16/01/2026
#जरूर_पढ़ें: रात ढाई बजे की डिलीवरी और हमारी संवेदनहीनता:
🕛रात के ढाई बजे Zomato का एक डिलीवरी बॉय ऑर्डर लेकर एक अपार्टमेंट के नीचे पहुँचता है।
फोन करता है – कस्टमर से निवेदन करता है कि वह नीचे आ जाए।
💴🏢जवाब आता है –
“पैसे नहीं ले रहे हो क्या? ऊपर देकर जाओ।”
🙍♂️📦डिलीवरी बॉय कोई बहस नहीं करता। वह बस अपनी सुरक्षा की बात रखता है –
बाइक नीचे खड़ी है, ऊपर गया तो चोरी का डर है।
कस्टमर का फैसला साफ़ है – “तो ऑर्डर कैंसिल कर दो।”
यहाँ कहानी में जो सबसे अहम है, वह ये कि इसके बाद भी डिलीवरी बॉय एक बार फिर आग्रह करता है।
रात के ढाई बजे, लंबा सफ़र तय करके, वह बस इतना कहता है – “सर, इतनी दूर से आया हूँ, क्या आप नीचे तक नहीं आ सकते?”
लेकिन सामने सहानुभूति नहीं थी, सिर्फ़ अधिकार का भाव था।
आख़िरकार ऑर्डर कैंसिल हुआ।
वहीं सड़क किनारे पैकेट खुला – पहले गुलाब जामुन, फिर बिरयानी।
यह कोई जश्न नहीं था, यह उस सिस्टम के खिलाफ़ एक ख़ामोश विरोध था।
हम अक्सर डिलीवरी पार्टनर्स को “सर्विस प्रोवाइडर” कह देते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि वे सबसे पहले इंसान हैं।
रात में अकेले सफ़र करना, चोरी का डर, असुरक्षित माहौल – ये सब उनकी रोज़मर्रा की सच्चाई है।
कुछ दिन पहले डिलीवरी वर्कर्स ने कंपनियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई थी। पर इस घटना के बाद लगता है कि सवाल सिर्फ़ कंपनियों का नहीं है।
सवाल हमारी सोच का भी है – क्या हमने सुविधा को इंसानियत से ऊपर रख दिया है?
अगर कोई लड़का रात के ढाई बजे आपका खाना लेकर खड़ा है,
तो ज़रा सा नीचे उतर आना कोई एहसान नहीं है।
यह बस इंसान होने का न्यूनतम शिष्टाचार है।
डिलीवरी बॉय काम करता है, वह आपका ग़ुलाम नहीं है।
थोड़ी तमीज़, थोड़ी संवेदनशीलता – और थोड़ा इंसान होना।
सिस्टम सुधरना ज़रूरी है, लेकिन उससे पहले सोच सुधरनी चाहिए।
क्योंकि जिस समाज में सुविधा इंसान से बड़ी हो जाए,वहाँ बिरयानी तो गरम मिल जाती है,
पर इंसानियत ठंडी पड़ जाती है।
Health and Cities K Jankaar
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