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जोड़ों का दर्द एक सामान्य समस्या है जो किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ इसका खतरा अधिक बढ़ जाता है। ...
12/04/2026

जोड़ों का दर्द एक सामान्य समस्या है जो किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ इसका खतरा अधिक बढ़ जाता है। यह दर्द शरीर के किसी भी जोड़ जैसे घुटना, कंधा, कमर या हाथ-पैर में हो सकता है।

🔶 कार्टिलेज का घिसना (Cartilage Wear)
जोड़ों के बीच एक मुलायम परत होती है जिसे कार्टिलेज कहते हैं।
यह हड्डियों को आपस में टकराने से बचाती है और मूवमेंट को आसान बनाती है।
उम्र बढ़ने के साथ कार्टिलेज घिसने लगता है
ज्यादा वजन या ज्यादा दबाव भी इसे नुकसान पहुंचाता है
कार्टिलेज कम होने पर हड्डियाँ आपस में रगड़ने लगती हैं
👉 इससे दर्द, अकड़न और चलने में परेशानी होती है
🔶 जोड़ों की सूजन (Joint Inflammation)
जोड़ों में सूजन आने से दर्द और असहजता बढ़ जाती है।
सूजन के कारण जोड़ लाल और गर्म महसूस हो सकते हैं
यह आर्थराइटिस या किसी इंफेक्शन की वजह से हो सकता है
सूजन होने पर जोड़ सही से काम नहीं कर पाते
👉 इससे मूवमेंट कम हो जाता है और दर्द बढ़ जाता है

मुख्य कारण (Causes)
बढ़ती उम्र
अत्यधिक वजन (मोटापा)
गलत पोस्टर (बैठने/उठने का तरीका)
विटामिन D और कैल्शियम की कमी
पुरानी चोट या इंजरी
ज्यादा शारीरिक मेहनत

उपाय (Remedies)
नियमित हल्की एक्सरसाइज और योग करें
वजन को कंट्रोल में रखें
गर्म पानी से सिकाई करें
सरसों या हर्बल तेल से मालिश करें
हल्दी, अदरक जैसे प्राकृतिक चीजों का सेवन करें
कैल्शियम और विटामिन D युक्त आहार लें

डिस्क्लेमर
यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता के लिए दी गई है।
यह किसी डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है।
अगर दर्द लगातार बना रहे या ज्यादा बढ़ जाए, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

#जोड़ों_का_दर्द

12/04/2026

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🌿 तुलसी: घर-घर की औषधि, सेहत का प्राकृतिक प्रहरीआगरा/स्वास्थ्य संवाददाता। भारतीय परंपरा में तुलसी को विशेष स्थान प्राप्त...
12/04/2026

🌿 तुलसी: घर-घर की औषधि, सेहत का प्राकृतिक प्रहरी

आगरा/स्वास्थ्य संवाददाता। भारतीय परंपरा में तुलसी को विशेष स्थान प्राप्त है। यह न केवल धार्मिक दृष्टि से पूजनीय है, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण आधुनिक जीवनशैली में भी अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार तुलसी में एंटीबैक्टीरियल, एंटीवायरल और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि तुलसी के नियमित सेवन से सर्दी-खांसी, जुकाम, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी श्वसन संबंधी समस्याओं में राहत मिलती है। इसके साथ ही यह पाचन तंत्र को मजबूत बनाकर गैस, एसिडिटी और अपच जैसी समस्याओं को भी कम करती है। तुलसी में मौजूद यूजेनॉल तत्व पेट से जुड़ी परेशानियों को नियंत्रित करने में सहायक माना जाता है।

मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी तुलसी को लाभकारी बताया गया है। इसमें पाए जाने वाले एडाप्टोजेनिक गुण तनाव और चिंता को कम करने में मदद करते हैं। वहीं, त्वचा और बालों के लिए भी यह उपयोगी है, जिससे कील-मुंहासे और रूसी जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि तुलसी का सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि यह ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने में सहायक होती है। इसके अलावा, तुलसी की पत्तियां चबाने से मुंह की दुर्गंध दूर होती है और छालों में आराम मिलता है।

🟢 कैसे करें उपयोग

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार सुबह खाली पेट 2–3 ताजी तुलसी की पत्तियां चबाना लाभकारी होता है। इसके अलावा, चाय में तुलसी डालकर या काढ़ा बनाकर भी इसका सेवन किया जा सकता है, खासकर सर्दी-खांसी के दौरान।

