14/02/2024
*सनातन धर्म *- जीव/मनुष्य की परम्परा (प्रकृति) के अनुसार मनसा-वाचा-कर्मणा जो कुछ धारण/करने योग्य है वह उस जीव/मनुष्य का सनातन/परम्परागत/ प्राकृतिक धर्म है । सनातन धर्म कोई सम्प्रदाय/पंथ (sect/religion/cult) आदि नहीं है परन्तु जीव/मनुष्य की प्रकृति मात्र है।
“ श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम् (अवधार्यताम्)।
आत्मानः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत्।”
अर्थात् जो अपने लिए अनुकूल न हो वह व्यवहार दूसरों के प्रति न करना ही ‘धर्म’ है।(विदुरनीति)
यह समस्त मानवमात्र का धर्म है और इसे ही सनातन धर्म कहते हैं । पाश्चात्य जगत में इसे ही गोल्डन रूल/नियम कहते हैं - One should never do something to others that one would regard as an injury to one's own self
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धः स धर्मः। (महर्षि गौतम)
अर्थात् जिन कर्मों से व्यक्ति का अभ्युदय ( सांसारिक उत्थान) व निःश्रेयस (पारलौकिक उत्थान) हो, उनका पालन करना ही धर्म कहलाता है।
धृतिःक्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्॥ (मनुस्मृति)
अर्थात् धृति (धैर्यधारण), क्षमा (हिंसा न करना), दम (तप), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (मानसिक विचारों की शुचिता/शुद्धि/पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह (एकादश इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाना), धी ( स्थिरबुद्धि), विद्या (सा विद्या या विमुक्तये, मोक्षदायिनी ज्ञान), सत्य (सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, सत्य व प्रिय बोलना) ये दश धर्म के लक्षण कहे गये हैं।
प्रत्येक देश-काल में यही मानवमात्र का सनातन (परम्परागत=मूल=प्राकृत) धर्म है।