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We SAM PROLIFE NUTRITION are dedicated to DIETETICS SCIENCE AND SUPPLEMENT RESEARCH. Intellectual property issues are an important consideration for dietary supplement companies, including patenting ingredients and formulas, avoiding infringement of existing products and registering false claims for their product. So we are PROFESSIONALLY MANAGED with HIGHLY EXPERIENCED RESEARCHERS, DOCTORS, FOOD TECHNOLOGISTS, PHARMACISTS, PHARMACOLOGISTS, SPORTS AUTHORITIES, & DIET EXPERTS to share their PRACTICAL APPROACH to SPORTS AND HEALTH NUTRITION for FAR BETTER PERFORMANCE. Our entire team understands the importance of QUALITY WITH BETTER RESULTS and follows strict guidelines as per regulations with practicality to nurture human capital and to serve society with highly ETHICAL AND QUALITY products. We SAM PROLIFE NUTRITION understand needs of an individual in FITNESS AND HEALTH field in better aspects.

10/12/2025
10/12/2025

अखिलेश यादव हर चुनाव से पहले वही पुराना सवाल उठाते हैं—“अमेरिका, जापान, जर्मनी EVM इस्तेमाल नहीं करते तो हम क्यों कर रहे हैं?” लेकिन असली बात ये है कि उन देशों में चुनाव के नाम पर बूथ कैप्चरिंग, लाठी-डंडा, नक़ली वोटर और गुंडों का कब्ज़ा नहीं होता। इसलिए वहां बैलेट बॉक्स चलता है, भारत में वही सिस्टम छोड़ा गया था क्योंकि यहां बटन दबाने से पहले ही पूरा बूथ उठा ले जाया जाता था।

EVM ने इस राजनीतिक गुंडागर्दी को खत्म किया, इसलिए कुछ लोग आज भी उससे चिढ़ते हैं। जब बैलेट था तब हार भी बूथ लूट से तय होती थी, अब EVM है तो हार तकनीक पर थोप दी जाती है।

सच ये है—EVM पर शक वही करता है जिसे जनता पर भरोसा नहीं। जो मैदान में हारे, वो मशीन पर ठीकरा फोड़ते हैं। जनता सब समझती है… और जवाब भी देती है।

डिस्क्लेमर: यह पोस्ट सार्वजनिक बयानों पर आधारित सामान्य राजनीतिक टिप्पणी है।

10/12/2025

#शिव_के_अनन्य_भक्त_महर्षि_दधीची

त्याग तपस्या की मुर्ति दधीची ऋषि की जयंती, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी पर शिव पुराण से आपके लिए एक विशेष लेख......

प्राचीन काल में एक परम तपस्वी हुए, जिनका नाम महर्षि दधीचि था। उनके पिता महान ऋषि अथर्वा जी थे और माता का नाम शांति था, उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शिव की भक्ति में व्यतीत किया था......

वे एक ख्यातिप्राप्त महर्षि थे तथा वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, परोपकारी और बहुत दयालु थे। उनके जीवन में अहंकार के लिए कोई जगह नहीं थी। वे सदा दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहते थे। जहां वे रहते थे, उस वन के पशु-पक्षी तक उनके व्यवहार से संतुष्ट थे। वे इतने परोपकारी थे कि उन्होंने असुरों का संहार के लिए अपनी अस्थियां तक दान में दे दी थी।

आइए पढ़ें परोपकारी महर्षि दधीचि की लोक कल्याण के लिए किए गए परोपकार की गाथा...

एक बार लोकहित के लिए कठोर तपस्या कर रहे महर्षि दधीचि के तप के तेज से तीनों लोक आलोकित हो उठे, लेकिन इन्द्र के चेहरे का तेज जाता रहा, क्योंकि उसे लगा कि महर्षि उससे इंद्रासन छीनना चाहते हैं। इसलिए उसने तपस्या भंग करने के लिए कामदेव और एक अप्सरा को भेजा, लेकिन वे विफल रहे।


तब इन्द्र उनकी हत्या के इरादे से सेना सहित वहां पहुंचा। लेकिन उसके अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तप के अभेद्य कवच को भेद न सके और वे शांत भाव से समाधिस्थ बैठे रहे, हारकर इन्द्र लौट गया।
#वृतासुर_का_वध कैसे हुआ..
इस घटना के बहुत समय बाद वृत्रासुर ने देवलोक पर कब्जा कर लिया।

पराजित इन्द्र और देवता मारे-मारे फिरने लगे। तब प्रजापिता ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वृत्रासुर का अंत महर्षि दधीचि की आस्थियों से बने अस्त्र से ही संभव है। इसलिए उनके पास जाकर उनकी अस्थियां मांगो, इससे इन्द्र पसोपेश में पड़ गया।

