29/12/2025
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मेरा बचपन, कहानी खुद अपनी ज़ुबानी, जुलाई 1968, उम्र 17 साल, गोइंग डाउन the मेमोरी Lane. आगरा जाने का प्लानिंग करने से पहले मेरे वाली साहब ने अपने मिलने-जुलने वालों को चिट्ठी लिखी और पता लगाया कि मोहल्ला ढोली खार में वाली साहब के एक मिलने वालों का स्कूल है। उन्हें जब मेरे दाखले के बारे में पता लगा, तो वह बड़े खुश हुए। मुझे बहुत प्यार और इज्ज़त मिली। वहीं एक कमरे में हम दोनों को ठहराया गया। वहीं करीब में उन्होंने हमारे एक सीनियर, डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी, के वाली साहब, जो उस इलाके के बड़े असरदार और ज़ोरदार लीडर थे, उनसे हमारी मुलाकात कराई। और फिर डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी ने मुझे बहुत प्यार दिया, मेरा बड़ा ख्याल रखा, और आज भी ख्याल रखते हैं। बाद में डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी एस. एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा के प्रिन्सिपल बने और फिर आगरा यूनिवर्सिटी में एक बड़ी पोस्ट पर रहे। आज भी जब मैं आगरा जाता हूं, तो उन्हीं के यहां ठहरता हूं। उनका पूरा घर मुझे प्यार और इज्ज़त देता है, फैमिली मेंबर की तरह, बड़ी बेतकल्लुफ़ी के साथ।
उन दिनों आगरा मेडिकल कॉलेज में रैगिंग का बड़ा ज़ोर था। फर्स्ट ईयर वाले बच्चे पंछी कहलाए जाते थे। सीनियर्स से बहुत डरते थे, रेस्पेक्ट भी करते थे, दंडवत प्रणाम करते थे। सीनियर्स बदले में प्यार दिया करते थे। डॉक्टर जियासुद्दीन कुरैशी बड़ी एहतियात से सीनियर बॉयज़ हॉस्टल लेकर मुझे गए। बड़े चुपके-चुपके, चोरी-चोरी वहां उन्होंने डॉक्टर वी. के. गोयल से मेरी मुलाकात करवाई, जो उनके जूनियर हुआ करते थे और मेरे सीनियर। मेरे वाली साहब से उनके खानदानी ताल्लुकात थे। डॉक्टर वी. के. गोयल ने भी मेरा बहुत साथ दिया, मेरा बड़ा ख्याल रखा, मुझे बहुत प्यार दिया, और आज भी देते हैं, और मैं उनको रेस्पेक्ट देता हूं। डॉक्टर वी. के. गोयल आजकल दिल्ली यूनिवर्सिटी में हैं।
इन सब मुलाकातों के बाद, एडमिशन फॉर्मेलिटीज पूरे होने के बाद मेडिकल चेकअप हम सब नए स्टूडेंट्स का एक साथ कराया गया। फिर हम सबको जी. बी. पंत हॉस्पिटल में कमरा अलॉट किया गया और फिर शुरू हुआ रैगिंग का ज़बरदस्त सिलसिला। महीना भर तक उसका वितरण यहां के स्कोप से बाहर है। दिन भर पढ़ाई और रात में रैगिंग।