Jhunjhunu Club

Jhunjhunu Club Jhunjhunu Club is the organization to explore the people of Jhunjhunu District. Jhunjhunu district needs much to be done for its development.

There should be a Defense Research & Development Organisation (DRDO) lab, Agriculture and Livestock Research Institute, Medical and Engineering College, Entrepreneurship and Skill Development Institute, Military School, Defense University, Small and Middle scale Industries, Agro-food processing Industries, Mines and Mineral based Industries, Inclusion of Jhunjhunu in NCR, Network of Roads to each

Village, Promotion of science and technology in agriculture, Drinking water for All (free from fluoride, germs etc.), promotion of floriculture, horticulture and forestry, Improved healthcare system and e-healthcare, Enhanced e-governance and people grievance system, welfare and rehabilitation of retired and ex-service persons, more facilities to military persons and for their families, and much is needed to improve in education, administration, child-women empowerment, and for youth employment.

29/04/2026
पांच राज्यों में चुनाव हैं। चुनाव में यूँ तो दिलचस्पी नही बची है। मगर लगता है कि जहां जिसके पास जो राज्य है, वह बना रहेग...
28/04/2026

पांच राज्यों में चुनाव हैं।

चुनाव में यूँ तो दिलचस्पी नही बची है। मगर लगता है कि जहां जिसके पास जो राज्य है, वह बना रहेगा।

ऐसे में मुझे निराशा होगी। मेरी ख्वाहिश है कि हर जगह बीजेपी जीत जाये। जहां नही जीते, वहां भी सारे विधायक खरीद कर सरकार बना ले।

और चप्पा चप्पा भाजपा हो जाये।
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उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम, पंचायत से संसद तक, हर ऑफिस, हर कोर्ट, हर थाने, हर रेजिमेंट में भाजपा के कार्यकर्ता बैठ जायें।

आकाश से पाताल तक भगवा लहराए। सारे दल नेस्तनाबूद कर दिये जायें। लोग कोर्ट जाना बंद कर दें। वोट देना बंद कर दें। वेतन मांगना बन्द कर दें। फरियाद करना बंद कर दें। राम राज्य में जो मिले, लेकर नमस्कार करें।

उस दिशा में जिधर, मोहल्ले में बुलडोजर खड़ा है। जिस पर पांच लफंगे, पुलिस सुरक्षा में नाच रहे हैं।।
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ये कई जगह हो गया है, कई जगह प्रक्रिया में है। लेकिन बंगाल केरल तमिलनाडु वगैरह फालतू रेजिस्ट कर रहे हैं। इससे प्रोसेस लम्बी खिंचती है।

और ये विपक्ष वाले कहीं कहीं, किसी किसी राज्य में जीतकर- देश की व्यग्रता और क्रोध को सेफ पैसेज दे देते हैं। लोगो मे सिस्टम पर आस्था फिर से पैदा होने लगती है। और कुकर से भाप निकल जाती है।
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यह भाप कहीं से भी नही निकलनी नही चाहिए। चुनने को कोई विकल्प बचना नही चाहिए। हर फैसला सबको पहले ही पता होना चाहिए।

चुनाव हो, मुकदमा हो, बहस हो, मत विभाजन हो। भाजपा आरएसएस को हर जगह जीतना चाहिए। उसे सरकार बनानी चाहिए, और अपने एजेंडे को छल, कपट, पैसे, दबाव और डर से बदस्तूर लागू करते रहना चाहिए।
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और इस तरह इतना गहरा खड्ड खोदना चाहिए

कि, जब ये उसमे गिरें, तो इस देश की आने वाली 100 पीढ़ियों को याद रहने लायक सबक देकर, ठीक वैसे गायब हो जाएं,

जैसे 1945 के बाद जर्मनी में नाजी
और इटली में फॉसिस्ट गायब हुए।
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क्योकि एक दशक और एक पीढ़ी बर्बाद हो चुकी है। उनका खोया अवसर लौटेगा नही। कभी भरपाई नही होगी।

