Adiwasi Tau: Online-Herbalist, Homeopath & Counselor

Adiwasi Tau: Online-Herbalist, Homeopath & Counselor A revolution in Health Care Products & Services. Treatment and care by Tribal herbs and Homeopathic Medicines.

नयी उपचार सेवा प्रक्रिया: 2026-27*नयी उपचार सेवा प्रक्रिया: 2026-27**(एक बीमारी का दो माह का खर्च मात्र ₹6006)**Adiwasi ...
08/04/2026

नयी उपचार सेवा प्रक्रिया: 2026-27


*नयी उपचार सेवा प्रक्रिया: 2026-27*
*(एक बीमारी का दो माह का खर्च मात्र ₹6006)*
*Adiwasi Tau's Online Health Care Sewa*

*1-यदि आप मेरी ऑनलाइन सेवाएं लेना चाहते हैं, तो कृपया नीचे दी गई सभी बातों को ध्यानपूर्वक पढ़ें, समझें और सहमत हों तो ही आगे बढ़ें।*

2-सबसे पहले कृपया इस *वाट्सएप नम्बर 8561955619 को “Adiwasi Tau” नाम से अपने मोबाइल में सेव करें,* जिससे आगे किसी प्रकार का भ्रम न रहे।

*3-सेवा का स्वरूप:*
मैं एक ऑनलाइन हर्बलिस्ट, होम्योपैथ, बायोकेमिक और बैच फ्लावर रेमेडीज प्रैक्टिशनर के साथ-साथ काउंसलर भी हूँ। मैं बीमारी के नाम या केवल जांच रिपोर्ट के आधार पर नहीं, बल्कि मरीज के *शारीरिक (Physical), मानसिक (Mental), भावनात्मक (Emotional) लक्षणों, जीवनशैली, आनुवांशिक इतिहास और आदतों* के आधार पर जड़ कारण खोजकर समग्र (Holistic Treatment) उपचार करता हूँ। इसलिए विस्तृत जानकारी देना अनिवार्य है और इसमें समय लगता है, इसी कारण वेटिंग रहती है।

*4-महत्वपूर्ण नियम:*

(1) सभी जानकारी 100% गोपनीय रखी जाएगी।
(2) किसी भी प्रकार के गारंटीड/स्थायी इलाज का दावा करना गैर कानूनी है, अत: ऐसी उम्मीद न रखें।
(3) कोई भी औषधि पूरी तरह साइड इफेक्ट-फ्री नहीं होती, कुछ प्रतिक्रियाएं संभव हैं।
(4) जीवनशैली सुधार, नशामुक्ति, अनुशासन और शरीर की सकारात्मक प्रतिक्रिया के बिना परिणाम संभव नहीं।

*5-सेवा की अनिवार्य शर्तें:*

(1) केवल व्हाट्सएप एवं फोन के माध्यम से ही सेवा दी जाती है।
(2) ऑडियो/वीडियो मैसेज स्वीकार नहीं होंगे, केवल व्हाट्सएप पर लिखित विवरण मान्य है।
(3) एक मोबाइल एवं व्हाट्सएप से एक ही मरीज का केस लिया जाएगा।
(4) यदि किसी अन्य के व्हाट्सएप के माध्यम से केस भेजा जाता है तो खर्च 20% तक बढ़ सकता है और गोपनीयता की जिम्मेदारी मरीज की होगी।

*6-स्वस्थ होने की संभावना पर प्रभाव डालने वाले कारक:*
पूर्व ऑपरेशन, खराब पाचन, अत्यधिक चाय, कॉफी, धूम्रपान, गुटका, पान, तम्बाकू, शराब, एनीमन फूड, पैक्ड फूड एवं बेकरी फूड का सेवन आदि स्थितियों में परिणाम कम, धीमे या शून्य हो सकते हैं। इसलिए शीघ्र और बेहतर परिणाम हेतु इनका तुरंत त्याग करें।

*7-चार्जेज एवं भुगतान:*

(1) एक बीमारी के उपचार के लिए प्रारंभिक चार्जेज *₹6006 एडवांस अनिवार्य* है (नॉन-रिफंडेबल)।
(2) एक से अधिक बीमारी होने पर 2 माह के कोर्स का कुल खर्च सामान्यतः ₹9000–₹15000 के बीच हो सकता है (केस अनुसार)।
(3) एडवांस राशि अंतिम खर्च में समायोजित होगी।
(4) भुगतान के बाद *फुल डिटेल स्क्रीनशॉट (JPEG)* भेजना अनिवार्य है।
(5) 48 घंटे में वेटिंग नंबर दिया जाएगा।

