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dr Amit gupta Ayurveda expert in neuro spine care

माइग्रेन (आधे सिर का दर्द) – आयुर्वेद के अनुसार कारण व उपचारआयुर्वेद में माइग्रेन को “अर्धावभेदक” कहा गया है। यह मुख्यतः...
27/12/2025

माइग्रेन (आधे सिर का दर्द) – आयुर्वेद के अनुसार कारण व उपचार
आयुर्वेद में माइग्रेन को “अर्धावभेदक” कहा गया है। यह मुख्यतः वात दोष के साथ पित्त दोष के असंतुलन से उत्पन्न होता है। इसलिए इसका उपचार केवल दर्द दबाने से नहीं, बल्कि कारण को ठीक करने से होता है।

🔴 माइग्रेन के प्रमुख कारण (आयुर्वेद अनुसार)
1️⃣ वात दोष वृद्धि
अनियमित दिनचर्या
देर रात जागना
अधिक मोबाइल/स्क्रीन देखना
मानसिक तनाव

2️⃣ पित्त दोष वृद्धि
तीखा, खट्टा, तला-भुना भोजन
धूप, गर्मी
क्रोध, चिड़चिड़ापन

3️⃣ पाचन की गड़बड़ी (अग्निमांद्य)
गैस, कब्ज
समय पर भोजन न करना

4️⃣ हार्मोनल असंतुलन
महिलाओं में पीरियड्स से पहले/बाद दर्द

5️⃣ मानसिक कारण
चिंता, अवसाद, दबा हुआ तनाव
🧠 माइग्रेन के लक्षण
▪️ आधे सिर में तेज दर्द
▪️ उल्टी या मितली
▪️ रोशनी व आवाज से परेशानी
▪️ आंखों में जलन
▪️ चक्कर

🌿 आयुर्वेदिक उपचार (Root Cause Treatment)
✔️ 1. शोधन चिकित्सा (Detox)
नस्य कर्म – नाक के द्वारा औषधि
वमन / विरेचन – दोषों की शुद्धि
(रोगी की प्रकृति अनुसार)

✔️ 2. शमन चिकित्सा
वात-पित्त संतुलक औषधियाँ
मस्तिष्क को शांत करने वाली रसायन चिकित्सा

✔️ 3. आहार (Diet)
हल्का, सुपाच्य भोजन
गर्म, ताजा खाना
ज्यादा तेल, मसाले, फास्ट फूड से परहेज

✔️ 4. विहार (Lifestyle)
नियमित नींद
सुबह का समय पर उठना
योग, प्राणायाम, ध्यान

🧘‍♂️ माइग्रेन में लाभकारी योग
अनुलोम-विलोम
भ्रामरी
शवासन

⚠️ क्या न करें
❌ खाली पेट रहना
❌ बार-बार पेन किलर
❌ देर रात जागना
❌ अत्यधिक चाय-कॉफी
✅ निष्कर्ष (वैद्य की सलाह)
माइग्रेन लाइलाज नहीं है,
लेकिन धैर्य, अनुशासन और सही आयुर्वेदिक उपचार आवश्यक है।
दर्द को नहीं, कारण को ठीक करें — यही आयुर्वेद है।

DrAmit Gupta
Tanav clinic ayu. Neuro spine care centre 9519036026

🌿*सर्दियों में हड्डी व घुटनों का दर्द – कारण व आयुर्वेदिक समाधान*   सर्दियों में बहुत से लोगों को घुटनों का दर्द, जोड़ों...
26/12/2025

