्वेद के प्राचीन विज्ञान और आधुनिक रिसर्च के माध्यम से जानते हैं कि आपके शरीर के लिए असली 'इंधन' कौन सा है।"
आयुर्वेद और विज्ञान समर्थित सर्वश्रेष्ठ विकल्प

1) गव्य घृत (A2 गाय का घी):
आयुर्वेद: "घृतं पित्तप्रशमनं पित्तप्रशमनं हि तत्।" (घी पित्त नाशक और ओज वर्धक है।)
विज्ञान: ICMR-NIN के अनुसार, इसका उच्च स्मोक पॉइंट (250 डिग्री) इसे भारतीय कुकिंग के लिए सबसे स्थिर (Stable) फैट बनाता है।

2) तिल का तेल (Sesame Oil):
आयुर्वेद: "तैलं तु तिलजं श्रेष्ठं बलार्थं स्नेहनेषु च।" (सभी तेलों में तिल का तेल बल के लिए श्रेष्ठ है।)
विज्ञान: American Journal of Clinical Nutrition के अनुसार, इसके एंटीऑक्सीडेंट धमनियों को सख्त होने से बचाते हैं।

3) सरसों का तेल (Mustard Oil):
आयुर्वेद: "कटूष्णं सार्षपं तैलं कफवातविनाशनम्।" (उत्तर भारत के लिए सर्वोत्तम कफ-वात नाशक।)
विज्ञान: ICMR के अनुसार, इसमें हृदय के लिए आदर्श ओमेगा-3 और 6 का अनुपात मौजूद है।

4) नारियल का तेल (Coconut Oil):
आयुर्वेद: यह शीतल और पित्त शामक है, जो दक्षिण भारत की जलवायु के लिए वरदान है।
विज्ञान: इसमें मौजूद 'लौरिक एसिड' इम्युनिटी और मेटाबॉलिज्म बढ़ाता है।

5) मूंगफली का तेल (Groundnut Oil):
आयुर्वेद: महाराष्ट्र और मध्य भारत के लिए उत्तम वात शामक और ऊर्जादायक तेल।
विज्ञान: NIN के अनुसार, इसमें मौजूद प्रचुर MUFA धमनियों का लचीलापन बरकरार रखता है।

आधुनिक तेलों के वैज्ञानिक दुष्प्रभाव ⚠️

रिफाइंड तेल (Refined Oils): ICMR के अनुसार, रिफाइनिंग के केमिकल नसों में सूखापन (Dryness) पैदा करते हैं, जिससे नसें सख्त होकर Heart Attack (due to Arteriosclerosis) का मुख्य कारण बनती हैं।

1) सनफ्लावर ऑयल: शोध के अनुसार, उच्च तापमान पर इसमें कैंसरकारी 'Aldehydes' जैसे ज़हरीले तत्व पैदा होते हैं जो शरीर के लिए हानिकारक हैं, साथ ही ये शरीर में फ़्री रैडिकल्ज़ को बढ़ते है जो अंगो के सामन्य कामकाज को बाधित करता है। इसका सम्बन्ध Parkinsonism और Neuro-degenerative बीमारियों से पाया गया है।

2) राइस ब्रान ऑयल: World Journal of Cardiology के अनुसार, इसकी ओमेगा-6 की अधिकता हृदय में ब्लॉकेज का खतरा बढ़ाती है। इसके अलावा चावल की खेती के दौरान यह ज़मीन से Arsenic सोख लेता है, जो ज़्यादातर उसकी बाहरी परत भूसी में जमा राहता है। Arsenic की यही सूक्ष्म मात्रा शरीर के लिए हानिकारक है।

3) ऑलिव ऑयल: इसमें ओमेगा -9प्रचुर मात्रा में रहता है किंतु इसके साथ में शरीर को ओमेगा-3 की भी सख़्त ज़रूरत रहती है जो इसमें बहुत ही कम है। विदेशों में भी इसे केवल ऊपर से गार्निश करने के लिए ही प्रयोग में लाया जाता है।

निष्कर्ष: जड़ों की ओर वापसी

"भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि आपके शरीर की औषधि है। आयुर्वेद का सरल नियम है— 'स्थानीय खाएं, स्वस्थ रहें'। जो तेल आपके परिवेश की मिट्टी में उगता है, वही आपके डीएनए के लिए अनुकूल है। विज्ञापनों के 'रिफाइंड' छलावे से बाहर निकलें और अपनी परंपरा के शुद्ध, कच्ची घानी तेलों को अपनाएं। याद रखें, नसों में प्राकृतिक चिकनाई बनी रहेगी, तभी जीवन की गति निर्बाध चलेगी।”

वैद्य राहुल गुप्ता
BAMS, MD
श्री विश्व प्रांगण आयुर्वेद चिकित्सालय, मुखानी, हल्द्वानी
संपर्क: 78953-72936

🌞 भीषण ग्रीष्म: बच्चों की सुरक्षा के लिए 'आयुर्वेद' सुरक्षा कवच 🛡️अत्यधिक गर्मी बच्चों के 'ओज' (Immunity) को सोख लेती है...
24/04/2026

