Saloni medicose

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26/07/2020
15/10/2014

नारियल का सेवन-

- नारियल की तासीर ठंडी होती है।
- ताजा नारियल कैलोरी से भरपूर होता है। इसमें अनेक पोषक तत्व होते हैं।
- नारियल के कोमल तनों से जो रस निकलता है उसे माड़ी (नीरा) कहते हैं उसे लज्जतदार पेय माना जाता है।
- सोते समय नारियल पानी पीने से नाड़ी संस्थान को बल मिलता है तथा नींद अच्छी आती है।
- जिन शिशुओं को दूध नहीं पचता उन्हें दूध के साथ नारियल पानी मिलाकर पिलाना चाहिए।
- शिशु को डि-हाइड्रेशन होने पर नारियल पानी में नीबू का रस मिलाकर पिलाएं। नरियल का पानी हैजे में रामबाण औषधि है।
- नारियल की गिरी (खोपरा) खाने से कामशक्ति बढ़ती है।
- मिश्री के साथ खाने से गर्भवती स्त्री की शारीरिक दुर्बलता दूर होती है तथा बच्चा सुंदर होता है।
- सूखी गिरी खाने से आंख की रोशनी तथा गुर्दों के शक्ति मिलती है।
- पौष, माघ और फाल्गुन माह में नियमित सुबह गिरी के साथ गुड़ खाने से वक्षस्थल में वृद्धि होती है, शारीरिक दुर्बलता दूर होती है।
- इसके पानी में पोटेशियम और क्लोरीन होता है जो मां के दूध के समान होता है।
- नारियल कठिनता से पचने वाला, वातशोधक, विष्टïम्भी, पुष्टिïकारक, बलवर्धक और वात-पित्त व रक्तविकार नाशक होता है।

20/08/2014

भोजन संबन्धी 12 महीने के नियमों को अपनाने से व्यक्ति कभी भी बीमार नहीं पड़ता है क्योंकि 12 महीने में कभी ठंड का मौसम होता है तो कभी गर्मी का तो कभी बरसात का मौसम। जब कोई व्यक्ति ठंड के मौसम में अधिक ठंडी चीजों का सेवन करता है तो उसे कई सारे रोग जैसे-सर्दी तथा जुकाम आदि हो जाते हैं। यदि व्यक्ति गर्मी के मौसम में अधिक गर्म चीजों का उपयोग करता है तो उसे दस्त, उल्टी आदि रोग हो जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि मनुष्य 12 महीने में भोजन संबन्धी परहेज करके कई प्रकार के रोगों से बच सकता है।
नियम :-
• चैत्र (मार्च-अप्रैल)- चैत्र के महीने में गुड़ का सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। नीम की 4-5 कोमल पत्तियों को सुबह के समय में चेत्र के महीने में चबाने से बहुत अधिक लाभ मिलता है और कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
• वैशाख (अप्रैल-मई)- इस महीने में तेल का बहुत कम उपयोग करना चाहिए क्योंकि इसके प्रयोग से शरीर में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं। इस महीने में बेल का सेवन बहुत लाभदायक होता है।
• ज्येष्ठ (मई-जून)- इस महीने में बहुत अधिक गर्मी होती है इसलिए दोपहर के समय में कुछ घंटे सोना चाहिए। इस महीने में बासी भोजन का सेवन न करें क्योंकि ऐसा करने से शरीर में बहुत से रोग हो सकते हैं।
• आषाढ़ (जून-जुलाई) - इस महीने में सभी व्यक्तियों को व्यायाम तथा खेल-कुछ करना चाहिए जिससे बहुत अधिक लाभ मिलता है। इस महीने में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए।
• श्रावण (जुलाई-अगस्त)- इस महीने में हरी साग-सब्जियों तथा दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। हरड़ का सेवन इस महीने में लाभदायक होता है।
• भाद्रपद (अगस्त-सितम्बर)- इस महीने में चीता औषधि का सेवन करना चाहिए।
• आश्विन (सितम्बर-अक्तूबर)- इस महीने में गुड़ का सेवन करना लाभदायक होता है लेकिन इस महीने में करेले का सेवन हानिकारक होता है।
• कार्तिक (अक्तूबर-नवम्बर)- इस महीने में मटठा पीना हानिकारक होता है। मूली का सेवन इस महीने में लाभदायक होता है।
• अगहन:( नवम्बर-दिसम्बर)- इस महीने में व्यायाम करना लाभदायक होता है। इस महीने में अधिक ठंडी तथा गर्म चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
• पौष (दिसम्बर-जनवरी)- इस महीने में दूध पीना लाभदायक होता है लेकिन इस महीने में धनिये का सेवन नहीं करना चाहिए।
• माघ (जनवरी-फरवरी)- इस महीने में घी का सेवन लाभदयक होता है। मिश्री का सेवन इस महीने में नहीं करना चाहिए।
• फाल्गुन (फरवरी-मार्च)- इस महीने में सुबह के समय में स्नान करना लाभदायक होता है। चने का सेवन इस महीने में हानिकारक होता है।