⚠️ सावधानी भी जरूरी

हालांकि तुलसी के अनेक फायदे हैं, लेकिन किसी गंभीर बीमारी या लंबे समय तक उपयोग से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।

👉 निष्कर्ष:
तुलसी एक सुलभ और प्रभावी प्राकृतिक औषधि है, जो सही तरीके से उपयोग करने पर कई सामान्य बीमारियों से बचाव में मदद कर सकती है।

🧈 मक्खन: एक संपूर्ण जानकारी---🔹 1. परिचय (Introduction)मक्खन एक डेयरी उत्पाद है जो दूध या क्रीम को मथकर (churning) तैयार...
11/04/2026

🧈 मक्खन: एक संपूर्ण जानकारी

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🔹 1. परिचय (Introduction)

मक्खन एक डेयरी उत्पाद है जो दूध या क्रीम को मथकर (churning) तैयार किया जाता है। यह प्राचीन काल से मानव आहार का हिस्सा रहा है और दुनिया भर में विभिन्न रूपों में उपयोग होता है।

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🔹 2. इतिहास (History)

मक्खन का उपयोग हजारों वर्षों से हो रहा है।

इसका वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है, जहाँ इसे "नवनीत" कहा गया है।

प्राचीन काल में यह विशेष अवसरों, पूजा-पाठ और चिकित्सा में भी प्रयोग होता था।

मध्य युग में यूरोप में मक्खन एक विलासिता की वस्तु था, जो बाद में आम हो गया।

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🔹 3. निर्माण प्रक्रिया (Making Process)

👉 कच्चा माल:

गाय, भैंस, बकरी या भेड़ का दूध (अक्सर क्रीम के रूप में)

👉 प्रक्रिया:

1. क्रीम निकालना: दूध को कुछ घंटों के लिए रखा जाता है ताकि मलाई ऊपर तैर आए।

2. मलाई मथना: मथानी या मशीन से मलाई को तेजी से हिलाया जाता है। इससे वसा अलग होकर मक्खन बनता है।

3. धोना और नमक मिलाना (वैकल्पिक): मक्खन को धोकर उसमें स्वाद अनुसार नमक मिलाया जाता है।

4. रूप देना और पैकिंग करना।

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🔹 4. मक्खन के प्रकार (Types of Butter)

प्रकार विशेषता

देसी मक्खन परंपरागत मथानी से बनाया गया, बिना नमक
नमकयुक्त मक्खन स्वाद के लिए नमक मिलाया गया होता है
अनसाल्टेड मक्खन बिना नमक का, बेकिंग के लिए उत्तम
क्लेरिफाइड बटर (घी) मक्खन को गर्म करके बनाया जाता है
वेगन मक्खन दूध रहित विकल्प (सोया, नारियल, काजू आदि से)

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🔹 5. पोषण मूल्य (Nutritional Value)

100 ग्राम मक्खन में औसतन:

घटक मात्रा

ऊर्जा ~717 kcal
वसा (Fat) ~81 ग्राम
संतृप्त वसा ~51 ग्राम
कोलेस्ट्रॉल ~215 मिलीग्राम
विटामिन A ~684 μg
विटामिन D, E, K थोड़ी मात्रा में
प्रोटीन ~1 ग्राम
कार्बोहाइड्रेट ~0.1 ग्राम

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🔹 6. उपयोग (Uses of Butter)

🍳 खाने में:

पराठे, रोटियाँ, ब्रेड पर लगाकर

सब्जियों, दालों में तड़का लगाने में

मिठाइयाँ (जैसे लड्डू, हलवा) और बेकिंग (केक, कुकीज़) में

पनीर मक्खनी, बटर चिकन जैसी डिशों में

🕉️ धार्मिक कार्यों में:

पूजा, यज्ञ में मक्खन और घी का प्रयोग

💊 आयुर्वेद में:

आयुर्वेदिक औषधियों में मक्खन व घी का उपयोग किया जाता है

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🔹 7. स्वास्थ्य लाभ (Health Benefits)

लाभ विवरण

ऊर्जा स्रोत मक्खन ऊर्जा का गाढ़ा स्रोत है
विटामिन्स से भरपूर विशेषकर वसा में घुलनशील विटामिन (A, D, E, K)
पाचन में सहायक देसी मक्खन ब्यूटिरिक एसिड से युक्त होता है
रोग प्रतिरोधक क्षमता में मददगार सीमित मात्रा में सेवन लाभकारी हो सकता है