🌿*सर्दियों में हड्डी व घुटनों का दर्द – कारण व आयुर्वेदिक समाधान*

सर्दियों में बहुत से लोगों को घुटनों का दर्द, जोड़ों की जकड़न और हड्डियों में पीड़ा बढ़ जाती है। आयुर्वेद के अनुसार यह वात दोष के बढ़ने से होता है।
*कारण*
ठंड में वात दोष का प्रकोप
घुटने की चिकनाहट (स्नेह) कम होना
ऑस्टियोआर्थराइटिस (घुटना घिसना)
सुबह उठते समय अकड़न
अधिक देर बैठना, ठंडे फर्श पर बैठना
कम धूप (Vitamin D की कमी)
*लक्षण*
घुटनों में दर्द व सूजन
चलने में कठिनाई
सुबह उठते ही जकड़न
बैठकर उठते समय दर्द
ठंड लगते ही दर्द बढ़ जाना
* *आयुर्वेदिक उपचार व घरेलू उपाय*
1. तेल मालिश (अभ्यंग)
तिल तेल / महामाष तैल / नारायण तैल
सुबह-शाम गुनगुना कर घुटनों पर मालिश करें
2. स्वेदन
गर्म पानी की बोतल
या पत्र पोटली स्वेद
3. *आयुर्वेदिक औषधियाँ* (चिकित्सक की सलाह से)
महायोगराज गुग्गुलु
लक्षादि गुग्गुलु
अश्वगंधा चूर्ण
दशमूल क्वाथ
4 *पंचकर्म चिकित्सा*
जानु बस्ती
कटि बस्ती
बस्ती कर्म (वात दोष शमन हेतु)
*आहार-विहार*
तिल, गुड़, घी, हल्दी वाला दूध
गुनगुना भोजन
ठंडा पानी, दही, फ्रिज का खाना देर तक ठंड में रहना
*अतिरिक्त जीवन शैली में बदलाव*
रोज़ 20–30 मिनट धूप लें
हल्के योगासन (वज्रासन, पवनमुक्तासन)
सुबह-सुबह ठंड से बचना चाहिए
बड़े बुजुर्गो को मॉर्निंग वॉक पर जाने रोकना चाहिए

🌿 तनव आयुर्वेद न्यूरो स्पाइन क्लिनिक कानपुर
*धन्यवाद*

🌿डायबिटीज़ क्यों बढ़ रही है? डॉक्टर भी जो कम बताते हैंडायबिटीज़ अचानक नहीं होती, यह गलती सालों से हो रही है शुगर बढ़ने का ...
22/12/2025

🌿डायबिटीज़ क्यों बढ़ रही है? डॉक्टर भी जो कम बताते हैं
डायबिटीज़ अचानक नहीं होती, यह गलती सालों से हो रही है
शुगर बढ़ने का असली कारण चीनी नहीं, कुछ और है
डायबिटीज़ क्यों बढ़ रही है? असली कारण

डायबिटीज़ आज हर घर की समस्या बन चुकी है।
यह केवल मीठा खाने से नहीं होती।
गलत जीवनशैली इसका सबसे बड़ा कारण है।
कम चलना और ज्यादा बैठना शुगर बढ़ाता है।
तनाव और नींद की कमी भी बड़ा रोल निभाती है।
पेट की चर्बी डायबिटीज़ को बढ़ावा देती है।
शुरुआत में इसके लक्षण अक्सर नजर नहीं आते।
समझदारी से इसे कंट्रोल किया जा सकता है।

❓ FAQs

1. क्या डायबिटीज़ सिर्फ मीठा खाने से होती है?
नहीं, सफेद आटा, जंक फूड और गलत दिनचर्या भी बड़ा कारण हैं।

2. दुबले व्यक्ति को भी डायबिटीज़ हो सकती है?
हाँ, पेट की अंदरूनी चर्बी से दुबले व्यक्ति भी प्रभावित होते हैं।

3. तनाव से शुगर कैसे बढ़ती है?
तनाव से हार्मोन असंतुलन होता है, जिससे ब्लड शुगर बढ़ती है।

4. क्या डायबिटीज़ पूरी तरह ठीक हो सकती है?
शुरुआती अवस्था में सही जीवनशैली से कंट्रोल संभव है।

5. बार-बार खाने से शुगर क्यों बढ़ती है?
इससे इंसुलिन को आराम नहीं मिलता और रेसिस्टेंस बढ़ता है।
🥼Dr Amit Gupta
Bams Ayurveda physician
Neuro spine specialist with panchkarma
Tanav clinic ayu. Neuro spine care centre 9519036026

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सुबह उठते ही यदि शरीर में कसाव, जकड़न या भारीपन लगे, तो हल्की स्ट्रेचिंग करना अत्यंत लाभकारी है।बताए गए मुख्य लाभ - ✅मां...
21/12/2025

सुबह उठते ही यदि शरीर में कसाव, जकड़न या भारीपन लगे, तो हल्की स्ट्रेचिंग करना अत्यंत लाभकारी है।

बताए गए मुख्य लाभ -

✅मांसपेशियाँ सक्रिय होती हैं

✅शरीर का जकड़ाव कम होता है

✅दर्द में राहत मिलती है

✅रक्त संचार बेहतर होता है

✅ऊर्जा (Energy) बढ़ती है

✅पूरे दिन ताजगी बनी रहती है।

बताए गए 5 स्ट्रेचिंग व्यायाम (संक्षेप में)

1️⃣ पहला व्यायाम

सीधे खड़े होकर हाथ ऊपर उठाकर आगे झुकना
➡️ रीढ़ (Spine) + पीठ + हैमस्ट्रिंग के लिए लाभकारी

