Yoga For Spine Cure

Yoga For Spine Cure YOGA TEACHER/ THERAPIST FOR SPINE PROBLEMS (SLIP DISC,SCIATICA,CERVICAL )

16 कैमरों वाले इस शॉट को लेने के लिए एक जर्मन फोटोग्राफर को 62 दिनों तक इंतजार करना पड़ा। स्क्रीन को टच करें और आप चंद्र...
13/02/2023

16 कैमरों वाले इस शॉट को लेने के लिए एक जर्मन फोटोग्राफर को 62 दिनों तक इंतजार करना पड़ा। स्क्रीन को टच करें और आप चंद्रमा और सूर्य को एक साथ देख सकते हैं। इसे केवल 2035 में फिर से देखा जा सकता है। फोटो का आनंद लें।
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श्रद्धा और आस्था पे ऐसी मानसकिताक्या यह एक होने वाली मानसिकता है🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
31/01/2023

श्रद्धा और आस्था पे ऐसी मानसकिता
क्या यह एक होने वाली मानसिकता है
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"एक धार्मिक व्यक्ति इतने गहरे रूप से जीता है कि वह किसी मृत्यु को नहीं जानता। मृत्यु को जानने के लिए ऊर्जा बचती ही नहीं।...
22/01/2023

"एक धार्मिक व्यक्ति इतने गहरे रूप से जीता है कि वह किसी मृत्यु को नहीं जानता। मृत्यु को जानने के लिए ऊर्जा बचती ही नहीं। कोई वहां होता नहीं मृत्यु को जानने के लिए। जब तुम इतने गहरे रूप से जीते हो जीवन को तो मृत्यु मिट जाती है ।मृत्यु केवल तभी अस्तित्व रखती है ,यदि तुम सतह पर जीते हो। जब तुम गहरे रूप से जीते हो तो मृत्यु भी जीवन बन जाती है। जब तुम जीते हो सतह पर तो जीवन भी मृत्यु बन जाता है।"
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सूत्र है-जांच कीजिए कि मैं कौन हूं?
भीतर गहरे में उतरिये और स्वयं की तरह रहिये।
वह ईश्वर है अस्तित्व की तरह।"
अस्तित्व सत चित आनंदस्वरुप है, अन्यथा हो नहीं सकता। अन्यथा को तो शरीर के जन्म मरण से जोडकर देखा जाता है।
कृष्ण कहते हैं-"मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और उत्पन्न होनेवालों का उत्पत्ति -हेतु हूं।।"
वे ही कृष्ण कहते हैं -"मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूं तथा संपूर्ण भूतों का आदि,मध्य और अंत भी मैं ही हूं।।"
दोनों चीजें अलग अलग हैं।जो उत्पन्न तथा नष्ट होता है वह वह नहीं है जो न उत्पन्न होता है,न नष्ट होता है।
वह हर समय है मौजूद हम सबके हृदय में। हमें इसीकी गहराई में उतरने की परम आवश्यकता है अपने अस्तित्व बोध के माध्यम से।
तदर्थ चित्त को मन से तोड लेना चाहिए,मैं हूं अनुभव को मैं यह हूं,वह हूं इस मान्यता से तोड लेना चाहिए।
केवल और केवल मैं हूं अनुभव -इसकी गहराई में उतरना अंतर्यात्रा करना है मूल को पहचानकर उसमें स्थित होने के लिए।तब शरीर,मन आदि बहुत पीछे छूट जाते हैं।उनके जन्म मरण को लेकर होने वाले विचार, चिंता,भय आदि सब विलीन हो जाते हैं।
ऐसा व्यक्ति ही धार्मिक कहे जाने योग्य है।तनमन को मैं मानकर जीनेवाला व्यक्ति तो अधार्मिक है।वह सतह पर जीता है और सतह पर जीवन, मृत्यु बन जाता है।
गहराई में मृत्यु,जीवन बन जाती है।
कृष्ण स्वयं कह रहे हैं -मैं मृत्यु हूं।'
शाश्वत जीवन कह रहा है-मैं मृत्यु हूं।
तो मृत्यु किसकी?शाश्वत की तो मृत्यु है नहीं अन्यथा वह शाश्वत है नहीं।
प्रकाश कहे-मैं अंधकार हूं।
तो ऐसा कैसे हो सकता है?
या जैसे सूर्य कहे-मैं अंधकार हूं।
तो यह तो असंभव ही है। सूर्य पृथ्वी के जिस भाग में है वहां उजाला ही संभव है। वहां तब वहां, यहां तब यहां। पृथ्वी के लिए होता है प्रकाश, अंधकार,
सूर्य के लिए तो अंधकार है ही नहीं। वहां प्रकाश की तरह प्रकाश भी नहीं है तुलनात्मक रुप में।उसीको पहचानने की बात है।
इसी तरह शाश्वत जीवन के लिए मृत्यु जैसी कोई चीज नहीं है।
