Panditai jyotish karamkand pujan path

Panditai jyotish karamkand pujan path Pujan path karamkand jyotish Face Reading se had samsaya ka nidan large hai!!!

जय गणेश जय हो 🙏🙏🙏जय श्री महाकाल जय हो 🙏🙏🙏
09/09/2024

जय गणेश जय हो 🙏🙏🙏
जय श्री महाकाल जय हो 🙏🙏🙏

आप सभी को गणेश चतुर्थी की जन्मो उत्सव की बहुत बहुत शुभ कामनाये 🙏🙏🙏जय गणेश जय हो 🙏🙏🙏🙏
07/09/2024

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सभी प्रकार के रत्न ,दक्षिणावर्ती शंख ,सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा करा हुआ मिलता है हमारे पास
20/12/2022

सभी प्रकार के रत्न ,दक्षिणावर्ती शंख ,सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा करा हुआ मिलता है हमारे पास

आज जन्म कुंडली के विश्लेषण में मान-सम्मान और पद प्रतिष्ठा और यश कीर्ति पर चर्चा करेंगे। पद प्रतिष्ठा और मान सम्मान किस प...
01/12/2021

आज जन्म कुंडली के विश्लेषण में मान-सम्मान और पद प्रतिष्ठा और यश कीर्ति पर चर्चा करेंगे। पद प्रतिष्ठा और मान सम्मान किस प्रकार मिलता है हर स्त्री , पुरुषों की इच्छा होती है कि मुझे मान , सम्मान मिले उच्च पद प्रतिष्ठा और मान-सम्मान प्राप्त करने के लिए जीवन में समाज और लोगों के बीच कुछ योगदान करने पड़ते हैं ।
जिन लोगों ने उच्च पद प्रतिष्ठा को पाया है उनकी जन्म कुंडली में अच्छे ग्रहों का योगदान रहा है जातक की जन्मकुंडली में मान प्रतिष्ठा पाने के लिए कुंडली के लग्न भाव प्रथम भाव चतुर्थ भाव सुख भाव पंचम भाव शिक्षा बुदि भाव और नवम भाव भाग्य भाव के साथ दशम भाव कर्म भाव केरियर भाव और एकादश भाव पर विचार करते हैं साथ ही अष्टम भाव को देखा जाता है ।
जन्म कुंडली के लग्न भाव से स्वयं का विचार स्वयं का आचरण जातक के व्यक्तित्व और जातक की कार्यक्षमता के साथ उसकी शक्ति उसके सामर्थ्य के साथ चिंतन मनन जीवन संघर्ष और कार्य के प्रयासों में सफलता स्पष्ट बादिता मान सम्मान प्रतिष्ठा और संपन्नता को देखा जाता है कुल मिलाकर जातक की पर्सनैलिटी के ऊपर लग्न भाव प्रथम भाव तनु भाव से विचार किया जाता है ।

