21/12/2025
विश्व ध्यान दिवस
🧘
From Doing to Being
करने से होने की यात्रा
भगवद गीता में कर्म योग और संन्यास योग,दोनों की बात आती है। भारतीय आश्रम व्यवस्था भी जीवन को एक स्वाभाविक क्रम में देखने की दृष्टि देती है:
25-50 वर्ष गृहस्थ, 50-75 वानप्रस्थ और 75-100 संन्यास।
आज स्थिति बदल गई है। हमारा गृहस्थ आश्रम लंबा होता चला गया है और हम सांसारिक बंधनों से मुक्त होने का गंभीर प्रयास ही नहीं करते। ‘करना’ ही जीवन का केंद्र बन गया है; ‘होना’ पीछे छूटता जा रहा है।
तीन गुणों का सिद्धांत भी हमें यही संकेत देता है:
• तमोगुण: आलस्य, जड़ता
• रजोगुण: पाने की दौड़, उपलब्धि, संग्रह
• सत्त्वगुण: शांति, सामंजस्य, सहजता
उम्र और परिपक्वता के साथ जीवन का झुकाव रजस से सत्त्व की ओर होना स्वाभाविक है।
पतंजलि के अष्टांग योग में भी यह क्रम स्पष्ट दिखता है। यम और नियम से शुरू होकर प्रत्याहार, धारणा और फिर ध्यान। यम का पहला सूत्र,अहिंसा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी लागू होता है।यहीं से करने और होने का सूक्ष्म अंतर समझ में आता है।बहुत से कर्म, जो बाहर से साधारण लगते हैं, भीतर कहीं न कहीं हिंसा छुपाए रहते हैं-
किसी को बदलने की हिंसा,
पाने की उतावली,अपने विचार थोपने की आकांक्षा।
Doing has mostly a desire to change, to have, to possess, to achieve. इसमें संघर्ष है, टकराव है, और कई बार सूक्ष्म हिंसा भी।
Being अधिक प्राकृतिक है:
शांत, मौन, स्वीकार से भरा हुआ।यह कम हस्तक्षेप करता है और इसलिए कम हिंसक होता है।जैसे-जैसे हम Doing से Being की ओर बढ़ते हैं, हम अहिंसक भी होते जाते हैं।
यही संतुलन Serenity Prayer में सुंदर रूप से व्यक्त होता है:
Give me strength to change things which I should.
Give me serenity to accept things which I can’t change.
Give me wisdom to know the difference.
अंततः जीवन Doing बनाम Being की लड़ाई नहीं है,बल्कि दोनों के बीच एक नाज़ुक संतुलन है।युवा अवस्था में Doing आवश्यक है: कर्तव्य, कर्म, निर्माण।पर उम्र के साथ एक स्वाभाविक, सूक्ष्म संक्रमण होना चाहिए: करने से होने की ओर।शायद यहीं से वास्तविक शांति मिल सकती है।
We thus can move from ‘reacting’ to ‘responding’.
ध्यान इस प्रक्रिया में मददगार हो सकता है।
A simple life is the key.
🌱🌱
On World Meditation day