06/01/2026
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।
हे रघुनाथजी! मेरे हृदय में आपके अतिरिक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैं सत्य कहता हूँ और आप तो सबके अंतर्यामी हैं। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी पूर्ण (निर्भर) भक्ति प्रदान करें। मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित करें।
🙏🏻⛳‼️जय सियाराम ‼️⛳🙏🏻