2️⃣ दूसरा व्यायाम

हाथ ऊपर ले जाकर धीरे-धीरे आगे झुकना
➡️ कमर की जकड़न और पीठ दर्द में लाभ

3️⃣ तीसरा व्यायाम

दोनों हाथ फैलाकर आगे-पीछे घुमाना
➡️ कंधे, गर्दन और हाथों की नसों के लिए अच्छा

4️⃣ चौथा व्यायाम

हाथ कमर पर रखकर कमर को दाएँ–बाएँ घुमाना
➡️ कटि प्रदेश (Lumbar region) को मजबूत करता है

5️⃣ पाँचवाँ व्यायाम

एक पैर आगे, दूसरा पीछे रखकर हल्का झुकाव
➡️ जांघ, घुटने, कमर और संतुलन में सुधार

⚠️ सावधानियाँ

झटके से न करें स्ट्रेचिंग

दर्द की सीमा में ही करें

बुजुर्ग, स्लिप डिस्क, घुटना दर्द वाले लोग डॉक्टर की सलाह से करें।

Source - मधुरिमा

वात पित्त कफ: अपनी आयुर्वेदिक प्रकृति जानें | स्वस्थ भारत आयुर्वेद के अनुसार हर व्यक्ति की एक विशेष शरीर प्रकृति होती है...
20/12/2025

वात पित्त कफ: अपनी आयुर्वेदिक प्रकृति जानें | स्वस्थ भारत

आयुर्वेद के अनुसार हर व्यक्ति की एक विशेष शरीर प्रकृति होती है — वात, पित्त या कफ।
यह प्रकृति हमारे शरीर की बनावट, सोच, पाचन, ऊर्जा स्तर और रोगों की प्रवृत्ति को प्रभावित करती है।

इस पोस्ट में बताया गया है:
🔹 वात, पित्त और कफ प्रकृति की पहचान कैसे करें
🔹 प्रत्येक प्रकृति के स्वभाव और सामान्य लक्षण
🔹 किस प्रकृति में कौन-सा आहार अधिक उपयुक्त माना जाता है
🔹 किन खाद्य पदार्थों और आदतों से बचना चाहिए
🔹 बेहतर स्वास्थ्य के लिए किस तरह का व्यायाम सहायक हो सकता है

👉 अपनी प्रकृति को समझकर सही आहार और जीवनशैली अपनाने से स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने में मदद मिलती है।

⚠️ ध्यान दें:
यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में व्यक्तिगत सलाह के लिए योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ या डॉक्टर से परामर्श करें।

स्वस्थ रहें, सही जानकारी अपनाएँ 🌿
🥼Dr. DrAmit Gupta
Ayurveda physician
Tanav clinic ayu. Neuro spine care centre 9519036026






संपूर्ण स्वास्थ्य केवल दवा से नहीं, सही पोषण से बनता हैआज की तेज़ ज़िंदगी में थकान, चिड़चिड़ापन, कमजोरी, बाल झड़ना, मुंह...
20/12/2025

संपूर्ण स्वास्थ्य केवल दवा से नहीं, सही पोषण से बनता है

आज की तेज़ ज़िंदगी में थकान, चिड़चिड़ापन, कमजोरी, बाल झड़ना, मुंह में छाले, याददाश्त कम होना या बार-बार बीमार पड़ना—
अक्सर हम इन्हें छोटी समस्या मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

लेकिन शरीर संकेत देता है कि कहीं न कहीं पोषण की कमी है, विशेषकर विटामिन B-कॉम्प्लेक्स की।

🔹 विटामिन B समूह
• ऊर्जा बढ़ाने में सहायक
• नसों और दिमाग़ को मजबूत करता है
• पाचन और भूख सुधारता है
• त्वचा, बाल और आँखों के स्वास्थ्य में उपयोगी
• थकान और मानसिक तनाव कम करने में मददगार

🪔 आयुर्वेद की दृष्टि से
जब अग्नि (पाचन शक्ति) कमजोर होती है, तो शरीर सही पोषण नहीं ले पाता।
इसलिए केवल सप्लीमेंट नहीं,
आहार + दिनचर्या + पाचन सुधार— तीनों का संतुलन आवश्यक है।

👉 याद रखें—
दवा तभी सही काम करती है,
जब शरीर उसे स्वीकार करने की क्षमता रखता हो।

स्वस्थ रहने के लिए
✔️ संतुलित आहार लें
✔️ समय पर भोजन करें
✔️ शरीर के संकेतों को समझें
✔️ आवश्यकता हो तो चिकित्सकीय सलाह लें