*8-उपचार प्रक्रिया:*

(1) सामान्यत: वेटिंग एक माह से दो माह तक की रहती है।
(2) फोन पर मरीज की केस हिस्ट्री लेकर पूछताछ के आधार पर औषधि चयन किया जाएगा।
(3) 2 माह का कोर्स डाक से भेजा जाएगा।
(4) हर 15 दिन में प्रोग्रेस रिपोर्ट देना अनिवार्य है।
(5) नशामुक्ति, अनुशासन और निरंतर सेवन जरूरी है।

*9-काउंसलिंग (वैकल्पिक):*
(1) काउंसलिंग की अनिवार्यता होने पर मरीज को खुद किसी काउंसलर से काउंसलिंग लेनी होगी।
(2) मेरे पास मौखिक काउंसलिंग के लिए समय की कमी है।
(3) इस​लिए लिखित काउंसलिंग उपलब्ध करवाई जाती है। (₹1616 प्रारंभ में, बाद में ₹5005)।

*10-अंतिम सहमति:*
(1) यदि आप ऊपर लिखी सभी शर्तों को *100% बिना शर्त स्वीकार करते हैं,* तो—
*(A) ₹6006 एडवांस फोन पे नं. 8561955619 पर जमा करें।*
और
*(B) फोन पे पर भुगतान का स्क्रीनशॉट भेजें।*
(2) इसके बाद मरीज की जानकारी व्हाट्सएप पर लिखकर भेजने का निर्धारित फॉर्मेट भेज दिया जाएगा, जिसे एक ही बार में भरकर भेजने पर आपका नाम वेटिंग लिस्ट में शामिल कर दिया जाएगा।
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*नोट:* जो मरीज किसी वजह से प्रॉपर उपचार की उक्त प्रक्रिया को नहीं अपना सकते, वे हमारी अनुभवसिद्ध किट/कॉम्बो/वटी/अर्क/तेल आदि मंगवाकर सेवन कर सकते हैं। जिसके लिए मांगने पर उत्पादों की लिस्ट भेजी जा सकती है। मगर ऐसे मरीजों से न तो मैं बात करूंगा और न हीं उनको किसी उत्पाद के सेवन की सलाह दूंगा। क्योंकि बिना डिटेल जानें सलाह देना अनुचित है और डिटेल जानने हेतु प्रॉपर उपचार प्रक्रिया को अपनाना होता है। इसलिए मरीज को खुद को ही लिस्ट में लिखे विवरण को पढकर अपने लिए उपयुक्त उत्पाद का खुद को ही चयन करके मंगवाना होगा।
*Adiwasi Tau: WA No.: 085619 55619*

स्वास्थ्य खराब होने की शुरुआत कैसे होती है (How Poor Health Usually Begins)लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणाअनेक वर्षों तक व...
07/04/2026

स्वास्थ्य खराब होने की शुरुआत कैसे होती है (How Poor Health Usually Begins)

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा
अनेक वर्षों तक विभिन्न प्रकार की बीमारियों से पीड़ित लोगों से बातचीत करने और उनके जीवन-क्रम को समझने पर एक सामान्य तथ्य बार-बार सामने आता है। अधिकांश गंभीर बीमारियों की शुरुआत बहुत छोटे और साधारण कारणों से होती है। ये कारण इतने सामान्य होते हैं कि लोग उन्हें बीमारी का कारण मानते ही नहीं। धीरे-धीरे वही छोटी-छोटी अनदेखियाँ शरीर की कार्यप्रणाली को प्रभावित करने लगती हैं और समय के साथ बड़ी बीमारियों का रूप ले लेती हैं।
मानव शरीर एक जटिल जैविक व्यवस्था है, जिसमें digestion (पाचन), metabolism (शरीर में भोजन से ऊर्जा बनने की प्रक्रिया) और circulation (रक्त प्रवाह की प्रक्रिया) जैसी अनेक क्रियाएँ निरंतर चलती रहती हैं। यदि जीवनशैली में छोटी-छोटी गड़बड़ियाँ लंबे समय तक बनी रहें तो इन प्रक्रियाओं का संतुलन धीरे-धीरे बिगड़ने लगता है।
नीचे ऐसे कुछ सामान्य कारणों का उल्लेख किया जा रहा है जो अक्सर स्वास्थ्य बिगड़ने की शुरुआती कड़ी बन जाते हैं।

अनियमित मलत्याग की आदत (Irregular Bowel Habit):

अधिकांश लोग बचपन से ही भोजन दिन में दो या तीन बार करते हैं, लेकिन मलत्याग केवल एक बार करते हैं और वह भी कई बार पूरा या खुलकर नहीं हो पाता। बहुत से लोग इसे सामान्य बात मान लेते हैं कि 24 घंटे में एक बार मलत्याग होना ही पर्याप्त है।
जब भोजन शरीर में जाता है तो digestion (पाचन) के बाद उसका अपशिष्ट भाग intestine (आंत) में पहुँचता है। यदि मल समय पर बाहर नहीं निकलता तो वह आंतों में अधिक समय तक ठहरने लगता है। इससे constipation (कब्ज), gas (वायु विकार) और acidity (अम्लता) जैसी समस्याएँ धीरे-धीरे बनने लगती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कई लोग इस स्थिति को बीमारी का संकेत मानने के बजाय सामान्य मान लेते हैं। ऐसे लोग जब माता पिता बनते हैं तो उनके बच्चे भी उनसे यही सीखते हैं कि मलत्याग 24 घंटे में केवल एक बार होना ही सामान्य है। इस प्रकार एक गलत आदत कई बार परिवार की सामान्य जीवनशैली का हिस्सा बन जाती है।