64% युवाओ का डेमोग्राफिक डिविडेंट, अब ढलान पर है। पीक की एनर्जी, जवानी तो सस्ता नाजी बनने में निकल गयी। वे अब कुछ बन नही सकते।

सिवाय अगली पीढ़ियों के लिए नजीर बनने के।

तो अब कोई अवरोध नही।यह खेल फटाफट मुकम्मल होना चाहिए। सबको अपने हश्र पर जल्द पहुचना चाहिए।

जय जय श्रीराम।

भारतीय जनता पार्टी में जाने के बाद ये स्वाभाविक शिक्षाएं मिल जाती हैं। पार्टी से निवेदन है कि एक पुस्तिका के रूप में देश...
27/04/2026

भारतीय जनता पार्टी में जाने के बाद ये स्वाभाविक शिक्षाएं मिल जाती हैं। पार्टी से निवेदन है कि एक पुस्तिका के रूप में देश को यह बताने का काम करे और सबसे पहले संसद में सभी सांसदों को प्याज दें और उसे AC से मुक्त करें।

27/04/2026

अफ़्रीका के माली में अल-क़ायदा गिरोहों का कई सैनिक ठिकानों पर बीते दो दिनों से हमले चल रहे हैं। एक हमले में माली के रक्षा मंत्री भी मारे गये हैं।

माली में राष्ट्रवादी क्रांतिकारी सैनिक शासन आने के बाद फ़्रांस के सैनिकों की वापसी हुई है और फ़्रांस का नियंत्रण ख़त्म हुआ है, लेकिन इसके साथ ही, अल-क़ायदा गिरोहों के हमले बढ़े हैं।

ज़ाहिर है, हमेशा की तरह इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकी गिरोहों का इस्तेमाल पश्चिमी देश कर रहे हैं।

तीन साल पहले माली से फ़्रांसीसी और संयुक्त राष्ट्र के सैनिकों की वापसी हो चुकी है। इस्लामिक आतंक रोकने के बहाने यह सब सैनिक तैनाती असल में संसाधनों की लूट का बहाना होती हैं।

इसे सरल शब्दों में ऐसे समझा जाए। माली पर सदियों तक फ़्रांस का दख़ल रहा। अन्य उपनिवेशों की तरह स्वतंत्रता के बाद भी माली में फ़्रांस का दबदबा बना रहा। इसका कारण यह है कि लूट जारी रहे।

दुनिया में सबसे अधिक सोने का रिज़र्व अमेरिका, जर्मनी, इटली, फ़्रांस और रूस के पास है।

इस मामले में चौथे स्थान पर स्थित फ़्रांस के पास बीते दो दशकों में औसतन 26 सौ टन से अधिक सोना है। दिलचस्प यह है कि फ़्रांस में केवल एक जगह मामूली मात्रा में सोने की खुदाई होती है और कुछ बाहर के उसके औपनिवेशिक द्वीपों पर खुदाई होती है।

अब सवाल यह है कि इसके बाद भी उसके पास इतना सोना कैसे है। इसका उत्तर यह है कि इसका अधिकांश माली का लूटा हुआ सोना है। माली में सोने के सैकड़ों खदान हैं, जो सालाना 50 टन से अधिक सोना पैदा करते हैं।

यह भी कहना ज़रूरी है कि माली में फ़्रांसीसी और संयुक्त राष्ट्र के सैनिकों की तैनाती के बाद वहाँ हिंसक घटनाएँ बेतहाशा बढ़ी थीं।

फिर भी सोने के उत्पादन पर असर नहीं हुआ था. ठीक उसी तरह, जैसे इराक़ में इस्लामिक स्टेट के दौर में भी वहाँ से भारी मात्रा में तेल बेचा जाता रहा। ऐसा ही लीबिया में होता रहा है।

अरे जियो यार !! 😍एक्रोस पार्टी लाइन, कुछ चेहरे है- जिन्हें देखना नयनाभिराम होता है। संजय सिंह उन कुछ नेताओं में शुमार है...
26/04/2026

