Dr. N.H Mirza

Dr. N.H Mirza P.P. Rtn. Dr. N.H. MIRZA - MPHF
MBBS, PGDAP, FCGP, FAMS, FICMU
SENIOR FAMILY PHYSICIAN, ADOLESCENT PEDIATRICIAN & SONOLOGIST

30/12/2025

मेरा मेडिकल कैरियर 1968 से 1977 तक एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा से यूपीपीएससी में सिलेक्शन लिस्ट तक रहा, जिसमें मेरी 29वीं पोजीशन थी। जुलाई 1968 में एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा में एडमिशन होने के बाद जी बी पंत हॉस्टल में रूम अलॉट किया गया। जबरदस्त पंछी बाजी! यह एक तरह की रैगिंग हुआ करती थी हमारे मेडिकल कॉलेज में, उसका दौर चला। रोजाना सुबह सवेरे उठना, 7:30 बजे कॉलेज जाना और 8:00 बजे से क्लास - शाम तक एनॉटमी, फिजियोलॉजी और बायोकेमेस्ट्री की क्लासेस हुआ करती थीं। हमारे इमीडिएट सीनियर्स डॉक्टर एलएम काज़मी और डॉक्टर केएमएल खन्ना का बड़ा सहयोग और मार्गदर्शन रहा इस दौरान। डॉक्टर जीयू कुरैशी, डॉक्टर मोहम्मद असगर, डॉक्टर वी के गोयल जो हमारे बड़े सीनियर्स थे, उनका भी मेरे साथ में बड़ा प्यार रहा। इसके बाद वन यूपी मेडिकल कंपनी नैशनल क्रेडिट कोर्स यानि एनसीसी में ट्रेनिंग और उसमें बी सर्टिफिकेट पास किया, अच्छे ग्रेड में 79% मार्क्स लाकर।

29/12/2025

9
मेरा बचपन, कहानी खुद अपनी ज़ुबानी, जुलाई 1968, उम्र 17 साल, गोइंग डाउन the मेमोरी Lane. आगरा जाने का प्लानिंग करने से पहले मेरे वाली साहब ने अपने मिलने-जुलने वालों को चिट्ठी लिखी और पता लगाया कि मोहल्ला ढोली खार में वाली साहब के एक मिलने वालों का स्कूल है। उन्हें जब मेरे दाखले के बारे में पता लगा, तो वह बड़े खुश हुए। मुझे बहुत प्यार और इज्ज़त मिली। वहीं एक कमरे में हम दोनों को ठहराया गया। वहीं करीब में उन्होंने हमारे एक सीनियर, डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी, के वाली साहब, जो उस इलाके के बड़े असरदार और ज़ोरदार लीडर थे, उनसे हमारी मुलाकात कराई। और फिर डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी ने मुझे बहुत प्यार दिया, मेरा बड़ा ख्याल रखा, और आज भी ख्याल रखते हैं। बाद में डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी एस. एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा के प्रिन्सिपल बने और फिर आगरा यूनिवर्सिटी में एक बड़ी पोस्ट पर रहे। आज भी जब मैं आगरा जाता हूं, तो उन्हीं के यहां ठहरता हूं। उनका पूरा घर मुझे प्यार और इज्ज़त देता है, फैमिली मेंबर की तरह, बड़ी बेतकल्लुफ़ी के साथ।

उन दिनों आगरा मेडिकल कॉलेज में रैगिंग का बड़ा ज़ोर था। फर्स्ट ईयर वाले बच्चे पंछी कहलाए जाते थे। सीनियर्स से बहुत डरते थे, रेस्पेक्ट भी करते थे, दंडवत प्रणाम करते थे। सीनियर्स बदले में प्यार दिया करते थे। डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी बड़ी एहतियात से सीनियर बॉयज़ हॉस्टल लेकर मुझे गए। बड़े चुपके-चुपके, चोरी-चोरी वहां उन्होंने डॉक्टर वी. के. गोयल से मेरी मुलाकात करवाई, जो उनके जूनियर हुआ करते थे और मेरे सीनियर। मेरे वाली साहब से उनके खानदानी ताल्लुकात थे। डॉक्टर वी. के. गोयल ने भी मेरा बहुत साथ दिया, मेरा बड़ा ख्याल रखा, मुझे बहुत प्यार दिया, और आज भी देते हैं, और मैं उनको रेस्पेक्ट देता हूं। डॉक्टर वी. के. गोयल आजकल दिल्ली यूनिवर्सिटी में हैं।