श्रम करने में शर्म और शारीरिक निष्क्रियता (Physical Inactivity):

आज के समय में कई बच्चे और युवा शारीरिक श्रम से दूर होते जा रहे हैं। दौड़ना, खेलना, पैदल चलना या नियमित exercise (व्यायाम) करना अब बहुत कम लोगों की दिनचर्या का हिस्सा रह गया है।
जब शरीर पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं रहता तो muscles (मांसपेशियाँ), joints (जोड़) और heart (हृदय) की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। शारीरिक गतिविधि कम होने से metabolism (ऊर्जा निर्माण की प्रक्रिया) भी धीमा हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि शरीर में fat (वसा) जमा होने लगता है, पाचन कमजोर पड़ने लगता है और थकान जल्दी महसूस होने लगती है।

नशे की शुरुआती आदतें (Early Addiction Habits):

कई युवाओं में नशे की शुरुआत अक्सर दिखावे या साथियों की नकल करने की प्रवृत्ति से होती है। बीड़ी, cigarette (सिगरेट), gutkha (गुटखा) या to***co (तंबाकू) जैसे पदार्थ धीरे-धीरे आदत बन जाते हैं।
तंबाकू में ni****ne (नशा पैदा करने वाला रासायनिक पदार्थ) पाया जाता है, जो brain (मस्तिष्क) के reward system (आनंद अनुभव कराने वाली तंत्रिका प्रणाली) को प्रभावित करता है। इससे कुछ समय के लिए राहत महसूस होती है, लेकिन धीरे-धीरे शरीर इसकी आदत का आदी हो जाता है। लंबे समय तक नशे का सेवन lungs (फेफड़े), liver (यकृत) और blood vessels (रक्त वाहिकाएँ) पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

दिखावे पर अनावश्यक खर्च और मानसिक तनाव (Unnecessary Spending and Stress):

कई युवाओं में कम उम्र से ही महंगे मोबाइल, फैशनेबल कपड़े और अन्य दिखावटी वस्तुओं पर खर्च करने की आदत बनने लगती है। जब माता पिता की आय से इन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती, तब घर में तनाव और असंतोष की स्थिति बन सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में financial stress (आर्थिक तनाव) बढ़ने लगता है। लगातार तनाव में रहने से शरीर में cortisol (तनाव से जुड़ा हार्मोन) का स्तर बढ़ सकता है। लंबे समय तक तनाव रहने से sleep (नींद), digestion (पाचन) और immunity (रोग प्रतिरोधक क्षमता) प्रभावित हो सकती है।

पैक्ड और बाजारू भोजन की आदत (Packaged and Ultra-Processed Food Habit):

आज बड़ी संख्या में बच्चे और युवा घर के ताजे भोजन की तुलना में पैक्ड और बाजारू भोजन जैसे packed food (पैक्ड फूड), ultra processed food (अत्यधिक कारखाना निर्मित भोजन), bakery items (बेकरी पदार्थ), sugary drinks (अधिक चीनी वाले पेय) आदि के अधिक सेवन के आदी होते जा रहे हैं।
इन खाद्य पदार्थों में अक्सर अधिक salt (नमक), sugar (चीनी) और unhealthy fats (हानिकारक वसा) होते हैं, जबकि fiber (रेशायुक्त अंश) और micronutrients (सूक्ष्म पोषक तत्व) कम होते हैं। ऐसे भोजन का लगातार सेवन पाचन को कमजोर कर सकता है और कब्ज, गैस, अम्लता, मोटापा तथा थकान जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है।

शिक्षा से भटकाव और जीवन दिशा का भ्रम (Distraction from Education):

जब स्वास्थ्य कमजोर होता है, नशे की आदतें बढ़ती हैं और मानसिक तनाव बढ़ता है तो व्यक्ति का ध्यान पढ़ाई से हटने लगता है। concentration (एकाग्रता) कमजोर हो जाती है और पढ़ाई में रुचि कम होने लगती है।
धीरे-धीरे कई युवाओं का career (जीवन-व्यवसाय) प्रभावित हो जाता है और वे सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाते।

अपराधबोध और मानसिक दबाव (Guilt and Psychological Pressure):