19/02/2014

कई बीमारियां ऐसी होती हैं। जिसे हम खुद ही बुलावा देते हैं। कहने का मतलब यह है कि हमारी गलत जीवनशैली ही ऐसे रोगों को बढ़ावा देती है। एसिडिटी ऐसे ही रोगों में से एक है। एसिडिटी को चिकित्सकीय भाषा में गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफलक्स डिजीज (GERD) के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद में इसे अम्ल पित्त कहते हैं। आज इससे हर दूसरा व्यक्ति या महिला पीडि़त है। एसिडिटी होने पर शरीर की पाचन प्रक्रिया ठीक नहीं रहती।

एसिडिटी का कारण?
आधुनिक विज्ञान के अनुसार आमाशय में पाचन क्रिया के लिए हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पेप्सिन का स्रवण होता है। सामान्य तौर पर यह अम्ल तथा पेप्सिन आमाशय में ही रहता है तथा भोजन नली के सम्पर्क में नही आता है। आमाशय तथा भोजन नली के जोड पर विशेष प्रकार की मांसपेशियां होती है जो अपनी संकुचनशीलता से आमाशय एवं आहार नली का रास्ता बंद रखती है तथा कुछ खाते-पीते ही खुलती है। जब इनमें कोई विकृति आ जाती है तो कई बार अपने आप खुल जाती है और एसिड तथा पेप्सिन भोजन नली में आ जाता है। जब ऐसा बार-बार होता है तो आहार नली में सूजन तथा घाव हो जाते हैं।इसकी वजह गलत खान-पान, आरामदायक जीवनशैली, प्रदूषण, चाय, कॉफी, धूम्रपान, अल्कोहल और कैफीनयुक्त पदार्थों का ज्यादा इस्तेमाल करना है।

एसिडिटी के लक्षण?
एसिडिटी के लक्षणों में हैं सीने और छाती में जलन। खाने के बाद या प्राय: सीने में दर्द रहता है, मुंह में खट्टा पानी आता है। इसके अलावा गले में जलन और अपचन भी इसके लक्षणों में शामिल होता है। जहां अपचन की वजह से घबराहट होती है, खट्टी डकारें आती हैं। वहीं खट्टी डकारों के साथ गले में जलन-सी महसूस होती है।
कुछ घरेलू उपचार-
1:हर तीन टाइम भोजन के बाद गुड जरुर खाएं। इसको मुंह में रखें और चबा चबा कर खा जाएं।
2:एक कप पानी उबालिये और उसमें एक चम्मच सौंफ मिलाइये। इसको रातभर के लिए ढंक कर रख दीजिये और सुबह उठ कर पानी छान लीजिये। अब इसमें 1 चम्मच शहद मिलाइये और तीन टाइम भोजन के बाद इसको लीजिये।
3:एक गिलास गर्म पानी में एक चुटकी कालीमिर्च चूर्ण तथा आधा नींबू निचोड़कर नियमित रूप से सुबह सेवन करें। इसके साथ ही सदाल के रूप मे मूली को जरुर शामिल करें। उस पर काला नमक छिडक कर खाएं।
4:एक लौंग और एक इलायची ले कर पाउडर बना लें। इसको हर मील के बाद माउथफ्रेशनर के रूप में खाएं। इसको खाने से एसिडिटी भी सही होगी और मुंह से बदबू भी नहीं आएगी।

