Dr. Ekta Singh

Dr. Ekta Singh Asst.

Professor, Agronomy (CV Raman Awardee) ll " Certificate Excellence " as a Pathbreaker - Special Attendee Bharat Young Leaders Dialogue 2026 ll Icon of Bihar, 2026 ll World Research Fellow, UK ll FRSB, UK ll
Matribhasha Ratna ll

कुसुम किसलय कुञ्ज कोकिल,कूकते है फ़ाग में।तन और मन भीगे हुए हैं,प्रेम और अनुराग में।।तन प्रफुल्लित मन प्रफुल्लित,नित नए ...
04/03/2026

कुसुम किसलय कुञ्ज कोकिल,
कूकते है फ़ाग में।
तन और मन भीगे हुए हैं,
प्रेम और अनुराग में।।
तन प्रफुल्लित मन प्रफुल्लित,
नित नए उत्सर्ग में।
ईश् अनुकम्पा बिखेरे,
होलिका के पर्व में।।

आप को सपरिवार रंगपर्व होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं। 🙏💐☺️

— डा. एकता सिंह

01/03/2026

चित्रकूट की पुण्यभूमि पर स्थित महर्षि वाल्मीकि तपोस्थली

भारत की आध्यात्मिक चेतना के आकाश में चित्रकूट एक दीप्तिमान नक्षत्र की भाँति आलोकित है। विंध्याचल की गोद में अवस्थित यह पावन धरा केवल भौगोलिक स्थल नहीं, अपितु तप, त्याग, साधना और दिव्य अनुभूति की शाश्वत गाथा है। इसी पुण्यभूमि पर स्थित है महर्षि वाल्मीकि की तपोस्थली— वह स्थान जहाँ आत्मचिंतन, साधना और ज्ञान की अखंड ज्योति प्रज्वलित हुई।

पौराणिक प्रमाणों के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि ने यहीं कठोर तप कर आत्मबोध की परम अवस्था प्राप्त की और मानव सभ्यता को रामायण जैसा अमर महाकाव्य प्रदान किया। यह वही काव्य है जिसने न केवल धर्म, नीति और आदर्श जीवन का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा को शब्दों में ढालकर युगों-युगों तक अमर कर दिया।

चित्रकूट का नाम आते ही स्मरण होता है वनवास काल का, जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने इस धरती को अपने चरणों से पवित्र किया। यहाँ की पर्वत-श्रृंखलाएँ, निर्झरिणियाँ और वनखंड आज भी उस दिव्य कालखण्ड की मौन साक्षी प्रतीत होते हैं। लोकविश्वास और शास्त्रीय उल्लेख इस क्षेत्र को ऋषि-मुनियों की तपोभूमि सिद्ध करते हैं।

पौराणिक साक्ष्य और सांस्कृतिक विरासत
पुराणों एवं रामायण में वर्णित चित्रकूट की महिमा इसे अद्वितीय बनाती है। यहाँ की प्रत्येक शिला, प्रत्येक सरिता और प्रत्येक कण में आध्यात्मिक ऊर्जा का स्पंदन अनुभव किया जा सकता है। यह स्थल केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का जीवंत प्रतीक है।

सांस्कृतिक पर्यटन के समग्र विकास की आवश्यकता

इतिहास, आस्था और साहित्यिक गौरव से परिपूर्ण इस तपोस्थली का संरक्षण एवं सुव्यवस्थित विकास वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि यहाँ
प्राचीन स्थलों का वैज्ञानिक संरक्षण एवं प्रामाणिक अभिलेखन
स्वच्छ, सुसज्जित एवं पर्यावरण-अनुकूल परिसर का निर्माण
पौराणिक शोध संस्थान एवं साहित्यिक अध्ययन केंद्र की स्थापना

तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों हेतु आधुनिक सुविधाओं का विस्तार
वार्षिक सांस्कृतिक महोत्सव, रामायण संगोष्ठी एवं आध्यात्मिक आयोजन

जैसी योजनाओं को क्रियान्वित किया जाए, तो चित्रकूट राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आध्यात्मिक पर्यटन का आदर्श केंद्र बन सकता है। इससे स्थानीय संस्कृति, हस्तशिल्प और अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ आधार प्राप्त होगा।