वह सोचने लगा कि जिनकी हत्या का प्रयास कर चुका था, वह उसकी सहायता क्यों करेंगे। लेकिन कोई उपाय न होने पर वह महर्षि के पास पहुंचा और झिझकते हुए बोला- महात्मन्‌, तीनों लोकों के मंगल हेतु हमें आपकी आस्तियों की भिक्षा चाहिए।

महर्षि विनम्रता से बोले- देवेंद्र, लोकहित के लिए मैं तुम्हें अपना शरीर देता हूं, इन्द्र आश्चर्य से उनकी ओर देख ही रहे थे कि महर्षि ने योग विद्या से अपना शरीर त्याग दिया। बाद में उनकी अस्थियों से बने वज्र से इन्द्र ने वृत्रासुर को मारकर तीनों लोकों को सुखी किया।

लोकहित के लिए महर्षि दधीचि ने तो अपनी अस्थियां तक दान कर दी थीं, क्योंकि वे जानते थे कि शरीर नश्वर है और एक दिन इसे मिट्टी में मिल जाना है।

#दधिची #ऋषि ने #धर्म की रक्षा के लिए #अस्थि_दान किया था !

उनकी हड्डियों से तीन #धनुष बने-

१. #गांडीव, २. #पिनाक और ३. #सारंग !
जिसमे से गांडीव #अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !

सारंग से #भगवान_राम ने युद्ध किया था और #रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !

और, #पिनाक था #भगवान_शिवजी के पास जिसे तपस्या के माध्यम से खुश करके भगवान शिव से रावण ने मांग लिया था !

परन्तु... वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में #जनकपुरी में छोड़ आया था !

इसी पिनाक की नित्य सेवा #सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !

ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही #एकघ्नी नामक #वज्र भी बना था ... जो इन्द्र को प्राप्त हुआ था !

इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने #कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में #भीम का महाप्रतापी पुत्र #घटोत्कच कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !

दधिची के इस अस्थि-दान का एक मात्र संदेश था धर्म रक्षा. ...

'' हे भारतीय वीरो शस्त्र उठाओ और #अन्याय तथा #अत्याचार के विरुद्ध #युद्ध करो !''

ऐसे महान त्याग मूर्ति महर्षि दधीचि को कोटि कोटि वंदन..💐🚩🙏

10/12/2025

जिस दिन मैंने तेज़ आवाज़ में कह दिया,
“माँ… ज़रा जल्दी करोगी?”
इतना ज़ोर से कि पूरी किराने की लाइन ने सुन लिया,
मेरी अठहत्तर साल की माँ ऐसे सिहर उठीं जैसे मेरे शब्दों का वज़न उनके शरीर पर गिरा हो।

वो पल मेरे दिल पर भारी पड़ गया।
क्योंकि उस क्षण मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं वही अधीर इंसान बन गया था,
जिसे बनने की मैंने खुद से कभी कसम खाई थी।

वो एक बिल्कुल साधारण मंगलवार था,
हमारे छोटे से ओहायो के कस्बे में।
यहाँ का किराने का स्टोर ही लोगों का मिलन-स्थान भी है—
लोग धीरे चलते हैं, बातें करते हैं,
ज़िंदगी की यादों में टहलते हुए aisles में घूमते हैं।

लेकिन मैं टहल नहीं रहा था।
मैं भाग रहा था—
हाथ में बजता हुआ फ़ोन,
दिमाग़ में काम के ईमेल,
बटुए में बिल,
और हड्डियों में तनाव।

माँ मेरे साथ चल रही थीं—
एक हाथ गाड़ी पर,
दूसरा उनकी छड़ी पर।
उनके कदम सावधानी से, धीरे-धीरे—
हर कदम एक छोटा सा संतुलन का परीक्षण।
फैक्टरी में सालों की मेहनत और बाद में नर्सिंग होम में मरीजों को उठाने-बैठाने ने
उनके शरीर पर मेहनत की लकीरें बना दी थीं।

“क्या हमारे पास इसके लिए समय है?”
मैंने बड़बड़ाया,
जब वो पास्ता सॉस की बोतल का लेबल पढ़ रही थीं।

उन्होंने मेरी आवाज़ में छिपी झुंझलाहट नहीं सुनी।
वो बस हल्का सा मुस्कुराईं।
“बस यह देख रही हूँ कि ज़्यादा नमकीन तो नहीं… तुम्हारा ब्लड प्रेशर, बेटा।”

आज भी—
काँपते हाथों के बावजूद—
वो मेरे बारे में ही सोच रही थीं।

चेकआउट तक पहुँचते-पहुंचते लाइन लंबी और बेचैन थी।
हमारे पीछे खड़ा एक किशोर गाड़ी को बार-बार ठकठका रहा था, साफ़ झल्लाया हुआ।
हमारे आगे की महिला अपनी घड़ी देखकर ऐसे परेशान हो रही थी
जैसे दुनिया कभी भी खत्म हो सकती हो।