इन सब मुलाकातों के बाद, एडमिशन फॉर्मेलिटीज पूरे होने के बाद मेडिकल चेकअप हम सब नए स्टूडेंट्स का एक साथ कराया गया। फिर हम सबको जी. बी. पंत हॉस्पिटल में कमरा अलॉट किया गया और फिर शुरू हुआ रैगिंग का ज़बरदस्त सिलसिला। महीना भर तक उसका वितरण यहां के स्कोप से बाहर है। दिन भर पढ़ाई और रात में रैगिंग।

28/12/2025

8
मेरा बचपन कहानी खुद अपनी ज़ुबानी, जून 1968, उम्र का 17वां साल। Going down the memory lane. खैर, मेरे मां-बाप ने तैयारियां जारी रखीं। मेरी मां ने होटल ले जाने के लिए न जाने क्या-क्या और कपड़े इत्यादि की तैयारी शुरू कर दी। छोटे भाई-बहन भी कुछ-कुछ हाथ बंटाते रहे। इतना सामान पहली बार इतनी दूर ले जाने के लिए खूब सोचा गया। उस ज़माने में सूटकेस या आज जैसे ब्रीफ़केस तो हुआ नहीं करते थे। लकड़ी के बक्से बनवाए जाते थे, मगर वो बहुत भारी हुआ करते थे। हमारे घर में भी कई तरह के छोटे-बड़े लकड़ी के बक्से रखे हुए थे। प्लाई का सामान उन दिनों नहीं हुआ करता था। किसी-किसी के पास चमड़े की अटैची या फिर थैला हुआ करता था। थैले सिलवा भी लिए जाया करते थे घर पर ही। मेरे लिए मेरे मां-बाप ने एक ट्रंक निकाला जो कभी मेरी दादी का था। ये बक्सा टिन का या जस्ती चादर का, पुराना, बहुत पुराना तो ना था और मीडियम साइज का था। उस बक्से पर डार्क ग्रीन कलर का पेंट करवाया गया। वो आज भी मेरे भाइयों के पास मौजूद है। उस पर मेरा नाम लिखवाने की बात चल ही रही थी कि अचानक डाक या पोस्टमैन, जो हमारी चिट्ठियां लाया करता था, आया और उसने वालिद साहब को एडमिशन लेटर लाकर हैंडओवर किया। उसमें सब डिटेल्स कॉलेज के बारे में, रूस रिलाइजेशनस, एडमिशन डिटेल्स और फीस स्ट्रक्चर के बारे में सब कुछ लिखा था। मेरे 1 साल की कॉलेज की फीस मात्र ₹225 थी उस लेटर के हिसाब से। और हॉस्टल फीस 1 साल की मात्र ₹250 थी 1 साल की। इस तरह कुल मिलाकर मात्र ₹475, 1 साल भर का खर्चा था, उस एडमिशन लेटर के हिसाब से। यह जानकर हम सबकी जान में जान आई। इस समय मेरी उम्र 17 साल हो गई थी। अब उस गहरे रंग के बक्से पर मेरा नाम लिखवाया गया, पेंटर से सफेद रंग से: नजाकत हुसैन मिर्ज़ा, एमबीबीएस, एसटीडी, एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा। अब आगरा चलने की तैयारी पूरी हो गई। वालिद साहब के साथ एक बक्सा, एक अटैची, एक होल्डर या बिस्तर बंद और एक थैले के साथ।