फिर मृत्यु किसकी?
हम स्वयं को जान लें तो ही कह सकते हैं कि मृत्यु जैसी कोई चीज नहीं है।
एक साधारण सी बात है।हम जब शरीर छोड देते हैं तब दूसरों को लगता है हम मर गये जबकि हम होते हैं।
दूसरों को लगने से क्या होता है,वे तो शरीर को ही देखते हैं।सवाल तो हमारा है कि हम मरे क्या?हम तो वैसे के वैसे होते हैं।स्थूल नहीं तो सूक्ष्म शरीर में-वस्तुत: आत्मरुप,स्वरुप जो सचमुच हम हैं,जो हमारी सच्ची पहचान है।
यह बनने वाला, मिटने वाला शरीर हमारी पहचान नहीं है।इसे पहचान बनाने का अर्थ है सतह पर जीना।सतह पर जीवन भी मृत्यु प्रतीत होता है। गहराई में मृत्यु भी जीवन बन जाती है।
कृष्ण कहते हैं -मैं मृत्यु हूं।
शाश्वत जीवन स्वयं मृत्यु नहीं हो सकता।
शरीर में जो जीवात्मा है वह कृष्ण का ही अंश है,उसकी मृत्यु हो नहीं सकती।
इसलिए मृत्यु उसीकी मानी जाती है जो स्वयं को नाशवान देह मानता है।
वह स्वयं को जन्मा हुआ भी मानता है।
जड चेतनहि ग्रंथि परी गई।
यह अहंकार रुपी गांठ ही है जो स्वयं को जन्मने मरनेवाला मानती है।यह गांठ खुलनी चाहिए।
यह खुल सकती है यदि गहरे में यात्रा की जाय।सतह पर इसका पता नहीं चलता।समुद्र के गहरे राज तो उसके भीतर गहरे उतरने पर ही मालूम होते हैं।सतह पर तो शोर है,वे ही लहरों के रागद्वेष, आपसी झगडे।जन्म मृत्यु की मान्यताएं भी वहीं हैं। लहरें बनती बिगड़ती रहती हैं।सागर की अथाह गहराई में है परम शांति ,असीम शांति।
यह सागर ही तो कहता है लहरों को-मेरी शरण में आओ।परम शांति तथा शाश्वत पद को प्राप्त हो जाओगे।
पता चल जायेगा कि वास्तव में जो है वह कभी जन्मता,मरता नहीं।वह तो शाश्वत रुप से वैसा का वैसा ही है जैसा है।
उसकी गहराई में तो उतरना पडेगा तभी समझ में आयेगा-
"एक धार्मिक व्यक्ति इतने गहरे रूप से जीता है कि वह किसी मृत्यु को नहीं जानता। मृत्यु को जानने के लिए ऊर्जा बचती ही नहीं। कोई वहां होता नहीं मृत्यु को जानने के लिए।
जब तुम इतने गहरे रूप से जीते हो जीवन को,तो मृत्यु मिट जाती है। मृत्यु केवल तभी अस्तित्व रखती है, यदि तुम सतह पर जीते हो।जब तुम गहरे रुप से जीते हो,तो मृत्यु भी जीवन बन जाती है।"
न वह मरता है,न किसीको मरने देता है।अगर कोई मृत्यु भय से भयभीत है तो वह जानता है व्यर्थ है यह भय। स्वयं तो कभी मर सकता नहीं और जिस शरीर के मरने से डरता है वह तो सतह पर है। गहराई में कहीं कोई शरीर नहीं,न मन है,न विचार,न कोई स्मृति,न कोई मान्यता।सारा खेल अहंग्रंथि का है जिसे छुड़ाना मुश्किल है मगर वास्तव में वह है नहीं। जदपि मृषा छूटत कठिनई।
मिथ्या है तो छूटना कैसा? कठिनाई कैसी?
यही है।जागे बिना सपने के दुख दूर नहीं होते,वे जारी रहते हैं, असहनीय भी हो जाते हैं फिर भी सपना सपना ही है।
"उमा कहउं मैं अनुभव अपना।सत हरि भजन जगत सब सपना।।"
समस्या है तो समाधान भी है।हम पर है कि हम जोरों से किसे कसकर पकडे रहते हैं समस्या को या समाधान को?
जो है वह तो सदा ही है।
"परमात्मा को स्वीकार करो अथवा न करो किंतु प्राप्ति तो परमात्मा की ही होती है क्योंकि सिवाय परमात्मा के कुछ है नहीं,होगा नहीं,हो सकता नहीं।"
कोई कहे हम तो सतह पर ही सारे राज जान लेंगे और सुखी हो जायेंगे तो यह कभी नहीं होगा।सतह पर अहंग्रंथि खुल नहीं सकती। शिथिल, विश्राम पूर्ण (रिलेक्स्ड )होकर अस्तित्व बोध की गहराई में तो आना ही होगा।
सतह पर तमाम तनाव हैं,खिंचाव हैं,हम सुखपूर्वक रह ही नहीं सकते। हमेशा कुछ नजर आता रहेगा पाने या हटाने के लिए।
'इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।।'
हां,जो भी दिखाई,सुनाई पड रहा है हम उससे रागद्वेषरहित हो सकें तो अपनी गहराई में उतरना आसान हो सकता है। होता हीहै।किये बिना पता नहीं चलता।

