06/01/2026
हमने फिदेल कास्त्रो को नहीं देखा लेकिन ह्यूगो शावेज़ को देखा है। आधुनिक वेनेजुएला के संस्थापक शावेज़ 2005 में भारत आये थे।
जेएनयू में शानदार भाषण हुआ था उनका। तब जेएनयू के वीसी डॉ कर्ण सिंह थे। एक साल पहले हुए 2004 के चुनाव में लेफ्ट ने इतिहास का सबसे शानदार प्रदर्शन किया था। भारतीय संसद में तब लेफ्ट के 61 सांसद थे।
मुदरो की जगह मैं ह्यूगो शावेज़ की बात क्यों कर रहा हूं? क्योंकि वेनेजुएला के बरक्स अमरीकी साम्राज्यवाद के बारे में बात करना है तो शावेज़ को ही प्रस्थान बिंदु बनाना होगा। मुदरो उसके योग्य नहीं।
शावेज़ ने अमरीकी मसूंबो पर जितना तगड़ा प्रहार किया वह कोई और नहीं कर सका। वो संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में नोम चोमस्की की किताब लेकर जाते थे।
यूएन के मंच से अमरीका के खिलाफ अब तक का सबसे विस्फोटक भाषण शावेज़ ने ही दिया। उन्होंने कहा था - कल यहां एक शैतान [बुश] आया था। अभी भी बारूद की गंध आ रही है. यह 2006 की बात है।
तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बुश का भाषण 19 सितंबर को था। शावेज का एक दिन बाद 20 सितंबर को।
अगर दुनिया में शोषक का चरित्र और शोषण के हथियार एक जैसे हैं तो मुक्ति की आकांक्षा भी एक जैसी होनी चाहिये। लेकिन नहीं है। मेरी आकांक्षा चीन से मेल नहीं खाती है- यह मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं।
यही वजह है कि मैंने हमेशा शावेज और मुदरो के बीच क्या फर्क है – इस बात को समझा है। हमारा लेफ्ट भी अगर समझता तो कम से कम 61 सांसद आज भी भारत की संसद में होते।
नोट- माओवाद एक अलग श्रेणी है। यद्यपि वो भी विस्तृत लेफ्ट का एक हिस्सा हैं लेकिन यहां पर उन्हें अलग समझिए।