27/12/2025

7
मेरा बचपन। कहानी खुद अपनी ज़ुबानी। जून 1968, उम्र का 17वां साल, गोइन डाउन द मेमोरी लाइन। रिज़ल्ट डिक्लेअर होने के बाद एडमिशन लेटर आने में ज्यों-ज्यों समय लग रहा था, ज्यों-ज्यों देरी हो रही थी, तरह-तरह की बातें होने लगीं। उन दिनों न जाने क्या-क्या बातें हुईं। कभी-कभी खुद को भी रिज़ल्ट पर यकीन नहीं आ रहा था। क्योंकि यह हमारे खानदान के लिए पहला मौका था। किसी का इतनी कम उम्र में किसी बच्चे का सीपीएम टीपीएमटी में पहले ही एटेम्प्ट में पास करना, किसी का बच्चा 4-5 साल से बैठ रहा था। किसी की छठी व सातवीं एटेम्प्ट थी। मुझे तो इन सब बातों की हिज़ न थी। मेरा काम तो पढ़ना और बोलना था। साल में कई-कई बार स्पीच देने के लिए जाना पड़ता था, जो पहले टीचर्स और फिर मां-बाप तैयार कराते थे। फिर उसके बाद मैं खुद तैयार कर लिया करता था। एक दिन मेरे मामू, जिन्होंने मेरे साथ हाई स्कूल का एग्ज़ाम दिया था, और मेरे छोटे मामू निज़ाम मामू, और एक और मेरे अच्छे वाले मामू बाहर से आए, कुछ बातें सुनकर। वह बातें सुनकर आकर अपनी आवा, यानी मेरी अम्मी को सुनाया करते थे। मैं भी सुन लिया करता था। मगर मेरे टीचर्स और मेरे साथियों को पूरी तरीके से कॉन्फ़िडेंस था मेरे रिज़ल्ट पर। मैं भूल नहीं पा रहा कि एक दिन मेरे मामू ने मेरी अम्मी को एक दिन आकर बताया कि एक बड़े रसूखदार, बड़ी अच्छी पॉज़िशन वाले हमारे एक रिश्तेदार के बारे में, कि वह कह रहे थे, "भाई, डॉक्टरी में दाखिला मिलने के बाद भी, बड़ी लंबी पढ़ाई है, बड़ी महंगी पढ़ाई है। बड़ा लंबा-चौड़ा खर्च है। कोर्स भी बड़ा महंगा है।" मेरी मां ने जब सुना, तो बड़ी सोच में पड़ गई। मेरी मां एम. ए. बीएड थी। वालिद साहब दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी करके आए हुए थे, मगर रुपए-पैसे के मामले में हम बहुत वेल टू डू न थे। और अब तक भी मेरी बेसिक पढ़ाई पर भी कोई खास खर्चा नहीं हुआ था। स्कूल फीस कुछ आने मात्र हुआ करती थी। और आठवीं क्लास में कॉलेज टॉप करने पर मुझे ₹10 महीने का स्कॉलरशिप मिलना शुरू हो गया था। वह भी 2 साल तक, नवीं और दसवीं क्लास तक, बीआइएस बिजनौर इंटर कॉलेज बिजनौर में। उसके बाद गवर्नमेंट इंटर कॉलेज बिजनौर में भी फीस बहुत कम थी। वर्धमान डिग्री कॉलेज बिजनौर में भी बहुत अधिक फीस न थी। अब्बा ने अम्मी से कहा, "फिक्र मत करो, सब हो जाएगा।" वह हर बात को ऐसे ही तसल्ली दे दिया करते थे।