🌞 भीषण ग्रीष्म: बच्चों की सुरक्षा के लिए 'आयुर्वेद' सुरक्षा कवच 🛡️

अत्यधिक गर्मी बच्चों के 'ओज' (Immunity) को सोख लेती है। ग्रीष्म ऋतु में बच्चों का सुकुमार शरीर पित्त और वात के प्रकोप के प्रति अत्यंत संवेदनशील होता है। एक अभिभावक और चिकित्सक के रूप में, इन ६ प्रमुख खतरों और उनके शास्त्रीय समाधानों को समझना अत्यंत आवश्यक है:

१. नासागत रक्तपित्त (नक्सीर फूटना)
तेज गर्मी से बच्चों की नासिका की कोमल रक्त वाहिकाएं प्रभावित होती हैं।
समाधान: ताजे दूर्वा (दूब घास) का स्वरस नाक में २-२ बूंद डालें। सिर के बीचों-बीच चंदन का लेप लगाएं।
शास्त्र प्रमाण: "घ्राणप्रवृत्ते जलमाशु देयं सशर्करं नासिकया पयश्च।" (चरक संहिता)
अर्थात: नक्सीर फटने पर मिश्री मिला हुआ ठंडा जल या दूध का नस्य तुरंत लाभ देता है।

२. छर्दि एवं अतिसार (उल्टी-दस्त)
गर्मी में अत्यधिक/ दूषित जल के सेवन जठराग्नि मंद होने से इन्फेक्शन और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।
समाधान: 'लाजा पेया' (खील का मांड) और दाड़िम (अनार) का रस। यह आंतों को बल देता है और शरीर में जलस्तर बनाए रखता है।

३. अंशुघात (Heat Stroke/लू लगना)
लू लगने पर बच्चा सुस्त और निस्तेज हो जाता है।
हटके समाधान: 'आम्र पनक' (कच्चे आम का पन्ना)। इसे केवल पिलाना ही नहीं, बल्कि उबले आम के गूदे को बच्चे के तलवों और हथेलियों पर मलना लू का सबसे प्रभावी उपचार है।
इसके अलावा खाने में नियमित रूप से प्याज़ का सेवन लू लगाने की सम्भावना को कम करता है।

४. अक्षि-दाह (आँखों की जलन एवं लालिमा)
बाहर की गर्म हवा 'आलोचक पित्त' को कुपित कर दृष्टि पर प्रभाव डालती है।
समाधान: शुद्ध गौ-घृत (गाय का घी) की पैरों के तलवों पर मालिश करें। रात में आंखों पर गुलाब जल के फाहे रखना अत्यंत सुखदायक है।

५. तर्षण एवं भ्रम (अत्यधिक प्यास और चक्कर)
सिर्फ पानी पीना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है।
समाधान: 'मंथ' का प्रयोग। खजूर, मुनक्का, मिश्री और सत्तू को मथकर तैयार किया गया पेय।
शास्त्र प्रमाण: "सितोपलाढ्यं मन्थं वा भक्षयन् ग्रीष्मजं जयेत्।" (सुश्रुत संहिता)

अर्थात: मिश्री युक्त शीतल 'मंथ' के सेवन से गर्मी के विकारों पर विजय प्राप्त होती है।

६. त्वक-शोष एवं घमौरियां (Skin Issues)
पसीने से होने वाली खुजली और रैशेज बच्चों को बेचैन कर देते हैं।
समाधान: स्नान के जल में 'उशीर' (खस) या नीम के पत्ते डालें। सिंथेटिक पाउडर के बजाय चंदन पाउडर का प्रयोग करें।

💡 डॉ. राहुल की विशेष टिप:
गर्मी के इन दिनों में बच्चों को 'चंद्रिका सेवन' (रात में चांदनी में १०-१५ मिनट बिताना) जरूर करवाएं। यह उनके मानसिक और शारीरिक ताप को शांत करने की सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक चिकित्सा है।

⚠️ महत्वपूर्ण सूचना (Disclaimer):
यह जानकारी केवल जन-जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए साझा की गई है। यद्यपि इसमें वर्णित उपाय आयुर्वेदिक शास्त्रों पर आधारित हैं, फिर भी प्रत्येक बच्चे की शारीरिक प्रकृति और बीमारी की तीव्रता अलग-अलग हो सकती है। किसी भी औषधि या उपचार को अपनाने से पहले अपने नजदीकी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। आपातकालीन स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें।

स्वस्थ भविष्य हेतु संकल्पित:
नाड़ी वैद्य राहुल गुप्ता (BAMS, MD)
📍 श्री: विश्व प्रांगण आयुर्वेद चिकित्सालय एवं पंचकर्म केंद्र
हल्द्वानी, उत्तराखंड
📞 078953 72936

आयुर्वेद की प्रामाणिकता: “ग्रंथो का कालक्रम” ही सत्यता की कसौटी।नमस्ते मित्रों,एक आयुर्वेदिक चिकित्सक होने के नाते, मेरा...
18/04/2026

