Dr.Shiv Soni

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24/11/2020

*याददास्त कमजोर होना*

लगभग एक कप आम का रस, एक चम्मच अदरक का रस और चौथाई कप दूध में स्वादानुसार चीनी मिलाकर रोजाना पीने से दिमाग की याददास्त मजबूत होती है। दिमाग की कमजोरी के कारण होने वाला सिर का दर्द भी दूर हो जाता है।

25/10/2020

*बेचैनी और घबराहट दूर करने के उपाय*

लैवेंडर ऑयल की खुशबू से बेचैनी और घबराहट दूर होती है। यदि किसी व्यक्ति को अचानक से बेचैनी होने लगे या किसी कारणवश घबराहट शुरू हो जाए तो उसे लैवेंडर ऑयल को सूंघना चाहिए। लैंवेंडर ऑयल में एंटी एंग्जायटी गुण पाया जाता है जो बेचैनी दूर करने में दवा की तरह कार्य करता है। कुछ मामलों में यह बहुत कम समय में ही बेचैनी और घबराहट को पूरी तरह से दूर कर देता है। गुनगुने पानी में इप्सम साल्ट मिलाकर नहाने से बेचैनी दूर हो जाती है। यह शरीर के तामपान को बढ़ाता है और मस्तिष्क को शांत रखने में मदद करता है। इप्सम साल्ट में मैग्नीशियम सल्फेट पाया जाता है जो ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रिक करता है एवं बेचैनी और घबराहट को बढ़ने नहीं देता है। यदि किसी व्यक्ति को बेचैनी हो तो उसे यह समस्या दूर करने के लिए इप्सम साल्ट पानी में मिलाकर तत्काल नहाना चाहिए।

16/04/2020

पेट के भीतरी भाग वेष्टन में जलन होने के कारण दर्द (Parrynaitis)

पेट के भीतरी भाग वेष्टन में जलन होने के कारण दर्द (Parrynaitis) परिचय:- इस रोग के कारण पेट के भीतरी भाग में जलन होने लगती है जिसके कारण पेट में दर्द होता है। इस रोग को पैरीनाईटिस भी कहते हैं। पैरीनाईटिस रोग होने का कारण- पैरीनाईटिस रोग कई प्रकार के रोगों के हो जाने के कारण होता है जैसे- पेचिश, कैंसर, तथा टायफाइड आदि। इन रोगों के कारण पेट के भीतरी भाग वेष्टन की झिल्ली में विजातीय द्रव्य जमा हो जाता है जिसके कारण वहां पर घाव बन जाता है। इसी कारण से पेट के वेष्टन भाग में जलन तथा दर्द होने लगता है। ज्यादा हिलने-डुलने पर यह दर्द और भी तेज हो जाता है। पैरीनाईटिस रोग होने के लक्षण- इस रोग के कारण रोगी के पेट में तेज दर्द होता है तथा उसका पेट फूलकर काठ (लकड़ी) के समान कठोर हो जाता है। इस रोग के कारण रोगी को अधिक प्यास लगती है और उल्टियां भी होने लगती हैं और रोगी के शरीर से ठंडा पसीना निकलने लगता है। पैरीनाईटिस रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार- पैरीनाईटिस रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को शहद मिले गुनगुने पानी का एनिमा दिन में 2 बार देना चाहिए। इस क्रिया को कम से कम 4-5 दिनों तक करना चाहिए। एनिमा देने के लगभग 20 मिनट के बाद रोगी के पेट पर भाप देनी चाहिए। इसके बाद 1 घण्टे के लिए उसके पेट पर ठंडी पट्टी लगानी चाहिए तथा दिन में 2 बार रोगी को तौलिया स्नान कराना चाहिए तथा सप्ताह में 1 बार एप्सम साल्ट बाथ कराना चाहिए। रात के समय में रोगी व्यक्ति के पेट पर गीली पट्टी या कमर की गीली पट्टी लगानी चाहिए। जब तक रोगी का रोग ठीक न हो जाए तब तक रोगी को नींबू का रस मिला हुआ पानी पिलाना चाहिए तथा इसके बाद रोगी को धीरे-धीरे सादा भोजन करना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने से रोगी का पैरीनाईटिस रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।