अरे जियो यार !! 😍

एक्रोस पार्टी लाइन, कुछ चेहरे है- जिन्हें देखना नयनाभिराम होता है। संजय सिंह उन कुछ नेताओं में शुमार हैं।

दरअसल मौत के डर के बाद, इंसान का दूसरा बड़ा डर जेल होता है, और तीसरा गरीबी। जिसने इन तीनो को जीत लिया हो, मौजूदा रेजीम के सामने सिर्फ वही लीडर, खड़ा और तना रह सकता है।
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विपक्ष की राजनीति से जिस निर्भीकता, चुनौती देने की अदा और नतीजों से बेफिक्री का अंदाज चाहिए, संजय सिंह उसकी प्रतिमूर्ति हैं।

उनकी वाणी, ओज, और शक्ति इंस्पायर करती है, बेलौस फक्कड़पन आनंदित करता है। मजबूत रीढ़ के खड़े चंद नेताओ में एक..

संजय सिंह के लिए लाखों शुभकामनाएं और दुआयें हैं।
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करेजा हरियर कर दिये लल्ला!!
🙏❤️

26/04/2026

बंगाल में सरकार किसकी बनेगी, यह तो रिजल्ट आने पर पता चलेगा। लेकिन याद रखिएगा कि बंगाल में भाजपा को एंट्री दीदी ने दिलाई थी। बाक़ायदा गठबंधन किया था।

अब इसका अफ़सोस है उन्हें या लेफ्ट को इस तरह ख़त्म करने की ख़ुशी, यह तो उन्हें ही पता होगा।

26/04/2026

सुना जाना चाहिए...

25/04/2026

ये तेजस्वी पत्रकार अजीत साही ने लिखा है और बहुत कम शब्दों में भारतीय राजनीति, राजनेताओं और मूर्ख लोगों का शानदार वर्णन किया है।
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राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है। मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है।

2011 में अन्ना हज़ारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया। देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द खत्म हो जाएगा। हज़ारों की भीड़ जमा हो गई। क्रांति को नाम मिला India Against Corruption। नामी-गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन-कौन उसमें शामिल हो गए। मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं। मैं खुद तो वहाँ कभी नहीं गया। उन्होंने मुझे कहा, “अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं।”

कुछ हफ्तों बाद आग्रह कर उन्होंने मुझे महाराष्ट्र भवन में अन्ना हज़ारे से मिलवाया।

एक दिन मैंने बहन से कहा: “आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख्ता कर लें। कल ये एक पार्टी बनेगा। आप चांदनी चौक लोकसभा का टिकट लें। आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे। बस बीजेपी से समझौता करना होगा, वो अपना उम्मीदवार न खड़ा करें।”

बहन को बात नागवार गुजरी। बोलीं, “मुझे अफसोस है कि आप इतने सिनिकल हैं। अन्ना और अरविंद पार्टी बनाने की सोच भी नहीं सकते हैं। हम इंडिया बदलने निकले हैं। आपकी सोच बहुत छोटी है। ये एक दूसरी आजादी है। वी आर मेकिंग हिस्ट्री।”

मुझे बरबस बचपन और जवानी का ख्याल आ गया।
मैं ग्यारह साल का था जब इमरजेंसी खत्म हुई थी। 1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हारीं और जनता पार्टी चुनाव जीती तो पूरे मोहल्ले में खुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस खुशी में दीवाना हो गया।

ढाई साल बाद 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरी और इंदिरा गांधी चुनाव जीत गईं। पूरे मोहल्ले में खुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस खुशी में शामिल हो गया।

फिर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। दो महीने बाद लोकसभा चुनाव हुआ। इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन ने चुनाव लड़ा। मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। सिविल लाइंस जाकर मैंने खादी का नया कुर्ता-पायजामा खरीदा और अमिताभ बच्चन की कैंपेनिंग में लग गया।

