वैदिक चिकित्सक राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी 'राघव'

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वैदिक चिकित्सक राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी 'राघव' योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा ग? A person who Believes in ''Sarva Dharm Sambhav'' .

Nadi Pariksha - वात-पित्त-कफ का फील: उंगलियों से नाड़ी को समझने का आसान तरीका - आयुर्वेद में नाड़ी परीक्षा (Pulse Diagno...
19/03/2026

Nadi Pariksha - वात-पित्त-कफ का फील: उंगलियों से नाड़ी को समझने का आसान तरीका - आयुर्वेद में नाड़ी परीक्षा (Pulse Diagnosis) को एक बहुत बड़ा वरदान माना गया है।

इसकी मदद से सिर्फ बीमारी ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की पूरी शारीरिक और मानसिक स्थिति को समझा जा सकता है।

नाड़ी के जरिए हम जान सकते हैं:

शरीर में कौन सा दोष (वात, पित्त, कफ) बढ़ा हुआ है
धातुओं (रस, रक्त, मांस आदि) की स्थिति कैसी है
जठराग्नि (डाइजेशन) कैसा काम कर रही है
शरीर के अंदरूनी अंगों की स्थिति क्या है
और यहां तक कि व्यक्ति की भावनाएं और मानसिक स्थिति भी

यानी आपकी उंगलियों के नीचे, पूरी बॉडी की “लाइव रिपोर्ट” मिल सकती है।

सबसे पहले बेसिक समझ लो—हमारे शरीर में वात-पित्त-कफ लगातार बहते रहते हैं, जैसे ब्लड फ्लो करता है। इसलिए इनका एहसास भी हमें शरीर में कहीं ना कहीं मिलता है—और सबसे साफ जगह है हमारी उंगलियाँ।

नाड़ी परीक्षा कैसे की जाती है
नाड़ी जांचने के लिए हाथ और उंगलियों की सही पोजीशन बहुत जरूरी है।

पुरुष (Male) - दाहिने (Right) हाथ की नाड़ी
महिला (Female) - बाएं (Left) हाथ की नाड़ी

जब हम नाड़ी चेक करते हैं, तो तीन उंगलियाँ काम में आती हैं:

इंडेक्स फिंगर
मिडल फिंगर
रिंग फिंगर

यहीं पर हमें तीनों दोषों का अलग-अलग फील मिलता है।

नाड़ी का बेसिक लॉजिक: कहाँ क्या महसूस होता है
जब आप उंगलियाँ रखते हो, तो हर दोष की एक खास जगह होती है:

वात (Vata) - इंडेक्स फिंगर के टिप (डिस्टल एंड) पर

पित्त (Pitta) - मिडल फिंगर के बीच (मिडल पार्ट) में

कफ (Kapha) - रिंग फिंगर के बेस (प्रॉक्सिमल एंड) पर

मतलब साफ है—तीनों दोष एक ही जगह नहीं मिलते, बल्कि अलग-अलग पॉइंट पर अपनी पहचान देते हैं।

ध्यान रखें:

तीनों उंगलियाँ एक लाइन में हों
आपस में चिपकी हुई नहीं, हल्का गैप हो
रेडियल बोन के ठीक नीचे सही जगह पर रखें

अगर पोजीशन सही होगी, तो नाड़ी साफ और पूरी (full) महसूस होगी।

स्पाइक का कॉन्सेप्ट: असली फील क्या है
नाड़ी पढ़ते समय जो “झटका” या “उछाल” महसूस होता है, उसे स्पाइक कह सकते हैं।

वात का स्पाइक हल्का, तेज और मूविंग होता है
पित्त का स्पाइक मिड में स्टेबल और थोड़ा गर्म फील देता है
कफ का स्पाइक भारी, स्लो और गहराई में महसूस होता है

यह फीलिंग ही असली आर्ट है—यहीं से आप समझते हैं कि शरीर में क्या चल रहा है।

नॉर्मल vs अननॉर्मल गति समझना जरूरी है
हर दोष की एक नॉर्मल चाल (movement) होती है:

वात - हल्की, तेज, सर्प जैसी
पित्त - उछलती, मेंढक जैसी
कफ - स्थिर, हंस जैसी

लेकिन जब यही चाल बदल जाती है—तो वो संकेत देती है कि अंदर कुछ imbalance चल रहा है।

तीनों दोष हर उंगली में क्यों महसूस होते हैं?
अब एक इंट्रेस्टिंग बात—ऐसा नहीं है कि वात सिर्फ इंडेक्स पर ही होगा।
तीनों दोष हर उंगली पर थोड़े-बहुत मिलते हैं, लेकिन:

उनकी strong presence अपनी-अपनी जगह पर होती है
बाकी जगह पर उनकी subtle (हल्की) presence होती है
यानी हर उंगली एक तरह से पूरी कहानी बता रही है, बस ध्यान से समझना है।

प्रेशर डालने से क्या बदलता है?
अगर आप उंगली से ज्यादा दबाव डालते हो, तो दोष का फील दूसरी जगह शिफ्ट भी हो सकता है।

