06/10/2025
🌹शरद पूर्णिमा🌹
में आज बीज परीक्षण का प्राचीन ज्ञान आजमाएं
इस वर्ष अधिक उत्पादन किस बीज में होगा यह परीक्षण आज रात्रि में कर सकते है
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चंद्रमा वनस्पतियों का देवता है,
वनस्पति अर्थात पेड़ पौधे लताएं,अनाज औषधी आदि यह सब कब उगेंगे,कैसे उगेंगे, इनमें कब पतझड़ आएगा, कब फूल आएगा, कब फल आएगा,यह सब चंद्रमा ही तय करता है।
सरसों के बीज को जमीन में डालकर कितना भी सिंचाई करो उगता तो वह हस्त नक्षत्र में ही है।
ऐसे ही सब प्रकार की फसलों के बीजों को उगाने का नक्षत्र चंद्रमा की किरणों के साथ ही तय होता है।
शरद पूर्णिमा में चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र के तारामंडल के सामने होता है, अश्विनी नक्षत्र को सबसे अधिक कांतिमान अर्थात सौंदर्य प्रदान करने वाला नक्षत्र माना गया है, भारत का प्राचीन ज्ञान यह भी कहता है कि शरद पूर्णिमा में चंद्रमा की किरणें 16 कलाओं से युक्त रहते है,किरणों में स्वर्ण की ऊर्जा रहती है,
चंद्रमा की किरणों में वे शक्तियां हैं जिनसे जीवन उत्पन्न होता है।
खेती करते समय हमने यह पाया है की पूर्णिमा में मिट्टी में पॉजिटिव जीव की अर्थात फसल को बढ़ाने वाले जीवो की ज्यादा उत्पत्ति होती है और अमावस्या के समय में फसल को नष्ट करने वाले जीवों की अर्थात फंगस वायरस और कीटों की उत्पत्ति या प्रजनन ज्यादा होता है।
पूर्णिमा के समय जब चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण धरती के ऊपर बढ़ जाता है तो समुद्र का पानी ऊपर उठने लगता है, पेड़ पौधों का जीवन रस पत्तों के तरफ आ जाता है, इसीलिए औषधि के लिए पत्तों को बीजों को फलों को तोड़ने का कार्य शरद पूर्णिमा के बाद से ही प्रारंभ किया जाता है।
इस समय फसलों में पके हुए धान्य में जीवन रस आने से धान्य का स्वाद बढ़ जाता है। इसलिए इस समय धान्य फसलों की कटाई की जाती है।
चंद्रमा खुद प्रकाशित नहीं होता यह सूर्य की किरणों को रिफ्लेक्ट करके धरती की ओर भेजता है,
दर्पण से सूर्य की रिफ्लेक्ट करने वाली रोशनी आंखों को चुभती है,ऐसा आपने अपने जीवन में कभी न कभी अनुभव में लिया होगा या नहीं लिया हो तो करके देख लेना, दर्पण से रिफ्लेक्ट हुए रोशनियों से आंखें चुंधिया जाती हैं
इसमें दोष सूर्य का नहीं है दोष दर्पण का है जिसने हमारी ओर सूर्य की तीक्ष्ण किरणों को भेजा,
पर चंद्रमा ऐसा नहीं करता चंद्रमा सूर्य की तीक्ष्ण किरणों को सोख लेता है और सौम्या सफेद किरणों को धरती की ओर भेजता है इसलिए चंद्रमा हमें सफेद दिखाई देता है।
अब चंद्रमा केवल सूर्य की ही सफेद किरणों को ही हमारी ओर नहीं भेजता अपितु चंद्रमा के पीछे जो अलग-अलग नक्षत्र है अर्थात तारामंडल का समूह है उनकी किरणों को भी हमारी ओर भेजता है,
शरद पूर्णिमा में चंद्रमा एक विशेष तारामंडल अश्विनी नक्षत्र के सामने होता है।