चुनाव से चौबीस घंटे पहले एक जीप में छंटे हुए कांग्रेसी गुंडों के साथ मुझे गांवों की ओर भेज दिया गया। मैंने वहाँ बूथ मैनेजमेंट का पावन अनुभव किया।

आधी रात खेतों के बीच घुप अंधेरे में कच्ची सड़क पर दो जीपें आमने-सामने रुकीं। मैं अपनी जीप में बैठा रहा। मेरी जीप के गुंडे और दूसरी जीप के गुंडे जीपों की हेडलाइट में गुटखा खाते बातें करते रहे। फिर दूसरी जीप पर से विपक्षी पार्टी का झंडा उतर गया। आवाज लगाकर मुझे कांग्रेस का झंडा लाने को कहा गया। उसे दूसरी जीप पर लगा दिया गया। फिर दोनों जीपें अपने-अपने रास्ते निकल लीं।

राजीव गांधी ने बंपर जीत हासिल की। अमिताभ बच्चन ने भी। तब तक मेरा परिवार ननिहाल छोड़कर सरकारी अफसरों के मोहल्ले में रहने लगा था। इस मोहल्ले में भी खुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस खुशी में शामिल हो गया।

फिर 1989 आया। अब मैं दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस अखबार में रिपोर्टर की नौकरी कर रहा था। देश जान गया था कि राजीव गांधी भ्रष्ट हैं। देश ये भी जान गया था कि वी. पी. सिंह देवता हैं। राजीव गांधी हार गए। वी. पी. सिंह जीत गए। जिस मोहल्ले में मैं रहता था वहाँ भी खुशी की लहर दौड़ गई।

खैर।

जैसा कि मैंने अपनी मुंहबोली बहन से कहा था, India Against Corruption से पार्टी निकली। उस मुकाम पर केजरीवाल ने अन्ना हज़ारे को थैंक्यू बोल दिया। मेरी बहन गांधी को छोड़कर नेहरू के साथ चली गईं। तमाम और लोगों ने भी यही मुश्किल फैसला लिया।

उस दौर में पार्टी के एक दूसरे भारी नेता थे। मैं उनकी तब भी और आज भी इज्जत करता हूँ। उन्होंने मुझे घर बुलाया। केजरीवाल भी थे। दोनों बोले हम पार्टी शुरू कर रहे हैं और एक खोजी पत्रकारिता की वेबसाइट बना रहे हैं। तुम हमारे साथ आकर उसे चलाओ। विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर मैंने बताया मैं इस नेक काम के काबिल नहीं हूँ। बाद में नेहरू ने उन दूसरे नेता को भी पार्टी से निकाल दिया।

मेरी बहन ने भी वक्त आने पर नेहरू को छोड़ दिया। आज वो पार्टीगत राजनीति की माननीय सदस्या हैं। मेरी मनोकामना है कि देर से ही सही, उनको संसद की सदस्यता मिलनी चाहिए। और ऐसा क्यों न हो?

अगर आप सोच रहे हैं कि इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स है तो मैं माफी चाहता हूँ, इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स नहीं है। भारतीय समाज जिस रुआब से अपनी पीठ थपथपाता है, दरअसल वो भीतर से उतना ही खोखला और लचर है। हम उस मरीज की तरह हैं जो दुनिया से जानलेवा मर्ज छुपाकर सोचता है कि कोई मर्ज है ही नहीं।

लेकिन दुनिया जानती है कि मर्ज लाइलाज है। पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है।

25/04/2026

कभी कभी ख़बरों की कुछ हेडलाइन्स ऐसी होती हैं कि सालों तक ज़ेहन में बसी रहती हैं। मुझे याद है मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे। उनके वित्तमंत्री पी चिदंबरम पहली बार बजट पेश कर रहे थे। लोगों को आशंका थी कि पता नहीं आगे क्या होगा?

बजट पेश होने के अगले दिन The Economic Times ने शीर्षक लगाया:
PC goes to MS Word.
क्या ही शानदार शीर्षक था।

Aaj Tak के ईपेपर ने आज शीर्षक लगाया है: हम आप के हैं कौन?

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