जैसे:

इंडेक्स पर ज्यादा दबाव - वात का एहसास थोड़ा दूर या शिफ्ट हो सकता है
मिडल पर दबाव - पित्त का फील दूसरी उंगलियों में दिख सकता है
रिंग पर दबाव - कफ का असर ऊपर की तरफ महसूस हो सकता है

इसलिए नाड़ी पढ़ना सिर्फ उंगली रखना नहीं है—यह सही प्रेशर का खेल है।

दोषों की नेचर समझो, तभी नाड़ी समझ आएगी
हर दोष की अपनी पर्सनालिटी होती है:

वात - हल्का, ड्राय, तेज, मूविंग
पित्त - गर्म, तीखा, एक्टिव
कफ - भारी, स्लो, स्थिर

इन्हीं गुणों के आधार पर आप फील को पहचानते हो।

मूवमेंट का सीक्रेट: कौन आगे चलता है?
अगर आप कल्पना करो कि तीनों दोष एक साथ बह रहे हैं:

सबसे आगे - वात (हमेशा मूवमेंट में)
उसके पीछे - पित्त
सबसे पीछे - कफ

इसीलिए नाड़ी में भी उनकी पोजिशन और फील उसी हिसाब से मिलती है।

प्रकृति vs विकृति: क्या देखना है
नाड़ी से दो चीजें समझनी होती हैं:

1. प्रकृति (Natural body type)
व्यक्ति का बेस नेचर क्या है

जैसे कोई naturally वात, पित्त या कफ प्रधान है

2. विकृति (Imbalance)
अभी शरीर में क्या गड़बड़ चल रही है
कौन सा दोष बढ़ा हुआ है

ध्यान रखो—नाड़ी सब कुछ नहीं बताती, यह सिर्फ एक powerful संकेत (signal) देती है।

नाड़ी के 7 मुख्य संकेत (Seven Characters of Pulse)
एक अच्छा नाड़ी विशेषज्ञ इन 7 चीजों को समझता है:

1. गति (Movement)
नाड़ी की चाल कैसी है—तेज, धीमी, उछलती या लहरदार।

2. वेग (Rate)
एक मिनट में कितनी बीट्स हैं।

वात - तेज
पित्त - मध्यम
कफ - धीमी

लेकिन ध्यान रखें—यह उम्र, एक्सरसाइज, इमोशन और बीमारी के हिसाब से बदल सकता है।

3. तापमान (Temperature)
छूने पर नाड़ी कैसी लगती है:

ठंडी - वात या कफ
गर्म - पित्त

यह जठराग्नि (मेटाबॉलिज्म) का संकेत देता है।

4. आकृति (Volume + Tension)
वॉल्यूम - सिस्टोलिक प्रेशर (ब्लड का थ्रो)
टेंशन - डायस्टोलिक प्रेशर (स्थिर दबाव)

इससे हार्ट की कार्यक्षमता और ब्लड फ्लो का अंदाजा लगता है।

5. ताल (Rhythm)
बीट्स के बीच का अंतर:

नॉर्मल - नियमित (Regular)
अनियमित - वात दोष गड़बड़

अगर बीट मिस हो रही है या रिदम टूट रही है, तो यह अंदर की समस्या का संकेत है।

6. कठिनता (Consistency of Vessel)
ब्लड वेसल (धमनी) की कठोरता:

वात बढ़ा - रफ, हार्ड (artery सख्त)
पित्त बढ़ा - नाजुक, जल्दी टूटने वाली
कफ बढ़ा - मोटी, भारी (fat deposition)

इससे भविष्य की बीमारियों का अंदाजा भी लगाया जा सकता है।

7. बल (Force of Pulse)
जब आप हल्का दबाव डालते हैं, तो नाड़ी कितनी ताकत से जवाब देती है।

ज्यादा बल - हार्ट पर ज्यादा स्ट्रेस
कम बल - हार्ट की कमजोरी

यह सिस्टोलिक और डायस्टोलिक प्रेशर के अंतर से जुड़ा होता है।

नाड़ी से बीमारी का अंदाजा कैसे लगता है
नाड़ी सिर्फ बीट नहीं है—यह एक पैटर्न है।

उदाहरण:

अगर कफ नाड़ी बहुत भारी और धीमी हो - लिंफ ब्लॉकेज या मोटापा
अगर पित्त नाड़ी बहुत तेज और गर्म हो - इंफ्लेमेशन या एसिडिटी
अगर वात नाड़ी अनियमित हो - गैस, एंग्जायटी, नर्वस इश्यू

यानी नाड़ी आपको बीमारी का नाम नहीं, बल्कि रूट कॉज़ बताती है।

मशीन vs नाड़ी चिकित्सा
आज मशीन से हमें सिर्फ:

Pulse rate
Graph

मिलता है।

लेकिन नाड़ी चिकित्सा से हम समझते हैं:

कौन सा दोष किसे ब्लॉक कर रहा है
शरीर में असली imbalance क्या है
यही फर्क इसे खास बनाता है।

प्रैक्टिस ही असली गुरु है
शुरुआत में सब एक जैसा लगेगा,
लेकिन धीरे-धीरे:

उंगलियाँ संवेदनशील हो जाएंगी
दिमाग में पैटर्न सेव हो जाएगा
और आप नॉर्मल vs अननॉर्मल पहचानने लगेंगे
यही असली स्किल है।
नाड़ी पढ़ना = Awareness का खेल
असल में नाड़ी विज्ञान कोई मैजिक नहीं है—यह आपकी awareness पर depend करता है:

आप कितनी बारीकी से फील कर सकते हो
आप स्पाइक को अलग-अलग पहचान सकते हो या नहीं
आपका माइंड कितना फोकस्ड है
जिसने यह समझ लिया, उसने नाड़ी पढ़ना शुरू कर दिया।

साभार: फेसबुक

07/12/2025

(अनिद्रा रोग) Insomnia नींद न आने के प्रकार और सम्बन्धित समस्याओं की होम्योपैथिक ओषधि-

परिचय- यह रोग कई बार तो किसी दूसरे रोग का लक्षण होता है इसलिए इस रोग को ठीक करने के लिए ऐसी औषधियों को उपयोग करना चाहिए जो किसी ऐसे रोग को ठीक करता हो जिसमें नींद न आने के लक्षण उत्पन्न हों। ऐसे औषधि जहां इस रोग को ठीक करेगी, वही वह नींद भी लाने में मदद करेगी। होम्योपैथी में सिर्फ नींद लाने के लिए कोई विशेष औषधि नहीं है और प्रत्येक औषधि का नींद पर प्रभाव पड़ता है इसलिए मुख्य-रोग के लिए चुनाव ही ऐसी औषधि का होना चाहिए जिसमें मुख्य रोग के लक्षणों के साथ नींद के लक्षण भी हों।

यदि नींद न आना ही एकमात्र लक्षण हो दूसरा कोई लक्षण न हो तब इस प्रकार की औषधियां लाभकारी है जिनका नींद लाने पर विशेष-प्रभाव होता है जैसे- कैल्केरिया कार्ब, सल्फर, फॉसफोरस, कॉफिया या ऐकानाइट आदि।

कारण :- सिर में रक्त की अधिकता, सिर का अधिक ठंडा होना, अधिक खाना, उपवास, बहुत ज्यादा चाय या कॉफी का सेवन करना, मानसिक उत्तेजना होना, कब्ज की समस्या होना या अधिक चिंता होना आदि कारणों से यह रोग होता है। कई प्रकार के रोग होने के कारण से भी नींद न आने की शिकायत हो सकती है।

विभिन्न औषधियों से चिकित्सा-
१. लाइकोडियम- दोपहर के समय में भोजन करने के बाद नींद तेज आ रही हो और नींद खुलने के बाद बहुत अधिक सुस्ती महसूस हो तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए लाइकोडियम औषधि की ३० शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।

२. चायना- रक्त-स्राव या दस्त होने के कारण से या शरीर में अधिक कमजोरी आ जाने की वजह से नींद न आना या फिर चाय पीने के कारण से अनिद्रा रोग हो गया हो तो उपचार करने के लिए चायना औषधि ६ या ३० शक्ति का उपयोग करना लाभदायक है।

३. कैल्केरिया कार्ब - इस औषधि की ३० शक्ति का उपयोग दिन में तीन-तीन घंटे के अंतराल सेवन करने से रात के समय में नींद अच्छी आने लगती है। यह नींद किसी प्रकार के नशा करने के समान नींद नहीं होती बल्कि नींद होती है।

४. कॉफिया - खुशी के कारण नींद न आना, लॉटरी या कोई इनाम लग जाने या फिर किसी ऐसे समाचार सुनने से मन उत्तेजित हो उठे और नींद न आए, मस्तिष्क इतना उत्तेजित हो जाए कि आंख ही बंद न हो, मन में एक के बाद दूसरा विचार आता चला जाए, मन में विचारों की भीड़ सी लग जाए, मानसिक उत्तेजना अधिक होने लगे, ३ बजे रात के बाद भी रोगी सो न पाए, सोए भी तो ऊंघता रहे, चौंक कर उठ बैठे, नींद आए भी तो स्वप्न देखे। इस प्रकार के लक्षण रोगी में हो तो उसके इस रोग का उपचार करने के लिए कॉफिया औषधि की २०० शक्ति का उपयोग करना चाहिए। यह नींद लाने के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि है। यदि गुदाद्वार में खुजली होने के कारण से नींद न आ रही हो तो ऐसी अवस्था में भी इसका उपयोग लाभदायक होता है। रोगी के अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए कॉफिया औषधि की ६ या ३० शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।