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🔹 8. सावधानियाँ और हानियाँ (Risks and Precautions)

हानि कारण

वजन बढ़ना अत्यधिक वसा सेवन से
हृदय रोग का खतरा अधिक संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल
हाई कोलेस्ट्रॉल रोज़ाना बड़ी मात्रा में सेवन नुकसानदायक

➡️ सुझाव: प्रतिदिन सीमित मात्रा (~1-2 चम्मच) में ही सेवन करें।

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🔹 9. मक्खन बनाम मार्जरीन

बिंदु मक्खन मार्जरीन

स्रोत दूध वनस्पति तेल
प्राकृतिकता अधिक प्राकृतिक कृत्रिम रूप से बनाया जाता है
स्वाद मलाईदार, समृद्ध थोड़ा हल्का और कृत्रिम
स्वास्थ्य प्रभाव सीमित मात्रा में फायदेमंद कुछ प्रकार में ट्रांस-फैट हो सकता है

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🔹 10. आधुनिक उपयोग और बाजार

आज के समय में मक्खन कई प्रकारों में उपलब्ध है: ऑर्गेनिक, फ्लेवरयुक्त, लाइट मक्खन आदि।

कई लोग इसे ग्लास जार या सिंगल-सेर्विंग पैक में खरीदते हैं।

डाइटिंग और फिटनेस की दुनिया में घी की तुलना में मक्खन को थोड़ा कम प्राथमिकता दी जाती है।

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📌 निष्कर्ष (Conclusion)

मक्खन एक बहुउपयोगी और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ है, जो सही मात्रा में सेवन करने पर स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है। हालांकि, इसका अत्यधिक सेवन वजन, कोलेस्ट्रॉल और हृदय से जुड़ी समस्याएँ पैदा कर सकता है। देसी पारंपरिक मक्खन आज भी स्वाद, पोषण और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण हिस्सा है

गुड़ जिसका सेवन सबसे ज्यादा ठंड में किया जाता है ? पर कुछ लोग बहुत थोड़ी मात्रा में सेवन करते है इस सोच के साथ की ज्यादा...
11/04/2026

गुड़ जिसका सेवन सबसे ज्यादा ठंड में किया जाता है ? पर कुछ लोग बहुत थोड़ी मात्रा में सेवन करते है इस सोच के साथ की ज्यादा गुड़ खाने से नुकसान होता है। इसकी प्रवृति गर्म होती है, लेकिन ये एक गलतफहमी है गुड़ हर मौसम में खाया जा सकता है और पुराना गुड़ हमेशा औषधि के रूप में काम करता है। आयुर्वेद संहिता के अनुसार यह शीघ्र पचने वाला, खून बढ़ाने वाला व भूख बढ़ाने वाला होता है। इसके अतिरिक्त गुड़ से बनी चीजों के खाने से बीमारियों में राहत मिलती है।

गुड़ में सुक्रोज 59.7 प्रतिशत, ग्लूकोज 21.8 प्रतिशत, खनिज तरल 26प्रतिशत तथा जल अंश 8.86 प्रतिशत मौजूद होते हैं।इसके अलावा गुड़ में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा और ताम्र तत्व भी अच्छी मात्रा में मिलते हैं। इसलिए चाहे हर मौसम में आप गुड़ खाना न पसन्द करें लेकिन ठंड में गुड़ जरूर खाएं।
यह सेलेनियम के साथ एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करता है। गुड़ में मध्यम मात्रा में कैल्शियम, फॉस्फोरस व जस्ता पाया जाता है यही कारण है कि इसका रोजाना सेवन करने वालों का इम्युनिटी पॉवर बढ़ता है। गुड़ में मैग्नेशियम अधिक मात्रा में पाया जाता है इसलिए ये बॉडी को रिचार्ज करता है साथ ही इसे खाने से थकान भी दूर होती है।

गुड़ और काले तिल के लड्डू खाने से सर्दी में अस्थमा परेशान नहीं करता है। रोजाना गुड़ का सेवन हाइब्लडप्रेशर को कंट्रोल करता है। जिन लोगों को खून की कमी हो उन्हें रोज थोड़ी मात्रा में गुड़ जरूर खाना चाहिए। इससे शरीर में हिमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है।