उष्ट्रासन : क्रोध पर नियंत्रण के इस योग की जानिये योग विधि, अन्य लाभ और सावधानियाउष्ट्रासन दो शब्द मिलकर बना है।  ‘उष्‍ट...
26/11/2022

उष्ट्रासन : क्रोध पर नियंत्रण के इस योग की जानिये योग विधि, अन्य लाभ और सावधानिया

उष्ट्रासन दो शब्द मिलकर बना है। ‘उष्‍ट्र’ का अर्थ ऊंट होता है। इस मुद्रा में शरीर ऊंट के समान लगता है इसीलिए इसको इस नाम से पुकारा जाता है। स्वस्थ लाभ के हिसाब से उष्ट्रासन बैठ कर करने वाले आसन में एक महत्वपूर्ण योगाभ्यास है। उष्ट्रासन एक ऐसी योग एक्सरसाइज है जो क्रोध एवं शारीरक विकारों को दूर करने में अहम भूमिका निभाता है।

उष्ट्रासन योग के लाभ

1 इसका अभ्यास करके आप डायबिटीज को बहुत हद तक कण्ट्रोल कर सकते हैं क्योंकि यह आपके पैंक्रियास को उत्तेजित करता है और इन्सुलिन के स्राव में मदद करता है।

2 इस योग से पेट की चर्बी को कम होती हैं।

3 फेफड़े के स्वस्थ के लिए यह एक उम्दा आसन है और फेफड़े से सम्बंधित परेशानियों से आप को बचाता है।

4 दृष्टि विकार वाले व्‍यक्तियों के लिए उष्‍ट्रासन अत्‍यधिक उपयोगी होता है।

5 उष्ट्रासन कमर दर्द में: इसको विशेषज्ञ के सामने अभ्यास करने से कमर दर्द में बहुत मदद मिलती है। यह आसन कमर दर्द के लिए रामबाण है।