13/04/2020

गर्दन का दर्द (cervical spondylosis)


परिचय:-

हमारे शरीर में रीढ़ की हड्डी में कुल मिलाकर 33 कशेरुकाएं होती हैं जिसमें 7 कशेरुकाएं गर्दन से सम्बन्धित होती हैं। इन कशेरुकाओं को सरवाइकल वर्टिबा कहते हैं। इन कशेरुकाओं से निकली वातनाड़ियां मस्तिष्क, आंख, नाक, कान, माथा, मुंह, दांत, तालु, जीभ, थाइरायड ग्रंथि तथा कुहनियों का संचालन करती हैं। इसलिए यदि गर्दन में कोई रोग हो जाता है तो इसका प्रभाव शरीर के सभी अंगों पर भी पड़ता है।

गर्दन में दर्द होने के लक्षण-

इस रोग के हो जाने पर गर्दन में अकड़न व दर्द होना शुरू हो जाता है। कुछ समय बाद गर्दन में धीरे-धीरे दर्द तथा अकड़न बढ़ती जाती है। इस रोग के कारण दर्द कभी कंधे व सिर व दोनों बाजुओं में शुरू हो जाता है। इस रोग के कारण रोगी की एक या दोनों बाजुओं में सुन्नता होने लगती है। जिसके कारण रोगी को सब्जी काटने या लिखने से कठिनाई महसूस होती है, सिर में चक्कर भी आने लगते हैं, हाथ पैरों की पकड़ कमजोर पड़ जाती है तथा गर्दन को इधर-उधर घुमाने में परेशानी होने लगती है। इस रोग के कारण रोगी को बेचैनी जैसी समस्याएं भी होने लगती हैं।

गर्दन में दर्द होने के कारण-

अपने भोजन में तली-भुनी, ठण्डी-बासी या मसालेदार पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण भी गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।
गर्दन में दर्द गलत तरीके से बैठने या खड़े रहने से भी हो जाता है जैसे-खड़े रहना या कूबड़ निकालकर बैठना।
भोजन में खनिज लवण तथा विटामिनों की कमी रहने के कारण भी गर्दन में दर्द की समस्या हो सकती है।
कब्ज बनने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
पाचनशक्ति में गड़बड़ी हो जाने के कारण गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।
अधिक चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, शोक या मानसिक तनाव की वजह से भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
किसी दुर्घटना आदि में किसी प्रकार से गर्दन पर चोट लग जाने के कारण भी गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।
अधिक शारीरिक कार्य करने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।
मोटे गद्दे तथा नर्म गद्दे पर सोने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।
गर्दन का अधिक कार्यो में इस्तेमाल करने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।
अधिक देर तक झुककर कार्य करने से गर्दन में दर्द हो सकता है।
व्यायाम न करने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
अधिक दवाइयों का सेवन करने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
शारीरिक कार्य न करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
चिंता, क्रोध, मानसिक तनाव, ईर्ष्या तथा शोक आदि के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
किसी दुर्घटना में गर्दन पर चोट लगने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
गर्दन के दर्द को प्राकृतिक चिकित्सा से ठीक करने के लिए उपचार-

गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सबसे पहले रोगी के गलत खान-पान के तरीकों को दूर करना चाहिए और फिर रोगी का उपचार करना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को हमेशा पौष्टिक भोजन करना चाहिए। रोगी को अपने भोजन में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम का बहुत अधिक प्रयोग करना चाहिए ताकि हडि्डयों का विकास सही तरीके से हो सके और हडि्डयों में कोई रोग पैदा न हो सके।
शरीर में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम मात्रा को बनाये रखने के लिए व्यक्ति को अपने भोजन में गाजर, नीबू, आंवला, मेथी, टमाटर, मूली आदि सब्जियों का अधिक सेवन करना चाहिए। फलों में रोगी को संतरा, सेब, अंगूर, पपीता, मौसमी तथा चीकू का सेवन अधिक करना चाहिए।
गर्दन में दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चोकरयुक्त रोटी व अंकुरित खाना देने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के ही एक भाग जल चिकित्सा का सहारा लिया जा सकता है। इस उपचार के द्वारा रोगी को स्टीमबाथ (भापस्नान) कराया जाता है और उसकी गर्दन पर गरम-पट्टी का सेंक करते है तथा इसके बाद रोगी को रीढ़ स्नान कराया जाता है जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार से उपचार करने से रोगी के शरीर में रक्त-संचालन (खून का प्रवाह) बढ़ जाता है और रोमकूपों द्वारा विजातीय पदार्थ बाहर निकल जाते हैं जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द तथा अकड़न होना दूर हो जाती है।
गर्दन के दर्द तथा अकड़न को दूर करने के लिए सूर्य किरणों द्वारा बनाए गए लाल व नारंगी जल का उपयोग करने से रोगी को बहुत अधिक फायदा होता है। सूर्य की किरणों में हडि्डयों को मजबूत करने के लिए विटामिन `डी` होता है। सूर्य की किरणों से शरीर में विटामिन `डी` को लेने के लिए रोगी को पेट के बल खुले स्थान पर जहां पर सूर्य की किरणें पड़ रही हो उस स्थान पर लेटना चाहिए। ताकि सूर्य की किरणें सीधी उसकी गर्दन व रीढ़ की हड्डी पर पड़े। इस क्रिया को करते समय सिर पर कोई कपड़ा रख लेना चाहिए ताकि सिर पर छाया रहें।
गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए रोगी की गर्दन पर सरसों या तिल के तेल की मालिश करनी चाहिए। मालिश करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि मालिश हमेशा हल्के हाथों से करनी चाहिए। मालिश यदि सूर्य की रोशनी के सामने करें तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
योगासन के द्वारा भी गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक किया जा सकता है। योगासन द्वारा गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक करने के लिए सबसे पहले गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं और फिर धीरे-धीरे गर्दन को आगे की ओर झुकाएं। फिर ठोड़ी को कंठ कूप से लगाएं। इसके कुछ देर बाद गर्दन को दाएं से बाएं तथा फिर बाएं से दाएं हल्के झटके के साथ घुमाएं।
गर्दन के दर्द तथा अकड़न को दूर करने के लिए भुजंगासन, धनुरासन या फिर सर्पासन करना लाभकारी रहता है।
गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक करने के लिए प्राणायाम व ध्यान का अभ्यास करें।
गर्दन के दर्द तथा अकड़न की समस्या को दूर करने के लिए रोजाना सुबह के समय में खुली ताजी हवा में घूमें।
गर्दन में दर्द होने पर इसका उपचार करने के लिए सबसे पहले गर्दन में दर्द होने के कारणों को दूर करना चाहिए।
योगाभ्यास तथा विशेष व्यायाम से गर्दन के दर्द से पूरी तरह छुटकारा मिल सकता है।
गर्दन के दर्द से पीड़ित रोगी को अपने कंधों को ऊपर से नीचे की ओर करना।
कंधों को सामने तथा पीछे की ओर गतिशील करना चाहिए इससे गर्दन का दर्द ठीक हो जाता है।
कंधों को घड़ी की दिशा में सीधी तथा उल्टी दिशा में घुमाना चाहिए जिससे गर्दन कां दर्द ठीक हो जाता है।
गर्दन से पीड़ित रोगी को अपनी उंगुलियों को गर्दन के पीछे आपस में फंसाना चाहिए और फिर फंसी उंगुलियों की तरफ दबाव देते हुए अपने कोहनी को आगे से पीछे की ओर गतिशील करना चाहिए जिसके फलस्वरूप गर्दन का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है।
गर्दन से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में विटामिन `डी´, लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस की अधिकता वाले खाद्य पदार्थों का अधिक उपयोग करना चाहिए।
संतरा, सेब, मौसमी, अंगूर तथा पपीता व चीकू का उपयोग भोजन में अधिक करना चाहिए।
गर्दन में दर्द तथा अकड़न से बचने के लिए कुछ सावधानियां-

