18/05/2026
जो कहावतें समाज में सैकड़ो वर्षों से प्रचलित हैं, उसे ही तो भाटी जी ने कहा राजकुमार भाटी जी के बयान से जो उन्होंने अपने बयान में एक जवाब में दिया है.....
सच बोलने के बाद भी बिना शर्त भाटी ने माफी भी मांग ली है जबकि इसी बयान में उन्होंने साफ कहा है कि हर ब्राह्मण बुरा नहीं होता कुछ अच्छे भी होते हैं।
मैं भी सहमत हूं राज कुमार भाटी जी के बयान से.... कि बिल्कुल सभी ब्राह्मण एक जैसे नहीं होते कुछ अच्छे होते हैं।जो हर समाज में पाए जाते हर जाति में पाए जाते हैं।
राज कुमार भाटी जी ने एक सवाल के जवाब में इस दोहा का उदाहरण दिया है जिसे उनके किसी मित्र ने कहा था,जब कुछ ब्राह्मण लोग पहले उनको ये दोहा बोल कर चिढ़ाया करते थे....
जब राज कुमार भाटी जी पत्रकारिता करते थे तब एक पत्रकार महोदय राज कुमार भाटी जी को एक दोहा सुनाकर चिढ़ाते थे कि.....
"गुर्जर अहीर कंजर
कुत्ता बिल्ली बंदर।
ये छै ना होते
तो खुले किवाड़ों सोते।
दूसरे पत्रकार ने जो पीडीए समाज से था, राज कुमार भाटी जी को एक दोहा बताया कि आप उन्हें यह सुना दिया करो.... कि
ब्राह्मण भला न वैश्या,
इनमें भला न कोय।
कोय कोय वैश्या भली,
पर ब्राह्मण भला न कोय।
(उपरोक्त कहावत इसलिए कही गयी है कि वैश्या जिससे सौदा करती है उससे दैहिक संबंध बनाती है लेकिन कर्मकांड, धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर ब्राह्मण आर्थिक दोहन करता है,चढ़ावा लेता है,पर वह यजमान का भला नहीं चाहता है, सिर्फ और सिर्फ आर्थिक लाभ अर्जित कर बेवकूफ बनाकर पीछे ही करता है।)
राज कुमार भाटी जी जातीय व्यवस्था पर बोल रहे थे जो समाज में फैली हुई हैं....
अब कुछ ब्राह्मण समाज के लोग उन्हें गालियां दे रहे हैं तो मैं उनसे पूछना चाहता हूं....
अहीर गड़रिया कुर्मी चोर,
धर सारे कय टंगरी तोड़ ...
कर कर्पूरी कर पूरा,
छोड़ गद्दी, धर उस्तरा।
दिल्ली से चमड़ा भेजा संदेश, बाल बनावे कर्पूरी भैंस चरावे राम नरेश।
अहीर गड़ेरिया पासी, तीनों सत्यानाशी।
अहिरम् लोधम् गड़रम् मल्लाहम्,
बिना गुनाहम् 10 पन्नाहम्.
अहीरे के बुद्धि 12 बजे खुलेला।
भर भुइहार अहीर के जाना, तीनो जाति पोश नहीं माना।
अहीर यादव समाज को दिन रात यदुमुल्ला बोलते हो,
ये सब कहावतें किसने कहीं क्यों कहीं क्या कभी इस स्तर पर इन मुहावरों का विरोध किया...?जवाब है नहीं!
तो फिर जब जवाब मिलता है तो क्यों बिलबिलाने लगते हो तुम लोग.....
याद रखना बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने कहा था कि शिक्षा वो शेरनी का दूध है इसे जो पियेगा दहाड़ेगा....
जैसे जैसे समाज जागरूक होगा वो तर्कशील होगा,हर सवाल हर मजाक हर गाली का वो जवाब देगा।
अगर दूसरों के प्रति आप हीन भावना रखते हो तो अपने लिए प्यार मोहब्बत स्नेह का अपेक्षा भूल जाओ।
अब समय बदल चुका है लोगों में चेतना आ गई है, लोग पढ़ने लगे हैं,जानने लगे हैं।
भाटी जी ने प्रसंगवश उक्त उद्धरण को दिया न कि जातीय विद्वेष भाव से, साहित्यिक विमर्श के दौरान उन्होंने कहा कि इस तरह के जो लोकोक्तियाँ, मुहावरे, कहावतें, दोहे आदि प्रचलित हैं, वे सामाजिक भाईचारा के लिए ठीक नहीं हैं।
भाटी जी के भाषण की छोटी सी क्लिप काटकर उन्हें जिस तरह एक जाति विशेष के द्वारा ट्रोल किया कराया जा रहा है, ये सब संघीय मानसिकता के हैं। रामचरित मानस में दर्जनों दोहे, चौपाइयाँ हैं जो निषाद, अहीर, कोल, वनवासी, भील, तेली, वाल्मीकि, कलवार आदि के विरुद्ध लिखी गयी हैं, उस पर भाटी का विरोध करने वाले गलत क्यों नहीं कहते? मनुस्मृति, व्यास स्मृति, पाराशर स्मृति आदि में शूद्र वर्ण की जातियों के विरोध में तमाम बातें लिखी गयी हैं, उस ये प्रतिक्रिया क्यों नहीं करते?
(डॉ यदुनाथ विश्वकर्मा)