कैशियर ने माँ को प्यार से कहा, “आराम से करो, प्यारी।”

माँ ने अपना पुराना बटुआ निकाला,
उंगलियाँ काँप रहीं थीं।
कुछ सिक्के काउंटर पर गिर पड़े।
मेरे चेहरे पर गर्मी सी फैल गई—शर्म की।

“माँ,” मैंने दबी लेकिन तेज़ आवाज़ में कहा,
“कार्ड इस्तेमाल करो न।”

उन्होंने घबराकर सिर हिलाया
और कार्ड निकाला।
कार्ड उनकी उंगलियों से फिसल गया—
एक बार… दो बार…
फर्श पर खनखनाता हुआ।
लाइन में किसी ने ज़ोर से साँस छोड़ी—नाराज़गी से।

मेरा फ़ोन फिर बजा—काम, बिल, ज़िम्मेदारियाँ।
मेरे जल्दबाज़ दिमाग़ में,
यहाँ तक कि वो स्त्री जिसने मुझे पाला था,
मुझे धीमा करने वाली लग रही थी।

“माँ, प्लीज़,”
मैं ज़रूरत से ज़्यादा ऊँची आवाज़ में बोल गया।
“ज़रा जल्दी करो।”

सब कुछ ठहर गया।

उनके हाथों का काँपना रुक गया।
उन्होंने ऊपर देखा—
उन आँखों में न गुस्सा था, न नाराज़गी,
बस एक शांत, गहरी चोट।

“मैं… कोशिश कर रही हूँ,”
उन्होंने फुसफुसाकर कहा।

और ये दो शब्द
किसी भी डाँट से ज़्यादा गहरे चुभे।

कार में हम खामोश बैठे रहे।
सीने में अपराध-बोध भारी था,
लेकिन अहंकार ज़बान बंद रखे था।

लाल बत्ती पर मैंने उनकी ओर देखा।
वो अपने हाथों को देख रही थीं—
पतले, धब्बेदार, नसों से भरे,
जिन पर सालों की कहानी लिखी हुई थी।

“हाथ ठीक हैं?” मैंने पूछा।

उन्होंने हल्की हँसी दी।
“ये बूढ़े हाथ? अब अपनी नहीं सुनते।”

फिर धीरे से, जैसे खुद से ही:
“कभी बहुत काम करते थे।”

उन पाँच शब्दों ने मुझे भीतर तक हिला दिया।

उस शाम, जब वो सो रही थीं,
मैं अटारी में गया और एक पुराना डिब्बा मिला—
जिस पर लिखा था “Keep”.

अंदर ऐसी तस्वीरें थीं जो मैंने कभी नहीं देखीं—
बीस की उम्र में माँ—मज़बूत, फैक्टरी में खड़ी।
तीस की उम्र में माँ—एक हाथ में मुझे लिये, दूसरे में किराने का सामान।
चालीस की उम्र में माँ—मरीज़ उठाती हुई, चेहरे पर करुणा और दृढ़ता।

वो हाथ
जो कभी खाना बनाते थे,
उठाते-ढोते थे,
सहारा देते थे,
सफाई करते थे,
काम करते थे,
देखभाल करते थे…
अब एक कार्ड स्वाइप करने में मुश्किल कर रहे थे।

अटारी के फर्श पर बैठकर मैं रो पड़ा—
धीरे, चुपचाप—
उस दुख के लिए जो मैंने अनजाने में दे दिया था।

अगली सुबह मैंने उन्हें रसोई की मेज़ पर
दवाई की बोतल से जूझते पाया।

“मैं कर दूँ?” मैंने नर्मी से पूछा।

उन्होंने बोतल मुझे देने से पहले
एक पल झिझका—
और वह छोटा सा ठहराव मेरे दिल को चीर गया।

“कभी मैं तुम्हारी दादी की बोतलें खोला करती थी,”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा।
“अब अपनी भी नहीं खुलती।”

उसी वक्त मैंने माफ़ी माँगी।
उन्होंने तुरंत टाल दिया—
क्योंकि माँएँ यही करती हैं।

लेकिन उनकी मुस्कान
पूरा दर्द छुपा नहीं पाई।

कुछ दिनों बाद,
डॉक्टर के क्लिनिक में, एक बुज़ुर्ग आदमी
अपना नाम साइन करने में संघर्ष कर रहे थे।
लोग पीछे खिसक रहे थे, चिढ़े हुए।

एक हफ़्ता पहले—शायद मैं भी उनमें होता।

लेकिन इस बार, मैं आगे बढ़ा।
“कोई बात नहीं,” मैंने कहा। “मैं मदद कर देता हूँ।”

वापस बैठा तो माँ ने मेरी बाँह थपथपाई।

“सीख रहे हो,”
उन्होंने फुसफुसाया।

“क्या?”