अधूरी शिक्षा, बेरोजगारी और नशे की आदतें कई बार व्यक्ति के मन में guilt (अपराधबोध) पैदा कर देती हैं।
जब व्यक्ति अपने जीवन को अपेक्षित दिशा में आगे बढ़ता हुआ नहीं देखता तो उसके मन में anxiety (चिंता), depression (अवसाद) और stress (मानसिक दबाव) जैसी स्थितियाँ बनने लगती हैं। मानसिक तनाव का प्रभाव शरीर की अनेक जैविक प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है। brain (मस्तिष्क) और body (शरीर) के बीच hormonal regulation (हार्मोन संतुलन की प्रक्रिया) भी प्रभावित होने लगती है।

शुरुआती बीमारियों की अनदेखी (Ignoring Early Health Problems):

जब ऊपर बताए गए कारण लंबे समय तक बने रहते हैं तो युवावस्था में ही कई समस्याएँ दिखाई देने लगती हैं।
इनमें constipation (कब्ज), dysentery (पेचिश), gas (वायु विकार), acidity (अम्लता), migraine (आधे सिर का तेज दर्द) और depression (अवसाद) जैसी समस्याएँ शामिल हो सकती हैं।
महिलाओं में leucorrhoea (श्वेत प्रदर), irregular menstruation (अनियमित माहवारी) और पुरुषों में sexual dysfunction (यौन कार्यक्षमता में कमी) जैसी समस्याएँ भी सामने आने लगती हैं।
यदि इन प्रारंभिक समस्याओं की लंबे समय तक अनदेखी की जाए तो आगे चलकर piles (बवासीर), fissure (गुदा में दरार), fistula (गुदा के पास नाल बनना), ulcer (घाव) और hypertension (उच्च रक्तचाप) जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

सक्रिय और संतुलित जीवनशैली का महत्व (Importance of an Active Lifestyle):

स्वास्थ्य की रक्षा अधिकतर दवाओं से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी सही आदतों से होती है। यदि बचपन से ही नियमित मलत्याग, पर्याप्त physical activity (शारीरिक गतिविधि), संतुलित diet (आहार) और नशामुक्त जीवन अपनाया जाए तो शरीर की प्राकृतिक प्रणाली लंबे समय तक संतुलित बनी रह सकती है।
यदि लापरवाही के कारण स्वास्थ्य पहले ही खराब हो चुका हो या कोई बीमारी हो गई हो, तो बिना विलंब उसका उचित उपचार करवाना भी आवश्यक है। समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वस्थ रहना हमेशा बीमारी के उपचार पर होने वाले खर्च से कहीं अधिक सस्ता, सरल और सुरक्षित होता है।
Adiwasi Tau (14.03.2026)
Online Herbalist, Homeopath, Counselor & Writer
फ्री परामर्श हेतु अपनी समस्या WhatsApp No.: 8561955619 पर लिखें।
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Allergy Care Combo के बारे में मरीज का अनुभव।
07/04/2026

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अश्वगंधा थायराइड की श्रेष्ठ औषधि

क्या थायराइड की सुस्ती यानी Hypothyroidism आपकी ऊर्जा, वजन और रोजमर्रा की सक्रियता को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है, और आप प्राकृतिक समाधान खोज रहे हैं, तो इस वीडियो में एक ऐसी शक्तिशाली जड़ी-बूटी की सटीक जानकारी मिलेगी जो हार्मोन संतुलन और मेटाबॉलिज्म को सक्रिय करने में सहायक मानी जाती है, अंत तक जरूर देखें।

Adiwasi Tau Dr. Purushottam Lal Meena
Online Herbalist, Homeopath, Counselor & Writer
WhatsApp No.: 85-619-55-619, 05.04.2026
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क्या थायराइड की सुस्ती यानी Hypothyroidism आपकी ऊर्जा, वजन और रोजमर्रा की सक्रियता को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है, और आप प्राकृ....

Health Report.
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गरीबों को कैसे खत्म किया जाए?
कुछ मिनट का समय हो तो वीडियो देखें/सुनें।

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यौन कमजोरी में होम्यापैथी की अद्भुत दवाईSelenium-सेलेनियम:यौवनावस्था में स्त्री-सहवास या हस्त-मैथुनादि कुकर्मों द्वारा व...
27/03/2026

यौन कमजोरी में होम्यापैथी की अद्भुत दवाई

Selenium-सेलेनियम:
यौवनावस्था में स्त्री-सहवास या हस्त-मैथुनादि कुकर्मों द्वारा वीर्यक्षय से उत्पन्न कमजोरी आदि हालातों में जननांगों पर इस औषधि का विशेष प्रभाव है और होम्योपैथी में अति-विहार/सेक्स, अति स्त्री-सहवास तथा अति हस्त-मैथुन आदि कुकर्मों से उत्पन्न होने वाले दोषों में इसका प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रमुख लक्षण असामान्य-दुर्बलता है।

