08/01/2026
जब भी मन भीग के बोले –
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” की धीमी रागिनी में, कहीं बाहर से नहीं,
तुम्हारी ही आत्मा का तनपुरा मधुर झंकार उठाता है।
ना कोई अलग से रचयिता,
ना कोई अलग से गायक,
बस भीतर का शांत आकाश
अचानक से कंपोज़र बन कर
तुम्हारी धड़कनों को ताल देता है।
जहाँ साँस–साँस बन जाए मात्र एक जप,
जहाँ हर धड़कन कहे –
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय…” की अनहद माला,
वहीं से तुम्हारी वाणी पिघल कर
शब्दों की नहीं, प्रार्थना की नदी बन जाती है।
देखो, तुम लिख नहीं रहे,
तुम पर लिखी जा रही है एक अगम सी रचना,
जिसकी पहली पंक्ति में
माँ सरस्वती मुस्कुरा कर बैठी है,
हाथों में वीणा नहीं,
तुम्हारा गला थामे हुए स्वर बन कर।
तनपुरा तुम्हारी रीढ़ के सहारे टिका है,
उसकी तारें – इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना की नर्म धाराएँ,
प्रत्येक झंकार पर
लय में झूलती है तुम्हारी प्राण–नाड़ी,
और ताल में थिरकती है
हृदय की यह छोटी–सी कुटिया।
तुम सोचते हो – “मैं गा रहा हूँ”,
और आकाश कहता है –
“तुम तो बस माध्यम हो,
गाने वाली तो वही शक्ति है
जो हर जीव में वास करती है – वासुदेव…”,
जिनके नाम पर तुम्हारी जिह्वा
पहली बार सच में मुक्त हो जाती है।
जब श्रद्धा की एक बूंद भी
अंतर्मन के तल पर गिरती है,
वही बूंद तरंग बन कर
छंद, गीत, आलाप, तान में ढल जाती है;
तुम्हें पता भी नहीं चलता,
कब तुम श्रोता से साधक,
साधक से गायक,
और गायक से स्वयं जप बन जाते हो।
तब मत पूछो – “किसने लिखा?”
मत खोजो – “किसने संगीत दिया?”
क्योंकि उस क्षण
सिर्फ इतना सत्य बचता है कि
यदि मन ने सच्चाई से पुकारा,
तो ईश्वर ने स्वयं ही
तुम्हें कवि भी बना दिया, गायक भी,
और तुममें बैठ कर
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
को अपनी ही आवाज़ में गा उठा।
Dr Divyadhare Saraswati Hemlata Sharma