आयुर्वेद की प्रामाणिकता: “ग्रंथो का कालक्रम” ही सत्यता की कसौटी।

नमस्ते मित्रों,
एक आयुर्वेदिक चिकित्सक होने के नाते, मेरा यह निरंतर प्रयास रहता है कि आयुर्वेद का शुद्ध और वैज्ञानिक स्वरूप आप तक पहुँचे। आज जनमानस में आयुर्वेद को लेकर बहुत भ्रम है, जिसका मुख्य कारण है— ग्रंथों के कालक्रम (Chronology) की जानकारी न होना। आयुर्वेद का एक शाश्वत नियम है: ग्रंथ जितना प्राचीन है, उसका सिद्धांत उतना ही मौलिक और प्रामाणिक है।”

ग्रंथों का पदानुक्रम और प्रामाणिकता:

आयुर्वेद की सर्वोच्च सत्ता 'बृहत्रयी' (चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय) में निहित है। ये ग्रंथ लगभग 3000 से 5000 वर्ष पुराने हैं। इनके हजारों वर्षों बाद लिखे गए ग्रंथों में समय के साथ कुछ ऐसी बातें जुड़ गईं जो मूल सिद्धांतों के विपरीत हैं।

भ्रम और कालक्रम के उदाहरण (प्राचीन बनाम नया आयुर्वेद):

शहद (मधु) को गर्म करना - भ्रामक आधुनिक नुस्खे:

आजकल वजन घटाने के लिए गर्म पानी में शहद लेना बहुत प्रचलित है, लेकिन 5000 वर्ष पुरानी चरक संहिता इसे स्पष्ट वर्जित करती है:

"उष्णार्तमुष्णैः संयुक्तं चोष्णं वा मरणाय मधु..." (चरक सूत्रस्थान 27/246)

व्याख्या: शहद स्वभाव से ही नाना प्रकार के पुष्पों के विषैले अंशों से बना होता है। जब इसे गर्म किया जाता है, तो इसके भीतर के सूक्ष्म विषैले तत्व सक्रिय हो जाते हैं, जो शरीर के लिए धीमे जहर (Slow poison) के समान काम करते हैं।

2) उषःपान (सुबह का पानी) - भावप्रकाश का प्रभाव:

प्राचीन मत (चरक/सुश्रुत): बिना प्यास के जलपान अग्नि मंद करता है।

"अत्यम्बुपानान्न च पावकस्य..." (चरक विमानस्थान 2/7)।

नया आयुर्वेद (16वीं शताब्दी): सुबह सुबह उठ कर किए जाने वाले जलपान की अवधारणा लगभग 500 वर्ष पुराने ग्रंथ 'भावप्रकाश' से आई है। मूल आयुर्वेद में इसकी ऐसी अनिवार्यता नहीं थी।

3) च्यवनप्राश में सोना-चांदी - आधुनिक मिलावट:

प्राचीन मत (चरक संहिता):चिकित्सास्थान (1.1) के अनुसार इसमें केवल वनस्पतियों का योग है। धातु का कोई उल्लेख नहीं है।

नया आयुर्वेद: शारंगधर संहिता' (14वीं शताब्दी) और आधुनिक मार्केटिंग ने इसमें भस्मों को जोड़ दिया, जो मूल ऋषि-प्रोक्त विधि नहीं है।

4) दूध और फल (विरुद्ध आहार):

प्राचीन मत (चरक संहिता): फल और दूध का मेल 'विरुद्ध' है। (चरक सूत्रस्थान 26/82-83)।

नया आयुर्वेद: 'भावप्रकाश' जैसे बाद के ग्रंथों ने "पके हुए आम" को दूध के साथ लेने की छूट दी, जो प्राचीन कठोर सिद्धांतों के विपरीत है।

5) लवण (नमक) का सेवन:

प्राचीन मत (चरक संहिता): नमक का अति-सेवन ओज का क्षय और बालों की समस्याएं करता है। (चरक सूत्रस्थान 26/43)।

नया आयुर्वेद (17वीं शताब्दी): बाद के 'राज निघंटु' जैसे ग्रंथों में सेंधा नमक की अति-प्रशंसा के कारण लोगों ने इसे असीमित खाना शुरू कर दिया।

निष्कर्ष:
आयुर्वेद की प्रामाणिकता उसके 'कालक्रम' पर निर्भर करती है। यदि कोई बात भावप्रकाश या शारंगधर जैसे 'उत्तरकालीन' ग्रंथों में दी गई है और वह प्राचीन संहितों (बृहत्रयी) के विरुद्ध है, तो उसे 'शुद्ध आयुर्वेद' नहीं माना जा सकता। आज के परिपेक्ष में जो जनमानस में जो भ्रम फैला है उसका कारण यही कालक्रम है। अपनी सहूलियत के हिसाब से आयुर्वेद में परिवर्तन करना उचित तब है जब मूल ग्रंथ से वह विरोधाभास ना रखता हो।

इसलिए इधर-उधर की सुनी-सुनाई बातों के बजाय, स्वयं चरक संहिता, सुश्रुत संहिता या अष्टांग हृदय जैसे मूल ग्रंथों के सिद्धांतों को समझें। प्रामाणिक ग्रंथों की ओर लौटें, स्वस्थ रहें।

वैद्य राहुल गुप्ता
BAMS, MD
श्री विश्व प्रांगण आयुर्वेद चिकित्सालय, मुखानी, हल्द्वानी
संपर्क: 78953-72936

सावधान: क्या आपकी आयुर्वेद दवा 'प्लास्टिक के धीमे जहर' के साथ आ रही है?​पैकिज्ड वॉटर बॉटल पर जो expiry date डाली जाती है...
13/04/2026

सावधान: क्या आपकी आयुर्वेद दवा 'प्लास्टिक के धीमे जहर' के साथ आ रही है?