ऐसे करें बचाव-
1.समय पर भोजन करें और भोजन करने के बाद कुछ देर टहलें ।
2.अपने खाने में ताजे फल, सलाद, सब्जियों का सूप, उबली हुई सब्जी को शामिल करें। हरी पत्तेदार सब्जियां और अंकुरित अनाज खूब खाएं। ये विटामिन बी और ई का बेहतरीन स्रोत होते हैं जो शरीर से एसिडिटी को बाहर निकाल देते हैं।
3.खाना हमेशा चबा कर और जरूरत से थोड़ा कम ही खाएं। सदैव मिर्च-मसाले और ज्यादा तेल वाले भोजन से बचें।
4.अपने रोजमर्रा के आहार में मट्ठा और दही शामिल करें।
5.शराब और मांसाहारी भोजन से परहेज करें।
6.पानी खूब पिएं। याद रखें इससे न सिर्फ पाचन में मदद मिलती है, बल्कि शरीर से टॉक्सिन भी बाहर निकल जाते हैं।
7.खाने के बाद तुरंत पानी का सेवन न करें। इसका सेवन कम से कम आधे घंटे के बाद ही करें।
8.धूम्रपान, शराब से बचें।
9.पाइनेपल के जूस का सेवन करें, यह एन्जाइम्स से भरा होता है। खाने के बाद अगर पेट अधिक भरा व भारी महसूस हो रहा है, तो आधा गिलास ताजे पाइनेपल का जूस पीएं। सारी बेचैनी और एसिडिटी खत्म हो जाए
10.आंवले का सेवन करें हालांकि यह खट्टा होता है, लेकिन एसिडिटी के घरेलू उपचार के रूप में यह बहुत काम की चीज है।
11.गैस से फौरन राहत के लिए 2 चम्मच ऑंवला जूस या सूखा हुआ ऑंवला पाउडर और दो चम्मच पिसी हुई मिश्री ले लें और दोनों को पानी में मिलाकर पी जाएं।

17/12/2013

आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में रोग पहचानने के कई तरीके हैं। नाभि स्पंदन से रोग की पहचान का उल्लेख हमें हमारे आयुर्वेद व प्राकृतिक उपचार चिकित्सा पद्धतियों में मिल जाता है। परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हम हमारी अमूल्य धरोहर को न संभाल सके।

कैसे होती है नाभि स्पंदन से रोगों की पहचान :

यदि नाभि का स्पंदन ऊपर की तरफ चल रहा है याने छाती की तरफ तो अग्न्याष्य खराब होने लगता है। इससे फेफड़ों पर गलत प्रभाव होता है। मधुमेह, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ होने लगती हैं। यदि यह स्पंदन नीचे की तरफ चली जाए तो पतले दस्त होने लगते हैं। बाईं ओर खिसकने से शीतलता की कमी होने लगती है, सर्दी-जुकाम, खाँसी, कफजनित रोग जल्दी-जल्दी होते हैं।

यदि यह ज्यादा दिनों तक रहेगी तो स्थायी रूप से बीमारियाँ घर कर लेती हैं। दाहिनी तरफ हटने पर लीवर खराब होकर मंदाग्नि हो सकती है। पित्ताधिक्य, एसिड, जलन आदि की शिकायतें होने लगती हैं। इससे सूर्य चक्र निष्प्रभावी हो जाता है। गर्मी-सर्दी का संतुलन शरीर में बिगड़ जाता है। मंदाग्नि, अपच, अफरा जैसी बीमारियाँ होने लगती हैं। यदि नाभि पेट के ऊपर की तरफ आ जाए यानी रीढ़ के विपरीत, तो मोटापा हो जाता है। वायु विकार हो जाता है। यदि नाभि नीचे की ओर (रीढ़ की हड्डी की तरफ) चली जाए तो व्यक्ति कुछ भी खाए, वह दुबला होता चला जाएगा।

नाभि के खिसकने से मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताएँ कम हो जाती हैं। नाभि को पाताल लोक भी कहा गया है। कहते हैं मृत्यु के बाद भी प्राण नाभि में छः मिनट तक रहते है। यदि नाभि ठीक मध्यमा स्तर के बीच में चलती है तब स्त्रियाँ गर्भधारण योग्य होती हैं। यदि यही मध्यमा स्तर से खिसककर नीचे रीढ़ की तरफ चली जाए तो ऐसी स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर सकतीं।