कुंडली का चतुर्थ सुख का भाव है । मन माता के साथ सुख वैभव और पब्लिक या जनता का भाव है ।आपका व्यक्तित्व जनता के समक्ष किस प्रकार का है ।
आपकी निजी गतिविधियां किस प्रकार की है जिससे जनता के समक्ष आप की अच्छी छवि उभर कर आनी चाहिए ।
जन्म कुंडली का पंचम भाव शिक्षा संतान आपकी बुद्धि विवेक ज्ञान भक्ति मंत्रणा शक्ति और आपकी बुद्धि स्तर का विचार किया जाता है जोकि मान प्रतिष्ठा के लिए बहुत जरूरी है ।
जन्म कुंडली का नवम भाव भाग्य भाव है जो जातक के भाग्य का ज्ञान कराता है जातक कितना भाग्यशाली है उसको भाग्य का कितना साथ मिल रहा है साथ ही जातक के धर्म और अध्यात्म और उसके मन की पवित्रता उत्तम व्यवहार का ज्ञान कराता है साथ ही जातक की उच्च शिक्षा और विदेश और विदेश यात्राओं के संबंध का ज्ञान कराता है ।
कुंडली का दशम भाव कर्म भाव कैरियर भाव आपके मान सम्मान प्रसिद्धि के साथ सत्ता पद प्रतिष्ठा और सफलता नाम रुतबा और आपके अधिकार के साथ आपकी महत्वकांक्षाओ का ज्ञान कराता है और आपको प्राप्त जिम्मेदारियों को बताता है कुल मिलाकर दशम भाव आपकी हैसियत को बताता है ।
जन्म कुंडली का एकादश भाव इलेवंथ हाउस को आय और लाभ भाव भी कहते हैं ।
कुंडली का एकादश भाव के द्वारा मित्रों का सहयोग समाज का सहयोग प्रशंसकों का सहयोग सहायकों सलाहकारों का सहयोग समर्थकों का सहयोग और शुभ चिंतकों का सहयोग के साथ हमारी आशाएं इच्छाएं आकांक्षाएं और उनकी पूर्ति का भाव है ।
साथ ही एकादश भाव हमारे कार्यों में सफलता के साथ चुनाव और मुकदमों में सफलता को बताता है ।
पदोन्नति के साथ मंत्री पद विधायक सांसद लोकसभा नगर पालिका जिला बोर्ड पंचायत सरकारी नीतियां और योजनाएं कंपनी , मंडली, परिषद , संघ और सेवकों को नियंत्रण करने वाली समितियां मैं भागीदारी को बताता है ।
जन्म कुंडली का अष्टम भाव आपके यश और अपयश के साथ आपके गुप्त ज्ञान और कार्यक्षेत्र में गुप्त कूटनीति की जानकारी देता है साथ ही आरोप-प्रत्यारोप और आपकी बदनामी नाम खराब के बारे में बताता है और जीवन में आकाशमिक परिवर्तन को बताता है साथ ही गूढ़ ज्ञान गुप्त ज्ञान और षड्यंत्र पूर्वक कार्य करने की क्षमताओं के बारे में भी बताता है ।
पद प्रतिष्ठा और मान-सम्मान प्राप्त करने के लिए जन्म कुंडली में भावों के अलावा ग्रहों की बात करते हैं जिसमें सूर्य ग्रह बुध ग्रह और देव गुरु बृहस्पति के साथ चंद्र और शुक्र ग्रह का बली होना अति आवश्यक है ।
अब हम मान प्रतिष्ठा के लिए कुंडली के भाव और ग्रहों को जोड़कर देखते हैं ।
कुंडली के नवम भाव का राशि स्वामी लॉर्ड उच्च या स्वराशि का होकर चतुर्थ भाव में स्थित हो अथवा चतुर्थ भाव का राशि स्वामी लॉर्ड नवम भाव में बली होकर विराजमान होने पर जातक को राज्य पक्ष से जनता के बीच में मान सम्मान और पद प्रतिष्ठा प्राप्त होती है जातक की यश कीर्ति फैलती है उसका नाम होता है उसके नाम का रुतबा बढ़ता है।
जन्म कुंडली के नवम भाव में स्थित देव गुरु बृहस्पति उच्च राशि का या स्वयं की राशि धनु या मीन का होने पर जातक संत महात्मा धार्मिक गुरु या महामंडलेश्वर अथवा प्रवचन कर्ता बनकर मान प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है ।
जन्म कुंडली में लग्नेश लग्न का स्वामी और चंद्रमा जिस राशि में हो वह आपस में मित्रों और लगन को कोई बली ग्रह देखता हो तब जातक अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से मान प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है ।
दशम भाव का राशि स्वामी लॉर्ड गुरु ग्रह के साथ ही थी बनाकर केंद्र या त्रिकोण भाव में स्थित होने पर जातक अपने कर्म के माध्यम से प्रसिद्धि और पद प्रतिष्ठा को पाता है ।
लग्न भाव पर राशि स्वामी लॉर्ड और पंचम भाव का राशि स्वामी नवम भाव में स्थित होने पर जातक शिक्षा के क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त करता है जिस प्रकार प्रोफेसर व्याख्याता लेक्चरर अध्यापक आदि के पदों पर मध्य प्रतिष्ठा पाकर अपनी प्रसिद्धि को प्राप्त करता है और गौरव प्राप्त करता है ।
पंचम भाव का राशि स्वामी लॉर्ड लग्न भाव स्थित होने पर और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तब ऐसा जातक अपने बुद्धि और विवेक के माध्यम से पद प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और अपने नाम की यश कीर्ति फैलाता है ।

जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह और मंगल ग्रह युति बनाकर वृश्चिक राशि में नहीं होना चाहिए शुक्र शनि की युति शुक्र राहु की युति सप्तम भाव या सप्तम भाव के राशि स्वामी लॉर्ड के साथ नहीं होना चाहिए अन्यथा जातक के मान-सम्मान पर कलंक लगता है बदनामी का भय रहता है जो पद प्रतिष्ठा मान-सम्मान को गिराने का कार्य करता है ।
जन्म कुंडली में गजकेसरी योग पंच महापुरुष योग में से हंस योग शश योग रोचक योग मालव्य योग भद्र योग जातक को मान सम्मान पद प्रतिष्ठा को दिलाते हैं साथ ही जातक के यश कीर्ति की बढ़ाते है।
आज के इस प्रतिस्पर्धा के युग में हर व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है हर एक को अपने नाम का रुतबा हो अच्छा लगता है लोगों के बीच मान-सम्मान हो अपनी एक अलग पहचान हो ऐसी ख्वाहिशें हर एक व्यक्ति के मन में होती हैं लेकिन जन्म कुंडली में ग्रहों का साथ भाग्य का साथ जिसे मिल जाता है वही आगे बढ़कर पद प्रतिष्ठा और मान-सम्मान यश कीर्ति और अपने नाम को बनाता है बना पाता है।