​पैकिज्ड वॉटर बॉटल पर जो expiry date डाली जाती है वह पानी की नहीं अपितु उस सिंगल यूस प्लास्टिक बॉटल की होती है जो की expiry date के बाद अपने प्लास्टिक के कण बहुतायत से पानी में छोड़ना शुरू कर देती है, जिससे आप पानी के साथ-साथ ना चाहते हुए भी Microplastic का सेवन करते है जो स्वयं में कैन्सरकारक है।

​अब सवाल यह आता है की आयुर्वेद कम्पनीयां जो आसव अरिष्ट कल्पनाओं में दस-दस साल की expiry date डालती हैं वह तो दवा की होती है किंतु दवा को रखने वाले प्लास्टिक बॉटल का क्या है? कुछ समय बाद प्लास्टिक के कण दवा के साथ मिलकर आपके शरीर को बीमार बना सकते है। आसव अरिष्ट वैसे भी फ़र्मंटेशन प्रोडक्ट होने के कारण प्लास्टिक को जल्द से जल्द गला कर अपने अंदर समाहित कर लेता है। पुराने समय में इन दवाओं को रखने के लिए काँच की बोतल का प्रयोग होता था। आज भी कुछ आयुर्वेद कम्पनीयां इस ख़तरे को भली भाँति जानती है इसलिए काँच की बोतल को प्रयोग में लाती है।

​अतः दवा कम्पनीयां में बड़े-बड़े नाम के पीछे भागने से अच्छा है की उन कम्पनीयां को प्राथमिकता दें जो आसव अरिष्ट कल्पनाओं को रखने के लिए काँच की बोतल का इस्तेमाल करती हैं। आयुष मिनिस्ट्री से भी अनुरोध है की इस मानक को जल्द से जल्द लागू कराया जाए।

​⚕️ नाड़ि वैद्य राहुल गुप्ता

🏥 श्री विश्व प्रांगण आयुर्वेद एवं पंचकर्म क्लिनिक

📞 Mob- 78953-72936

स्वस्थ स्कैल्प हेतु 'निम्ब काष्ठ कंकत' (Neem Wood Comb)"आयुर्वेद में बालों के स्वास्थ्य के लिए केवल औषधियां ही नहीं, बल्...
08/04/2026

स्वस्थ स्कैल्प हेतु 'निम्ब काष्ठ कंकत' (Neem Wood Comb)

"आयुर्वेद में बालों के स्वास्थ्य के लिए केवल औषधियां ही नहीं, बल्कि दैनिक चर्या के उपकरणों का भी महत्व है। प्लास्टिक के स्थान पर नीम के कंघे का उपयोग एक 'औषधीय उपक्रम' है।” आयुर्वेद में नीम को 'विशद' और 'लेखन' गुणों से युक्त माना गया है। जब हम नीम के कंघे का उपयोग करते हैं, तो यह केवल बालों को सुलझाता नहीं है, बल्कि एक 'भौतिक चिकित्सा' की तरह कार्य करता है।

स्कैल्प की समस्याओं, विशेषकर दारुणक (Dandruff) और कण्डू (Itching) के लिए नीम के गुणों का संदर्भ:

निम्बस्तिक्तः कषायश्च हुतभोजनदीपनः।
लेखनः कफपित्तघ्नः कण्डूकुष्ठविनाशनः॥
(धन्वन्तरि निघण्टु)

व्याख्या (Ayurvedic Analysis):
लेखन (Scraping property): नीम में 'लेखन' गुण होता है। जब आप इससे कंघी करते हैं, तो यह स्कैल्प पर जमी मृत कोशिकाओं (Dead cells) और डैंड्रफ को सूक्ष्मता से हटाता है।

कफ-पित्त शामक: स्कैल्प की गर्मी (पित्त) और चिपचिपाहट (कफ) को संतुलित कर रोमछिद्रों (Hair follicles) को खोलता है।

2. आयुर्वेद के अनुसार, सिर की त्वचा पर नीम का घर्षण निम्नलिखित लाभ देता है:

रक्त प्रसादन (Blood Purification): नीम 'तिक्त रस' प्रधान है। कंघी करते समय जो सूक्ष्म घर्षण होता है, वह स्कैल्प के सूक्ष्म रक्त संचार (Micro-circulation) को सक्रिय करता है।

कृमिघ्न (Anti-Microbial): स्कैल्प पर होने वाले किसी भी प्रकार के फंगल संक्रमण या सूक्ष्म कृमियों (जुएँ/लीखें)का नाश करता है।

