09/02/2019
भारत ने 1966 में फ़ैसला लिया था कि अगले दस सालों में चेचक को भारत से मिटा कर रहेंगे. आठ साल बाद, 1974 में भी 188000 नए लोगों को चेचक हो गया था जिन में से 31263 बच्चे चेचक से अपनी जान गँवा बैठे थे. जैसे जैसे सरकार अपनी मुहीम तेज़ करती वैसे वैसे चेचक के टीकों का विरोध बढ़ता जा रहा था. अंधविश्वास और अशिक्षा की वजह से लोग टीके लगाने वालों के हाथ पैर तोड़ देते थे. नतीजे में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार में चेचक ख़तरनाक तरीक़े से फैल रही थी. शरारती लोग अफ़वाहें फैला रहे थे कि इस टीके से बच्चे मर जाएँगे या वह बच्चे पैदा करने लायक़ नहीं बचेंगे. लेकिन अगले ही साल 24 मई 1975 के बाद भारत में किसी को चेचक नहीं हुई. सरकार की लगन और सर फुड़वा कर भी टीके लगाने वाले कर्मचारियों की क़ुर्बानियाँ आख़िर रंग ले ही आईं थीं.
पोलियो की भी यही कहानी है. वह ज़माना तो ज़्यादातर लोगों के ज़हन में ताज़ा होगा. जब सरकार ने पोलियो ख़त्म करने का बीड़ा उठाया तब भी शरारती लोगों ने अफ़वाहें फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
वही शरारत, वही अंधविश्वास, वही कमीनापन, वही नीचता आज फिर उफान पर है. सरकार ने रुबेला और ख़सरे को पूरी तरह साफ़ करने की ठान ली है. 2020 के बाद भारत में ये बीमारियाँ किसी को नहीं होंगी. बहुत पुरानी बात नहीं है जब ख़सरे से पीड़ित कई बच्चे हर मोहल्ले में हर साल मर जाया करते थे.
व्हाट्सएप पर मुस्लिम ग्रुप में एक मेसेज चल रहा है कि ये टीका मोदी और आर एस एस का टीका है. मुसलमानों की आबादी कम करने के लिए लगाया जा रहा है. मोदी से भी घातक अगर देश के लिए कुछ हो सकता है तो वो है ये अफ़वाहें.
पढ़े लिखों के ग्रुप में कहा जाता है कि इससे ऑटिज़्म होता है. ये पढ़े लिखे असल में वो गधे हैं जिनकी पीठ पर किताबें लाद दी गई हैं. अगर कोई अमरीकी कम अक़्ल अपनी 'रिसर्च' से नासमझी भरा नतीजा निकालता है तो ये 'समझदार' लोग दुनियाभर के डॉक्टरों को अनाड़ी समझने लगते हैं.
अख़बार भी पीछे नहीं हैं. एक अख़बार की कटिंग ख़ूब वायरल हो रही है. इसमें हेडलाइन है 'रुबेला के टीके से मध्यप्रदेश में पहली मौत'. ये अख़बार ऐसे हैं कि अगर एम आर का टीका लगने के बाद कोई कुचल कर भी मर जाए तो उसे यह यूँ छापेंगे ' एम आर टीका लगने के बाद एक और मौत'.
यह टीका किसी भी प्राइवेट क्लीनिक पर नहीं लग रहा है. जिन बच्चों को सभी टीके लग चुके हैं यह टीका उन्हें भी लगना चाहिए.
दोस्तो, अपने बच्चों को यह टीका ज़रूर लगवाएँ. वरना वो ये कहेंगे -
"बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है"
ख़सरा और रुबेला का 2020 तक सफ़ाया तय है. ख़ास बात ये है कि इसमें आपका रोल क्या होगा, हाथ बँटाने का या टाँग अड़ाने का?
- डॉ. नदीम फ़ारूक़ी