गुड़ का हलवा या लड्डू खाने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शरीर से जहरीले तत्वों को बाहर निकालता है व सर्दियों में, यह शरीर के तापमान को विनियमित करने में मदद करता है।

अगर आप गैस या एसिडिटी से परेशान हैं तो खाने के बाद थोड़ा गुड़ जरूर खाएं ऐसा करने से ये दोनों ही समस्याएं नहीं होती हैं। गुड़, सेंधा नमक, काला नमक मिलाकर चाटने से खट्टी डकारें आना बंद हो जाती हैं।
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कनेर (कनेर) एक सुंदर लेकिन बहुत जहरीला पौधा है। आयुर्वेद में इसका उपयोग किया जाता है, लेकिन सिर्फ विशेषज्ञ की देखरेख में...
11/04/2026

कनेर (कनेर) एक सुंदर लेकिन बहुत जहरीला पौधा है। आयुर्वेद में इसका उपयोग किया जाता है, लेकिन सिर्फ विशेषज्ञ की देखरेख में ही इसका प्रयोग करना चाहिए।

🌿 कनेर के संभावित फायदे

1. त्वचा रोगों में उपयोग

कनेर के पत्तों का लेप खाज-खुजली, दाद और फोड़े-फुंसी में लगाया जाता है।
👉 यह त्वचा के संक्रमण को कम करने में मदद कर सकता है।

2. दर्द और सूजन में राहत

इसके पत्तों का बाहरी उपयोग जोड़ों के दर्द और सूजन में किया जाता है।

3. घाव भरने में सहायक

कुछ पारंपरिक नुस्खों में कनेर का उपयोग घाव को जल्दी भरने के लिए किया जाता है।

4. कीटनाशक गुण

कनेर में प्राकृतिक कीटनाशक (insecticidal) गुण होते हैं, जिससे यह जूं और कीड़ों को खत्म करने में उपयोगी माना जाता है।

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⚠️ बहुत जरूरी सावधानियां

कनेर का पौधा अत्यंत विषैला (toxic) होता है

इसे खाने से जान का खतरा हो सकता है

बिना डॉक्टर या वैद्य की सलाह के आंतरिक सेवन बिल्कुल न करें

बच्चों और पालतू जानवरों से दूर रखें

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❗ निष्कर्ष

कनेर के कुछ औषधीय फायदे जरूर हैं, लेकिन इसकी जहरीली प्रकृति के कारण इसका उपयोग बेहद सावधानी से और केवल बाहरी रूप में ही करना चाहिए।


Desi Ghee - इन बीमारियों में नुकसानदायक होता है देसी घी! हम सभी ने बचपन से यही सुना है कि देसी घी आयुर्वेद में अमृत माना...
11/04/2026

Desi Ghee - इन बीमारियों में नुकसानदायक होता है देसी घी! हम सभी ने बचपन से यही सुना है कि देसी घी आयुर्वेद में अमृत माना गया है।

यह हड्डियों को मजबूत करता है, दिमाग को तेज करता है और आंखों की रोशनी बढ़ाता है। लेकिन आयुर्वेद सिर्फ तारीफ नहीं करता, वह चेतावनी भी देता है।

चरक संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में साफ लिखा है कि कुछ खास परिस्थितियों में यही अमृत शरीर के लिए ज़हर की तरह काम कर सकता है।

मतलब साफ है। घी अच्छा है, लेकिन हर किसी के लिए, हर समय और हर बीमारी में नहीं।
गलत समय पर और गलत हालत में खाया गया घी बीमारी को ठीक नहीं, बल्कि कई गुना बढ़ा सकता है।

इसी Post में हम जानेंगे वे आठ स्थितियां जहां देसी घी से दूरी बनाना ही समझदारी है।

सबसे पहले साइंस समझिए: घी और पाचन का रिश्ता
आयुर्वेद के अनुसार घी को पचाने के लिए बहुत तेज़ जठराग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर की जरूरत होती है।
अगर आपकी पाचन शक्ति मजबूत है, पेट हल्का रहता है और जीभ साफ है, तभी घी शरीर में सही तरह से काम करता है।

लेकिन अगर

पेट भारी रहता है
खाना देर से पचता है
जीभ पर सफेद परत जमी रहती है

तो यह संकेत है कि आपकी अग्नि कमजोर है।

ऐसी स्थिति में घी पचता नहीं, बल्कि सड़कर आम बनाता है।
यह आम एक चिपचिपा टॉक्सिन होता है, जो नसों में जमा होकर ब्लॉकेज और सूजन जैसी समस्याएं पैदा करता है।