आचार्य पंडित कृष्ण कांत त्रिवेदी
इंदौर मध्य प्रदेश

.......... ✦•••  *_जय श्री हरि_*  •📜 *_कुंडली के ये 6 खतरनाक दोष, जीवन बिगाड़ सकते हैं आपका, जानिए अचूक उपाय_**_**_वैसे ...
01/12/2021

.......... ✦••• *_जय श्री हरि_* •
📜 *_कुंडली के ये 6 खतरनाक दोष, जीवन बिगाड़ सकते हैं आपका, जानिए अचूक उपाय_*

*_*
*_वैसे तो ज्योतिष विद्या में कई तरह के योग और कुंडली के दोष की चर्चा की गई है, परंतु कुछ दोष ऐसे हैं जिस पर अधिक चर्चा होती है और जिसके निवारण पर जोर दिया जाता है। क्योंकि मान्यता के अनुसार इन दोषों के कारण जिंदगी लगभग बर्बाद हो जाती है। आओ जानते हैं इन दोषों में से 6 खास दोषों के बारे में और उनके निवारण के बारे में।_*

🔸 *_1. कालसर्प दोष_*
🔸 *_2. मंगल दोष_*
🔸 *_3. पितृ दोष_*
🔸 *_4. गुरु चांडाल दोष_*
🔸 *_5. विष दोष_*
🔸 *_6. केन्द्राधिपति दोष_*

🐍 *_1. कालसर्प दोष : जन्म के समय ग्रहों की दशा में जब राहु-केतु आमने-सामने होते हैं और सारे ग्रह एक तरफ रहते हैं, तो उस काल को सर्पयोग कहा जाता है। इस आधार पर कालसर्प के 12 प्रकार भी बताए गए हैं। कुछ ने तो 250 के लगभग प्रकार बताए हैं।_*

☠️ *_निवारण :_*
🔹 *_1. खाना रसोईघर में बैठकर खाएं।_*
🔹 *_2. दीवारों को साफ रखें।_*
🔹 *_3. टॉयलेट व बाथरूम की सफाई रखें।_*
🔹 *_4. ससुराल से संबंध अच्छे रखें।_*
🔹 *_5. पागलों को खाने को दें।_*
🔹 *_6. धर्मस्थान की सीढ़ियों पर 10 दिन तक पोंछा लगाएं।_*
🔹 *_7. माथे पर चंदन का तिलक लगाएं।_*
🔹 *_8. घर में ठोस चांदी का हाथी रख सकते हैं।_*
🔹 *_9. सरस्वती की आराधना करें।_*
🔹 *_10. लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर मंगल या गुरु का उपाय करें।_*

🎯 *_2. मंगल दोष : किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली में मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में से किसी भी एक भाव में है तो यह 'मांगलिक दोष' कहलाता है।_*

▪️ *_1.प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए।_*
▪️ *_2.सफेद सुरमा 43 दिन तक लगाना चाहिए।_*
▪️ *_3.नीम के पेड़ की पूजा करना चाहिए।_*
▪️ *_4.गुड़ खाना और खिलाना चाहिए।_*
▪️ *_5.क्रोध पर काबू और चरित्र को उत्तम रखना चाहिए।_*
▪️ *_6.मांस और मदिरा से दूर रहें।_*
▪️ *_7.भाई-बहन और पत्नी से संबंध अच्छे रखें।_*
▪️ *_8.पेट और खून को साफ रखें।_*
▪️ *_9.मंगलनाथ उज्जैन में भात पूजा कराएं।_*
▪️ *_10.विवाह नहीं हुआ है तो पहले कुंभ विवाह करें।_*

💁🏻‍♂️ *_3. पितृ दोष : कुंडली के नौवें में राहु, बुध या शुक्र है तो यह कुंडली पितृदोष की है। कुंडली के दशम भाव में गुरु के होने को शापित माना जाता है। गुरु का शापित होना पितृदोष का कारण है। सातवें घर में गुरु होने पर आंशिक पितृदोष माना जाता है। लग्न में राहु है तो सूर्य ग्रहण और पितृदोष, चंद्र के साथ केतु और सूर्य के साथ राहु होने पर भी पितृदोष होता है। पंचम में राहु होने पर भी कुछ ज्योतिष पितृदोष मानते हैं। जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है।_*