दारुणक चिकित्सा: प्लास्टिक के कंघे स्कैल्प में 'Static Electricity' पैदा करते हैं जिससे बाल झड़ते हैं, जबकि नीम का काष्ठ 'अविद्युत' (Non-static) होता है, जो बालों की जड़ों को शांत रखता है।

क्या आधुनिक हृदय रोगों का समाधान आयुर्वेद में है? आकाशवाणी देहरादून पर मेरा विशेष साक्षात्कार।हाल ही में मुझे आकाशवाणी द...
01/04/2026

क्या आधुनिक हृदय रोगों का समाधान आयुर्वेद में है? आकाशवाणी देहरादून पर मेरा विशेष साक्षात्कार।

हाल ही में मुझे आकाशवाणी देहरादून (100.5 FM) के माध्यम से आप सभी से जुड़ने और हृदय स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का अवसर मिला। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और बिगड़ती जीवनशैली के बीच, क्या आयुर्वेद वास्तव में 'Evidence-based' (प्रमाण आधारित) समाधान दे सकता है, यह इस साक्षात्कार का मुख्य विषय था।

यहाँ मेरे साक्षात्कार के मुख्य अंश हैं:

आयुर्वेद अब केवल परंपरा नहीं, विज्ञान है

आज का आयुर्वेद केवल परंपरा नहीं, बल्कि evidence पर आधारित है। ICMR के शोधों ने यह सिद्ध किया है कि 'पुष्करमूल' जैसी औषधियाँ हृदय की मांसपेशियों की पंपिंग क्षमता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती हैं। वहीं 'गुग्गुल' हृदय की धमनियों में जमाव/Plaque को साफ करने में बहुत प्रभावी पाया गया है। आयुर्वेद में कई जटिल रोगों का सफल प्रबंधन संभव है, जैसे: High BP, Angina, Atrial fibrillation, Heart blockage इत्यादि।

2. इमरजेंसी में आयुर्वेद की गति

अक्सर लोग सोचते हैं कि आयुर्वेद धीरे काम करता है, लेकिन आयुर्वेद की 'रस औषधियाँ' जीभ के नीचे (Sublingual) रखने पर एक सेकंड के आठवें हिस्से से भी कम समय में अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं। हमने 'त्रिमर्म' 'त्रिमर्म' सिद्धांत के जरिए ऐसे कई हृदय रोगियों की चिकित्सा की है जहाँ अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ संघर्ष कर रही थीं।

“कुछ समय पूर्व मेरे पास एक ऐसे रोगी आए जिनकी एक किडनी निकल जाने के कारण उनकी हृदय गति अनियमित और गिरकर मात्र 44 रह गई थी। आयुर्वेद के 'त्रिमर्म' सिद्धांत के अनुसार हृदय और मूत्र वह संस्थान आपस में गहराई से जुड़े हैं। हमने इसी सिद्धांत पर उनकी चिकित्सा की और परिणाम यह रहा कि जहाँ अन्य पद्धतियाँ कई महीनो से संघर्ष कर रही थीं, वहाँ आयुर्वेद से उनकी हृदय गति अब बिल्कुल सामान्य है।”

3. 'विरुद्ध आहार' और हार्ट अटैक का संबंध

अक्सर हार्ट अटैक आने से ठीक पहले के भोजन पर कोई ध्यान नहीं देता। हमारा पेट हृदय के ठीक नीचे स्थित है। गर्मी के मौसम में विशेषकर उत्तर भारतीय राज्यों में मछली का सेवन, इसके अलावा पनीर के साथ पालक का सेवन इत्यादि अनेक कॉम्बिनेशन है जो खाने के तुरंत बाद, पेट में सूजन पैदा कर सीधे हृदय पर दबाव डालते है जो की कुछ ही समय में हार्ट अटैक में परिवर्तित हो सकता है। आयुर्वेद में पेट के रोग “विदग्धाजीर्ण” के लक्षण हार्ट अटैक से बहुत मिलते-जुलते बताए गए हैं। इसलिए, आहार की उचित समझ आपको हृदय रोग से बचा सकती है।

4. Cooking oil और हृदय रोग का सम्बंध।

आपको शायद याद हो, एक बहुत प्रसिद्ध क्रिकेटर एक नामी गिरामी कम्पनी का हार्ट के लिए लाभदायक रेफ़ायंड ओईल का ऐड करता था। परिस्थितियाँ ऐसे बनी की उसी क्रिकेटर को खुद कुछ समय बाद हार्ट अटैक अगया जबकि उसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं थी। यह दर्शाता है की मार्केटिंग के नाम पर भारतीय लोगों को कैसे बेवक़ूफ़ बनाया जाता है।

आधुनिकता के चलते लोग अब रिफाइंड तेल इत्यादि पर शिफ़्ट हो गए हैं। रिफाइंड तेल हृदय की धमनियों में रूखापन बढ़ाता है। शरीर में हृदय की नसों को लचीला बने रहने के लिए प्राकृतिक चिकनाई चाहिए। रिफाइंड तेल के अधिक प्रयोग से नसें सख्त और मोटी हो जाती हैं, जिसे 'आर्टेरियोस्क्लेरोसिस' कहते हैं। इससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा आज कल प्रयोग में लाए जाने वाले ऑलिव ओईल इत्यादि भी हीट स्टेबल ना होने के कारण हृदय के लिए लाभकारी नहीं होते। इसीलिए, भोजन में कच्ची घानी सरसों का तेल, मोमफलि का तेल, तिल का तेल और शुद्ध गाय का घी का प्रयोग ही सर्वश्रेष्ठ है।

