18/12/2025
🌿कषाय कल्पना एवं महत्व
भैषज्य कल्पना शास्त्र में स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम और फाण्ट ये पाँच कल्पनाएं प्रधान और प्राथमिक हैं। इसी मूलभूत कल्पना से ही अन्य कल्पना की उत्पत्ति होती है। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि इन सभी कल्प निर्माण की आवश्यकता क्या है? इनका सरल उत्तर यही है कि-
👉१. आभ्यंतर स्वरूप- कोई भी द्रव्य अपने मूल स्वरूप में औषधोपयोगार्थ नहीं होती है। औषधि द्रव्यों पर विविध प्रक्रियायें करने के बाद ही उसे उत्कृष्ट गुणों के साथ शरीर के लिए ग्रहणयोग्य बनाते हैं। उदाहरण- किसी द्रव्य का स्वरस जितना कार्य दे सकता है उतना कार्य अन्य कोई कल्प दे नहीं सकता तभी स्वरस उपयुक्त होता है। जब द्रव्य के अंदर के गुणों को अग्नि संयोग से द्रव्य में उबाल कर उन द्रव्यों का क्वाथ बनाकर देते हैं तो उसका कार्य विशेष हो जाता है। इसी विशिष्ट प्रयोजन से अनेकविध कल्पों की आवश्यकता होती है। औषध द्रव्यों का उसी स्वरूप में उपयोग नहीं कर सकते इसीलिए द्रव्य को मर्दन करके, जल के साथ भिगो कर या उबालकर प्रयोगार्थ प्रयुक्त करते हैं।
👉२. अवस्था- द्रव्य की आर्द्रावस्था या शुष्कावस्था में वीर्य का आधिक्य जानकर उसी अवस्था में द्रव्य ग्रहण के साथ उसके किस प्रयोज्य अंग में सबसे अधिक वीर्य है उसी प्रमाण से अनेकविध कल्पनाओं का निर्माण करते हैं। साथ-साथ द्रव्य के पार्थिव, जलीय, तेजस अंश में से किसमें वीर्य अधिक है, यह जानकर कल्प निर्माण करते हैं।
उदाहरणार्थ द्रव्य का वीर्य पार्थिवांश में अधिक होगा तो उसका कल्क या चूर्ण बनाते हैं। जलीय अंश में अधिक है तो स्वरस और वायव्य-तेजस अंश में अधिक है तो फाण्ट या अर्क बनाकर उपयोग करते हैं।
👉३. अहित प्रभाव कम करने के लिए- कोई-कोई द्रव्य में गुणकारक वीर्य के साथ-साथ हानिकारक वीर्य भी होते हैं जिसे दूर करने के लिए क्षीरपाकादि कल्प बनाते हैं। उदाहरणार्थ, रसोन की तीक्ष्णता दूर करने के लिए रसोन क्षीरपाक।
हमारे आर्ष ग्रंथ चरक संहिता में चिकित्सा स्थान अध्याय ३० में विविध कषाय कल्पना के महत्व के बारे में बताया गया है।
सातव्याद् स्वाद्वभावाद्वा पथ्यं द्वेषत्वमागतम्।
कल्पना विधिभिस्तैस्तै: प्रियत्वं गमयेत् पुन:।।
(च.चि. ३०/३३१)
आचार्य चरक ने व्याधि शान्ति के बाद मृदु दोष अनुत्पत्ति के लिए पथ्य का महत्व बताया है।
प्रतिदिन एक ही प्रकार के भोज्य पदार्थ को खाते रहने से कभी-कभी रोगी पुरुष को पथ्य अप्रिय लगने लगता हो या उसे देखते ही रोगी चिढ़ जाता हो तो उसके लिए उसी द्रव्य को पाकविधि की विभिन्नता से तैयार करके इस प्रकार रोगी को दें जिससे उसे वह प्रिय लग सके।
मनसोऽर्थानिकूल्याद्धि तुस्टिरूर्जा रुचिर्बलम्।
सुखोपभोगता च स्याद् व्याधेश्र्चातो बलस्क्षमय्।।
मन के विषय के अनुकूल, आहार-विहार या पथ्य होने के कारण मन में संतोष, ऊर्जा, रुचि (उसे खाने के प्रति इच्छा) शारीरिक बल, सुखोपभोगता (सुख पूर्वक सेवन किया जाना) व्याधि के बल का क्षय होता है।
