28/12/2025
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ६.१७)
अर्थात: जो मनुष्य आहार और विहार में उचित (संतुलित) है, कर्मों में जिसकी चेष्टाएँ उचित हैं और जिसका सोना तथा जागना उचित है, उसका योग (साधना) दुःखों को नष्ट करने वाला होता है।