5. जिम और वर्कआउट: अति सर्वत्र वर्जयेत

आयुर्वेद में व्यायाम का स्पष्ट नियम कहता है कि अपनी शक्ति से आधा किया व्यायाम ही लाभकारी है। गर्मी और बारिश के मौसम में, जब हमारा शरीर प्राकृतिक रूप से कमजोर और थका हुआ रहता है, तब भारी वर्कआउट या ओवर-एक्सरसाइज हृदय पर अत्यधिक दबाव डालती है। लोग अक्सर मौसम और अपनी शारीरिक क्षमता/बल को नजरअंदाज कर 'एग्जर्शन' (Exertion) करते हैं, जो हार्ट फेलियर का कारण बन सकता है। व्यायाम उतना ही करें जिससे शरीर में हल्कापन आए, न कि इतनी थकान कि हृदय की धड़कन अनियंत्रित हो जाए।

हृदय को सुरक्षित रखने के सुझाव:

च्यवनप्राश एक ऐसा रसायन है जो प्रसिद्ध तो केवल इम्यूनिटी के लिए है लेकिन इसके लाभों में हृदय रोग नाशक ऐसी टिप्पणी आइ है। इसके सेवन से हृदय की मांसपेशियों बलवान बनती है।

वेगों/natural urges को ना रोकें। आयुर्वेद में आंसू को रोकने से हृदय रोग होना ऐसा सीधा वर्णन मिलता है। यही कारण है की पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में हार्ट अटैक कम देखने को मिलता है।

भोजन में खटाई या टमाटर की जगह अनारदाना और आँवले का चूर्ण का नियमित सेवन हृदय रोगों से बचाव कर सकता है।

हृदय स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनें, आयुर्वेद को अपनाएं।

— नाड़ि वैद्य राहुल गुप्ता
श्री विश्व प्रांगण आयुर्वेद एवं पंचकर्म क्लिनिक
Mob- 78953-72936

सावधान: कहीं 'मल्टीग्रेन' और 'मिलेट्स' के चक्कर में आप अपनी सेहत तो नहीं खो रहे? आजकल हर जगह मिलेट्स (मोटे अनाज) और मल्ट...
26/03/2026

सावधान: कहीं 'मल्टीग्रेन' और 'मिलेट्स' के चक्कर में आप अपनी सेहत तो नहीं खो रहे?

आजकल हर जगह मिलेट्स (मोटे अनाज) और मल्टीग्रेन आटे का शोर है। लोग वजन घटाने या डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए वर्षों से खाए जा रहे गेहूं को छोड़ रहे हैं। लेकिन क्या आयुर्वेद भी यही कहता है? आइए जानते हैं शास्त्रोक्त सच।

1. गेहूँ: शरीर के लिए 'अमृत' और नित्य सेवनीय
आयुर्वेद में गेहूं को 'नित्य सेवनीय' (रोजाना खाने योग्य) बताया गया है। यह शरीर को केवल कैलोरी नहीं, बल्कि ओज और बल देता है।

"गोधूम: मधुर: शीतो विपाके स्वादु रेचन:।
वातपित्तहरो वृष्यो जीवनो बलकृद् गुरु:॥"
(सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु, धान्यवर्ग)

अर्थ: गेहूं स्वाद में मधुर, तासीर में शीतल और पचने के बाद भी मधुर रहता है। यह वात और पित्त दोष को शांत करता है, शरीर की धातुओं को पोषण देता है और जीवन शक्ति (Vitality) बढ़ाता है।

2. मिलेट्स (मोटे अनाज) का सच: क्या ये 'रोग उत्पादक' हैं?
मिलेट्स (बाजरा, रागी, कोदो आदि) को आयुर्वेद में 'कुधान्य' या 'क्षुद्र धान्य' कहा गया है। इनका स्वभाव रूखा होता है।

"कषायमधुरा रूक्षा विपाके कटुकास्तथा।
वातला: श्लेष्मपित्तघ्ना: बद्धाविण्मूत्रशोषणा:॥"
(सन्दर्भ: चरक संहिता, सूत्रस्थान 27)

अर्थ: ये अनाज रूखे (Dry) और पचने पर तीखे (कटु) होते हैं। इनका निरंतर सेवन शरीर में 'वात' बढ़ाता है। आज जो लोग गेहूं छोड़कर पूरी तरह मिलेट्स पर हैं, उन्हें भविष्य में जोड़ों का दर्द, नसों की कमजोरी और पुरानी कब्ज जैसी बीमारियां घेर सकती हैं।

3. मल्टीग्रेन आटा और डायबिटीज का भ्रम
डायबिटीज के मरीजों को अक्सर कई अनाजों को मिलाकर खाने की सलाह दी जाती है, जो आयुर्वेद के अनुसार पाचन के लिए घातक है।

