07/04/2026
*क़दीम देवबंद में ख़वातीन के सफ़र में हया व पर्दा की पासदारी*
*~ मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उस्मानी साहब दामत बरकातुहुम*
उस ज़माने में देवबंद जैसे क़स्बे में खुदकार सवारियों, मसलन मोटर कारों का कोई तसव्वुर नहीं था। जो लोग देवबंद से कभी बाहर नहीं गए थे, उन्होंने शायद मोटर कार देखी भी नहीं होगी। ले-देकर तांगा (घोड़ा गाड़ी) ही एक ऐसी सवारी थी, जिसमें बैठकर क़स्बे के अंदरूनी फासले तय किए जाते थे, और वह भी ज़्यादातर मर्दों के लिए मख़सूस थी।
मुस्लिम ख़वातीन के लिए, बुरक़ा पहनकर भी तांगे में बैठकर कहीं जाना मआयूब (नापसंद) समझा जाता था। अगर बहुत दूर का सफ़र होता और तांगे के बग़ैर जाना मुश्किल होता, तो तांगे के चारों तरफ पर्दा बाँध दिया जाता था, और बुरक़ा-पोश ख़वातीन उसी पर्दे के अंदर बैठती थीं।
वरना एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले जाने के लिए पालकी इस्तेमाल होती थी, जिसे देवबंद की ज़बान में “वली” कहा जाता था। इस डोली को दो आदमी अपने कंधों पर उठाते थे, जिन्हें “कहार” कहा जाता था।
जब किसी ख़ातून को डोली में सफ़र करना होता, तो कहार उसे घर के अंदर रखकर बाहर चले जाते। ख़ातून उसमें बैठ जातीं, और कभी-कभी अपने साथ एक पत्थर भी रख लेती थीं, ताकि जब कहार डोली को उठाएँ, तो उन्हें ख़ातून के जिस्म का सही वज़न मालूम न हो सके।
बाज़ औक़ात छोटे बच्चों को शौक होता था कि वे भी अपनी माँ के साथ इस सवारी का मज़ा लें। ऐसी सूरत में पत्थर रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। चुनांचे जब मेरी वालिदा साहिबा अपने मायके के किसी घर तशरीफ़ ले जातीं, तो मुझे भी अपने साथ बिठा लेती थीं।
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