✍🏼 *_निवारण : इसका सरल-सा निवारण है कि प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ना। पूर्वजों के धर्म में विश्वास रखना, कुलदेवी और कुलदेव की पूजा करना और श्राद्ध पक्ष के दिनों में तर्पण आदि कर्म करना और पूर्वजों के प्रति मन में श्रद्धा रखना। त्र्यंबकेश्वर में जाकर पितृदोष की शंति कराएं।_*

🤷🏻‍♀️ *_4. गुरु चांडाल दोष : कुंडली के किसी भी भाव में बृहस्पति के साथ राहु बैठा है तो इसे गुरु चांडाल योग कहते हैं।_*

🧞‍♀️ *_चांडाल योग का निवारण :_*
👉🏼 *_1. माथे पर नित्य केसर, हल्दी या चंदन का तिलक लगाएं।_*

👉🏼 *_2. सुबह तालाब जाकर मछलियों को काला साबुत मूंग या उड़द खिलाएं।_*

👉🏼 *_3. प्रति गुरुवार को पूर्ण व्रत रखें। रात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।_*

👉🏼 *_4. उत्तम चरित्र रखकर पीली वस्तुओं का दान करें और पीले वस्त्र ही पहनें।_*

👉🏼 *_5. गुरुवार को पड़ने वाले राहु के नक्षत्र में रात्रि में बृहस्पति और राहु के मंत्र का जाप करना चाहिए या शांति करवाएं। राहु के नक्षत्र हैं आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा।_*

👉🏼 *_5. विष दोष : चंद्र और शनि किसी भी भाव में इकट्ठा बैठे हो तो विष योग बनता है।_*

☝🏼 *_दोष निवारण :_*
🤷🏻‍♀️ *_1. पंचमी को उपवास रखें। खासकर नागपंचमी को कड़ा उपवास रखें।_*

🤷🏻‍♀️ *_2. नागदेव की विधिवत पूजा करें। 'ऊं कुरु कुल्ले फट् स्वाहा' का जाप करते हुए घर में सभी जगह जल छिड़कें।_*

🤷🏻‍♀️ *_3. श्रीसर्प सूक्त का पाठ करें। श्रीमद भागवत पुराण और श्री हरिवंश पुराण का पाठ करवाएं।_*

🤷🏻‍♀️ *_4. माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। घर में चारों दिशाओं में कर्पूर जलाएं। कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है।_*

🌪️ *_6. केन्द्राधिपति दोष : केंद्र भाव पहला, चौथा, सातवां, और दसवां भाव होता है। मिथुन और कन्या लग्न की कुंडली में यदि बृहस्पति पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में हो, धनु और मीन लग्न की कुंडली में बुध पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में हो तो केन्द्राधिपति दोष का निर्माण होता है। दरअसल, बृहस्पति, बुध, शुक्र, और चंद्रमा के कारण यह दोष बनता है।_*

👉🏼 *_1. नित्य भगवान शिव की पूजा करें।_*
👉🏼 *_2. नित्य 21 बार ॐ नमो नारायण का जाप करें।_*
👉🏼 *_3. नित्य 11 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।_
आचार्य पंडित कृष्ण कांत त्रिवेदी इंदौर मध्यप्रदेश

रावण से भी ज्यादा शक्तिशाली था कंस, सवालाख किलो का उठा लिया था धनुष!रावण को मारने के लिए श्री राम को कई दिन युद्ध करना प...
01/12/2021

रावण से भी ज्यादा शक्तिशाली था कंस, सवालाख किलो का उठा लिया था धनुष!

रावण को मारने के लिए श्री राम को कई दिन युद्ध करना पड़ा था इस दौरान दो बार राम जी तो 4 बार लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे। करोडो वानरों की भी मृत्यु हो गई थी (हालाँकि उन्हें इंद्र ने पुनः जीवन दान दे दिया था) तब जाकर कंही अंत में रावण का वध हुआ था।

इसपे हनुमान जी और वानरों में भी कई वीरो की सहायता से ही रावण की सेना का संघार हुआ था। भले ही बड़े बड़े राक्षस राम लखन ने मारे थे लेकिन वानर वीरो ने भी कई राक्षस मारे थे।

इन सब को देखते हुए अगर आपको लगता है की कंस तो बड़ा कमजोर था। भगवान कृष्ण जब ग्यारह साल के थे तभी उसे आसानी से मार दिया था तो आप गलत है!