6 यह योगाभ्यास क्रोध को कम करते हुए आपको शांत करने में मदद करता है।

7 गर्दन के दर्द: गर्दन के दर्द को भी कम करने में मदद करता है।

8 पतली कमर और खूबसूरत चेहरा के लिए उष्ट्रासन का अभ्यास करनी चाहिए।

9 यह स्लिप डिस्क एवं साइटिका को दूर करने में मददगार है।

10 उष्ट्रासन पाचन संबंधी समस्‍याओं में यह लाभकारी होता है।

11 यह आसन महिलाओं में मासिक जैसी परेशानियों को दूर करने में लाभदायक है।

उष्ट्रासन योग करने की विधि

सबसे पहले आप स्वच्छ आसन बिछाकर उस पर घुटनों के बल बैठ जाएं या आप वज्रासन में बैठे।

ध्यान रहे जांघों तथा पैरों को एक साथ रखें, पंजे पीछे की ओर हों तथा फर्श पर जमे हों।

घुटनों तथा पैरों के बीच करीब एक फुट की दूरी रखें।

अब आप अपने घुटनों पर खड़े हो जाएं।

सांस लेते हुए पीछे की ओर झुकें और अब दाईं हथेली को दाईं एड़ी पर तथा बाईं हथेली को बाईं एड़ी पर रखें।

ध्‍यान रहे कि पीछे झुकते समय गर्दन को झटका न लगे।

अंतिम मुद्रा में जांघें फर्श से समकोण बनाती हुई होंगी और सिर पीछे की ओर झुका होगा।

शरीर का वजन बांहों तथा पांवों पर समान रूप से होना चाहिए।

धीरे धीरे सांस ले और धीरे धीरे सांस छोड़े।

जहाँ तक हो सके अपने हिसाब से मुद्रा को मेन्टेन करें।

और फिर लंबी गहरी सांस छोड़ते अपनी आरंभिक अवस्था में आएं।

यह एक चक्र हुआ।

इस तरह से आप इसको पांच से सात बार कर सकते हैं।

उष्ट्रासन योग के सावधानी

उच्‍च रक्‍तचाप में इसे नहीं करनी चाहिए।

हृदय रोग से पीड़ित व्यक्ति इसे करने से बचें।

हर्निया से ग्रस्‍त व्‍यक्तियों को यह आसन नहीं करना चाहिए।

अधिक कमर दर्द में इसका अभ्यास न करें।

साइटिका एवं स्लिप डिस्क वाले मरीज इसको किसी विशेषज्ञ के सामने करनी चाहिए।

कमर दर्द, गर्दन दर्द, नजला जुकाम, तनावग्रस्त के लिए संपर्क करें
जालंधर
9814944728

जीवन-ऊर्जाहमारी सारी जीवन-ऊर्जा बाहर की तरफ यात्रा कर रही है। इस बहिर्यात्रा में ही हम भीतर अंधेरे में पड़े हैं। यह ऊर्जा...
26/10/2022

जीवन-ऊर्जा

हमारी सारी जीवन-ऊर्जा बाहर की तरफ यात्रा कर रही है। इस बहिर्यात्रा में ही हम भीतर अंधेरे में पड़े हैं। यह ऊर्जा भीतर की तरफ लौटे तो यही #ऊर्जा #प्रकाश बनेगी। यह ऊर्जा ही प्रकाश है।

तुम्हारा सारा प्रकाश बाहर पड़ रहा है--वृक्षों पर, पर्वतों पर, पहाड़ों पर, लोगों पर। लेकिन तुम एक अपने पर अपनी रोशनी नहीं डालते। सबको देख लेते हो अपने प्रति अंधे रह जाते हो। और सबको देखने से क्या होगा? जिसने अपने को न देखा, उसने कुछ भी न देखा।

आज के सूत्र तुम्हारे भीतर का दीया कैसे जले, #सच्ची_दीवाली कैसे पैदा हो, कैसे तुम भीतर चांद बनो, कैसे तुम्हारे भीतर चांदनी का जन्म हो--उसके सूत्र हैं। बड़े मधु-भरे! सुंदर ने बहुत प्यारे वचन कहे हैं, पर आज के सूत्रों का कोई मुकाबला नहीं है। बहुत रस-भरे हैं, पीओगे तो जी उठोगे। ध्यान धरोगे इन पर, संभल जाओगे। डुबकी मारोगे इनमें, तो तुम जैसे हो वैसे मिट जाओगे; और तुम्हें जैसा होना चाहिए वैसे प्रकट हो जाओगे।