५. जेल्सीमियम - यदि उद्वेगात्मक-उत्तेजना (इमोशनल एक्साइटमेंट) के कारण से नींद न आती हो तो जेल्सीमियम औषधि के सेवन से मन शांत हो जाता है और नींद आ जाती है। किसी भय, आतंक या बुरे समाचार के कारण से नींद न आ रही हो तो जेल्सीमियम औषधि से उपचार करने पर नींद आने लगती है। अधिक काम करने वाले रोगी के अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए जेल्सीमियम औषधि का उपयोग करना चाहिए। ऐसे रोगी जिनको अपने व्यापार के कारण से रात में अधिक बेचैनी हो और नींद न आए, सुबह के समय में उठते ही और कारोबार की चिंता में डूब जाते हों तो ऐसे रोगियों के इस रोग को ठीक करने के लिए जेल्सीमियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

६. ऐकोनाइट - बूढ़े-व्यक्तियों को नींद न आ रही हो तथा इसके साथ ही उन्हें घबराहट हो रही हो, गर्मी महसूस हो रही हो, चैन से न लेट पायें, करवट बदलते रहें। ऐसे बूढ़े रोगियों के इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की ३० का उपयोग करना लाभकारी है। यह औषधि स्नायु-मंडल को शांत करके नींद ले आती है। किसी प्रकार की बेचैनी होने के कारण से नींद न आ रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइट औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।

७. कैम्फर - नींद न आने पर कैम्फर औषधि के मूल-अर्क की गोलियां बनाकर, घंटे आधे घंटे पर इसका सेवन करने से नींद आ जाती है।

८. इग्नेशिया - किसी दु:ख के कारण से नींद न आना, कोई सगे सम्बंधी की मृत्यु हो जाने से मन में दु:ख अधिक हो और इसके कारण से नींद न आना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी को इग्नेशिया औषधि की २०० शक्ति का सेवन करना चाहिए। यदि किसी रोगी में भावात्मक या भावुक होने के कारण से नींद न आ रही हो तो उसके इस रोग का उपचार इग्नेशिया औषधि से करना लाभदायक होता है। हिस्टीरिया रोग के कारण से नींद न आ रही हो तो रोग का उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की २०० शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है। यदि रोगी को नींद आ भी जाती है तो उसे सपने के साथ नींद आती है, देर रात तक सपना देखता रहता है और रोगी अधिक परेशान रहता है। नींद में जाते ही अंग फड़कते हैं नींद बहुत हल्की आती है,नींद में सब-कुछ सुनाई देता है और उबासियां लेता रहता है लेकिन नींद नहीं आती है। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए इग्नेशिया औषधि का उपयोग करना उचित होता है। मन में दु:ख हो तथा मानसिक कारणों से नींद न आए और लगातार नींद में चौंक उठने की वजह से नींद में गड़बड़ी होती हो तो उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की ३ या ३० शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है।

९. बेलाडोना - मस्तिष्क में रक्त-संचय होने के कारण से नींद न आने पर बेलाडोना औषधि की ३० शक्ति का उपयोग करना चाहिए। रोगी के मस्तिष्क में रक्त-संचय (हाइपरमिया) के कारण से रोगी ऊंघता रहता है लेकिन मस्तिष्क में थकावट होने के कारण से वह सो नहीं पाता। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए के लिए भी बेलाडोना औषधि उपयोगी है। रोगी को गहरी नींद आती है और नींद में खर्राटे भरता है, रोगी सोया तो रहता है लेकिन उसकी नींद गहरी नहीं होती। रोगी नींद से अचानक चिल्लाकर या चीखकर उठता है, उसकी मांस-पेशियां फुदकती रहती हैं, मुंह भी लगतार चलता रहता है, ऐसा लगता है मानो वह कुछ चबा रहा हो, दांत किटकिटाते रहते हैं। इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही रोगी का मस्तिष्क शांत नहीं रहता। जब रोगी को सोते समय से उठाया जाता है तो वह उत्तेजित हो जाता है, अपने चारों तरफ प्रचंड आंखों (आंखों को फाड़-फाड़कर देखना) से देखता है, ऐसा लगता है कि मानो वह किसी पर हाथ उठा देगा या रोगी घबराकर, डरा हुआ उठता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए बेलाडोना औषधि की ३० शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है।

१०. काक्युलस- यदि रात के समय में अधिक जागने के कारण से नींद नहीं आ रही हो तो ऐसे रोगी के इस लक्षण को दूर करने के लिए काक्युलस औषधि की ३ से ३० शक्ति का उपयोग करना चाहिए। जिन लोगों का रात के समय में जागने का कार्य करना होता है जैसे-चौकीदार, नर्स आदि, उन्हें यदि नींद न आने की बीमारी हो तो उनके लिए कौक्युलस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद है। यदि नींद आने पर कुछ परेशानी हो और इसके कारण से चक्कर आने लगें तो रोग को ठीक करने के लिए कौक्युलस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।