सोने के लिए व्यक्ति को सख्त तख्त का ही प्रयोग करना चाहिए।
सोते समय गर्दन के नीचे तकिए का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
किसी भी कार्य को करते समय अपनी रीढ़ की हड्डी को तनी हुई और बिल्कुल सीधी रखनी चाहिए।
गर्दन के दर्द तथा अकड़न का उपचार करते समय अधिक सोच-विचार नहीं करना चाहिए।
गर्दन में दर्द तथा अकड़न की समस्या से बचने के लिए वह कार्य नहीं करना चाहिए जिससे गर्दन या आंखों पर अधिक बोझ या तनाव पड़े।
गर्दन में दर्द तथा अकड़न की समस्या से बचने के लिए प्रतिदिन 6 से 8 घण्टे की तनाव रहित नींद लेना बहुत ही जरूरी है।
गर्दन के दर्द तथा अकड़न से बचने के लिए यह ध्यान देना चाहिए कि यदि खड़े है तो तनकर खड़े हो तो अपनी पीठ सीधी रखनी चाहिए।
आगे की ओर झुककर किसी भी कार्य को नहीं करना चाहिए।
जानकारी-

इस प्रकार से कुछ नियमों का अपने जीवन में प्रयोग करने से गर्दन में कभी भी दर्द तथा अकड़न नहीं होता है। यदि गर्दन में दर्द तथा अकड़न हो भी गई है तो संतुलित भोजन का सेवन करके तथा प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करके जल्दी ही इस रोग को ठीक किया जा सकता है।

04/04/2020

कंधे में दर्द (Shoulder pain)


परिचय:-

वैसे देखा जाए तो कंधों में आर्थराइटिस नहीं पाया जाता है। जब जोड़ों की सरंचना किसी कारण से प्रभावित होती है तो कंधे में दर्द होने लगता है। कंधे में दर्द होने के कारण रोगी व्यक्ति को चलने-फिरने में भी परेशानी होने लगती है।

कंधे सुन्न पड़ जाने की बीमारी 50 से 75 वर्ष की उम्र के स्त्री-पुरुषों में अधिक पाई जाती है। दर्द के कारण कंधा निष्क्रिय पड़ जाता है।



कंधे में दर्द होने का लक्षण:-

इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के कंधे में दर्द होता है तथा उसका कंधा सुन्न पड़ जाता है। रोगी को कंधे में अकड़न भी होने लगती है और जब दर्द तेज हो जाता है तो रोगी व्यक्ति को नींद भी नहीं आती है।



कंधे में दर्द होने का कारण:-

कंधे के जोड़ तथा इसकी संरचनाओं का तन्त्रिका वितरण मुख्य रूप में पांचवी ग्रीवा-मूल के माध्यम से होता है जो ग्रीवा-कशेरुका से निकलती है। यह कंधे की जड़ तथा ऊपरी बांह के ऊपर फैली हुई त्रिकोणिका मांसपेशी के क्षेत्र में निहित होती है इसलिए अधिकतर इसमें दर्द महसूस होता रहता है।