तब पर श्री कृष्णा हो या महाभारत सभी में कृष्ण लीला तो दिखाई है। लेकिन कंस का पराक्रम बहुत कम ही दिखाया गया है। श्री कृष्ण के राज पुरोहित गर्गाचार्य ने जो गर्ग संहिता लिखी है उसमे उन्होंने कंस के बल का वर्णन किया है जिसे जान आप भी कहेंगे की वो रावण से ज्यादा बलशाली था।

जाने उसका बल… वत्सासुर, पूतना, तृणावर्त, अघासुर, बकासुर (पूतना का भाई). अरिष्ठासुर, केशी, व्योमासुर, शकटासुर इन सभी असुरो को भगवान् कृष्ण ने बचपन में ही मार दिया था। लेकिन आप जानकार चौंक जायेंगे की इस सभी को कंस ने अपनी दिग्गविजय यात्रा में परास्त कर अपना गुलाम बना लिया था, तभी प्राण दान दिया इनको नहीं तो ये उसके हाथो भी मारे जाते।

जरासंध का हाथी कुवलयापीड़ जिसमे 1000 हाथियों का बल था जरासंध की दिग्गविजय के समय उसके साथ था, मथुरा नगरी के पास जब उसने शिविर लगाया तो वो हाथी कंस की नगरी में घुस गया। कंस तब मल्ल युद्ध में व्यस्त था तब कंस निहत्था ही उस हाथी से भीड़ गया और उसे उठाकर जरासंध के शिविर में फेंक दिया।

हाथी फिर भी मरा नहीं लेकिन ये पराक्रम देख उसने अपनी दो बेटियों कंस से ब्याहकर उससे संधि कर ली।

परशुराम जी से भी टकरा गया था कंस जाने पूरी कथा….

कंस ने अपने काका देवक की बेटी देवकी के विवाह के पूर्व ही दिग्गविजय की यात्रा शुरू की थी जिस दौरान उसने सभी उपलब्धिया हासिल की थी। इसी दौरान वो महेंद्र पर्वत (वर्तमान ओडिशा में) पहुंचा और उस पर्वत पर परशुराम जी तपस्या कर रहे है, ये जान उसे महेंद्र पर्वत को वैसे ही उठा लिया जैसे रावण ने हिमालय उठा लिया था।

तब परशुराम जी कुपित हो गए तो कंस ने उनकी परिक्रमा कर उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति की और कहा में क्षत्रिय नहीं हूं। तब भी परशुराम का क्रोध शांत नहीं हुआ और उसे भगवान् विष्णु का धनुष दिखाते हुए कहा की ये 120000 किलो का है अगर तुमने उसे उठा लिया तो में तुम्हे माफ़ कर ये धनुष भी तुम्हे दे दूंगा।

कंस ने सहसा उस धनुष को उठा लिया और उसकी प्रत्यंचा भी कर डाली तो परशुराम जी प्रसन्न हुए और उसे वो धनुष दे दिया, साथ ही ये भी कहा की जो ये धनुष तोड़ेगा वो ही तुम्हारा अंत करने में सक्षम होगा।

चाणूर और मुष्टिक कौन थे कैसे बने कंस के सेवक जाने????

कंस मल्ल युद्ध का बड़ा शौकीन था, उसके बराबर मथुरा में कोई पहलवान भी नहीं था, एक दिन उसे पता चला की पड़ौसी देश के राजा जो की पांच भाई थे वो सभी मल्ल्युद्ध में पारंगत थे। कंस उनके राज्य में गया और उन्हें ललकारा और कहा की अगर तुम जीते तो में तुम्हारा सेवक और में जीता तो तुम मेरे सेवक।

तब कंस ने एक एक कर के पांचो भाइयो को मल्ल युद्ध में हरा दिया और उनमे से मुष्टिक और चाणूर को अपने साथ मथुरा ले आया जिनसे बाद में उसने कृष्ण बलराम को मरवाना चाहा था। लेकिन कृष्ण बलराम जब मथुरा आये तो उन्होंने विष्णु धनुष भी तोडा जरासंध के उस हाथी को भी मारा और अंत में इन दो पहलवानो के बाद कंस को भी,जैसे तैराक पानी में ही डूबता है वैसे कंस को भी उसके पसंदीदा मल्ल युद्ध में ही परास्त कर कृष्ण ने उसका संघार किया।