११. सल्फर - रोगी की नींद बार-बार टूटती है, जरा सी भी आवाज आते ही नींद टूट जाती है, जब नींद टूटती है तो रोगी उंघाई में नहीं रहता, एकदम जाग जाता है, रोगी की नींद कुत्ते की नींद के समान होती है। रोगी के शरीर में कहीं न कहीं जलन होती है, अधिकतर पैरों में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि की ३० शक्ति का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।

१२. नक्स वोमिका - रोगी का मस्तिष्क इतना कार्य में व्यस्त रहता है कि वह रात भर जागा रहता है, व्यस्त मस्तिष्क के कारण नींद न आ रही हो, मन में विचारों की भीड़ सी लगी हो, आधी रात से पहले तो नींद आती ही नहीं यदि नींद आती भी है तो लगभग तीन से चार बजे नींद टूट जाती है। इसके घंटे बाद जब वह फिर से सोता है तो उठने पर उसे थकावट महसूस होती है, ऐसा लगता है कि मानो नींद लेने पर कुछ भी आराम न मिला हो। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स वोमिका औषधि का उपयोग कर सकते हैं।

किसी रोगी को आधी रात से पहले नींद नहीं आती हो, शाम के समय में नींद नहीं आती हो और तीन या चार बजे नींद खुल जाती हो, इस समय वह स्वस्थ अनुभव करता है लेकिन नींद खुलने के कुछ देर बाद उसे फिर नींद आ घेरती है और तब नींद खुलने पर वह अस्वस्थ अनुभव करता है, इस नींद के बाद तबीयत ठीक नहीं रहती। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स वोमिका औषधि का उपयोग करना चाहिए। कब्ज बनना, पेट में कीड़े होना, अधिक पढ़ना या अधिक नशा करने के कारण से नींद न आए तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए नक्स वोमिका औषधि की ६ या ३० शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।

१३.पल्स - रोगी शाम के समय में बिल्कुल जागृत अवस्था में होता है, दिमाग विचारों से भरा होता है, आधी रात तक नींद नहीं आती, बेचैनी से नींद बार-बार टूटती है, परेशानी भरे सपने रात में दिखाई देते हैं, गर्मी महसूस होती है, उठने के बाद रोगी सुस्त तथा अनमना स्वभाव का हो जाता है। आधी रात के बाद नींद न आना और शाम के समय में नींद के झोंके आना, रोगी का मस्तिष्क व्यस्त होता है अन्यथा साधारण तौर पर तो शाम होते ही नींद आती है और ३-४ बजे नींद टूट जाती है, इस समय रोगी रात को उठकर स्वस्थ अनुभव करता है, यह इसका मुख्य लक्षण शराब, चाय, काफी के सेवन के कारण नींद न आना है। ऐसी अवस्था में रोगी को पल्स औषधि का सेवन कराना चाहिए।

१४. सेलेनियम - रोगी की नींद हर रोज बिल्कुल ठीक एक ही समय पर टूटती है और नींद टूटने के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होने लगती है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी का उपचार करने के लिए सेलेनियम औषधि का उपयोग करना चाहिये।

१५. ऐम्ब्राग्रीशिया - रोगी अधिक चिंता में पड़ा रहता है और इस कारण से वह सो नहीं पाता है, वह जागे रहने पर मजबूर हो जाता है। व्यापार या कोई मानसिक कार्य की चिंता होने से नींद आने में बाधा पड़ती है। सोने के समय में तो ऐसा लगता है कि नींद आ रही है लेकिन जैसे ही सिर को तकिए पर रखता है बिल्कुल भी नींद नहीं आती है। इस प्रकार की अवस्था उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्राग्रीशिया औषधि की २ या ३ शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है। इस औषधि का उपयोग कई बार करना पड़ सकता है।

१६. फॉसफोरस - रोगी को दिन के समय में नींद रहती है, भोजन के बाद नींद नहीं आती लेकिन रात के समय में नींद बिल्कुल भी नहीं आती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए फॉसफोरस औषधि की ३० शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
वृद्ध-व्यक्तियों को नींद न आ रही हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि की ३० शक्ति का उपयोग करना चाहिए।

आग लगने या संभोग करने के सपने आते हों और नींद देर से आती हो तथा सोकर उठने के बाद कमजोरी महसूस होता हो तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए फॉसफोरस औषधि का उपयोग किया जा सकता है।

रोगी को धीरे-धीरे नींद आती है और रात में कई बार जाग पड़ता है, थोड़ी नींद आने पर रोगी को बड़ा आराम मिलता है, रोगी के रीढ़ की हड्डी में जलन होती है और रोग का आक्रमण अचानक होता है। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए फॉसफोरस औषधि की ३० शक्ति का प्रयोग करना अधिक लाभकारी है।

१७. टैबेकम- यदि स्नायुविक अवसाद (नर्वस ब्रेकडाउन) के कारण से अनिद्रा रोग हुआ हो या हृदय के फैलाव के कारण नींद न आने के साथ शरीर ठंडा पड़ गया हो, त्वचा चिपचिपी हो, घबराहट हो रही हो, जी मिचलाना और चक्कर आना आदि लक्षण हो तो रोग को ठीक करने के लिए टैबेकम औषधि की ३० शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।

