03/01/2026
आश्रम और संचालन : भाग – 6
(BTS – पर्दे के पीछे)
जब ओशो के साधकों और शिविरों के प्रति भ्रम टूटने लगे।
अनेक शिविरों में जाने और कई ओशो आश्रमों में रहने के बाद, भीतर कुछ बातें बहुत चुपचाप साफ़ होने लगीं। ओशो की दुनिया जैसी बाहर से दिखाई जाती है, वैसी है नहीं। बहुत अच्छे, प्रेमपूर्ण और पहुँचे हुए साधक व सिद्ध भी हैं—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन वे बहुत विरले हैं। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।
परन्तु जो ज़्यादातर दिखाई देता है, वह ध्यान के नाम पर छूट पाए हुए लुच्चे, लफंगे, शराबी, नशेड़ी, गंजेड़ी लोगो की भीड़ है। यह कहना कठोर लग सकता है, पर मेरा अनुभव यही रहा।
ओशो की देशना बिल्कुल स्पष्ट थी—“कुछ भी करो, लेकिन होश रखो।” लेकिन ये लोग कुछ भी करते हैं, पर होश नहीं रखते। ओशो का सारा जोर तो होश पर था। जितना मैंने ओशो को समझा, उनका आशय यह कभी नहीं था कि आदमी बेहूदगी को स्वतंत्रता समझ ले। शोर-शराबा ध्यान नहीं है। “ओशो-ओशो” चिल्लाना ओशो को पुकारना नहीं है है। नाम बदल गया है—बेहोशी वही पुराने आदमी की है।
नृत्य के नाम पर बेहूदगी देखी। ओशो ने इस नृत्य की बात नहीं की थी। उन्होंने कहा था—“हसीबा, खेलिबा, धरीबा ध्यानं।” लेकिन
यहाँ हँसी और खेल है—ध्यान ग़ायब है।
उन्होंने कहा था—“उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र।”
उत्सव और आनंद मनाया जा रहा है, लेकिन यह किस जाति और किस गोत्र का है—इसकी किसी को खबर नहीं। यह तो हमारा निज स्वभाव था, पर निज स्वभाव की ओर नज़र ही नहीं जाती।
कभी समाज में नैतिकता एक सीमा-रेखा का काम करती थी—गलत को गलत कहने का साहस देती थी। लेकिन तथाकथित ओशो सन्यासियों में नैतिकता और आचरण का मूल्य बहुत कम दिखाई दिया। सब कुछ जायज़ है—बस नाम ध्यान का होना चाहिए।
ओशो ने स्त्री को माँ कहा था। यह बहुत पवित्रता से भारी भावना थी। लेकिन यहाँ माँ माँ कहकर माँ को पटाने चल पड़ते हैं। शब्द पवित्र हैं, नज़र पवित्र नहीं।
धीरे-धीरे यह भी समझ में आया कि एक घंटे का ध्यान, ध्यान नहीं होता। ध्यान तो एक जीवन-शैली है। अगर जीवन भर का आचरण बेहोश है, तो एक घंटे की विधि केवल अपने आप को दिलासा देना है। कई लोग 40–50 वर्षों से ध्यान कर रहे हैं और आज भी वहीं खड़े हैं, गोल-गोल घूम रहे हैं। मुझे तो ओशो-कृपा से यह अनुभव हुआ कि ओशो द्वारा दी गई ध्यान पूर्ण जीवन शैली इतनी सशक्त हैं कि 24 घंटे के भीतर साधक को बदल सकती हैं। तो फिर कहीं न कहीं कोई गहरी चूक हो रही है।
मैने यह भी देखा—बहुत-से लोग ओशो शिविरों में मन लगाने आते हैं। उन्हें पता ही नहीं कि ध्यान तो मन की मृत्यु है। और वे यहाँ भी मन को और मज़बूत करने आ रहे हैं। करनी थी चेतना की वृद्धि—हो रही है मन की वृद्धि।
इसके साथ-साथ सुविधाओं की माँग भी दिखी—बहुत बढ़िया भोजन चाहिए, बहुत अच्छी व्यवस्था चाहिए, पूरा आराम चाहिए। और भीतर-ही-भीतर यह अपेक्षा भी कि ध्यान की देवी आसमान से उतरकर गोद में बैठ जाए। न कुछ करना पड़े, न थोड़ा-सा भी कष्ट उठाना पड़े। मेरे अनुभव में ध्यान ऐसे नहीं घटता। ध्यान में तो तपना पड़ता है—जला देना पड़ता है अपनी अब तक बनाई हुई मूरत को।
शिविरों में संख्याओं का भी बड़ा महत्व है—कितने लोग आए, कितनी भीड़ थी। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? सत्य के प्यासे हमेशा विरले होते हैं। भीड़ से सत्य पैदा नहीं होता।
एक और बात बहुत स्पष्ट दिखी—यदि आपके पास धन नहीं है, तो अधिकतर ओशो आश्रमों में आपके लिए जगह नहीं है, चाहे आप कितने ही सच्चे साधक क्यों न हों। तब मेरे भीतर प्रश्न उठा—क्या कोई ऐसा आश्रम नहीं हो सकता जहाँ सच्चे साधकों को भोजन, आवास और साधना सम्मान के साथ उपलब्ध हो? मुझे नहीं लगता कि धन ध्यान में बाधा होना चाहिए।
फिर यह भी अनुभव में आया कि सच्चे साधकों के अनुभव सबसे अलग होते हैं। वे भीड़ के नहीं होते। क्या कोई ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती जहाँ उनकी साधना की स्थिति के अनुसार व्यक्तिगत मार्गदर्शन दिया जा सके?
एक और अजीब बात दिखी—ओशो के शिष्य ओशो को इसलिए पसंद करते हैं कि वे विद्रोही थे। लेकिन यदि कोई ओशो शिष्य विद्रोही हो जाए, तो वही लोग उसका विरोध करने लगते हैं। तब मन में प्रश्न उठा—क्या कोई ऐसा स्थान नहीं हो सकता जहाँ मिसफिट लोगों का स्वागत हो? जहाँ भीड़ में फिट न बैठने वाले साधकों को जगह मिल सके?
यह सब मैं बाहर खड़े होकर नहीं कह रहा। मैं कोई आलोचक नहीं हूँ। मैं भी ओशो का शिष्य हूँ—और 1992 से ओशो जगत के संपर्क में हूँ। यह बातें सुनी-सुनाई नहीं, जिए हुए अनुभव हैं।
इन्हीं अनुभवों के बीच धीरे-धीरे यह भाव भीतर बैठता चला गया कि एक दिन ऐसा आश्रम बनेगा—जहाँ केवल साधना होगी, केवल प्रेम होगा। और यह सारी बेहोशी अपने आप बाहर रह जाएगी।
यहीं से आनंद ग्राम कोई विरोध नहीं, बल्कि एक रचनात्मक उत्तर बनने लगा।
स्वामी विमल कीर्ति
क्रमशः