स्वास्थ्य एक दिन में नहीं बिगड़ता,
और न ही एक दिन में बनता है।

---

🥼Dr.Amit Kumar Gupta
Ayurvedic Physician
Tanav Ayurveda kanpur

18/12/2025

🌿कषाय कल्पना एवं महत्व

भैषज्य कल्पना शास्त्र में स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम और फाण्ट ये पाँच कल्पनाएं प्रधान और प्राथमिक हैं। इसी मूलभूत कल्पना से ही अन्य कल्पना की उत्पत्ति होती है। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि इन सभी कल्प निर्माण की आवश्यकता क्या है? इनका सरल उत्तर यही है कि-

👉१. आभ्यंतर स्वरूप- कोई भी द्रव्य अपने मूल स्वरूप में औषधोपयोगार्थ नहीं होती है। औषधि द्रव्यों पर विविध प्रक्रियायें करने के बाद ही उसे उत्कृष्ट गुणों के साथ शरीर के लिए ग्रहणयोग्य बनाते हैं। उदाहरण- किसी द्रव्य का स्वरस जितना कार्य दे सकता है उतना कार्य अन्य कोई कल्प दे नहीं सकता तभी स्वरस उपयुक्त होता है। जब द्रव्य के अंदर के गुणों को अग्नि संयोग से द्रव्य में उबाल कर उन द्रव्यों का क्वाथ बनाकर देते हैं तो उसका कार्य विशेष हो जाता है। इसी विशिष्ट प्रयोजन से अनेकविध कल्पों की आवश्यकता होती है। औषध द्रव्यों का उसी स्वरूप में उपयोग नहीं कर सकते इसीलिए द्रव्य को मर्दन करके, जल के साथ भिगो कर या उबालकर प्रयोगार्थ प्रयुक्त करते हैं।

👉२. अवस्था- द्रव्य की आर्द्रावस्था या शुष्कावस्था में वीर्य का आधिक्य जानकर उसी अवस्था में द्रव्य ग्रहण के साथ उसके किस प्रयोज्य अंग में सबसे अधिक वीर्य है उसी प्रमाण से अनेकविध कल्पनाओं का निर्माण करते हैं। साथ-साथ द्रव्य के पार्थिव, जलीय, तेजस अंश में से किसमें वीर्य अधिक है, यह जानकर कल्प निर्माण करते हैं।

उदाहरणार्थ द्रव्य का वीर्य पार्थिवांश में अधिक होगा तो उसका कल्क या चूर्ण बनाते हैं। जलीय अंश में अधिक है तो स्वरस और वायव्य-तेजस अंश में अधिक है तो फाण्ट या अर्क बनाकर उपयोग करते हैं।

👉३. अहित प्रभाव कम करने के लिए- कोई-कोई द्रव्य में गुणकारक वीर्य के साथ-साथ हानिकारक वीर्य भी होते हैं जिसे दूर करने के लिए क्षीरपाकादि कल्प बनाते हैं। उदाहरणार्थ, रसोन की तीक्ष्णता दूर करने के लिए रसोन क्षीरपाक।

हमारे आर्ष ग्रंथ चरक संहिता में चिकित्सा स्थान अध्याय ३० में विविध कषाय कल्पना के महत्व के बारे में बताया गया है।
सातव्याद् स्वाद्वभावाद्वा पथ्यं द्वेषत्वमागतम्।
कल्पना विधिभिस्तैस्तै: प्रियत्वं गमयेत् पुन:।।
(च.चि. ३०/३३१)
आचार्य चरक ने व्याधि शान्ति के बाद मृदु दोष अनुत्पत्ति के लिए पथ्य का महत्व बताया है।

प्रतिदिन एक ही प्रकार के भोज्य पदार्थ को खाते रहने से कभी-कभी रोगी पुरुष को पथ्य अप्रिय लगने लगता हो या उसे देखते ही रोगी चिढ़ जाता हो तो उसके लिए उसी द्रव्य को पाकविधि की विभिन्नता से तैयार करके इस प्रकार रोगी को दें जिससे उसे वह प्रिय लग सके।
मनसोऽर्थानिकूल्याद्धि तुस्टिरूर्जा रुचिर्बलम्।
सुखोपभोगता च स्याद् व्याधेश्र्चातो बलस्क्षमय्।।

मन के विषय के अनुकूल, आहार-विहार या पथ्य होने के कारण मन में संतोष, ऊर्जा, रुचि (उसे खाने के प्रति इच्छा) शारीरिक बल, सुखोपभोगता (सुख पूर्वक सेवन किया जाना) व्याधि के बल का क्षय होता है।