26/12/2025

6
मेरा बचपन कहानी खुद अपनी ज़बानी। बीएससी फाइनल ईयर एग्जामिनेशन के बाद, मई-जून 1968, उम्र का 17वां साल। Going down the memory lane. सीपीएमटी का रिजल्ट आने पर पता लगा कि मेरी पहली चॉइस एसएन मेडिकल कॉलेज की सिलेक्शन लिस्ट में मेरा नाम है। यह हमारी बस्ती के लिए तथा मेरे और हम सबके लिए बहुत बड़ी बात थी कि पहली ही अटेंप्ट में, पहली ही चॉइस पर सीपीएमटी में सिलेक्शन लिस्ट में नाम आया। रिजल्ट डिक्लेअर होने के बाद, दाखिले की चिट्ठी आने में जो देर लगी, वो समय बड़ी बेचैनी से गुजरा। यहां मैं बयान नहीं कर सकता कि उन दिनों दिल में क्या-क्या ख्याल आए। मैं क्या-क्या सोचा करता था? मां-बाप, भाई-बहन और पूरे खानदान में एक अजब सा बयान से बाहर खुशहाली का माहौल रहा। मुबारकबाद के लिए लोग आने लगे। उन दिनों टेलीफोन तो थे नहीं, जिससे पता कर लें, या जाकर पता करना भी बड़ा मुश्किल काम था। लगभग नामुमकिन सा था। जब तक एडमिशन लेटर नहीं आया, दिल में धुक-धुक सी लगी रही। उन दिनों चिट्ठी आने में काफी देर लग जाया करती थी। उधर वालिद साहब ने आगरा अपने साथ लेकर जाने की तैयारी शुरू कर दी। अभी मेरी उम्र पूरे 17 साल नहीं हुई थी। 18 जून 1968 को 17 साल पूरे होने थे, और मुझे जुलाई के पहले हफ्ते में जाना था एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा एमबीबीएस फर्स्ट ईयर में दाखिले के लिए। और अभी तक मेरी दाढ़ी मूछ भी नहीं आई थी, जैसा कि उस उम्र के बच्चों में हुआ करता था। उस समय मुझे बड़ी शर्म सी महसूस हो रही थी। बड़ा अजब सा लग रहा था, जो बयान से बाहर है। मुझे अच्छी तरह याद है, मैंने मेडिकल कॉलेज में जाने से पहले अपने पारिवारिक नाई से उस्तरा फिरवाया, पहली मर्तबा दाढ़ी मूछ की जगह पर, और तब मेडिकल कॉलेज गया था। तब से अब तक लगातार शेव कर रहा हूं। वहां भी और यहां पर भी, लेकिन अपने घर पर ही।

24/12/2025


5
मेरा बचपन कहानी, खुद अपनी ज़ुबानी, बी.एस.सी. फाइनल ईयर एग्जामिनेशन के बाद, मई-जून 1968। उम्र का 17वां साल। गोइंग डाउन द मेमोरी लेन, मैं यह छोटी किताब या गुटके या बुकलेट लिखने की तैयारी कर ही रहा था कि एक दिन अचानक सुबह सवेरे मेरा एक दोस्त, क्लास फेलो प्रमोद, अब डॉक्टर पी. के. सिंह ने आकर मेरा घर का दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से पीटना शुरू कर दिया। दरवाज़े में उन दिनों मोटी सी लोहे की कुंडी हुआ करती थी। मैं घर से बाहर निकल आया। तो वह बोला, "अपना रोल नंबर निकाल।" मैं अपना रोल नंबर उन दिनों बड़ी एहतियात से अपनी एक किताब में रखकर भूल गया था। खैर, उसके कहने पर मैं अंदाज़े से लाइब्रेरी गया, जो हमारे चाशरी बिजनौर वाले घर के पास थी। जिस अखबार में रिज़ल्ट आया हुआ था, उसको जाकर देखा तो मुझे लगा कि मेरा रोल नंबर इसमें है। मैं फ़ौरन वापस लौटकर अपने घर आया। जब मैं लाइब्रेरी से लौटकर घर वापस आ रहा था, तो मुझे उस समय ऐसा लग रहा था कि मेरे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे हैं और मैं हवा में उड़ रहा हूं। अनएक्सप्लेंड खुशी का आभास लेकर घर आया और अपनी अम्मी को बताया। किताब में ढूंढकर एडमिशन कार्ड निकाला गया और नंबर मिलाया गया तो मेरा रोल नंबर निकला। घर खुशियों से भर गया और मेरी मां ने मुझे गले से लगा लिया और बाप का खुशी का ठिकाना ना रहा। मेरे वालिद साहब को मैं अब्बा कहा करता था। अब्बा उन दिनों दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद घर पर ही थे।