१८. ऐवैना सैटाइवा - स्नायु-मंडल पर ऐवैना सैटाइवा औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है। ऐवैना सैटाइवा जई का अंग्रेजी नाम है। जई घोड़ों को ताकत के लिए खिलाई जाती है जबकि यह मस्तिष्क को ताकत देकर अच्छी नींद लाती है। कई प्रकार की बीमारियां शरीर की स्नायु-मंडल की शक्ति को कमजोर कर देती है जिसके कारण रोगी को नींद नहीं आती है। ऐसी स्थिति में ऐवैना सैटाइवा औषधि के मूल-अर्क के ५ से १० बूंद हल्का गर्म पानी के साथ लेने से स्नायुमंडल की शक्ति में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप नींद भी अच्छी आने लगती है। अफीम खाने की आदत को छुडाने के लिए भी ऐवैना सैटाइवा औषधि का उपयोग किया जा सकता है।

१९. स्कुटेलेरिया - यदि किसी रोगी को अनिद्रा रोग हो गया हो तथा सिर में दर्द भी रहता हो, दिमाग थका-थका सा लग रहा हो, अपनी शक्ति से अधिक काम करने के कारण उसका स्नायु-मंडल ठंडा पड़ गया हो तो ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए स्कुटेलेरिया औषधि का प्रयोग आधे-आधे घंटे के बाद इसके दस-दस बूंद हल्का गर्म पानी के साथ देते रहना चाहिए, इससे अधिक लाभ मिलेगा।

२०. सिप्रिपीडियम - अधिक खुशी का समाचार सुनकर जब मस्तिष्क में विचारों की भीड़ सी लग जाए और इसके कारण से नींद न आए या जब छोटे बच्चे रात के समय में उठकर एकदम से खेलने लगते हैं और हंसते रहते हैं और उन्हें नींद नहीं आती है। ऐसे रोगियों के अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए सिप्रिपीडियम औषधि के मूल-अर्क के ३० से ६० बूंद दिन में कई बार हल्का गर्म पानी के साथ सेवन कराना चाहिए। रात में अधिक खांसी होने के कारण से नींद न आ रही हो तो सिप्रिपीडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप खांसी से आराम मिलता है और नींद आने लगती है।

२१. कैमोमिला - दांत निकलने के समय में बच्चों को नींद न आए और जंहाई आती हो और बच्चा ऊँघता रहता हो लेकिन फिर भी उसे नींद नहीं आती हो, उसे हर वक्त अनिद्रा और बेचैनी बनी रहती हो। ऐसे रोगियों के इस रोग को ठीक करने के लिए कैमोमिला औषधि की १२ शक्ति का सेवन कराने से अधिक लाभ मिलता है।

२२. बेल्लिस पेरेन्निस- यदि किसी रोगी को सुबह के तीन बजे के बाद नींद न आए तो बेल्लिस पेरेन्निस औषधि के मूल-अर्क या ३ शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है।
२३. कैनेबिस इंडिका- अनिद्रा रोग (ओब्सीनेट इंसोम्निया) अधिक गंभीर हो और आंखों में नींद भरी हुई हो लेकिन नींद न आए। यदि रोगी में इस प्रकार के लक्षण हैं तो कैनेबिस इंडिका औषधि के मूल-अर्क या ३ शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद है। इस प्रकार के लक्षण होने पर थूजा औषधि से भी उपचार कर सकते हैं।

२४. पल्सेटिला- रात के समय में लगभग ११ से १२ बजे नींद न आना। इस लक्षण से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पल्सेटिला औषधि की ३० शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

२५. सिमिसि- यदि स्त्रियों के वस्ति-गन्हर की गड़बड़ी के कारण से उन्हें अनिद्रा रोग हो तो उनके इस रोग का उपचार करने के लिए सिमिसि औषधि की ३ शक्ति का उपयोग किया जाना चाहिए।

२६. साइना- पेट में कीड़े होने के कारण से नींद न आने पर उपचार करने के लिए साइना औषधि की २ मात्रा या २०० शक्ति का उपयोग करना लाभदायक है।

२७. पैसिफ्लोरा इंकारनेट- नींद न आने की परेशानी को दूर करने के लिए यह औषधि अधिक उपयोगी होती है। उपचार करने के लिए इस औषधि के मूल-अर्क का एक बूंद से ३० बूंद तक उपयोग में लेना चाहिए।

नींद लाने के लिए कुछ अन्य उपाय :-

¬ सोने से पहले मुंह, गर्दन का पिछला भाग, कान और दोनों पैर ठंडे पानी से धोए।

¬ सोने से पहले हल्का गर्म पानी में एक कपड़े को डालकर उसे अच्छी तरह से निचोड़ ले और फिर इसके बाद इससे पूरे शरीर को पोछें और थोड़ी देर बाद घूमने के लिए जाना चाहिए तथा इसके बाद सोना चाहिए इससे अच्छी नींद आती है।