1. कफ प्रकृति वालों के लिए घी क्यों खतरनाक है
अगर आपकी प्रकृति कफ प्रधान है यानी

वजन आसानी से बढ़ता है
ज्यादा नींद आती है
शरीर भारी और सुस्त रहता है
तो घी आपके लिए दोस्त नहीं, दुश्मन बन सकता है।

क्योंकि घी और कफ दोनों के गुण एक जैसे होते हैं।
ठंडा, भारी और चिकना।

ऐसे में घी खाने से कफ और ज्यादा बढ़ेगा, वजन बढ़ेगा, आलस्य बढ़ेगा और मेटाबॉलिज्म और स्लो हो जाएगा।

2. पित्त में भी हर बार घी सही नहीं होता
अक्सर लोग सोचते हैं कि एसिडिटी या गर्मी में घी खा लो, सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन यहां एक बड़ा फर्क समझना जरूरी है।

अगर पित्त निराम है यानी शुद्ध है, तब घी फायदेमंद होता है।
लेकिन अगर पित्त साम है यानी टॉक्सिन से भरा हुआ है, तब घी नुकसान करता है।

साम पित्त के लक्षण होते हैं

खट्टी डकारें
मुंह में खट्टा स्वाद
जलन के साथ पेट में भारीपन

ऐसी हालत में घी आग में घी डालने जैसा काम करता है और जलन और एसिडिटी बढ़ा देता है।

3. बुखार में घी क्यों मना है
अगर आपको बुखार आया है, खासकर शुरुआती सात दिन जिसे आयुर्वेद में तरुण ज्वर कहा जाता है, तो घी बिल्कुल नहीं खाना चाहिए।

बुखार में शरीर की अग्नि त्वचा पर काम कर रही होती है और पेट की अग्नि कमजोर होती है।
ऐसे समय में घी पेट में जाकर पचता नहीं और बुखार को शरीर के अंदर ही फंसा देता है।

4. लीवर और पीलिया में घी से दूरी जरूरी
लीवर ही शरीर में फैट को पचाने का काम करता है।
अगर आपको पीलिया या फैटी लीवर है, तो इसका मतलब है कि लीवर पहले से ही कमजोर है।

ऐसी स्थिति में घी जैसा भारी फैट देना लीवर पर अतिरिक्त बोझ डालता है।
इसीलिए आयुर्वेद में पीलिया के मरीज को शुरुआत में बिल्कुल फैट फ्री डाइट दी जाती है।

5. खांसी और अस्थमा में घी कब ज़हर बनता है
अगर खांसी सूखी है, तब घी फायदेमंद हो सकता है।
लेकिन अगर खांसी बलगम वाली है, तो घी जहर जैसा काम करता है।

घी बलगम को और गाढ़ा और चिपचिपा बना देता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत बढ़ जाती है।
अस्थमा के मरीजों में यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है।

6. हार्ट और हाई कोलेस्ट्रॉल में सावधानी जरूरी
अगर आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है और आपकी लाइफस्टाइल सुस्त है, तो घी धमनियों में ब्लॉकेज बढ़ा सकता है।

ऐसे लोगों के लिए आयुर्वेद में मेदोहर यानी फैट घटाने वाले आहार की सलाह दी जाती है, ना कि घी बढ़ाने की।

7. घी के साथ ये गलत कॉम्बिनेशन ज़हर बन जाते हैं
सिर्फ घी ही नहीं, उसे किसके साथ खा रहे हैं यह भी उतना ही जरूरी है।
आयुर्वेद इसे विरुद्ध आहार कहता है।

घी और शहद बराबर मात्रा में कभी न मिलाएं
घी खाने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं, हमेशा गुनगुना पानी लें
कांसे के बर्तन में 10 दिन से ज्यादा रखा घी जहरीला माना गया है

8. मौसम का असर: वसंत ऋतु में घी क्यों कम करें
मार्च और अप्रैल के महीने यानी वसंत ऋतु में सर्दियों का जमा हुआ कफ पिघल रहा होता है।
अगर इस समय ज्यादा घी खाया जाए तो सर्दी, जुकाम और एलर्जी की संभावना बढ़ जाती है।

Conclusion: घी अमृत है, लेकिन शर्तों के साथ
देसी घी वाकई अमृत है, लेकिन
सही अग्नि, सही मौसम और सही बीमारी में।