24/12/2025

23/12/2025

23/12/2025



मेरा बचपन कहानी खुद अपनी ज़बानी। बीएससी फाइनल ईयर एग्जाम के बाद मई-जून 1968। उम्र का 17वां साल। Going down the memory lane. बीएससी फाइनल ईयर का एग्जाम के बाद और फिर सीपीएमडी का टेस्ट देकर आने के बाद लंबी छुट्टियां थीं। बड़ा परेशान, क्या करें? वैसे तो गर्मी की छुट्टियों में हम अगली क्लास का कोर्स मगाकर उसको पढ़ने की कोशिश किया करते थे। इससे पहले, लेकिन अब बीएससी के बाद तो यहां पर बिजनौर में कुछ भी नहीं था आगे पढ़ने के लिए। एमएससी बिजनौर में थी नहीं। मेरठ का रास्ता उस समय बहुत लंबा व मुश्किल भरा था। इसी बीच मैंने एक काम करने की सोची: गुटका लिखना, छोटी-छोटी किताबें, शॉर्ट नोट्स बनाकर लिखने की। बुकलेट की शक्ल में जूलॉजी, बॉटनी और केमिस्ट्री की अलग-अलग सब्जेक्ट थी, जिससे आगे आने वाले बच्चे आसानी से पढ़ सकें और शॉर्ट नोट्स की मदद से अपने कोर्स को जल्दी से रिवाइज कर सकें। यहां मैं यह बता दूं कि हम कुछ साथियों को नोट्स बनाने का बड़ा शौक था। बड़े खाएदे के साथ हेडिंग डालकर लाल और हरे रंग से, वैसे आमतौर पर नीले रंग की जेल पार कोशिश ना ही इस्तेमाल करते थे। कभी-कभी काला रंग भी फाउंटेन पेन में भरकर अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करते थे। कभी-कभी जी निब का भी इस्तेमाल कर लिया करते थे। कलमदान के साथ उन दिनों बॉल पॉइंट पेन या रिफिल नहीं हुआ करते थे। रफ काम के लिए तो कच्ची पेंसिल थी ही। गुटका हम उन दिनों छोटे आकार की पुस्तकों को कहा करते थे जिसका साइज लगभग 4 इंच * 5 इंच हुआ करता था। थोड़ी मोटी जरूर हो जाती थी, लेकिन आसानी से जेब में रखकर या हाथ में रखकर पढ़ने में आसानी हुआ करती थी। जो बच्चे किताब को डीटेल्स में पढ़ने से बचते थे, ये शॉर्ट नोट्स की शक्ल की संकलन की छोटी पुस्तक बन जाती थी जिससे कम समय में विषय रिवाइज किया जा सके और इम्तेहान में आसानी से कम मेहनत करके पास कर सकें।