रोगी वीर्य-क्षय तथा सेक्स-संबंधी कुकर्मों आदि से इतना कमजोर हो जाता है कि कुछ काम नहीं कर सकता। शारीरिक-दृष्टि से ही वह दुर्बल नहीं हो जाता, मानसिक-कार्य भी वह नहीं कर सकता।

स्टैनम नामक हौयोपैथिक दवाई में भी कमजोरी पायी जाती है, परन्तु वह कमजोरी छाती तक सीमित रहती है, रोगी को छाती में कमजोरी अनुभव होती है।

शारीरिक-कमजोरी सबसे अधिक आर्सेनिक में पायी जाती है, उसमें मानसिक-उत्तेजना बनी रहती है; सेलेनियम के रोगी में तो रोगी शक्तिहीन, नि:सत्व, जीवन-शून्य हो जाता है।

अत्यधिक वीर्य-नाश, अप्राकृतिक या अति-मैथुन आदि से कमजोरी में इससे निश्चय ही लाभ होता है। इन अवस्थाओं में रोगी नपुंसक सा हो जाता है। बैठे-बैठे या पखाने में जोर लगाने पर प्रोस्टेट-ग्लैंड का स्राव/धात निकल पड़ता है।

यह जानकारी जन जागरूकता हेतु है। किसी अनुभवी होम्योपैथ से परामर्श करके ही दवाई का सेवन करना चाहिए।

Adiwasi Tau (27.03.2026)
Online Herbalist, Homeopath, Counselor & Writer
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गुप्तांगों के आसपास बार बार दाद और खुजली की समस्यासमस्या का सरल समाधान (Simple Solution):स्वास्थ्य जागरूकता हेतु मैं स्व...
19/03/2026

गुप्तांगों के आसपास बार बार दाद और खुजली की समस्या

समस्या का सरल समाधान (Simple Solution):
स्वास्थ्य जागरूकता हेतु मैं स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जनजागरूकता के लिए लेखन के माध्यम से सार्वजनिक रूप से जानकारी प्रदान करता रहता हूं। इसी क्रम में मुझे एक मरीज ने निम्न समस्या लिखकर भेजी है।

मुझे गुप्तांगों के आसपास बार बार दाद हो जाते हैं। वहां बहुत खुजली होती है। कई बार इतनी खुजली होती है कि हाथ रोकना मुश्किल हो जाता है। खुजाते खुजाते खून तक निकल आता है। अब तो यह आदत सी बन गई है और काम करते समय भी कई बार हाथ चला जाता है, जिससे शर्मिंदगी होती है और लोग टोक भी देते हैं। अंग्रेजी गोली, ट्यूब और मरहम बहुत बार उपयोग कर चुका हूं। जब तक उपयोग करता हूं तब तक आराम रहता है, लेकिन बंद करते ही तकलीफ फिर शुरू हो जाती है। पेट भी ठीक नहीं रहता और मन में टेंशन भी बहुत रहती है।

मरीज की पहचान गोपनीय रखते हुए उसकी स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखकर समाधान निम्नानुसार प्रस्तुत है।

परिचय (Introduction): गुप्तांगों के आसपास बार बार दाद और खुजली होना अधिकतर फंगल संक्रमण, ज्यादा पसीना, जगह पर नमी बने रहना, तंग कपड़े पहनना, बार बार खुजलाना, पेट की गड़बड़ी और तनाव जैसे कारणों से जुड़ा हो सकता है। कई बार बाजार की क्रीमों में Steroid यानी सूजन दबाने वाली दवा मिली होती है, जिससे थोड़े समय आराम मिलता है, लेकिन बाद में समस्या और जिद्दी होकर लौट आती है। बार बार खुजलाने से त्वचा छिल जाती है, खून निकल आता है और संक्रमण बढ़ सकता है।

जीवनशैली सुधार (Lifestyle Support): सबसे पहले प्रभावित जगह को साफ और पूरी तरह सूखा रखना बहुत जरूरी है। नहाने के बाद, पसीना आने के बाद और शौच आदि के बाद उस जगह को हल्के हाथ से साफ करके अच्छी तरह सुखाएं। सूती और ढीला अंडरवियर पहनें। बहुत तंग, गीले या सिंथेटिक कपड़े न पहनें। नाखून से खुजलाने की आदत रोकना जरूरी है, क्योंकि इससे त्वचा और खराब होती है। मीठा, बहुत मसालेदार, बहुत तला हुआ और जंक फूड कम करें। तनाव भी खुजली बढ़ा सकता है, क्योंकि Cortisol यानी तनाव हार्मोन, Stress Hormone बढ़ने पर शरीर की सूजन और खुजली की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।