¬ रोगी को भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
¬ ऊंची तकिए पर सिर रखकर सोना चाहिए।

साभार - चिकित्सा पल्लव - सितंबर, अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर 2020)

अकरकरा (Anacyclus pyrethrum) के औषधीय गुणों की विवेचनाडॉ० राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी राघव--१. वनस्पति एवं पारम्परिक उपयोग...
02/11/2025

अकरकरा (Anacyclus pyrethrum) के औषधीय गुणों की विवेचना

डॉ० राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी राघव--

१. वनस्पति एवं पारम्परिक उपयोग

वैज्ञानिक नाम: Anacyclus pyrethrum DC. (परिवार Asteraceae) (PMC)

अकरकरा, एक अद्वितीय जड़ी-बूटी है। यह बहु-वर्षीय या अर्ध-वर्षीय झाड़ी जैसी जड़ी-बूटी है, जिसकी जड़ मोटी, तंग-फुसी होती है, और छोटे-छोटे पीले या सफेद फूल खिलते हैं। पारंपरिक रूप से इसे खेतों, जंगलों के किनारों, खेतों की खलिहानों आदि स्थानों पर पाया जाता है।

परम्परागत चिकित्सा पद्धति में उपयोग:
आयुर्वेद, यूनानी एवं लोक-चिकित्सा प्रणाली में अकरकरा को पुरुषों के रोग, दांत/मसूड़ों के रोग, सर्दी-जुकाम, पेट संबंधी विकार, स्नायु रोग (जैसे लकवा, वात विकार) आदि में उपयोग किया जाता रहा है।

२. रसायनात्मक संरचना (Phytochemistry)

अकरकरा में कई सक्रिय रसायन पाए गए हैं। उदाहरण स्वरूप:

एन-अल्किलामाइड्स (जैसे pellitorine) (ResearchGate)

फ्लैवोनॉइड्स, टैनिन्स, स्टेरॉल्स, ट्राइटरपीन आदि (IJNRD)

एंटीऑक्सिडेंट एवं रोग-रोधी (antimicrobial) गुण प्रदर्शित करने वाले यौगिक (MDPI)
इन रसायनों के कारण ही इस पौधे के अनेक औषधीय गुण देखने को मिलते हैं।

३. पारम्परिक उपयोग एवं संकेत

नीचे कुछ प्रमुख उपयोग दिए गए हैं, साथ ही वैज्ञानिक साक्ष्यों के अनुरूप टिप्पणी भी है:

मासिक धर्म की समस्याओं का समाधान भी है अकरकरा--

मासिक धर्म या पीरियड्स होने के दौरान बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे- मासिक धर्म होने के दौरान दर्द होना, अनियमित मासिक धर्मचक्र, मासिक धर्म के दौरान रक्तस्राव का कम या ज्यादा होना आदि नारी-सम्बन्धित बीमारियों में अकरकरा का घरेलू उपाय बहुत ही लाभकारी होता है। इसमे अकरकरा-मूल का काढ़ा बनायें। 10 मिली काढ़े में चुटकी भर हींग डालकर कुछ माह सुबह-शाम पीने से मासिकधर्म ठीक होता है। इससे मासिकधर्म के दिनों में होने वाले दर्द से भी छुटकारा मिलता है।

दांत/मसूड़ों का दर्द, मुँह की बदबू या दुर्गन्ध: पारम्परिक रूप से दांत दर्द व मसूड़ों की समस्याओं में अकरकरा की जड़ या पुष्प को मंजन के रूप में प्रयोग किया जाता है। यूनानी साहित्य में “Amrad Asnan” (दांतों के रोग) में इसका उल्लेख मिलता है।

स्नायु / वात-रोग (जैसे लकवा, साइटिका): अकरकरा को वात विकारों, पक्षाघात, कमर-पीड़ा आदि में उपयोगी माना गया है।

पुरुषों के स्वास्थ्य (लिबिडो, शुक्र-संबंधी विकार): आयुर्वेद एवं यूनानी में इसे वीर्य-वर्धक, कामोद्दीपक के रूप में वर्णित किया गया है।

पाचन, पेट-दर्द, गैस, असमय भोजन के बाद की समस्या: पेट की तकलीफ, गैस, अनियमित भोजन के बाद के लक्षण में अकरकरा का प्रयोग मिलता है।

हृदय स्वास्थ्य / थकान / कमजोरी: इसके टॉनिक एवं स्तम्भन-प्रवृत्ति के आधार पर हृदय-संबंधी लक्षणों में लाभ की संभावना बताई गई है।

सर्दी-जुकाम, बुखार: पारम्परिक साहित्य में इसके उपयोग से इनफेक्शन के लक्षण कम होने का उल्लेख है।

इनमें से अधिकांश उपयोग आज-के शोध में आंशिक समर्थन पाते हैं, पर मानव-क्लीनिकल ट्रायल की कमी अभी बनी हुई है।