कंधे में दर्द होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

कंधे के दर्द को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सबसे पहले अपने कंधे की मालिश करानी चाहिए तथा गर्म व ठंडी सिंकाई करवानी चाहिए ताकि यदि कंधे के पास की रक्त कोशिकाओं में रक्त जम गया हो तो उस स्थान पर रक्त का संचारण हो सके। इसके फलस्वरूप कंधे का दर्द ठीक हो जाता है।
रोगी के कंधे के दर्द से प्रभावित भाग को सूर्य की किरणों के पास करके सिंकाई करनी चाहिए क्योंकि सूर्य की पराबैंगनी किरणों में दर्द को ठीक करने की शक्ति होती है। फिर रोगी व्यक्ति को कंधे पर ठंडी सिंकाई करनी चाहिए तथा इसके बाद उस पर मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। इसके फलस्वरूप कंधे के दर्द का रोग ठीक हो जाता है।
रोगी व्यक्ति को रात के समय में कम से कम 1 घण्टे तक ठंडा लेप कंधे पर करना चाहिए। इसके फलस्वरूप कंधे का दर्द तथा अकड़न ठीक हो जाती है।
इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सुबह के समय में व्यायाम करने से लाभ होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को मांस, मछली तथा अन्य मांसाहारी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
जानकारी-

इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी व्यक्ति का कंधे का दर्द ठीक हो जाता है।

02/04/2020

भस्मक रोग (Over eating)


परिचय:-

भस्मक रोग एक प्रकार का ऐसा रोग है जिसमें रोगी हर समय खाता ही रहता है। रोगी जितना भी खाना खा ले उसे ऐसा लगता है कि उसने अभी तो कुछ भी नहीं खाया है और वह बहुत अधिक खाने लगता है।

भस्मक रोग के लक्षण:-

इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक भूख लगती है तथा वह थोड़ी-थोड़ी देर के बाद कुछ न कुछ खाने के लिए मांगता रहता है।

भस्मक रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

इस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को एनिमा क्रिया के द्वारा पेट साफ करना चाहिए और इसके बाद दिन में 2 बार कटिस्नान करना चाहिए।
रात को सोते समय रोगी को अपनी कमर पर भीगी पट्टी लगाकर कुछ समय के लिए सोना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक लगातार करने से भस्मक रोग ठीक हो जाता है।
इस रोग का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने के लिए सबसे पहले रोगी को कुछ दिनों तक रसाहार तथा फलाहार भोजन करना चाहिए और इसके बाद धीरे-धीरे सामान्य भोजन करना चाहिए।
भस्मक रोग को ठीक करने के लिए आसमानी रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल को लगभग 50 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन 8 बार रोगी को सेवन कराना चाहिए। इससे रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

बढ़िया खबर! कारोना वायरस वैक्सीन तैयार। इंजेक्शन के बाद 3 घंटे के भीतर रोगी को ठीक करने में सक्षम। अमेरिकी वैज्ञानिकों क...
23/03/2020

बढ़िया खबर! कारोना वायरस वैक्सीन तैयार। इंजेक्शन के बाद 3 घंटे के भीतर रोगी को ठीक करने में सक्षम। अमेरिकी वैज्ञानिकों को सलाम।
अभी ट्रम्प ने घोषणा की कि रोशे मेडिकल कंपनी अगले रविवार को वैक्सीन लॉन्च करेगी, और लाखों खुराक इससे तैयार हैं !!!

30/09/2019

एड्स होने पर शरीर देता है ये 4 संकेत, एक बार जरूर पढ़ें और इसे अनदेखा ना करें


हेलो दोस्तो नमस्कार,दोस्तों एड्स एक ऐसी बीमारी है। जो एचआईवी वायरस के कारण होता है यानी शुरुआत में व्यक्ति को एड्स नहीं बल्कि एचआईवी होता है। सही समय पर एचआईवी का पता चलने पर अगर इलाज और दवाएं शुरू कर दी जाए तो व्यक्ति को एड्स के खतरे को कम किया जा सकता है। इलाज ना मिलने पर एचआईवी वायरस एड्स का कारण बनते हैं। और एक गंभीर स्थिति है क्योंकि इसका इलाज अब तक संभव नहीं हुआ है। दोस्तों आज मैं आपको एचआईवी के चार संकेत के बारें में बताने वाली हूँ। तो आइए जानते हैं।