रोगादि में उक्त औषध के सतत् उपयोग से उस वस्तु के प्रति द्वेषत्व-अरुचि उत्पन्न होती है तभी उसी पथ्यादि से स्वरसादि विविध कल्पना बनाकर उसके द्वारा रोगी में रुचि उत्पन्न करनी चाहिए, जिससे वह सुखसेवनीय होकर प्रियत्वगुण उत्पन्न होने से मन की अनुकूलता होती है। उदाहरण के लिए मूँग की दाल सेवन से रुग्ण में अरुचि उत्पन्न होती है तो मूँग के पापड़ या पूरियाँ बनाकर देना चाहिए क्योंकि मनुष्य स्वभाव निरंतर नया चाहता है, एक ही स्वरूप में औषधि द्रव्य सेवन से अरुचि उत्पन्न होती है।

चरकाचार्य ने एक ही प्रकार के कर्म के लिए अलग-अलग औषधयोग वर्णित किये हैं जैसे कि मध्यरसायन के लिए मंडूकपर्णी स्वरस दूध के साथ, गुडूची स्वरस यष्टीमधुचूर्ण, गुडूचीस्वरस मूल और फल सहित, शंखपुष्पी कल्प देने से एक ही प्रकार के मध्यकर्म प्रयोज्य सिद्ध होता है।

🌳कषाय की परिभाषा-
कण्ठस्य कषणात् प्रायो रोगाणां वाऽपि कर्षणात्।
कषायशब्द: प्राधान्यात् सर्वयोगेषु कल्प्यते।।
(का.सं. श्विल ३/२९)
सेवन के समय कण्ठ में लगने के कारण या अरुचिकर होने के कारण या कण्ठ के लिये अहितकर होने के कारण तथा रोगों का कर्षण करने के कारण सम्पूर्ण योगों में शब्द का प्रयोग होता है।

👉कषायकल्प योनि
लवण रस को छोड़कर मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त कषाय रस वाले द्रव्य स्वरस, कल्क, क्वाथ शीत और फाण्ट इन पाँच प्रकार की कषाय कल्पना के आश्रयभूत हैं। अग्निवेशतंत्र में भी इन रस वाले द्रव्यों से बने हुए कषायकल्प को मधुर कषाय संज्ञाएं दी हैं।
पञ्च कषाय योनय: इति मधुर कषाय: अम्लकषाय: कटुकषाय: तिक्तकषाय: कषायकषायश्चेति तन्त्रे संज्ञा।।
(च.सू. ४/६)

👉लवण रस से स्वरस नहीं निकल सकता, क्योंकि लवण हमेशा सूखा ही प्राप्त होता है। पानी डालने पर लवण जल में घुल जाता है।

👉लवण का कल्क नहीं बना सकते क्योंकि गीले द्रव्य को पीसने से या सूखे द्रव्य को जल मिलाकर पीसने से कल्क बनता है, लवण सदा सूखा ही रहता है और जल मिलाने पर वह द्रव्य रूप ही हो जाता है, यद्यपि चूर्ण को कल्क का ही भेद माना जाता है।

लवण चूर्ण रूप नहीं बना सकते क्योंकि कषाय कल्पना गुणान्तसाधन के लिए की जाती है परन्तु लवण का चूर्ण करने से उसके गुणों में कोई अंतर नहीं आता।

लवण का क्वाथ, हिम, फाण्ट कल्पनायें भी नहीं की जा सकती क्योंकि द्रव्य का सारभाग न्यूनाधिक प्रमाण में जल में लाने तथा शेष किट्ट भाग फेंक देने के लिए उपर्युक्त तीन कल्पनायें की जाती हैं।

परन्तु, लवण सर्वात्मना जल में धुल जाता है और उसका कुछ भी अंश फेंका नहीं जा सकता। अत: शृत, शीत, फाण्ट ये तीन कल्पनायें भी नहीं हो सकतीं।

लवण में पाँच कषाय कल्पना की संभावना न होने से कषायसंज्ञा नहीं कही गयी है।
(च.सू. ४/६ चक्रपाणि)।
पञ्चविधकषायकल्पनामिति तद्यथा- स्वरस:, कल्क:, शृत:, शीत:, फाण्ट: कषाय इति।।
(च.सू. ४/७)