27/11/2021

शिव के गले में मुण्ड माला का रहस्य
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भगवान शिव और सती का अद्भुत प्रेम शास्त्रों में वर्णित है। इसका प्रमाण है सती के यज्ञ कुण्ड में कूदकर आत्मदाह करना और सती के शव को उठाए क्रोधित शिव का तांडव करना। हालांकि यह भी शिव की लीला थी क्योंकि इस बहाने शिव 51 शक्ति पीठों की स्थापना करना चाहते थे। शिव ने सती को पहले ही बता दिया था कि उन्हें यह शरीर त्याग करना है। इसी समय उन्होंने सती को अपने गले में मौजूद मुंडों की माला का रहस्य भी बताया था।
मुण्ड माला का रहस्य
एक बार नारद जी के उकसाने पर सती भगवान शिव से जिद करने लगी कि आपके गले में जो मुंड की माला है उसका रहस्य क्या है। जब काफी समझाने पर भी सती न मानी तो भगवान शिव ने राज खोल ही दिया। शिव ने पार्वती से कहा कि इस मुंड की माला में जितने भी मुंड यानी सिर हैं वह सभी आपके हैं। सती इस बात का सुनकर हैरान रह गयी।
सती ने भगवान शिव से पूछा, यह भला कैसे संभव है कि सभी मुंड मेरे हैं। इस पर शिव बोले यह आपका 108 वां जन्म है। इससे पहले आप 107 बार जन्म लेकर शरीर त्याग चुकी हैं और ये सभी मुंड उन पूर्व जन्मों की निशानी है। इस माला में अभी एक मुंड की कमी है इसके बाद यह माला पूर्ण हो जाएगी। शिव की इस बात को सुनकर सती ने शिव से कहा मैं बार-बार जन्म लेकर शरीर त्याग करती हूं लेकिन आप शरीर त्याग क्यों नहीं करते।
शिव हंसते हुए बोले श्मैं अमर कथा जानता हूं इसलिए मुझे शरीर का त्याग नहीं करना पड़ता।श् इस पर सती ने भी अमर कथा जानने की इच्छा प्रकट की। शिव जब सती को कथा सुनाने लगे तो उन्हें नींद आ गयी और वह कथा सुन नहीं पायी। इसलिए उन्हें दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने शरीर का त्याग करना पड़ा।
शिव ने सती के मुंड को भी माला में गूंथ लिया। इस प्रकार 108 मुंड की माला तैयार हो गयी। सती ने अगला जन्म पार्वती के रूप में हुआ। इस जन्म में पार्वती को अमरत्व प्राप्त होगा और फिर उन्हें शरीर त्याग नहीं करना पड़ा !
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27/11/2021

शनिदेव लंगड़े क्यों और उन पर तेल चढ़ाने की परंपरा क्यों?
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शनिदेव दक्ष प्रजापति की पुत्री संज्ञा देवी और सूर्यदेव के पुत्र हैं। यह नवग्रहों में सबसे अधिक भयभीत करने वाला ग्रह है। इसका प्रभाव एक राशि पर ढाई वर्ष और साढ़े साती के रूप में लंबी अवधि तक भोगना पड़ता है। शनिदेव की गति अन्य सभी ग्रहों से मंद होने का कारण इनका लंगड़ाकर चलना है। वे लंगड़ाकर क्यों चलते हैं, इसके संबंध में सूर्यतंत्र में एक कथा है-एक बार सूर्य देव का तेज सहन न कर पाने की वजह से संज्ञा देवी ने अपने शरीर से अपने जैसी ही एक प्रतिमूर्ति तैयार की और उसका नाम स्वर्णा रखा। उसे आज्ञा दी कि तुम मेरी अनुपस्थिति में मेरी सारी संतानों की देखरेख करते हुए सूर्य देव की सेवा करो और पत्नी सुख भोगो। ये आदेश देकर वह अपने पिता के घर चली गई। स्वर्णा ने भी अपने आप को इस तरह ढाला कि सूर्य देव भी यह रहस्य न जान सके। इस बीच सूर्य देव से स्वर्णा को पांच पुत्र और दो पुत्रियां हुई। स्वर्णा अपने बच्चों पर अधिक और संज्ञा की संतानों पर कम ध्यान देने लगी।

एक दिन संज्ञा के पुत्र शनि को तेज भूख लगी, तो उसने स्वर्णा से भोजन मांगा तब स्वर्णा ने कहा कि अभी ठहरो, पहले मैं भगवान् का भोग लगा लूं और तुम्हारे छोटे भाई-बहनों को खिला दूं, फिर तुम्हें भोजन दूंगी। यह सुनकर शनि को क्रोध आ गया और उन्होंने माता को मारने के लिए अपना पैर उठाया, तो स्वर्णा ने शनि को श्राप दिया कि तेरा पांव अभी टूट जाए। माता का श्राप सुनकर शनिदेव डरकर अपने पिता के पास गए और सारा किस्सा कह सुनाया। सूर्यदेव तुरंत समझ गए कि कोई भी माता अपने पुत्र को इस तरह का शाप नहीं दे सकती। इसलिए उनके साथ उनकी पत्नी नहीं, कोई और है। सूर्य देव ने क्रोध में आकर पूछा कि 'बताओ तुम कौन हो?' सूर्य का तेज देखकर स्वर्णा घबरा गई और सारी सच्चाई उन्हें बता दी। तब सूर्यदेव ने शनि को समझाया कि स्वर्णा तुम्हारी माता नहीं है, लेकिन मां समान है।