1) अगर आप रात में सोने से अपने आपको असमर्थ पाते हैं। क्योंकि आप जैसे ही रात में सोते हैं तो आप अपने शरीर से निकलने वाले अधिक पसीने को रोक नहीं पाते हैं और जिससे आपकी नींद बाधित होती है तो इस प्रकार के लक्षण को एचआईवी एड्स के संक्रमण के प्राथमिक कारणों में से एक माने जाते हैं और यह चिंता का कारण हो सकता है। अगर आपके साथ यह समस्या है तो आप डॉक्टर से तुरंत मिले और इसका इलाज करवाएं।

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2) दोस्तों,लिम्फ नोड्स शरीर के इम्यून सिस्टम का हिस्सा होता है और इसमें इम्यून सेल्स स्टोर रहती है। एचआईवी संक्रमण होने पर इम्यूनिटी सिस्टम प्रभावित होता है जिससे यह ब्लड सूज जाते हैं या गर्दन में सिर के पीछे कमर में और आर्मपिट्स में होते हैं। इनमें किसी तरह की सूजन या बदलाव दिखते हैं। अगर आपको यह समस्या हो रही है तो आप डॉक्टर से जरूर मिले और इसका सही समय पर इलाज करवाएं।

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3) पूरे बदन में खुजली और जलन होना त्वचा पर लाल चकत्ते और खुजली होना त्वचा का पीला पड़ना भी एड्स के लक्षण हो सकते हैं। अंगों में घाव संक्रमण या खुजली की बीमारी होना और लंबे समय तक इनका बने रहना, दवाई लेने के बावजूद मरीज का ठीक ना होना भी एड्स के लक्षण हो सकते हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है तो आप डॉक्टर के पास चेकअप के लिए जाएं और इसका इलाज करवाएं।

4) आपको लगातार बुखार आना भी एड्स का लक्षण है। अगर आपको लगातार बुखार आ रहा है तो आप सावधान रहें क्योंकि लगातार आने वाला बुखार एड्स का एक लक्षण हो सकता है। इस बीमारी में इम्यून पावर कम हो जाता है जिसके कारण आपका प्रतिरोधी तंत्र बार-बार बुखार रोक नहीं पाता है। अगर आपको भी लगातार बुखार आ रहा है तो आप डॉक्टर से मिले।

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दोस्तों यदि आपको भी जानकारी अच्छी लगी हो तो इस पोस्ट को लाइक और शेयर करें कमेंट में अपनी राय और विचार जरूर लिखें यदि आप रोज ऐसी जानकारी जानना चाहते हैं तो मेरे चैनल को फॉलो जरूर करें धन्यवाद।

01/07/2019

जठराग्नि का मंद पड़ जाना (गैस्ट्राइटिस) (Gastritis)
परिचय:-
इस रोग के कारण रोगी की पाचन का कार्य मंद पड़ जाता है जिसके कारण रोगी के शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं और उसकी पाचन प्रणाली प्रभावित हो जाती है।
जठराग्नि के मंद पड़ जाने का लक्षण:-

इस रोग से पीड़ित रोगी को जी मिचलाना, पेट में अफारा, पेट में गैस बनना, पेट में दर्द तथा पेट में जलन होने जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
इस रोग से पीड़ित रोगी जब भोजन कर लेता है तब उसे थोड़ी-थोड़ी घबराहट सी महसूस होने लगती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को खाया हुआ भोजन सही से पचता नहीं है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को उल्टी भी होने लगती है जिसके कारण से पचा हुआ भोजन बाहर आ जाता है तथा मल में खून के छींटे आने लगते हैं।
जठराग्नि के मंद पड़ जाने का कारण:-

यह रोग पेट के आन्तरिक भाग तथा नाजुक श्लेष्माकला अस्तर में सूजन आ जाने के कारण होता है।
औषधियों के जरूरत से ज्यादा सेवन करने तथा शारीरिक व मानसिक तनाव के कारण यह रोग होता है।
अधिक धूम्रपान करने,शराब पीने तथा नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने के कारण यह रोग होता है।
जठराग्नि के मंद पड़ जाने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