👍गुण तारतम्य-
तेषां यथापूर्व बलाधिक्यम्, अत: कषायकल्पना व्याध्यातुर बलापेक्षिणी, न त्वेवं खलु सर्वाणि सर्वत्रोपयोगीनि भवन्ति।
(च.सू. ४/७)

(साभार - चिकित्सा पल्लव : दिसम्बर 2020)

Dr Amit Gupta (BAMS )
Ayurveda मर्म चिकित्सक Tanav clinic ayu. Neuro spine care centre 9519036026

14/12/2025

🌿आँवला (आमलकी) – गुण और चिकित्सा उपयोग (आयुर्वेद में)

🌿आँवला का वानस्पतिक नाम Emblica officinalis / Phyllanthus emblica है। 👉आयुर्वेद में इसे रसायन माना गया है, यानी यह शरीर को पुनर्जीवित करने वाला फल है।

👉1. आयुर्वेदिक गुण (Properties)
👉रस (Taste):अम्ल (मुख्य)

मधुर, कषाय, तिक्त, कटु (अन्य पाँच रसों का भी समावेश)

👉गुण:लघु (हल्का)

रूक्ष (सूखापन)

👉वीर्य:शीत (ठंडा)

👉विपाक:मधुर

🌿दोषों पर प्रभाव:

त्रिदोषशामक – विशेष रूप से पित्त को शांत करता है

वात और कफ को संतुलित करता है

2. औषधीय (चिकित्सीय) उपयोग
🌳1. पाचन तंत्र के लिए
अग्नि को प्रदीप्त करता है

कब्ज, अम्लपित्त और अपच में लाभकारी

आँतों को मजबूत करता है

🌳2. प्रतिरक्षा शक्ति (इम्युनिटी)
विटामिन C से भरपूर

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है

बार-बार सर्दी–जुकाम में उपयोगी

🌳3. त्वचा रोगों में
मुहाँसे, दाग-धब्बे और झुर्रियों में लाभ

त्वचा को चमकदार बनाता है

रक्त शुद्धि में सहायक

🌳4. बालों के लिए
बालों का झड़ना कम करता है

समय से पहले सफेद बाल रोकने में सहायक

बालों को मजबूत और घना बनाता है

🌳5. आँखों के लिए
दृष्टि को तेज करता है

आँखों की जलन और थकान में लाभ

6. मधुमेह (डायबिटीज)
रक्त शर्करा को संतुलित रखने में सहायक

अग्न्याशय (Pancreas) को मजबूत करता है

7. हृदय स्वास्थ्य
कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक

हृदय को बल देता है

🍁3. प्रमुख आयुर्वेदिक योग
च्यवनप्राश – बल, स्मरण शक्ति और प्रतिरक्षा बढ़ाने हेतु

त्रिफला – आँवला, हरड़, बहेड़ा (पाचन और नेत्र स्वास्थ्य के लिए)

आँवला रस / चूर्ण – सामान्य स्वास्थ्य हेतु

4. सेवन विधि (सामान्य जानकारी)
ताजा फल, रस, चूर्ण, मुरब्बा या अवलेह के रूप में

नियमित और सीमित मात्रा में सेवन श्रेष्ठ माना गया है

⚠️ नोट: किसी गंभीर रोग, गर्भावस्था या दवा के साथ सेवन से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह आवश्यक है
DrAmit Gupta ( BAMS)

Tanav clinic ayu. Neuro spine care centre 9519036026

एसिड रिफ्लक्स का घरेलू इलाज | Acid Reflux Treatment | Pet Ki Jalan Ka Desi Ilaaj:👉Description :बार-बार खट्टी डकारें आना,...
13/12/2025

एसिड रिफ्लक्स का घरेलू इलाज | Acid Reflux Treatment | Pet Ki Jalan Ka Desi Ilaaj:

👉Description :
बार-बार खट्टी डकारें आना, सीने में जलन, पेट में भारीपन और गले में कड़वाहट—ये सब एसिड रिफ्लक्स के साफ संकेत हैं।
जब पेट का एसिड ऊपर चला जाता है तो खाना पचना बंद हो जाता है और पूरा सीना आग की तरह जलने लगता है।
अच्छी बात यह है कि कुछ आसान घरेलू उपाय इसे तेजी से शांत कर देते हैं।

एसिड रिफ्लक्स कम करने के लिए असरदार देसी उपाय—

• 1 गिलास गुनगुने पानी में 1 चम्मच सौंफ उबालकर दिन में 2 बार पिएं
• खाली पेट 1 चम्मच मुलैठी चूर्ण गुनगुने पानी के साथ
• 1 चम्मच अजवाइन + थोड़ा सा काला नमक चबाकर खाएं
• 1 गिलास ठंडा दूध सीने की जलन तुरंत कम करता है
• रात को सोते समय भारी और तली–भुनी चीजों से दूर रहें
• खाना हमेशा कम मात्रा में और 3–4 घंटे के गैप से खाएं
• दिन में 8–10 गिलास पानी पिएं ताकि एसिड कंट्रोल रहे