प्रमुख हर्ब्स और उनकी भूमिका (Key Herbs and Their Role):
(1) नीम, Azadirachta indica: Azadirachta indica में ऐसे घटक पाए जाते हैं जो Antifungal यानी फंगस को नियंत्रित करने वाले और Antimicrobial यानी संक्रमण कम करने वाले गुण रखते हैं। बार बार होने वाली दाद, खुजली और दूषित त्वचा स्थिति में यह उपयोगी दिशा दे सकता है।
(2) हल्दी, Curcuma longa: Curcuma longa में Curcumin पाया जाता है, जो Anti inflammatory यानी सूजन कम करने वाला और त्वचा को शांत करने वाला माना जाता है। खुजलाने से बनी लालिमा, जलन और छिली त्वचा में यह सहायक हो सकती है।
(3) गिलोय, Tinospora cordifolia: Tinospora cordifolia शरीर की प्रतिक्रिया प्रणाली को संतुलित करने और बार बार लौटने वाली तकलीफों में सहायक मानी जाती है। जिन लोगों में शरीर जल्दी बिगड़ता और बार बार त्वचा समस्या लौटती है, उनमें यह उपयोगी हो सकती है।
(4) मंजिष्ठा, Rubia cordifolia: Rubia cordifolia त्वचा संबंधी पुरानी समस्याओं में पारंपरिक रूप से उपयोग की जाती है। यह त्वचा की सूजन, खुजली और बार बार बिगड़ने वाली प्रवृत्ति में सहायक मानी जाती है।

देसी जड़ी बूटी समाधान (Herbal Support): आपकी तकलीफ को देखते हुए सामान्य समझ के स्तर पर नीम के पत्तों के पानी से प्रभावित जगह को धोना उपयोगी हो सकता है, लेकिन उसके बाद जगह को पूरा सुखाना बहुत जरूरी है। नीम, गिलोय, हल्दी और मंजिष्ठा जैसी जड़ी बूटियां अंदरूनी और बाहरी दोनों स्तर पर सहायक दिशा दे सकती हैं, पर सही मात्रा, सही रूप और सही अवधि आपकी प्रकृति और तकलीफ की तीव्रता देखकर ही तय होनी चाहिए। गुप्तांगों के पास कोई भी तेज लेप, तेल या गाढ़ा घरेलू मिश्रण बिना समझ के नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि वहां की त्वचा बहुत संवेदनशील होती है।

सेवन एवं उपयोग विधि (Intake and Usage Method): लेकिन हर व्यक्ति का शरीर, रोग प्रतिरोधक क्षमता, प्रतिक्रिया प्रणाली, खानपान, जीवनशैली और वंशानुगत इतिहास भिन्न होते हैं। इसलिए उसके लिए खुराक, डोज, शक्ति, सेवन अवधि आदि का निर्धारण करने के लिए उसकी केस हिस्ट्री की जानकारी होना नितांत जरूरी होता है। अत: आप इसके लिए किसी अनुभवी उपचारक से सम्पर्क करें।

कब विशेषज्ञ को दिखाना जरूरी है (When Specialist Consultation Is Necessary): यदि दाद तेजी से फैल रही हो, जगह पर पानी, पस, तेज जलन या बहुत अधिक दर्द हो, बार बार खून निकलता हो, त्वचा काली या मोटी होती जा रही हो, या मरहम छोड़ते ही तकलीफ तुरंत लौट आती हो, तो Dermatologist यानी त्वचा रोग विशेषज्ञ, Skin Specialist को दिखाना जरूरी है। यदि पेट की गड़बड़ी, तनाव और खुजलाने की आदत भी साथ में ज्यादा हो, तो अनुभवी उपचारक और काउंसलर दोनों की सलाह लेना अधिक अच्छा रहेगा।

आपको सुझाई गई दवाइयों का सेवन करने से पहले यह बेहतर होगा कि आप व्यक्तिगत रूप से किसी अनुभवी उपचारक या काउंसलर की सलाह अवश्य लें। मैं आपको इतना विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आप जिन हालातों और तकलीफों से परेशान हैं, इन जैसी ही, बल्कि इनसे भी गंभीर परिस्थितियों में जूझने वाले अनेकों मरीजों को मैंने स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जीते हुए देखा है। हाँ आपको अपना आत्मविश्वास बनाए रखने के साथ अपनी जीवनशैली एवं चिंतनशैली में बदलाव लाकर अनुशासित तरीके से औषधियों का सेवन करने के साथ उपचारक और काउंसलर की सलाह का अनुसरण करने की जरूरत होगी।
fans
Adiwasi Tau (19.03.2026, गुरुवार)
Online Herbalist, Homeopath, Counselor and Writer, WhatsApp No.: 85 619 55 619
नोट: उक्त जानकारी या सलाह उपयोगी लगी हो तो जनहित में this जानकारी को अधिकतम लोगों तक साझा किया जाए।

आप मात्र 1010 रु. में डाक खर्चा सहित 2 महीना की दवाई कैसे उपलब्ध करवा देते हैं?    fans
13/03/2026

