13/11/2017
वृद्धावस्था और वात विकार............
प्रशन:- क्या वृद्धावस्था में वातविकार होना कोई गंभीर रोग है...........
उत्तर:- नही यह स्वाभाविक रोग है। जो सरलता से ठीक हो जाये यदी सही चिकित्सा अपनायी जाये तो।
प्रश्न: क्या है यह रोग.......
उत्तर: सबसे पहले मल का कठोर होना गुठली पडना मल त्याग मै पिडा होना... भोजन में स्वाद न आना....नींद न आना....
चिंता होना, घबराहट होना, आँख की रोशनी कम होना, सुनाई कम देना, सबसे मुख्य जोड़ो का दर्द..
प्रश्न: यह तो बडे सारे रोग है।आपने कहा सरलता से ठीक हो सकते हैं बल्कि मुझे तो लगता है बुहत सी दवाओं और बुहत सारे विशेषज्ञों की सलाह जैसे पेट के डाक्टर, हृदय के डॉक्टर, जोडो के ....ही ठीक कर पाएँगे लेकिन क्या इतनी दवा लेनी पडेंगी वृद्ध व्यक्ति को......।
उत्तर: नही सिर्फ एक चिकित्सा है ......स्नेह चिकित्सा जो सब कुछ ठीक कर सकती है।
प्रश्न: अच्छा ऐसा .....क्या है ये स्नेह चिकित्सा....
उत्तर: आयुर्वेद कहता है वातविकार मै हमे वायु को स्नेह से जितना चाहिये। स्नेह का एक मतलब है कि हम पेट की समस्या हेतु घी युक्त दाल रोटी,रसेदार सब्जी से खाये जिससे मल शुष्क न हो पाये .....अगर तब भी आराम न हो तो हम गुद मार्ग से तैल लेकर मल सहजता से निकाले पेट साफ तो गैस डकार आदी मै आराम........फिर कान मै भी तैल डाले श्रावण शक्ति अच्छी नेत्र मै घी डाले, जोड़ो की मलीस करे, अच्छी नींद के लिए हफ्ते में एक बार शरीर की मलिश पैर के तलुवे में तैल लगना चाहिए। तो कुल मिलाकर हुई न सरल चिकित्सा....
स्नेह का दुसरा अर्थ है। प्यार से वृद्ध व्यक्ति की सेवा जिससे उनकी जीने की इच्छा बनी रहे।
स्नेह का एक और अर्थ है बाँधे रहना मतलब स्नेह औषधि से शरीर आदी को दृढ़ करे। और स्नेह स्वभाव से परिवार को प्रसन्न रखे।
देखिए हुई न संपूर्ण सरल चिकित्सा.......बडे बडे विशेषज्ञों की तो जरूरत ही नहीं है जी!
धन्यवाद!!!!!!!!!!!!!!!!!
डॉ गौरव वर्मा
साँईंश्याम आयुर्वेदिक पंचकर्म हॉस्पिटल आनंद नगर होशंगाबाद ८१०९८२८०६५