अकसर यदि नाभि बिलकुल नीचे रीढ़ की तरफ चली जाती है तो फैलोपियन ट्यूब नहीं खुलती और इस कारण स्त्रियाँ गर्भधारण नहीं कर सकतीं। कई वंध्या स्त्रियों पर प्रयोग कर नाभि को मध्यमा स्तर पर लाया गया। इससे वंध्या स्त्रियाँ भी गर्भधारण योग्य हो गईं। कुछ मामलों में उपचार वर्षों से चल रहा था एवं चिकित्सकों ने यह कह दिया था कि यह गर्भधारण नहीं कर सकती किन्तु नाभि-चिकित्सा के जानकारों ने इलाज किया।

उपचार पद्धति आयुर्वेद व प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों में पूर्व से ही विद्यमान रही है। नाभि को यथास्थान लाना एक कठिन कार्य है। थोड़ी-सी गड़बड़ी किसी नई बीमारी को जन्म दे सकती है। नाभि-नाड़ियों का संबंध शरीर के आंतरिक अंगों की सूचना प्रणाली से होता है।

यदि गलत जगह पर खिसक जाए व स्थायी हो जाए तो परिणाम अत्यधिक खराब हो सकता है। इसलिए नाभि नाड़ी को यथास्थल बैठाने के लिए इसके योग्य व जानकार चिकित्सकों का ही सहारा लिया जाना चाहिए। नाभि को यथास्थान लाने के लिए रोगी को रात्रि में कुछ खाने को न दें। सुबह खाली पेट उपचार के लिए जाना चाहिए। क्योंकि खाली पेट ही नाभि नाड़ी की स्थिति का पता लग सकता ह

17/12/2013

Last week, I ran out of Amla. I went to my regular health food store to get more, and they were out of it. In fact, they were reducing the size of their inventory, and Amla was one of the things they had discontinued selling. Even though I knew I could get it somewhere else, strangely, I felt a little sad. On the bright side of things, it made me appreciate how wonderful the plant is, and inspired me to write about it today.

I’ve been taking Amla off and on for about 12 years. It was recommended to me by my natural health practitioner, and it happens to be one of my favorite herbs. It’s very nourishing and rejuvenative; and I enjoy the effects it has on my body.

First, I’d like to say that before trying any new or unfamiliar supplement, you should check with a trusted health practitioner to make sure it’s right for you. I’d also like to let you know that I only recommend products that I feel are safe and I have experience taking. If I’m not sure of a product, or am unfamiliar with it, I don’t write about it or recommend it.

If you were to step into my kitchen or go through my cabinets, you would find a lot of the things I’ve recommended in articles. You’ll probably find a jar of coconut oil on my kitchen counter next to a little bottle of Vitamin D, and a box of tulsi tea. I sometimes have a bottle of Nucleotides on hand for cold and flu season (but unfortunately, I ran out recently). And I also have a bottle of Amla...