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अतिबला (Abutilon indicum) औषधीय पौधे की परिचयात्मक जानकारीलेखक: डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणाअतिबला (Abutilon indicum) भारतीय ...
08/03/2026

अतिबला (Abutilon indicum) औषधीय पौधे की परिचयात्मक जानकारी

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा
अतिबला (Abutilon indicum) भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली एक प्राचीन औषधीय वनस्पति है, जिसका उल्लेख आयुर्वेद, लोक-चिकित्सा और विभिन्न आदिवासी परंपराओं में लंबे समय से मिलता रहा है। यह पौधा सामान्यतः खेतों के किनारे, खाली भूमि, जंगलों के आसपास तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सहज रूप से उगता हुआ दिखाई देता है। जिसका यहां चित्र दिया गया है। अपने कोमल पत्तों, पीले फूलों और औषधीय गुणों के कारण यह पारंपरिक चिकित्सा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आयुर्वेद में इसे मुख्यतः बलवर्धक, शीतल, मूत्रल, सूजन-रोधी और ऊतक-शामक गुणों वाली औषधीय वनस्पति माना गया है।
अतिबला का हिंदी में सबसे प्रचलित नाम अतिबला ही है। कुछ क्षेत्रों में इसे कंघी, पेटारी, पीली झाड़ी, पोटारी या पेटरी जैसे नामों से भी जाना जाता है। पूर्वी राजस्थान में इसे ढेंढसण नाम से भी जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे सामान्यतः Indian Mallow (इंडियन मैलो) या Country Mallow (कंट्री मैलो) कहा जाता है।

इस पौधे का वैज्ञानिक या बोटैनीकल नाम Abutilon indicum (एब्यूटिलोन इंडिकम) है और यह Malvaceae (मैल्वेसी) यानी खरैंटी (बला) कुल से संबंधित है, वही कुल जिसमें भिंडी और कपास जैसे पौधे भी आते हैं। यह लगभग 1 से 2 मीटर तक ऊँची झाड़ी के रूप में विकसित होती है। इसके पत्ते मुलायम, हल्के रोएँदार और दिल के आकार के होते हैं, जबकि इसके छोटे पीले फूल इसे आसानी से पहचानने योग्य बनाते हैं।

औषधीय दृष्टि से इस पौधे का लगभग हर भाग उपयोगी माना जाता है, जैसे पत्ते, जड़, बीज, फूल और कभी-कभी पूरा पंचांग भी। इन भागों में विभिन्न प्रकार के जैव सक्रिय तत्व पाए जाते हैं, जिनमें फ्लैवोनॉयड्स, फिनोलिक यौगिक, म्यूसिलेज, अल्कलॉइड्स और कुछ वसायुक्त तत्व शामिल हैं। यही घटक इस पौधे को सूजन-रोधी, दर्द-शामक, श्लेष्मा-संरक्षक और ऊतक-शामक प्रभाव प्रदान करते हैं।

अब यदि उन प्रमुख बीमारियों या स्वास्थ्य समस्याओं की चर्चा करें जिनमें अतिबला का उपयोग पारंपरिक और अनुभवजन्य रूप से लाभकारी माना गया है, तो सबसे पहले सूजन और शोथ का उल्लेख किया जा सकता है। शरीर के किसी भी भाग में सूजन, लालिमा या दर्द होने पर अतिबला के पत्तों का लेप या काढ़ा पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता रहा है। माना जाता है कि इसके सूजन-रोधी गुण प्रभावित ऊतकों को शांत करने और दर्द कम करने में सहायता करते हैं।

दर्द और संधिशूल में भी अतिबला का उपयोग उल्लेखनीय माना गया है। विशेष रूप से मांसपेशियों के दर्द, जोड़ों की जकड़न या वातजन्य पीड़ा में इसके पत्तों या जड़ से तैयार किए गए पारंपरिक औषधीय मिश्रण उपयोग में लाए जाते रहे हैं। लोक-चिकित्सा में इसे दर्द को शांत करने और शरीर की जकड़न को कम करने वाली औषधि माना जाता है।

घाव, फोड़े और त्वचा संबंधी चोटों में भी इस पौधे का उपयोग किया जाता रहा है। पत्तों का लेप घाव वाले स्थान पर लगाने से सूजन कम होने और ऊतकों के भरने में सहायता मिलने का उल्लेख मिलता है। पारंपरिक उपचार में छोटे घावों, फोड़े और त्वचा की हल्की सूजन में इसे सहायक माना जाता है।

मूत्र संबंधी समस्याओं, विशेषकर पेशाब में जलन या मूत्रकृच्छ्र जैसी स्थितियों में भी अतिबला का उपयोग किया जाता रहा है। जड़ या बीज से तैयार काढ़ा मूत्रमार्ग को शीतलता देने और जलन कम करने में सहायक माना जाता है। कई आदिवासी उपचार पद्धतियों में इसे मूत्रल अर्थात पेशाब की मात्रा को सामान्य बनाने वाली वनस्पति माना गया है।