"विरुद्धमपि चाहारं विद्याद्विषगरोपमम्।”
(सन्दर्भ: चरक संहिता)

मंदाग्नि का कारण: हर अनाज का पचने का समय (Cooking & Digestion time) अलग होता है। जब आप उन्हें मिलाते हैं, तो जठराग्नि भ्रमित हो जाती है।

अनेकद्रव्य मिश्रण: शास्त्रों के अनुसार बहुत सारे द्रव्यों को मिलाकर खाने से पाचन मंद हो जाता है, जिससे शरीर में 'आम' (Toxins) बनते हैं। यही 'आम' डायबिटीज की जटिलताओं (Complications) को और बढ़ाता है।


नाड़ि वैद्य राहुल गुप्ता
BAMS, MD
श्री: विश्व प्रांगण आयुर्वेद चिकित्सालय, हल्द्वनी
सम्पर्क- 78953-72936

   भारतीय घरों में प्रयोग की जाने वाली मेहंदी (हिना) बार-बार होने वाले आँखों के गम्भीर रोग Uveitis (यूवाइटिस) से कर सकती...
18/03/2026




भारतीय घरों में प्रयोग की जाने वाली मेहंदी (हिना) बार-बार होने वाले आँखों के गम्भीर रोग Uveitis (यूवाइटिस) से कर सकती है बचाव!

* आयुर्वेद अनुसार रोग निर्माण के पीछे अनेक कारण होते हैं, जिसमें ख़राब जीवन शैली, आहार, व्यसन, निद्रा, मानसिक तनाव, विष इत्यादि सभी (कुछ कम तो कुछ ज़्यादा) अपनी अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं। आयुर्वेद में Uveitis (यूवाइटिस) को मुख्य रूप से 'अधिमंथ' या 'दृष्टिगत रोग' के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है। इसमें विशेष रूप से रक्तज और पित्तज दोष की प्रधानता रहती है।
दोषों का विवरण:
पित्त दोष: आंखों में लालिमा (redness), जलन और सूजन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
रक्त दोष: पित्त के साथ मिलकर यह आंखों की गंभीर सूजन और दृष्टि में धुंधलेपन का कारण बनता है जिससे आँखों की रोशनी भी जाना सम्भव है।

* सर पर लागाए जाने वाले किसी भी तरह के अप्राकृतिक/ रासायनिक द्रव्यों का प्रयोग आँखों के गम्भीर रोग uveitis के बार-बार होने में एक प्रमुख कारण हो सकता है। आधुनिक रीसर्च के अनुसार हेयर डाई इत्यादि में मौजूद अमोनिया और PPD (पैरा-फेनिलीनडायमाइन) जैसे केमिकल्स आंखों में जलन, सूजन और एलर्जी और यूवाइटिस (Uveitis) का कारण बन सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति को पहले से ही ऑटोइम्यून समस्या है, तो डाई से होने वाला गंभीर एलर्जिक रिएक्शन शरीर के इम्यून सिस्टम को उत्तेजित कर सकता है, जो परोक्ष रूप से आंखों की आंतरिक सूजन (फ्लेयर-अप) को ट्रिगर कर सकता है। यह रसायन (chemical) आयुर्वेद दृष्टिकोण से विष समान कार्य कर Uveitis (यूवाइटिस) का कारण बनता है।

जब रोग के पीछे का कारण कपाल (scalp) पर लगने वाला रसायन (chemical) हो तो उसके उसके उपचार के लिए उसी स्थान का प्रयोग कर रोग को रोकना के लिए भी किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार मेहंदी (मदयंतिका) के लाभकारी गुणों का वर्णन मुख्य रूप से इसके शीत वीर्य (Cooling nature) और रक्तशोधक (Blood purifier) गुणों के संदर्भ में मिलता है। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ भावप्रकाश निघंटु में मेहंदी (मदयंतिका) के विष-नाशक और कुष्ठ-नाशक गुणों का स्पष्ट वर्णन मिलता है।

प्रमुख श्लोक:
“मदयंतिका लघु रूक्षा कषाय तिक्त शीतला।
कफपित्तप्रशमनी कुष्ठघ्नी सा विषप्रणुत्॥”

अर्थ और व्याख्या:
१) विषप्रणुत् (Toxicology): यह शरीर से विषैले तत्वों (Toxins) को बाहर निकालने और उनके प्रभाव को शांत करने में सक्षम है।
२) कफपित्तप्रशमनी: यह शरीर में बढ़े हुए कफ और पित्त दोष को संतुलित करती है, जिससे रक्त की अशुद्धि दूर होती है।
३) कुष्ठघ्नी: त्वचा संबंधी गंभीर रोगों और घावों को भरने के लिए इसे रामबाण माना गया है।

मेहंदी का नियमित प्रयोग ना केवल आपके बालों के लिए अच्छा है अपितु इसके शीत, रक्त शोधक और विष नाशक गुण के चलते यह नेत्र के गम्भीर रोग Uveitis (यूवाइटिस) फ्लेयर-अप/ recurrence को रोकने में भी सक्षम है।

* मेहंदी रसायन/ chemical जन्य पालित्य (allopecia) में भी लाभकरक है और कुछ समय के उपयोग में ही सर पर बाल उगना शुरू हो जाते हैं।