“कि एक दिन… हम सब ऐसे ही होंगे।”

और वो सही थीं।
धीमे कदम, काँपते हाथ, भूले हुए पासवर्ड, बार-बार पूछे गए सवाल—
ये कमज़ोरियाँ नहीं हैं।
ये एक लंबी जी हुई ज़िंदगी की क़ीमत हैं।

उस रात घर लौटते हुए उन्होंने कहानियाँ सुनाईं
जो मैंने कभी नहीं सुनी थीं—
दोहरी शिफ्ट के बाद लंबी बस यात्राएँ,
टमाटर तोड़ते उनके किशोर साल,
वो रातें जब किराया कम पड़ता था और वो चुपके से रोती थीं।

उन्होंने कभी शिकायत नहीं की।
सबकुछ सह लिया।

और अब,
जब उनका शरीर कहता है “बस, अब काफी है,”
तो दुनिया उन्हें ऐसे देखती है जैसे धीरे चलना कोई अपराध हो।

लेकिन धीमापन कोई समस्या नहीं।
वो एक याद दिलाता है—
सालों की तेज़, मेहनती, अथक ज़िंदगी की।

अगर आप अब भी पढ़ रहे हैं,
तो क्या मैं एक बात पूछ सकता हूँ?

अगली बार जब कोई बुज़ुर्ग
आपके आगे एटीएम पर,
किराने की दुकान पर,
फार्मेसी में
धीरे होंगे—

तो आप क्या याद रखेंगे?

वो देरी?

या उन हाथों के पीछे की ज़िंदगी?

क्योंकि एक दिन,
अगर ज़िंदगी ने हमें लंबा चलने दिया,
तो हम सब वही बनेंगे—
धीमे कदम वाले।

धैर्य की कीमत कुछ नहीं।
लेकिन किसी ऐसे इंसान के लिए
जिसने पूरी ज़िंदगी दूसरों का ख्याल रखा—
थोड़ा सा इंतज़ार भी एक आशीर्वाद जैसा लगता है।

और शायद…
शायद जब हम आज धैर्य चुनते हैं,
तो हम अपने लिए भी
एक नरम, दयालु भविष्य बना रहे होते हैं।

अमरीकी page का post हिन्दी में अनुवाद ✍️

10/12/2025
08/12/2025

हिंदू:को मुसलमान मरता हैं तो मारने दो पर किसी मुस्लिम को हिंदू न मारे- मोहन दास गांधी

08/12/2025

जिनसे मुर्गियाँ तक नहीं बचीं उनसे बच्चियां क्या बचेंगी ......

कितनी कलियाँ तोड़ लईं, कितनन की है किसमत फोड़ी
कबहुँ लुगाई, कबहूँ अम्मा आंखन शरम बची नाय थोड़ी
ऐसी जवानी में आग लगे कहुं ऊँट, बकरिया कहूँ है घोड़ी
कुत्ता कुतियन की छोड़ो जा कौम ने नाय मुरगिया छोड़ी
__________© राष्ट्रपुत्री समीक्षा सिंह । उत्तर प्रदेश
आधार और गद्दार भूलिए मत

08/12/2025

Ten Unknown Facts About
1. Founding and History: BMW, Bayerische Motoren Werke AG, was founded in 1916 in Munich, Germany, initially producing aircraft engines. The company transitioned to motor

08/12/2025

मेरा चप्पल कहा हैं
बंगाल में बाबरी मस्जिद की नींव रखे जाने को लेकर राजनीति अचानक तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा और ज्यादा गरमाया जब कई लोगों ने सवाल उठाया कि जो लोग राममंदिर की जगह अस्पताल मांग रहे थे, वे अब इस नई मस्जिद की नींव पर चुप क्यों हैं। बयान देने वालों का कहना है कि मंदिर के समय ‘अस्पताल चाहिए’ का नारा लगाने वाले लोग अब कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं, जबकि बंगाल में मस्जिद निर्माण पर उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं है।

यह पूरा मामला राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ लोग इसे दोहरे मापदंड बताते हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक स्वार्थ से जोड़ रहे हैं। बंगाल में हो रही इस गतिविधि ने एक बार फिर धार्मिक निर्माण और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर देशभर में नई बहस खड़ी कर दी है।

Disclaimer: यह पोस्ट उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। किसी धर्म, समुदाय या व्यक्ति को आहत करने का कोई उद्देश्य नहीं है।

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