इन उपायों को नियमित करने से एसिड रिफ्लक्स, गैस, जलन और खट्टी डकारें कम होने लगती हैं।
👉 आयुर्वेद में इस बीमारी का इलाज पूर्ण रूप से संभव है, आपको रोज खाली पेट कैप्सूल खाने की जरूरत नही पड़ेगी।।
👉 Dr.amit gupta
👉Call/whatsaap: 095190 36026

Stop believing that knee pain is something you just have to live with! Your age does not mean you have to be in pain.The...
27/11/2025

Stop believing that knee pain is something you just have to live with! Your age does not mean you have to be in pain.

The truth is, early intervention and proper care are key to maintaining strong, healthy knees for years to come. We specialize in finding solutions that work.

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02/08/2025

पंचकर्म का शाब्दिक अर्थ:

"पंच" = पाँच
"कर्म" = क्रियाएँ या प्रक्रियाएँ

> 👉 इसलिए पंचकर्म का अर्थ है पाँच प्रमुख शोधन प्रक्रियाएँ जो शरीर को भीतर से शुद्ध करती हैं।

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🔷 पंचकर्म की 5 मुख्य प्रक्रियाएँ:

1. वमन (Vamana) – चिकित्सित वमन / औषधि द्वारा उल्टी कराना

उद्देश्य: कफ दोष को शरीर से बाहर निकालना।

लाभ: अस्थमा, एलर्जी, त्वचा रोग, मोटापा, साइनस आदि में लाभदायक।

प्रक्रिया: विशेष औषधियों का सेवन कराकर उल्टी कराई जाती है जिससे कफ का शोधन होता है---

2. विरेचन (Virechana) – औषधीय रेचक (Purgation Therapy)

उद्देश्य: पित्त दोष की शुद्धि।

लाभ: लीवर रोग, एसिडिटी, पित्ताशय की समस्याएँ, दाद, फोड़े-फुंसी आदि।

प्रक्रिया: विशेष औषधियों से दस्त लाकर शरीर से पित्त बाहर निकाला जाता है।-

3. बस्ती (Basti) – औषधीय एनीमा / एनिमा चिकित्सा

उद्देश्य: वात दोष का शमन और शोधन।

लाभ: गठिया, कब्ज, लकवा, पीठ दर्द, अनावृत्त वात रोग आदि में अत्यंत उपयोगी।

प्रकार:

अनुवासन बस्ती: तेलीय पदार्थों से।

निर्हार बस्ती: काढ़ा या क्वाथ आधारित।---

4. नस्य (Nasya) – नाक द्वारा औषधि डालना

उद्देश्य: सिर, मस्तिष्क और साइनस क्षेत्र की शुद्धि।

लाभ: साइनस, सिरदर्द, अनिद्रा, बाल झड़ना, चेहरे की त्वचा रोग आदि।

प्रक्रिया: नाक में औषधीय तेल या रस डालकर सिर की शुद्धि की जाती है।--

5. रक्तमोक्षण (Raktamokshana) – रक्त शुद्धि प्रक्रिया

उद्देश्य: दूषित रक्त का निष्कासन।

लाभ: त्वचा रोग, रक्तविकार, फोड़े-फुंसी, पित्तजन्य विकारों में लाभकारी।

प्रकार:

सुई द्वारा (सिरा वेध)

लीच (जोंक) द्वारा

श्रृंग / सींग द्वारा
---

🌿 पंचकर्म के पूर्व-प्रक्रियाएँ (Purvakarma):

मुख्य पंचकर्म से पहले शरीर को तैयार करने के लिए निम्न क्रियाएँ की जाती हैं:

1. स्नेहन (Snehana) – आंतरिक व बाहरी तेल सेवन / अभ्यंग (तेल मालिश)

शरीर को चिकनाई देना ताकि दोष ढीले होकर बाहर निकले।

2. स्वेदन (Swedana) – पसीना लाना / स्टीम थैरेपी

शरीर को गर्म करके छिद्र खोलना ताकि दोष बहार निकलें।---

🧘‍♂️ पंचकर्म के लाभ:

शरीर का गहराई से शुद्धिकरण

रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि

वजन नियंत्रण

मानसिक तनाव से मुक्ति

त्वचा रोगों में लाभ

पाचन तंत्र में सुधार

वात, पित्त, कफ संतुलन---

⚠️ पंचकर्म कराने से पहले ध्यान दें:

योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ की देखरेख में ही कराएँ

शरीर और रोग की प्रकृति के अनुसार उपचार का चयन हो

विश्राम व सात्विक आहार का पालन आवश्यक

पंचकर्म के बाद पश्चात कर्म (डाइट कंट्रोल, जीवनशैली सुधार) का पालन जरूरी

🔥 1. अग्नि कर्म (Agni Karma)

अर्थ: दर्द निवारण के लिए सटीक गर्मी चिकित्सा।
विवरण: विशेष धातु को आग में गर्म करके शरीर के प्रभावित हिस्से पर लगाया जाता है। यह जकड़न, गठिया, पुराने दर्द, पीठदर्द आदि में उपयोगी होता है।
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🩸 2. विद्ध कर्म (Viddha Karma)

अर्थ: पुराने रोगों के लिए प्रभावशाली रक्तस्राव चिकित्सा।
विवरण: विशेष सूई या उपकरण से शरीर के विशेष बिंदु पर चुभन देकर दूषित रक्त बाहर निकाला जाता है।
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🫙 3. कपिंग थेरेपी (Cupping Therapy)

अर्थ: विषहरण एवं मांसपेशियों की जकड़न से राहत।
विवरण: कांच के कप या ग्लास से त्वचा पर वैक्यूम बनाकर रक्तसंचार बढ़ाया जाता है।
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🩸 4. रक्तमोक्षण (Raktamokshana)

अर्थ: विशेष तकनीकों द्वारा रक्त शुद्धिकरण।
विवरण: यह पद्धति त्वचा से दूषित रक्त निकालने में सहायक है और त्वचा रोग, रक्तविकार आदि में लाभदायक है।---

🪱 5. लीच थेरेपी (Leech Therapy)

अर्थ: आधुनिक लाभों के साथ प्राचीन विषहरण प्रक्रिया।
विवरण: जोंक द्वारा दूषित रक्त को चूसा जाता है। यह त्वचा रोग, जोड़ों के दर्द और सूजन में अत्यंत प्रभावी है।
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💉 6. सिरा वेध चिकित्सा (Sira Vedh Chikitsa)

अर्थ: सटीक नस छेदन चिकित्सा।
विवरण: आयुर्वेद की एक विशेष रक्तमोक्षण पद्धति जिसमें नसों में चुभन द्वारा दूषित रक्त निकाला जाता है।
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🌿 7. पोटली चिकित्सा (Potali Chikitsa)

अर्थ: गहरी ऊतक चिकित्सा हेतु हर्बल सेक।
विवरण: गर्म औषधीय पोटली से शरीर पर सेंक देने से सूजन, दर्द, तनाव में राहत मिलती है।---

🦴 8. संधि सन्धान चिकित्सा (Sandhi Sandhan Chikitsa - Chiropractic)

अर्थ: जोड़ों का संतुलन व सुधार।
विवरण: हड्डियों व जोड़ों को हाथों से धीरे-धीरे उनकी सही स्थिति में लाना। यह स्पाइन, गर्दन व पीठ दर्द में उपयोगी है।---

🪔 9. अभ्यंग (Abhyanga)

अर्थ: समग्र स्वास्थ्य के लिए औषधीय तेल मालिश।
विवरण: पूरे शरीर पर गरम औषधीय तेल से मालिश करके रक्तसंचार, त्वचा की चमक व मानसिक शांति प्राप्त होती है।---

👂 10. कर्ण वेधन (Karn Bhedan)

अर्थ: आयुर्वेदिक कान छेदन चिकित्सा।
विवरण: नाड़ियों के संतुलन हेतु विशेष बिंदु पर कान छेदना। यह बच्चों के मानसिक विकास के लिए उपयोगी माना गया है।---

🛢️ 11. एक्सटर्नल वस्ति (External Vasti)

अर्थ: स्थानीय तेल चिकित्सा से दर्द निवारण।
विवरण: विशेष अंग (जैसे कमर, गर्दन, घुटने) पर आटा से बनी दीवार बनाकर गरम औषधीय तेल डालते हैं।
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💫 12. मर्म चिकित्सा (Marma Chikitsa)

अर्थ: ऊर्जा बिंदु सक्रियण द्वारा उपचार।
विवरण: शरीर के 107 मर्म बिंदुओं पर हल्के दबाव व स्पर्श से रोग उपचार किया जाता है।

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