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हमारे प्राचीन आयुर्वेद में ऐसी बहुत सी जड़ी-बूटी हैं जो हमारे शरीर को बेहतर बनाने में मददगार होती हैं। ये जड़ी-बूटियां हमा...
11/04/2026

हमारे प्राचीन आयुर्वेद में ऐसी बहुत सी जड़ी-बूटी हैं जो हमारे शरीर को बेहतर बनाने में मददगार होती हैं। ये जड़ी-बूटियां हमारे शरीर को भीतर से स्वस्थ बनाती हैं जिससे हमारी बाहरी सुंदरता और स्वास्थ्य दोनों में वृद्धि होती है। ऐसी ही एक जड़ी-बूटी है रतनजोत।

रतनजोत एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है। इसका इस्तेमाल कॉस्मेटिक्स और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में किया जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि इसका सेवन स्वास्थ्य के लिए भी बहुत फायदेमंद हो सकता है।

बालों के लिए रतनजोत के फायदे 🌿💇‍♀️

रतनजोत बालों की देखभाल में एक प्राकृतिक और असरदार जड़ी-बूटी मानी जाती है👇

1️⃣ बालों को मजबूत बनाता है
रतनजोत बालों की जड़ों को पोषण देकर उन्हें मजबूत करता है और झड़ना कम करता है।

2️⃣ बालों की ग्रोथ बढ़ाता है
यह स्कैल्प में ब्लड सर्कुलेशन सुधारकर बालों की बढ़त में मदद करता है।

3️⃣ डैंड्रफ कम करता है ❄️
इसके एंटीबैक्टीरियल गुण रूसी (डैंड्रफ) को कम करने में सहायक होते हैं।

4️⃣ बालों को प्राकृतिक रंग देता है
रतनजोत बालों को हल्का लाल/भूरा प्राकृतिक रंग देने में उपयोगी होता है।

5️⃣ स्कैल्प को स्वस्थ रखता है
यह खुजली और सूजन को कम करके स्कैल्प को हेल्दी बनाता है।

👉 कैसे करें उपयोग?

रतनजोत को नारियल या सरसों के तेल में उबालकर तेल बना लें

ठंडा करके बालों में नियमित मालिश करें

⚠️ ध्यान रखें:

ज्यादा मात्रा में उपयोग न करें

पहले थोड़ा लगाकर टेस्ट करें (एलर्जी चेक)

10/04/2026

छोटे-छोटे प्रयोग जिनको आप अवश्य अपनाए, कुछ प्रयोग जो आपको घर में ही उपलब्ध है अजमाए और लाभ ले।

▪️ खराश-सूखी खाँसी के लिये अदरक और गुड
गले में खराश या सूखी खाँसी होने पर पिसी हुई अदरक में गुड़ और घी मिलाकर खाएँ। गुड़ और घी के स्थान पर शहद का प्रयोग भी किया जा सकता है। आराम मिलेगा।

▪️ मुँह और गले के कष्टों के लिये सौंफ और मिश्री
भोजन के बाद दोनों समय आधा चम्मच सौंफ चबाने से मुख की अनेक बीमारियाँ और सूखी खाँसी दूर होती है, बैठी हुई आवाज़ खुल जाती है, गले की खुश्की ठीक होती है और आवाज मधुर हो जाती है।

▪️ बदन के दर्द में कपूर और सरसों का तेल
10 ग्राम कपूर, 200 ग्राम सरसों का तेल – दोनों को शीशी में भरकर मजबूत ठक्कन लगा दें तथा शीशी धूप में रख दें। जब दोनों वस्तुएँ मिलकर एक रस होकर घुल जाए तब इस तेल की मालिश से नसों का दर्द, पीठ और कमर का दर्द और, माँसपेशियों के दर्द शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं।

▪️ जोड़ों के दर्द के लिये बथुए का रस
बथुआ के ताजा पत्तों का रस पन्द्रह ग्राम प्रतिदिन पीने से गठिया दूर होता है। इस रस में नमक-चीनी आदि कुछ न मिलाएँ। नित्य प्रातः खाली पेट लें या फिर शाम चार बजे। इसके लेने के आगे पीछे दो-दो घंटे कुछ न लें। दो तीन माह तक लें।