यह तारामंडल सौंदर्य प्रदान करने वाला स्वर्ण की आभा प्रदान करने वाला नक्षत्र होता है।
इसीलिए इस दिन का अर्थात शरद पूर्णिमा का बड़ा महत्व रहता है,शुद्ध भारतीय देशी गाय के दूध में,देशी दुबराज चावल में शुद्ध देशी मिश्री डालकर इसे चंद्रमा के सामने रखकर फिर खाने का विधान है। इससे पेट के गट्स बैक्टीरिया अर्थात अच्छे वाले जीवाणु बढ़ते है।
शरद पूर्णिमा के किरणों में इस औषधीय महत्व के कारण ही इस पूर्णिमा के बाद ही धान्य वाली फसलों की कटाई गहाई की जाती है।
इसके पश्चात जमीन की जुताई भी की जाती है, कृषि परासर ग्रंथ के अनुसार इस समय में की गई जुताई के बाद की गई बुआई से फसलों से स्वर्ण निकलता है अर्थात इस समय की गई जुताई से अगली फसल स्वर्ण आभा वाली होगी अधिक उपज वाली होगी।
शरद पूर्णिमा में चंद्रमा की इन्हीं जीवनी शक्ति की ऊर्जाओ का उपयोग करने के लिए हमारे पूर्वज आज शरद पूर्णिमा की रात्रि में अपने बीजों को तौलकर चांद की रोशनी में रखते थे दूसरे दिन इन बीजों का पुनः वजन करते थे जिन बीजों का वजन बढ़ जाता था इसकी बुवाई करते थे और जिन बीजों का वजन घट जाता था अगले एक वर्ष उनकी बुवाई नहीं करते थे।
आज की रात आप 100 - 100 ग्राम बीज चांद की रोशनी में छत पर रखे या घर के आंगन में सुरक्षित रखें और दूसरे दिन सुबह 9:00 तक सूर्य की रोशनी दिखाकर फिर इन बीजों को पुनः तौल लें, जिन प्रकार के बीजों का वजन घट जाए उस बीज को अगले 1 वर्ष तक हमें खेती में बुवाई नहीं करना है ऐसे बीजों से इस वर्ष अच्छी फसल नहीं देंगे और जिन बीजों का वजन बढ़ गया है उन बीजों की बुवाई करना इन बीजों से इस वर्ष ज्यादा उत्पादन होगा।
अमावस्या के समय धरती का गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है, गुरुत्वाकर्षण शक्ति अंदर अंतरिक्ष की ऊर्जा धरती के अंदर समाने लगती है,पौधों की जीवनी रस जड़ों में चली जाती है,इसीलिए इस समय हमारे पूर्वज जमीन की जुताई निंदाई गुड़ाई को प्रतिबंधित कर दिए थे,
अमावस्या के आसपास के समय बहुत से कीटों का जन्म होता है,फंगस और वायरस इनका प्रभाव अमावस्या के आसपास पड़ता है इसलिए इस समय पर अपने खेतों के ऊपर अग्निहोत्र बहुत आवश्यक है हो सके तो महामृत्युंजय मंत्रों के साथ घी मिश्रित औषधियों का हवन भी करें ताकि घी और गाय के गोबर के कंडे के जलने से निकली हुई ऊर्जा हमारे खेतों के ऊपर छा जाए ताकि धरती का गुरुत्वाकर्षण से जो अंतरिक्ष की ऊर्जा धरती के अंदर समा रही है वह पॉजिटिव हो जाए उससे कीटों का प्रजनन रुक जाएगा,और कीटों की तितलियां हमारे खेतों में अंडे बच्चे न दे पाएं और अच्छे जीव ही हमारे खेत में रह रहें,तो अगली अमावस्या अर्थात दीपावली की रात्रि अपने घरों में घी का दीपक जलाएं घी की आहुति देकर महामृत्युंजय मंत्र बोलते हुए इस कार्य को संपन्न करें।
बाकी अन्य अमावस्या में जब खेत में फसल खड़ी हो तब अपने खेतों में भी यही प्रक्रिया करें।
शुभम् भवतु
जय श्री कृष्ण
पंचतत्व आरोग्यम
🙏