खांसी और श्वसन संबंधी समस्याओं में भी इसका उपयोग मिलता है। पारंपरिक उपचार में अतिबला के बीज या जड़ का उपयोग खांसी, गले की खराश और हल्के ब्रोंकाइटिस जैसी स्थितियों में किया जाता रहा है। यह श्वसन-पथ की जलन को शांत करने और कफ को ढीला करने में सहायक माना जाता है।

बवासीर जैसी समस्या में भी अतिबला का उल्लेख मिलता है। पारंपरिक रूप से इसके पत्तों या बीज का उपयोग कब्ज को कम करने और गुदा-क्षेत्र की सूजन व जलन को शांत करने के लिए किया जाता रहा है। इससे मल त्याग के दौरान होने वाली असुविधा में कुछ राहत मिल सकती है।

कब्ज में इसके बीजों का उपयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। बीजों में मौजूद म्यूसिलेज नामक श्लेष्मीय तत्व मल को मुलायम बनाने और आंतों को चिकनाई प्रदान करने में सहायक माना जाता है। इस कारण हल्की कब्ज की स्थिति में इसे सहायक औषधि के रूप में देखा जाता है।

अल्सर और श्लेष्मा-जलन जैसी स्थितियों में भी अतिबला का उपयोग किया गया है। इसकी श्लेष्मीय प्रकृति आंतरिक ऊतकों को कुछ हद तक संरक्षण देने में सहायक मानी जाती है। पारंपरिक रूप से पेट की जलन, हल्के अल्सर या श्लेष्मीय उत्तेजना में इसका उपयोग किया जाता रहा है।

दस्त और आंत्र संबंधी गड़बड़ियों में भी इस पौधे के पत्तों या अन्य भागों का उपयोग बताया गया है। माना जाता है कि यह आंतों की जलन को शांत करने और पाचन तंत्र को स्थिर करने में कुछ सहायक भूमिका निभा सकता है।
सामान्य कमजोरी और रोग के बाद की दुर्बलता में भी अतिबला का उपयोग किया जाता रहा है। आयुर्वेदिक परंपरा में इसे बल्य अर्थात शरीर को ताकत देने वाली वनस्पति माना गया है। जड़ या बीज के उपयोग से शरीर की थकान और कमजोरी में कुछ सुधार का उल्लेख मिलता है।

कुछ पारंपरिक स्रोतों में मधुमेह, यकृत-विकार, ज्वर और मूत्र में जलन जैसी स्थितियों में भी इसके उपयोग का उल्लेख मिलता है, हालांकि इन स्थितियों में इसका उपयोग प्रायः सहायक स्तर पर माना जाता है, मुख्य उपचार के रूप में नहीं।

दुष्प्रभावों की दृष्टि से उपलब्ध जानकारी के अनुसार सामान्य औषधीय मात्रा में अतिबला अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जाती है। फिर भी किसी भी वनस्पति की तरह अत्यधिक मात्रा में सेवन करने पर कुछ लोगों में हल्की पाचन गड़बड़ी, पेट फूलना या ढीलापन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। बाहरी उपयोग के समय संवेदनशील त्वचा वाले व्यक्तियों में हल्की खुजली या लालिमा भी संभव है।

सावधानियों के रूप में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि गर्भावस्था या स्तनपान की अवस्था में इसके नियमित सेवन के बारे में पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए बिना विशेषज्ञ सलाह के इसका प्रयोग उचित नहीं माना जाता। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति को गंभीर बीमारी, तीव्र संक्रमण, लगातार बुखार, या लंबे समय से चल रही जटिल स्वास्थ्य समस्या हो तो केवल इस वनस्पति पर निर्भर रहना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में उचित चिकित्सकीय सलाह आवश्यक होती है।

समग्र रूप से देखा जाए तो अतिबला एक बहुउपयोगी पारंपरिक औषधीय वनस्पति है, जिसका उपयोग मुख्यतः सूजन, दर्द, घाव, मूत्र समस्याओं, खांसी, कब्ज और हल्की पाचन गड़बड़ियों जैसी स्थितियों में सहायक रूप से किया जाता रहा है। इसके कई उपयोग लोक-परंपराओं और आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित हैं, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन भी इसके कुछ गुणों जैसे सूजन-रोधी, प्रतिऑक्सीकारक और घाव-भराव प्रभावों की पुष्टि की दिशा में संकेत देते हैं।

Adiwasi Tau (08.03.2026)
Online Herbalist, Homeopath, Counselor & Writer
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08/03/2026

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Adiwasi Tau (08.03.2026)
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03/03/2026

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