▪️ भोजन से पहले अदरक
भोजन करने से दस मिनट पहले अदरक के छोटे से टुकडे को सेंधा नमक में लपेट कर [थोड़ा ज्यादा मात्रा में ] अच्छी तरह से चबा लें। दिन में दो बार इसे अपने भोजन का आवश्यक अंग बना लें, इससे हृदय मजबूत और स्वस्थ बना रहेगा, दिल से सम्बंधित कोई बीमारी नहीं होगी और निराशा व अवसाद से भी मुक्ति मिल जाएगी।

▪️ अजवायन का साप्ताहिक प्रयोग
सुबह खाली पेट सप्ताह में एक बार एक चाय का चम्मच अजवायन मुँह में रखें और पानी से निगल लें। चबाएँ नहीं। यह सर्दी, खाँसी, जुकाम, बदनदर्द, कमर-दर्द, पेटदर्द, कब्जियत और घुटनों के दर्द से दूर रखेगा। 10 साल से नीचे के बच्चों को आधा चम्मच 2 ग्राम और 10 से ऊपर सभी को एक चम्मच यानी 5 ग्राम लेना चाहिए।

▪️ जलन की चिकित्सा चावल से
कच्चे चावल के 8-10 दाने सुबह खाली पेट पानी से निगल लें। 21 दिन तक नियमित ऐसा करने से पेट और सीने की जलन में आराम आएगा। तीन माह में यह पूरी तरह ठीक हो जाएगी।

▪️ दाँतों के कष्ट में तिल का उपयोग
तिल को पानी में 4 घंटे भिगो दें फिर छान कर उसी पानी से मुँह को भरें और 10 मिनट बाद उगल दें। चार पाँच बार इसी तरह कुल्ला करे, मुँह के घाव, दाँत में सड़न के कारण होने वाले संक्रमण और पायरिया से मुक्ति मिलती है।

▪️ मुलेठी पेप्टिक अलसर के लिये
मुलेठी के बारे में तो सभी जानते हैं। यह आसानी से बाजार में भी मिल जाती है। पेप्टिक अल्सर में मुलेठी का चूर्ण अमृत की तरह काम करता है। बस सुबह शाम आधा चाय का चम्मच पानी से निगल जाएँ। यह मुलेठी का चूर्ण आँखों की शक्ति भी बढ़ाता है। आँखों के लिये इसे सुबह आधे चम्मच से थोड़ा सा अधिक पानी के साथ लेना चाहिये।

▪️ सरसों का तेल केवल पाँच दिन
रात में सोते समय दोनों नाक में दो दो बूँद सरसों का तेल पाँच दिनों तक लगातार डालें तो खाँसी-सर्दी और साँस की बीमारियाँ दूर हो जाएँगी। सर्दियों में नाक बंद हो जाने के दुख से मुक्ति मिलेगी और शरीर में हल्कापन मालूम होगा।

▪️ दमे के लिये तुलसी और वासा
दमे के रोगियों को तुलसी की १० पत्तियों के साथ वासा (अडूसा या वासक) का २५० मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर दें। लगभग २१ दिनों तक सुबह यह काढ़ा पीने से आराम आ जाता है।

▪️ मौसमी खाँसी के लिये सेंधा नमक
सेंधा नमक की लगभग एक सौ ग्राम डली को चिमटे से पकड़कर आग पर, गैस पर या तवे पर अच्छी तरह गर्म कर लें। जब लाल होने लगे तब गर्म डली को तुरंत आधा कप पानी में डुबोकर निकाल लें और नमकीन गर्म पानी को एक ही बार में पी जाएँ। ऐसा नमकीन पानी सोते समय लगातार दो-तीन दिन पीने से खाँसी, विशेषकर बलगमी खाँसी से आराम मिलता है। नमक की डली को सुखाकर रख लें एक ही डली का बार बार प्रयोग किया जा सकता है।

▪️ पेट में वायु-गैस के लिये मट्ठा और अजवायन
पेट में वायु बनने की अवस्था में भोजन के बाद 125 ग्राम दही के मट्ठे में दो ग्राम अजवायन और आधा ग्राम काला नमक मिलाकर खाने से वायु-गैस मिटती है। एक से दो सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दिन के भोजन के पश्चात लें।

▪️ फटे हाथ पैरों के लिये सरसों या जैतून का तेल
नाभि में प्रतिदिन सरसों का तेल लगाने से होंठ नहीं फटते और फटे हुए होंठ मुलायम और सुन्दर हो जाते है। साथ ही नेत्रों की खुजली और खुश्की दूर हो जाती है।

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10/04/2026

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