05/05/2026
श्रीमद् भगवद्गीता - अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग
श्लोक 28:
अर्जुन उवाच |
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् |
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति || 28 ||
हिन्दी अनुवाद:
"अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा रखने वाले, युद्ध के लिए सामने खड़े इन अपने ही सगे-संबंधियों को देखकर मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं और मेरा मुख सूख रहा है।"
🌟 आज का विचार: शारीरिक और मानसिक द्वंद्व
पिछले श्लोक में हमने देखा कि अर्जुन मोह और करुणा से व्याकुल हो गया था। इस श्लोक में उस मानसिक तनाव का उसके शरीर पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, उसका वर्णन है।
🚩 जीवन सूत्र:
शारीरिक प्रतिक्रिया (सीदन्ति मम गात्राणि): जब मन में गहरा तनाव या द्वंद्व (Conflict) होता है, तो उसका सीधा असर शरीर पर पड़ता है। अर्जुन जैसा बलशाली योद्धा, जिसके पराक्रम से शत्रु कांपते थे, आज उसके अपने ही पैर लड़खड़ा रहे हैं। यह दर्शाता है कि मानसिक कमजोरी शरीर की पूरी शक्ति हर लेती है।
अपनों का मोह (स्वजनं): अर्जुन यहाँ 'शत्रु' शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा, बल्कि 'स्वजन' (अपने लोग) कह रहा है। जब हम किसी समस्या को कर्तव्य की दृष्टि के बजाय 'ममत्व' (मेरा-पराया) की दृष्टि से देखते हैं, तो निर्णय लेना कठिन हो जाता है।
भय और व्याकुलता: 'मुख सूखना' और 'अंगों का ढीला पड़ना' अत्यधिक चिंता और घबराहट के लक्षण हैं। अर्जुन युद्ध से नहीं डर रहा था, बल्कि वह इस परिणाम से डर रहा था कि अपनों को खोकर मिलने वाली विजय का क्या अर्थ?
🚩 विशेष विचार:
कृष्ण संबोधन: अर्जुन यहाँ भगवान को 'कृष्ण' कहकर पुकार रहा है। वह अपने सखा (मित्र) के सामने अपना हृदय खोलकर रख रहा है। यह शिष्य भाव की शुरुआत है।
कर्तव्य बनाम भावना: यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब मनुष्य भावनाओं के अतिरेक में होता है, तो वह अपना साहस खोने लगता है। अर्जुन का यह 'विषाद' (दुःख) ही आगे चलकर उसे आत्मज्ञान की ओर ले जाएगा।
"जीवन के युद्ध में जब अपनों के विरुद्ध खड़े होना पड़े, तब मोह पैर की बेड़ियाँ बन जाता है। अर्जुन की यह स्थिति हर उस व्यक्ति की है जो भावुकता में अपने लक्ष्य को धुंधला कर देता है।"
🚩🚩 जय श्री राधे कृष्ण 🚩🚩
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