इस रोग का उपचार करने के लिए व्यक्ति को कम से कम 3 दिन तक नियमानुसार एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए तथा इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिए।
इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपनी रक्त संचार प्रणाली में सुधार करना चाहिए और रक्त संचार प्रणाली में सुधार करने के लिए रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन 2-3 घण्टे तक अपने पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी का लेप करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन ठंडे पानी से कटिस्नान करना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को पेट में दर्द होने पर, दर्द से राहत पाने के लिए गैस्ट्रो-हैपेटिक लपेट का उपयोग करना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट पर गर्म या ठंडी सिंकाई करनी चाहिए तथा कटिस्नान करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को उपचार कराने के लिए नियमित अंतराल पर बर्फ का ठंडा दूध पीना चाहिए तथा भोजन नहीं करना चाहिए और बर्फ के टुकड़े को चूसना चाहिए। इसके फलस्वरूप तुरंत ही इस रोग से राहत मिल जाती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को हानिकारक खाद्य पदार्थ जैसे कॉफी, औषधियां, शराब, धूम्रपान आदि का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों के उपयोग से रोग की अवस्था और खराब हो सकती है।

01/07/2019
22/06/2019

कंधे में दर्द (Shoulder pain)
परिचय:-
वैसे देखा जाए तो कंधों में आर्थराइटिस नहीं पाया जाता है। जब जोड़ों की सरंचना किसी कारण से प्रभावित होती है तो कंधे में दर्द होने लगता है। कंधे में दर्द होने के कारण रोगी व्यक्ति को चलने-फिरने में भी परेशानी होने लगती है।
कंधे सुन्न पड़ जाने की बीमारी 50 से 75 वर्ष की उम्र के स्त्री-पुरुषों में अधिक पाई जाती है। दर्द के कारण कंधा निष्क्रिय पड़ जाता है।

कंधे में दर्द होने का लक्षण:-

इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के कंधे में दर्द होता है तथा उसका कंधा सुन्न पड़ जाता है। रोगी को कंधे में अकड़न भी होने लगती है और जब दर्द तेज हो जाता है तो रोगी व्यक्ति को नींद भी नहीं आती है।

कंधे में दर्द होने का कारण:-

कंधे के जोड़ तथा इसकी संरचनाओं का तन्त्रिका वितरण मुख्य रूप में पांचवी ग्रीवा-मूल के माध्यम से होता है जो ग्रीवा-कशेरुका से निकलती है। यह कंधे की जड़ तथा ऊपरी बांह के ऊपर फैली हुई त्रिकोणिका मांसपेशी के क्षेत्र में निहित होती है इसलिए अधिकतर इसमें दर्द महसूस होता रहता है।

कंधे में दर्द होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

कंधे के दर्द को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सबसे पहले अपने कंधे की मालिश करानी चाहिए तथा गर्म व ठंडी सिंकाई करवानी चाहिए ताकि यदि कंधे के पास की रक्त कोशिकाओं में रक्त जम गया हो तो उस स्थान पर रक्त का संचारण हो सके। इसके फलस्वरूप कंधे का दर्द ठीक हो जाता है।
रोगी के कंधे के दर्द से प्रभावित भाग को सूर्य की किरणों के पास करके सिंकाई करनी चाहिए क्योंकि सूर्य की पराबैंगनी किरणों में दर्द को ठीक करने की शक्ति होती है। फिर रोगी व्यक्ति को कंधे पर ठंडी सिंकाई करनी चाहिए तथा इसके बाद उस पर मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। इसके फलस्वरूप कंधे के दर्द का रोग ठीक हो जाता है।
रोगी व्यक्ति को रात के समय में कम से कम 1 घण्टे तक ठंडा लेप कंधे पर करना चाहिए। इसके फलस्वरूप कंधे का दर्द तथा अकड़न ठीक हो जाती है।
इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सुबह के समय में व्यायाम करने से लाभ होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को मांस, मछली तथा अन्य मांसाहारी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
जानकारी-

इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी व्यक्ति का कंधे का दर्द ठीक हो जाता है।

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