इसलिए उनका दिया शाप व्यर्थ तो नहीं होगा, परंतु यह इतना कठोर नहीं होगा कि टांग पूरी तरह से अलग हो जाए। हां, तुम आजीवन एक पांव से लंगड़ाकर चलते रहोगे।

शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाया जाता है, इस संबंध में आनंद रामायण में एक कथा का उल्लेख मिलता है। जब भगवान् राम की सेना ने सागर सेतु बांध लिया, तब राक्षस इसे हानि न पहुंचा सकें, उसके लिए पवनसुत हनुमान को उसकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई। जब हनुमान जी शाम के समय अपने इष्टदेव राम के ध्यान में मग्न थे, तभी सूर्य पुत्र शनि ने अपना काला कुरूप चेहरा बनाकर क्रोधपूर्वक कहा-'हे | वानर ! मैं देवताओं में शक्तिशाली शनि हूं। सुना है, तुम बहुत बलशाली हो। आंखें खोलो और मुझसे युद्ध करो, मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूं।' इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा-'इस समय में अपने प्रभु का ध्यान कर रहा हूँ। आप मेरी पूजा में विघ्न मत डालिए। आप मेरे आदरणीय कृपा करके यहां से चले जाइए।

जब शनि लड़ने पर ही उतर आए, तो हनुमान ने शनि को अपनी पूंछ में लपेटना शुरू कर दिया। फिर उसे कसना प्रारंभ कर दिया। जोर लगाने पर भी शनि उस बंधन से मुक्त न होकर पीड़ा से व्याकुल होने लगे। हनुमान जी ने फिर सेतु की परिक्रमा शुरू कर शनि के घमंड को तोड़ने के लिए पत्थरों पर पूंछ को झटका दे-दे कर पटकना शुरू कर दिया। इससे शनि का शरीर लहूलुहान हो गया, जिससे उनकी पीड़ा बढ़ती गई। तब शनिदेव ने हनुमान जी से प्रार्थना की कि मुझे बंधन मुक्त कर दीजिए मैं अपने अपराध की सजा पा चुका हूं। फिर मुझसे ऐसी गलती नहीं होगी।

इस पर हनुमान जी बोले-मैं तुम्हें तभी छोडूंगा, जब तुम मुझे वचन दोगे कि श्रीराम के भक्त को कभी परेशान नहीं करोगे। यदि तुमने ऐसा किया, तो मैं तुम्हें कठोर दंड दूंगा।' शनि ने गिड़गिड़ाकर कहा-मैं वचन देता हूं कि कभी भूलकर भी आपके और श्रीराम के भक्त की राशि पर नहीं आऊंगा। आप मुझे छोड़ दें। तब हनुमान ने शनिदेव को छोड़ दिया। फिर हनुमान जी से शनिदेव ने अपने घावों की पीड़ा मिटाने के लिए तेल मांगा। हनुमान् ने जो तेल दिया, उसे घाव पर लगाते ही शनिदेव की पीड़ा मिट गई। उसी दिन से शनिदेव को तेल चढ़ता है, जिससे उनकी पीड़ा शांत हो जाती है और वे प्रसन्न हो जाते हैं।

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03/09/2020

*🌹पितरों के समान हैं ये 3 वृक्ष, 3 पक्षी, 3 पशु और 3 जलचर🌹*
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*⭕धर्मशास्त्रों अनुसार पितरों का पितृलोक चंद्रमा के उर्ध्वभाग में माना गया है। दूसरी ओर अग्निहोत्र कर्म से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। पक्षियों के लोक को भी पितृलोक कहा जाता है। तीसरी ओर कुछ पितर हमारे वरुणदेव का आश्रय लेते हैं और वरुणदेव जल के देवता हैं। अत: पितरों की स्थिति जल में भी बताई गई है।* =================================

*⚜️तीन वृक्ष:-*
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*🚩1. पीपल का वृक्ष :-* पीपल का वृक्ष बहुत पवित्र है। एक ओर इसमें जहां विष्णु का निवास है वहीं यह वृक्ष रूप में पितृदेव है। पितृ पक्ष में इसकी उपासना करना या इसे लगाना विशेष शुभ होता है।

*🚩2. बरगद का वृक्ष :-* बरगद के वृक्ष में साक्षात शिव निवास करते हैं। अगर ऐसा लगता है कि पितरों की मुक्ति नहीं हुई है तो बरगद के नीचे बैठकर शिव जी की पूजा करनी चाहिए।