रोगादि में उक्त औषध के सतत् उपयोग से उस वस्तु के प्रति द्वेषत्व-अरुचि उत्पन्न होती है तभी उसी पथ्यादि से स्वरसादि विविध कल्पना बनाकर उसके द्वारा रोगी में रुचि उत्पन्न करनी चाहिए, जिससे वह सुखसेवनीय होकर प्रियत्वगुण उत्पन्न होने से मन की अनुकूलता होती है। उदाहरण के लिए मूँग की दाल सेवन से रुग्ण में अरुचि उत्पन्न होती है तो मूँग के पापड़ या पूरियाँ बनाकर देना चाहिए क्योंकि मनुष्य स्वभाव निरंतर नया चाहता है, एक ही स्वरूप में औषधि द्रव्य सेवन से अरुचि उत्पन्न होती है।
चरकाचार्य ने एक ही प्रकार के कर्म के लिए अलग-अलग औषधयोग वर्णित किये हैं जैसे कि मध्यरसायन के लिए मंडूकपर्णी स्वरस दूध के साथ, गुडूची स्वरस यष्टीमधुचूर्ण, गुडूचीस्वरस मूल और फल सहित, शंखपुष्पी कल्प देने से एक ही प्रकार के मध्यकर्म प्रयोज्य सिद्ध होता है।
🌳कषाय की परिभाषा-
कण्ठस्य कषणात् प्रायो रोगाणां वाऽपि कर्षणात्।
कषायशब्द: प्राधान्यात् सर्वयोगेषु कल्प्यते।।
(का.सं. श्विल ३/२९)
सेवन के समय कण्ठ में लगने के कारण या अरुचिकर होने के कारण या कण्ठ के लिये अहितकर होने के कारण तथा रोगों का कर्षण करने के कारण सम्पूर्ण योगों में शब्द का प्रयोग होता है।
👉कषायकल्प योनि
लवण रस को छोड़कर मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त कषाय रस वाले द्रव्य स्वरस, कल्क, क्वाथ शीत और फाण्ट इन पाँच प्रकार की कषाय कल्पना के आश्रयभूत हैं। अग्निवेशतंत्र में भी इन रस वाले द्रव्यों से बने हुए कषायकल्प को मधुर कषाय संज्ञाएं दी हैं।
पञ्च कषाय योनय: इति मधुर कषाय: अम्लकषाय: कटुकषाय: तिक्तकषाय: कषायकषायश्चेति तन्त्रे संज्ञा।।
(च.सू. ४/६)
👉लवण रस से स्वरस नहीं निकल सकता, क्योंकि लवण हमेशा सूखा ही प्राप्त होता है। पानी डालने पर लवण जल में घुल जाता है।
👉लवण का कल्क नहीं बना सकते क्योंकि गीले द्रव्य को पीसने से या सूखे द्रव्य को जल मिलाकर पीसने से कल्क बनता है, लवण सदा सूखा ही रहता है और जल मिलाने पर वह द्रव्य रूप ही हो जाता है, यद्यपि चूर्ण को कल्क का ही भेद माना जाता है।
लवण चूर्ण रूप नहीं बना सकते क्योंकि कषाय कल्पना गुणान्तसाधन के लिए की जाती है परन्तु लवण का चूर्ण करने से उसके गुणों में कोई अंतर नहीं आता।
लवण का क्वाथ, हिम, फाण्ट कल्पनायें भी नहीं की जा सकती क्योंकि द्रव्य का सारभाग न्यूनाधिक प्रमाण में जल में लाने तथा शेष किट्ट भाग फेंक देने के लिए उपर्युक्त तीन कल्पनायें की जाती हैं।
परन्तु, लवण सर्वात्मना जल में धुल जाता है और उसका कुछ भी अंश फेंका नहीं जा सकता। अत: शृत, शीत, फाण्ट ये तीन कल्पनायें भी नहीं हो सकतीं।
लवण में पाँच कषाय कल्पना की संभावना न होने से कषायसंज्ञा नहीं कही गयी है।
(च.सू. ४/६ चक्रपाणि)।
पञ्चविधकषायकल्पनामिति तद्यथा- स्वरस:, कल्क:, शृत:, शीत:, फाण्ट: कषाय इति।।
(च.सू. ४/७)
👍गुण तारतम्य-
तेषां यथापूर्व बलाधिक्यम्, अत: कषायकल्पना व्याध्यातुर बलापेक्षिणी, न त्वेवं खलु सर्वाणि सर्वत्रोपयोगीनि भवन्ति।
(च.सू. ४/७)
(साभार - चिकित्सा पल्लव : दिसम्बर 2020)
Dr Amit Gupta (BAMS )
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