है दिल मैं दिलदार... ।

जिसको तुम खोज रहे हो, तुम्हारे भीतर बैठा है। तुम्हारी खोज के कारण ही तुम उसे नहीं पा रहे हो। तुम दौड़े चले जाते हो। सारी दिशाओं में खोजते हो, थकते हो, गिरते हो। हर बार जीवन कब्र में समाप्त हो जाता है। जीवन से मिलन नहीं हो पाता। और जिसे तुम खोजने चले हो, जिस मालिक को तुम खोजने चले हो, उस मालिक ने तुम्हारे घर में बसेरा किया हुआ है। तुम जिसे खोजने चले हो, वह अतिथि नहीं है, आतिथेय है। खोजनेवाले में ही छिपा है। वह जो गंतव्य है, कहीं दूर नहीं, कहीं भिन्न नहीं, गंता की आंतरिक अवस्था है।

है दिल मैं दिलदार सही अंखियां उलटि करि ताहि चितइए।

लेकिन अगर उसे देखना हो, अगर उसके प्रति चैतन्य से भरना हो तो आंखें उलटाना सीखना पड़े। आंख उलटाना ही ध्यान है। ध्यान साधारणतया दृश्य से जुड़ा है। ऐसा मत सोचना कि तुम्हारे पास ध्यान नहीं है। तुम्हारे पास ध्यान है--उतना ही जितना बुद्धों के पास। रत्ती भर कम नहीं। परमात्मा किसी को कम और ज्यादा देता नहीं। उसके बादल सब पर बराबर बरसते हैं। उसका सूरज सबके लिए उगता है। उसकी आंखों में न कोई छोटा है न कोई बड़ा है। ऐसा मत सोचना कि #कृष्ण को कुछ ज्यादा दिया था, कि #बुद्ध को कुछ ज्यादा दिया था, कि #सुंदरदास को जरूर कुछ ज्यादा दे दिया होगा--कि ये रोशन हुए, कि ये जगमगाए। न खुद जगमगाए, बल्कि इनकी जगमगाहट से और भी लोग जगमगाए। दीयों से दीये जलते चले गए। ज्योति से ज्योति जले! जरूर इन्हें कुछ ज्यादा दे दिया होगा छिपा कर; हमें दिया नहीं, हम क्या करें? नहीं; ऐसा मत सोचना।

परमात्मा की तरफ से प्रत्येक को बराबर मिला है। रत्ती भर भेद नहीं। फिर हम अंधेरे में क्यों हैं? फिर कोई बुद्ध रोशन हो जाता है और हम बुद्धू के बुद्धू क्यों रह जाते हैं। हमें जो मिला है, हमने उसे गलत से जोड़ा है। जैसे कोई सरिता मरुस्थल में खो जाए, जल तो लाए बहुत हिमालय से और मरुस्थल में खो जाए--ऐसी हमारी जीवन-ऊर्जा मरुस्थल में खोई जा रही है। बाहर विस्तार है मरुस्थल का।

#ध्यान तुम्हारे पास उतना ही है जितना मेरे पास। लेकिन तुमने ध्यान वस्तुओं पर लगाया है। तुमने ध्यान किसी विषय पर लगाया है। तुम्हारा ध्यान हमेशा किसी चीज पर अटका है। चीजों को गिर जाने दो--चीजों को हट जाने दो। विषय वस्तु से मुत्त हो जाओ, मात्र ध्यान को रह जाने दो, निरालंब! और आंख भीतर मुड़ जाती है।

निरालंब ध्यान का नाम #समाधि। आलंबन से भरे ध्यान का नाम संसार। जब तक आलंबन है तब तक तुम बाहर जाओगे, क्योंकि आलंबन बाहर है। जब आलंबन नहीं तब तुम भीतर आओगे। कोई उपाय ही न बचा तो तुम्हें भीतर आना ही होगा। ध्यान को कहीं ठहरना ही होगा। बाहर न ठहराओगे तो अपने-आप सहज सरलता से ध्यान लौट आता है।

– ओशो
ज्योति से ज्योति जले

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