*🚩3. बेल का वृक्ष :-* यदि पितृ पक्ष में शिवजी को अत्यंत प्रिय बेल का वृक्ष लगाया जाय तो अतृप्त आत्मा को शान्ति मिलती है। अमावस्या के दिन शिव जी को बेल पत्र और गंगाजल अर्पित करने से सभी पितरों को मुक्ति मिलती है।...इसके अलावा अशोक, तुलसी, शमी और केल के वृक्ष की भी पूजा करना चाहिए।
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*⚜️तीन पक्षी:-*
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*🚩1. कौआ :-* कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। इस पक्ष में कौओं को भोजन कराना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है। शास्त्रों के अनुसार कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में स्थित होकर विचरण कर सकती है।

*🚩2. हंस :-* पक्षियों में हंस एक ऐसा पक्षी है जहां देव आत्माएं आश्रय लेती हैं। यह उन आत्माओं का ठिकाना हैं जिन्होंने अपने ‍जीवन में पुण्यकर्म किए हैं और जिन्होंने यम-नियम का पालन किया है। कुछ काल तक हंस योनि में रहकर आत्मा अच्छे समय का इंतजार कर पुन: मनुष्य योनि में लौट आती है या फिर वह देवलोक चली जाती है। हो सकता है कि आपके पितरों ने भी पुण्य कर्म किए हों।

*🚩3. गरुड़ :-* भगवान गरुड़ विष्णु के वाहन हैं। भगवान गरुड़ के नाम पर ही गुरुढ़ पुराण है जिसमें श्राद्ध कर्म, स्वर्ग नरक, पितृलोक आदि का उल्लेख मिलता है। पक्षियों में गरुढ़ को बहुत ही पवित्र माना गया है। भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले गरूड़ का आश्रय लेते हैं पितर।... इसके अलावा क्रोंच या सारस का नाम भी लिया जाता है। =================================

*⚜️तीन पशु:-*
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*🚩1. कुत्ता :-* कुत्ते को यम का दूत माना जाता है। कहते हैं कि इसे ईधर माध्यम की वस्तुएं भी नजर आती है। दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जो भविष्‍य में होने वाली घटनाओं और ईथर माध्यम (सूक्ष्म जगत) की आत्माओं को देखने की क्षमता रखता है। कुत्ते को हिन्दू देवता भैरव महाराज का सेवक माना जाता है। कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। कुत्ते को रोटी देते रहने से पितरों की कृपा बनी रहती है।

*🚩2. गाय :-* जिस तरह गया में सभी देवी और देवताओं का निवास है उसी तरह गाय में सभी देवी और देवताओं का निवास बताया गया है। दरअसल मान्यता के अनुसार 84 लाख योनियों का सफर करके आत्मा अंतिम योनि के रूप में गाय बनती है। गाय लाखों योनियों का वह पड़ाव है, जहां आत्मा विश्राम करके आगे की यात्रा शुरू करती है।

*🚩3. हाथी :-* हाथी को हिन्दू धर्म में भगवान गणेश का साक्षात रूप माना गया है। यह इंद्र का वाहन भी है। हाथी को पूर्वजों का प्रतीक भी माना गया है। जिस दिन किसी हाथी की मृत्यु हो जाती है उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता है। हाथियों को अपने पूर्वजों की स्मृतियां रहती हैं। अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन गजपूजा विधि व्रत रखा जाता है। सुख-समृद्धि की इच्छा रखने वाले उस दिन हाथी की पूजा करते हैं।.. इसके अलावा वराह, बैल और चींटियों का यहां उल्लेख किया जा सकता है। जो चींटी को आटा देते हैं और छोटी-छोटी चिड़ियों को चावल देते हैं, वे वैकुंठ जाते हैं। =================================

*⚜️तीन जलचर जंतु:-*
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*🚩1.मछली :-* भगवान विष्णु ने एक बार मत्स्य का अवतार लेकर मनुष्य जाती के अस्त्वि को जल प्रलय से बचाया था। जब श्राद्ध पक्ष में चावल के लड्डू बनाए जाते हैं तो उन्हें जल में विसर्जित कर दिया जाता है।

*🚩2. कछुआ :-* भगवान विष्णु ने कच्छप का अवतार लेकर ही देव और असुरों के लिए मदरांचल पर्वत को अपनी पीठ पर स्थापित किया था। हिन्दू धर्म में कछुआ बहुत ही पवित्र उभयचर जंतु है जो जल की सभी गतिविधियों को जानता है।

*🚩3. नाग :-* भारतीय संस्कृति में नाग की पूजा इसलिए की जाती है, क्योंकि यह एक रहस्यमय जंतु है। यह भी पितरों का प्रतीक माना गया है।... इसके अलावा मगरमच्छ भी माना जाता है।
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💐💐💐आचार्या पंडित कृष्ण कांत त्रिवेदी (इंदौर) 💐💐💐

जय श्री कृष्णा
03/09/2020

जय श्री कृष्णा

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