Dr. Kapur Sonkriya

Dr. Kapur Sonkriya STAY HOME AND BE SAFE

20/01/2021
07/01/2021

अगर जातियों के आधार पर ही पद देने है। तो फिर बहुमत के आधार पर दो,जिनकी जितनी जनसंख्या ।उनको उतने ही पद...? क्यों जनता को बेवकूफ बनाते हो,योग्यता और जाती एक साथ नहीं चल सकती जादूगर जी...?

23/08/2020

समझने वाले इशारो में ही समझ सकते हैं।

दलित बनाम अम्बेडकर संगठन :-सब अलग अलग लड़ते रहोगे तो आप लोग कुछ भी नहीं कर पाएंगे। सिर्फ ग्रुप बनाना एवम् भाषण बाजी करना...
21/08/2020

दलित बनाम अम्बेडकर संगठन :-

सब अलग अलग लड़ते रहोगे तो आप लोग कुछ भी नहीं कर पाएंगे। सिर्फ ग्रुप बनाना एवम् भाषण बाजी करना ही काम रहेगा। जो सब लोग भली भांति कर रहे है। धीरे धीरे करके सारे इंस्टीट्यूशंस को बाजारीकरण के हवाले कर दिया जायेगा तो बच्चे नौकरियों के लिए मुंह ताकते रहेंगे। बाकी सेठ जी की नौकरी दस हजार में पक्की समझना। पूरा दिन और रात काम करने के बाद भी आपको नौकरी में बोनस के रूप में गालियां जरूर मिलने वाली है। जिस तरह से समाज सोया पड़ा है और नेट में व्यस्त है उससे तो लगने लगा है गुलामी बेहद करीब है। विद्वान लोग ट्विटर फेसबुक व्हाट्सएप पर रोज जनता को जागरूक करने की कोशिश कर रहे है मगर हम मगरमच्छ की तरह निश्चिन्त है। आज बैंकों, एयर इंडिया, एलआईसी, रेलवे इत्यादि बड़ी बड़ी फायदे की कम्पनियों का निजीकरण हो चुका है अथवा किया जा रहा है इसके बाद हमारी पीढिय़ों के लिए जो हमने सपने देखे थे वो खत्म से होते दिख रहे है।
हमने व हमारे पिताजी ने अपने बच्चों को अच्छी तालीम दिलाकर बहुत खुश नजर आ रहे थे एक दिन बच्चा सरकार में अच्छी पोजिशन पर जायेगा, किन्तु ऐसा अब लगाना बंद सा हो रहा है। समाज के कई बच्चे मेरिट में अव्वल आ रहे है किन्तु अच्छा व्यापार करने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है ना नौकरी होगी ना व्यापार फिर हमारी उच्च शिक्षा के क्या फायदे।
हमने जिन नेताओं की जमात खड़ी करी है चाहे किसी भी समाज का क्यों ना हो वह हमारे लिए एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं रखता। उनसे सभी समाजों को आशा त्याग देनी चाहिए।
निजीकरण से एससी एसटी ओबीसी को ही नुकसान होगा ऐसा नहीं है क्योंकि अधिसंख्य सामान्य जाति के लोग भी नौकरी की आशा रखते है। किन्तु जाति धर्म का ऐसा धतूरा खिला दिया गया है कि आज कोई भारतीय रहा नहीं। बस देशभक्ति कुछ लोगों की बपौती बन कर रह गई है। न्यायपालिका से भी हमे आशा नहीं रह गई है जैसाकी इन दिनों आए कई निर्णय आए है। एक आदमी क्राइम करके भी स्वतंत्र घूम रहा है वहीं एक आदमी अपनी बात नहीं रख सके समाज को जागरूक नहीं कर सके इसलिए भी जेल में बंद कर दिया जाता है। यह सब कब तक चलेगा क्या कोई इस सोये हुए लोगों को जगाने के लिए आगे आयेगा।
राजनैतिक पार्टियों का तो कहना ही क्या वो तो इस कदर जातिवादियों में बंट चुकी है कि उनको अपने निजी स्वार्थ के सिवाय कुछ दिखता ही नहीं। वो सभी समाजों को एक जाजम पर ला नहीं सकती। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक हम और हमारे अधिकार सुरक्षित नहीं है।
क्या हमें इस बारे में गहन चिन्तन करने की आवश्यकता है।

17/06/2020

कोरोना COVID-19 लोक डॉउन (20 मार्च से 17 मई )के दौरान भारतीय मजदूरों की दुरदर्शा, भारतीय सरकार ने जिस निर्दय तरीके से की उसे इतिहासः में भुला नही जा सकता !

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