03/03/2026
होली के दिन दिल खिल जाते हैं
रंगों में रंग मिल जाते हैं....
खेलेंगे होली, रंग नहीं लगाएंगे — ऐसा कभी होता है क्या? आइए बाहर आइए, डरिए मत…
होली मतलब रंग, हँसी, गुलाल, पानी से भीगा चेहरा और अचानक पीछे से “पकड़ लिया!” वाला हमला।
लेकिन जैसे ही होली खेलने की बात आती है, कई लोगों के मन में एक सवाल उठता है — क्या ये रंग सुरक्षित हैं? कहीं होली खेलते-खेलते स्किन कैंसर तो नहीं हो जाएगा?
होली से ठीक पहले इन डर को थोड़ा दूर करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
सबसे पहले एक बात साफ कर लें — एक दिन होली खेलने से स्किन कैंसर नहीं होता।
यह पूरी तरह गलत धारणा है। एक या दो दिन रंग लगाने से कैंसर नहीं होता। कैंसर इतनी आसानी से नहीं होता, और सिर्फ होली के रंग उसका कारण बिल्कुल नहीं हैं।
हाँ, इसका मतलब यह भी नहीं कि हर रंग पूरी तरह सुरक्षित है। आजकल बाजार में मिलने वाले कई सस्ते रंगों में औद्योगिक केमिकल, सिंथेटिक डाई या कभी-कभी भारी धातुएँ भी मिली होती हैं। इनसे त्वचा में खुजली, एलर्जी, रैश, आँखों में जलन या स्किन इरिटेशन हो सकता है।
यानि कैंसर तो शायद नहीं होगा, लेकिन होली की मस्ती खुजली करते-करते खत्म जरूर हो सकती है।
तो समझदार होली खिलाड़ी क्या करते हैं?
रंग खेलने से पहले शरीर पर थोड़ा नारियल तेल या मॉइश्चराइज़र लगा लेते हैं। इससे रंग सीधे त्वचा पर नहीं चिपकता। फुल स्लीव कपड़े और सनग्लास भी स्टाइल के साथ-साथ सुरक्षा देते हैं।
और एक जरूरी बात — जो दोस्त काले, बहुत चमकीले या अजीब गंध वाले रंग लेकर आपकी तरफ दौड़ता हुआ आ रहा हो, उसे थोड़ी दूरी से ही “हैप्पी होली” बोल देना ज्यादा समझदारी है।
तो फिर होली खेलें किससे?
हर्बल या अच्छी गुणवत्ता वाला गुलाल इस्तेमाल करना सबसे सुरक्षित तरीका है। इससे मज़ा भी बना रहता है और बाद में घंटों रगड़-रगड़कर रंग छुड़ाने की परेशानी भी नहीं होती।
आख़िरकार, होली के रंग लोगों को करीब लाने के लिए होते हैं, डर्मेटोलॉजिस्ट के क्लिनिक भेजने के लिए नहीं।
इसलिए डर नहीं, बस थोड़ी सी जागरूकता ज़रूरी है।
हँसिए, खेलिए, रंगों में डूब जाइए — क्योंकि होली साल में एक बार आती है, लेकिन उसकी यादें लंबे समय तक साथ रहती हैं।
हैप्पी होली!