21/12/2025

*मेरा बचपन*
*कहानी खुद अपनी ज़बानी*
B.Sc Final year, 1967, उम्र 16 साल।
*Going down the memory lane*
मुझे याद आ रहा है और आज बताने को जी चाह रहा है कि जिस वर्धमान डिग्री कॉलेज, बिजनौर में मैं B.Sc कर रहा था, उन्हीं दिनों मेरी मां - मैं उन्हें अम्मी कहा करता था - उसी कॉलेज से B.Ed कर रही थी।
मेरी क्लास मॉर्निंग में फर्स्ट मीटिंग में हुआ करती थी और अम्मी की क्लास इवनिंग मीटिंग में हुआ करती थी।
मेरी अम्मी की B.Ed की क्लास में कुछ को छोड़कर ज्यादातर स्टूडेंट्स अम्मी से छोटे ही थे और मुझसे बड़े थे। वह माहौल भी बड़ा ही रोचक हुआ करता था।
वैसे तो मेरी अम्मी के लिए एक रिक्शा लगी हुई थी, जिसमें बैठकर दो-तीन सहेलियों के साथ आया जाया करती थीं लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता था कि किसी मजबूरी की वजह से रिक्शा वाला नहीं आ पाता था ऐसे में शाम को अम्मी को लेने के लिए मुझे ही जाना पड़ता था।
अम्मी की कॉलेज से छुट्टी होने पर शाम को वे सब स्टूडेंट्स एक साथ निकलते थे और लौटते हुए उनके साथियों से कुछ रास्ते में कट जाते थे अपने-अपने घरों को जाने के लिए। और तीन सहेलियां आगे की तरफ जाती थीं।
इस बीच में मुझे उन सबसे खूब अच्छी-अच्छी बातें करने और सुनने का मौका मिलता था अपनी मां के साथ।
अभी भी याद आता है, वह बड़ा ही रोचक दृश्य हुआ करता था।
अम्मी के साथियों के साथ-साथ उनके टीचर्स भी मुझे बहुत प्यार करते थे क्योंकि उस समय तक मेरी पहचान अपने जिले में एक बहुत ही अच्छे स्पीकर की बन चुकी थी, क्योंकि मैं हमेशा फर्स्ट आया करता था और ज्यादातर ट्रॉफी तो हमारी टीम को ही मिलती थी।

20/12/2025

*मेरा बचपन।*
*कहानी खुद अपनी ज़बानी।*
B.Sc फाइनल ईयर 1967, उम्र 16 साल।
*"Going down the memory lane"*

कहते हैं, सोहबत और अच्छे दोस्तों की कंपनी का व्यक्ति की जिंदगी में उसकी कामयाबी और उसके व्यक्तित्व पर बहुत गहरा असर पड़ता है। इसका जिंदगी में बहुत बड़ा रोल होता है।
मैं बड़ा खुश किस्मत रहा कि हमारे बैच में, हमारे साथ के अधिकतर बच्चे सभ्य, मेहनती और बहुत ही होनहार थे।
हमारे टीचर्स ठीक ही कहा करते थे कि तुम लोग देश की क्रीम हो। जो बाद में काफी हद तक सही साबित हुआ।
क्योंकि, हमारे जिले में इससे पहले हर साल केवल एक या दो बच्चा ही बड़े कंपीटिशंस में select हुआ करता था।
लेकिन, इस बार हमारे जिले में पहली बार हमारे चार और साथी, हमारे Batchmates सीपीएमटी में अलग-अलग मेडिकल कॉलेजेस में select हुए इस साल और दो Batchmates, उससे अगले साल और कुछ साथी उसके अगले सालों में भी मेडिकल में select हुए।
मैथ्स साइड से भी हमारे दो-तीन साथी इंजीनियरिंग कॉलेज में select हुए।
जो साथी मेडिकल में नहीं आ पाए उनको M.Sc Zoology, M.Sc Botany, M.Sc Chemistry और एक साथी को M.Sc Biotechnology में बड़े-बड़े शहरों में जाकर दाखिला मिला। और वो Lecturer, Reader और फिर अपने-अपने Subjects में Professor बने।
कुछ साथियों ने BAMS, BUMS वगैरह में दाखिला लिया, क्योंकि उन दिनों मेडिकल फील्ड में आने का बड़ा क्रेज़ था। हर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर बनाना चाहता था।
कुछ साथियों ने LLB करके वकालत में नाम कमाया और उच्च स्थान प्राप्त किया। आज भी ईमानदारी, सिंसेरिटी, कर्तव्य परायणता और सामाजिक कार्यों में उत्कृष्टता व हौसले भरी जिंदगी जिसकी मिसाल दी जाती है।
कुछ साथियों ने दो-तीन साल तैयारी करके Civil services यानी कि एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज में जाकर जिले का नाम रोशन किया। और कुछ साथियों ने कारोबार में नाम कमा डाला

30/10/2025

Address

Mirza Hospital
Kiratpur
246731

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Dr. N.H Mirza posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Share on Facebook Share on Twitter Share on LinkedIn
Share on Pinterest Share on Reddit Share via Email
Share on WhatsApp Share on Instagram Share on Telegram