14/12/2013

सफेद बाल की समस्या व निवारण
बालों का सफेद होना आम बात है। कई बार कम उम्र के लोगों के बाल सफेद हो जाते हैं और वे विभिन्न केमिकल्स द्वारा उन्हें रंगकर काले करने का प्रयास करते हैं। केमिकल्स से बालों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं, साथ ही अन्य दूसरे साइड इफेक्ट्स भी आ जाते हैं। यहाँ सफेद बालों हेतु घरेलू नुस्खे से उपचार की जानकारी इस प्रकार है-
सफेद बालों हेतु घरेलू खिजाब
- पिसी हुई सूखी मेहँदी एक कप, कॉफी पावडर पिसा हुआ 1 चम्मच, दही 1 चम्मच, नीबू का रस 1 चम्मच, पिसा कत्था 1 चम्मच, ब्राह्मी बूटी का चूर्ण 1 चम्मच, आँवला चूर्ण 1 चम्मच और सूखे पोदीने का चूर्ण 1 चम्मच। इतनी मात्रा एक बार प्रयोग करने की है। इसे एक सप्ताह में एक बार या दो सप्ताह में एक बार अवकाश के दिन प्रयोग करना चाहिए।सभी सामग्री पर्याप्त मात्रा में पानी लेकर भिगो दें और दो घण्टे तक रखा रहने दें। पानी इतना लें कि लेप गाढ़ा रहे, ताकि बालों में लगा रह सके। यदि बालों में रंग न लाना हो तो इस नुस्खे से कॉफी और कत्था हटा दें। पानी में दो घण्टे तक गलाने के बाद इस लेप को सिर के बालों में खूब अच्छी तरह, जड़ों तक लगाएँ और घण्टेभर तक सूखने दें।
इसके बाद बालों को पानी से धो डालें। बालों को धोने के लिए किसी भी प्रकार के साबुन का प्रयोग न करके, खेत या बाग की साफ मिट्टी, जो कि गहराई से ली गई हो, पानी में गलाकर, कपड़े से पानी छानकर, इस पानी से बालों को धोना चाहिए। मिट्टी के पानी से बाल धोने पर एक-एक बाल खिल जाता है जैसे शैम्पू से धोए हों।
लाभ : इस नुस्खे का प्रति सप्ताह प्रयोग करने से जहाँ बाल सुन्दर व मजबूत रहते हैं, वहीं सिर दर्द, अनिद्रा, शरीर की अतिरिक्त गर्मी, आँखों की जलन आदि व्याधियाँ दूर होती हैं। जिनके बाल अधपके होंगे वे इस नुस्खे के प्रयोग से काले दिखाई देंगे। खिजाब (हेयर डाई) लगाने की अपेक्षा इस नुस्खे का प्रयोग करना श्रेष्ठ है, क्योंकि खिजाब में जो केमिकल्स होते हैं, वे त्वचा पर बुरा असर करते हैं और रहे-सहे काले बाल भी सफेद हो जाते हैं। इस नुस्खे के सेवन से ऐसा कोई दुष्परिणाम नहीं होता।
- आमलकी रसायन आधा चम्मच प्रतिदिन सेवन करने से बाल प्राकृतिक रूप से जड़ से काले हो जाते हैं।
- एक छोटी कटोरी मेहँदी पावडर लें, इसमें दो बड़े चम्मच चाय का पानी, दो चम्मच आँवला पावडर, शिकाकाई व रीठा पावडर, एक चम्मच नीबू का रस, दो चम्मच दही, एक अंडा (जो अंडा न लेना चाहें वे न लें), आधा चम्मच नारियल तेल व थोड़ा-सा कत्था। यह सामग्री लोहे की कड़ाही में रात को भिगो दें। सुबह हाथों में दस्ताने पहनकर बालों में लगाएँ, त्वचा को बचाएँ, ताकि रंग न लगने पाए। दो घंटे बाद धो लें। यह आयुर्वेदिक खिजाब है, इससे बाल काले होंगे, लेकिन इन्हें कोई नुकसान नहीं होगा।
- सफेद बालों को कभी भी उखाड़ें नहीं, ऐसा करने से ये ज्यादा संख्या में बढ़ते हैं। सफेद बाल निकालना हों तो कैंची से काट दें या उन्हें काला करने वाला उपाय अपनाएँ।
- त्रिफला, नील, लोहे का बुरादा- तीनों 1-1 चम्मच लेकर भृंगराज पौधे के रस में डालकर रात को लोहे की कड़ाही में रख दें। प्रातः इसे बालों में लगाकर, सूख जाने के बाद धो डालें।
- जपा (जवाकुसुम या जास्बंद) के फूल और आँवला, एक साथ कूट-पीसकर लुगदी बनाकर, इसमें बराबर वजन में लौह चूर्ण मिलाकर पीस लें। इसे बालों में लगाकर सूखने के बाद धो डालें।
- रात को सोते समय नाक में दोनों तरफ षडबिन्दु तेल की 2-2 बूँद नियमित रूप से टपकाते रहें।
ये सभी प्रयोग धीरे-धीरे बालों को काला करने वाले हैं। कोई भी एक प्रयोग लगातार 5-6 माह तक करते रहें। षडबिन्दु तेल का प्रयोग अन्य प्रयोग करते हुए भी कर सकते हैं।

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