४. आधुनिक भेषजीय साक्ष्य

एक अध्ययन में अकरकरा के विभिन्न भागों (जड़, बीज, पत्ते) का हाइड्रो-अल्कोहॉलिक अर्क लिया गया जिसमें एनाल्जेसिक (दर्दनिवारक), एंटी-इंफ्लेमेटरी (सूजन-रोधी), घाव-हीलिंग प्रभाव लगभग 94 % तक पाए गए। (PMC)

इसके अर्क में एंटीऑक्सिडेंट और रोग-रोधी (antimicrobial) गतिविधि पाई गई है। (MDPI)

पुरुषों मे शुक्र-संबंधी शोधों में इससे शुक्र-गणना एवं टेस्टोस्टेरॉन स्तर में सुधार पाया गया है। (BioMed Central)

विषाक्तता-अध्ययन में यह पाया गया कि जलीय अर्क का LD₅₀ बहुत अधिक (>5000 mg/kg) था, जिससे तुलनात्मक रूप से सुरक्षित माना गया है। (MDPI)

५. खुराक-रूप, सावधानी और प्रतिबंध

परम्परागत खुराक: जड़ का चूर्ण, पुष्प या अर्क के रूप में प्रयोग। उदाहरण के लिए 500 मिग्रा जड़ का चूर्ण सुबह-शाम दिया गया अध्ययन में।

सावधानी: गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराती महिलाएं, हार्मोन-सेंसिटिव रोग (जैसे प्रोस्टेट) आदि में विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक।

चिकित्सकीय परीक्षण सीमित हैं — अत्यधिक भरोसा करने से पहले सावधानी।

जंगली संग्रहण के कारण प्रजाति संकट में भी है (IUCN “Vulnerable”) (Wikipedia)

६. आगे के शोध-दिशाएँ

मानव-क्लीनिकल ट्रायल्स: विशेष रूप से दांत/मसूड़ों, पुरुष स्वास्थ्य, वात-रोग आदि पर।

यांत्रिक अध्ययन (mechanistic studies): कैसे ये रसायन काम करते हैं (COX/LOX अवरोध, टेस्टोस्टेरॉन उत्तेजना आदि)।

मानकीकृत अर्क (standardised extracts) का विकास एवं गुणवत्ता नियंत्रण।

स्थायी कृषि एवं संरक्षण-व्यवस्था: जंगली उत्खनन से प्रजाति पर दबाव, इसलिए संवर्धन आवश्यक।

अकरकरा एक बहुआयामी औषधीय पौधा है जिसका पारम्परिक औषधि प्रणालियों में व्यापक उपयोग रहा है। आधुनिक शोध ने इसके कुछ प्रमुख गुण (दर्दनिवारक, सूजन-रोधी, रोग-रोधी, शुक्र-वर्धक) उजागर किए हैं, लेकिन इस-से सम्बंधित मानव-परीक्षण सीमित हैं। यदि आगे के शोधों एवं क्लीनिकल कार्यों द्वारा इन पर पुष्टि हो जाए, तो यह पौधा भविष्य में जनस्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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राघवेन्द्र कुमार राघव--

कृष्ण! निर्मोही है,
इसीलिए कृष्ण से
मोह हो जाता है।
कृष्ण! प्रेम की
प्रवहमान सरिता है।
जिसमे जड़ और चेतन
सब बह जाता है।
व्याकुल कंठों की चाह है कृष्ण।
प्रेम और आनंद की राह है कृष्ण।
किन्तु हर नदी की
एक ही नियति है।
उसे बहते जाना है।
यात्रा उसका धर्म है
सबके हृदय मे उसे रहना है।
तृषित हृदय की तृष्णा
हरने वाला है कृष्ण!
कर्म को धर्म समझाने वाला है कृष्ण!
जैसे पावन सरिता
सब जग अभिसिञ्चित करती है।
वैसा ही घटित होता है
कृष्ण के साथ भी।
सर्व-कल्याण के लिये वो
अपने प्रिय को छोड़ देते हैं।
किन्तु भूलते नहीं एक क्षण के लिए
छोड़ने के बाद भी।
कृष्ण से वियोग भी
सन्न्यास है आराधना है।
ये साकार से निराकार की ओर
गमन है।
कृष्ण-भक्ति भौतिकता से
सात्विकता की यात्रा है।
कृष्ण-प्रेम की सरिता मे डूबे
तो हर स्थान वृन्दावन है।
https://www.indianvoice24.com/prem-aur-anand-ki-raah-hai-krishna-janmashtami-iv24-26824/

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सचिव बैद गुरु तीनि जौं, प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिहीं नास॥

Dharma -
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प्रत्येक सजीव व निर्जीव मे ईश्वर तत्त्व विद्यमान है; ऐसा उद्घोष करने वाले 'योगयोगेश्वर', 'महामानव', 'यदुकुलनायक', 'श्रीकृष्ण' के युगल चरणारविन्दों मे सब ओर से नमस्कार।

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