विशेष सावधानी- हर्बल/ आयुर्वेद के नाम पर कई कम्पनियाँ पैकिज्ड मेहंदी (हिना) में रसायनो (chemicals) का प्रयोग करती है इसलिए, मेहंदी (हिना) के सूखे पत्तों को घर लाकर फिर उसका पाउडर बना कर प्रयोग में लाएँ। मेहंदी बनाते समय इसमें दही, अंडा इत्यादि सामग्रियों का प्रयोग करें से बचें अन्यथा इसका विष नाशक और रक्त शोधक गुण बाधित होगा।
नाड़ि वैद्य राहुल गुप्ता
BAMS, MD

क्या वाक़ई तांबे का बर्तन आपके स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है?आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ 'रसजलनिधि' और 'आयुर्वेद प्रकाश' ...
13/03/2026

क्या वाक़ई तांबे का बर्तन आपके स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है?

आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ 'रसजलनिधि' और 'आयुर्वेद प्रकाश' में ताम्र (तांबे) के तीव्र प्रभाव के कारण उसे 'महाविष' के समान माना गया है। इसका मुख्य श्लोक निम्नलिखित है:

“शुद्धं ताम्रं मृतं चैव महाविषहरं परम्।
अशुद्धं चामृतं ताम्रं हन्ति प्राणान्न संशयः॥”

श्लोक का अर्थ
* शुद्ध और मृत ताम्र: यदि तांबे का सही से शोधन और मारण (भस्म) किया जाए, तो यह महाविष को भी हरने वाला होता है।
* अशुद्ध ताम्र: इसके विपरीत, यदि तांबा अशुद्ध हो या उसकी भस्म सही न बनी हो, तो वह स्वयं महाविष की तरह कार्य करता है और व्यक्ति के प्राण ले सकता है।

क्योंकि तांबे का बर्तन आयुर्वेद अनुसार किसी भी शोधन प्रक्रिया से नहीं गुजरता इसलिए यह प्रत्येक अवस्था में विषाक्त परिणाम दर्शाता है। किसी-किसी अवस्था में तो ताम्बे के ये विषाक्त गुण कई गुना तक बढ़ जाते है।

'रसजलनिधि' के द्वितीय खण्ड में ताम्र दोषों का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि:

"ताम्रपात्रे न पक्तव्यं न च देयं कदाचन।
अम्लं च लवणं चैव तक्रं काञ्जिकमेव च॥”

भावार्थ: तांबे के बर्तन में कभी भी (अग्नि पर) पकाना नहीं चाहिए, और न ही इसमें खट्टे पदार्थ, नमक, छाछ या कांजी रखनी चाहिए।
जब आप तांबे में पानी उबालते हैं, तो अग्नि के संपर्क से तांबे के अष्ट-महादोष (जैसे वमन, मोह और अरुचि) सक्रिय होकर जल में घुल जाते हैं, जिससे वह जल स्वास्थ्य के लिए 'विष' के समान हानिकारक हो जाता है। विशेषकर यदि जल में लवण (Salt) या हल्की अम्लता हो, तो यह प्रतिक्रिया और भी घातक होती है। तांबे के पात्र में रखा हुआ जल पीने से जो पाचन तंत्र में सुधार आता है वह भी तांबे के इसी विषाक्त गुण के कारण होता है। चूँकि ठंडे पानी में तांबे के दोष पूर्ण रूप से घुल नहीं पाते इसलिए अल्प रूप में यह विष पचन में हितकारी होता है।

विचारणीय विषय:

१) आजकल के मॉडर्न वॉटर फ़िल्टेरों में UV और COPPER दोनो साथ में आते हैं जो की तांबे और अग्नि सम्पर्क की चेतावनी को दरकीनार कर स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़े ख़तरे के रूप में सामने आ सकता है। यह विष कई वर्षों के सेवन के पश्चात आज के परिपेक्ष के गम्भीर रोग जैसे कैन्सर इत्यादि को करने में सक्षम है।

२) तांबे का बर्तन शुक्र (s***m) के हानिकारक होता है इसीलिए COPPER T जैसे इंप्लांट में तांबे का प्रयोग होता है। यही कारण है की अगर युवा व्यक्ति तांबे के बर्तन का प्रयोग करता है तो वह उसकी पुंसत्व (fertility) के लिए हानिकारक रहेगा।

वैद्य राहुल गुप्ता

क्या आप जानते है, सिन्थेटिक फ़ाइबर से बने कपड़ों को पहनने से सोरीयसिस जसे अनेक त्वचा विकारों में गम्भीर लक्षणो की उत्पत्...
27/02/2026

क्या आप जानते है, सिन्थेटिक फ़ाइबर से बने कपड़ों को पहनने से सोरीयसिस जसे अनेक त्वचा विकारों में गम्भीर लक्षणो की उत्पत्ति सम्भव है। यह कार्य फ़ाइबर द्वारा छोड़े गए हानिकारक रसायनो द्वारा होता है। इससे बचेने के लिए जैविक कपास (organic cotton) के कपड़ों का प्रयोग लाभकारी रहेगा।


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