आह्वान
महर्षि वाल्मीकि की तपोस्थली केवल अतीत की स्मृति न बने, बल्कि भविष्य की प्रेरणा बने— यही हमारा संकल्प होना चाहिए। इस पावन भूमि का संरक्षण, संवर्धन और सुविचारित विकास ही हमारी सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण होगा।
चित्रकूट की यह दिव्य धरा आज भी साधना, समर्पण और सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा देती है। आइए, हम सब मिलकर इस अमूल्य विरासत को सुरक्षित रखें और इसे विश्व-पटल पर उसके यथोचित गौरव के साथ प्रतिष्ठित करें।
जय चित्रकूट! 🙏

28/02/2026

पावन चित्रकूट और माँ मंदाकिनी – आस्था, तप और संस्कृति की अमर धारा

चित्रकूट भारत की उस दिव्य तपोभूमि का नाम है, जहाँ हर कण में भक्ति, त्याग और मर्यादा की गूंज सुनाई देती है। यहाँ बहने वाली पावन माँ मंदाकिनी (पयस्वनी) केवल एक नदी नहीं, बल्कि सदियों से प्रवाहित होती आध्यात्मिक चेतना है।
मंदाकिनी का उद्गम स्थल उस पवित्र क्षेत्र में माना जाता है जहाँ स्थित है सती अनुसुइया आश्रम। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही वह तपोभूमि है जहाँ माता अनुसुइया ने अपनी अद्वितीय पतिव्रता शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बाल रूप में परिवर्तित कर दिया था। यह प्रसंग भारतीय संस्कृति में नारी की तपस्या, मर्यादा और दिव्य सामर्थ्य का अद्वितीय प्रतीक है।
इसी पावन स्थल से निकली मंदाकिनी की निर्मल जलधारा आश्रम के समीप से प्रवाहित होती हुई चित्रकूट की धरा को पवित्र करती है।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में चित्रकूट की महिमा

का वर्णन करते हुए प्रभु श्रीराम के मुख से कहलवाया—

“चित्रकूट गिरि करहु निवासू।”

अर्थात्, चित्रकूट पर्वत को ही अपना निवास बनाइए।
यह पंक्ति केवल निवास का संकेत नहीं, बल्कि इस भूमि की आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति का प्रमाण है।
चित्रकूट वही पावन स्थान है जहाँ प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने वनवास का महत्वपूर्ण समय व्यतीत किया। मंदाकिनी के तट पर उनका जीवन, तप और मर्यादा आज भी

श्रद्धालुओं को प्रेरित करता है।

मंदाकिनी की धारा हमें सिखाती है—
शांत रहकर भी गहराई बनाए रखना,
निर्मल रहकर भी निरंतर प्रवाहित होना,
और अपनी जड़ों से जुड़े रहना।
आइए, हम सब मिलकर इस पवित्र धरा और माँ मंदाकिनी की गरिमा को बनाए रखें।
इसकी स्वच्छता, पवित्रता और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करना ही हमारी सच्ची श्रद्धा है।

चित्रकूट की मंदाकिनी – जहाँ आस्था बहती है, इतिहास बोलता है और संस्कृति जीवित है।

28/02/2026

चित्रकूट में बहने वाली मंदाकिनी नदी (जिसे पयस्वनी के नाम से भी जाना जाता है) का उद्गम स्थल.... चित्रकूट (मध्य प्रदेश )

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार "सती अनुसुइया आश्रम" के पास माना जाता है....भौगोलिक दृष्टि से यह नदी मध्य प्रदेश के सतना जिले (पन्ना जिले के इटवा खास गांव के पास) के क्षेत्रों से निकलती है, जहाँ से यह चित्रकूट पहुँचती है।

ध्यान देने योग्य: भारत में 'मंदाकिनी' नाम की एक अन्य प्रसिद्ध नदी उत्तराखंड में है जिसका उद्गम... केदारनाथ के निकट, "चाराबाड़ी हिमनद" (ग्लेशियर) है।

अतः चित्रकूट वाली मंदाकिनी और उत्तराखंड वाली मंदाकिनी दो अलग-अलग नदियाँ हैं।

28/02/2026

विज्ञान दिवस पर प्रेरणादायी संदेश

चित्रकूट की पावन धरती पर बहने वाली मंदाकिनी (पयस्वनी) केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी आस्था, संस्कृति, इतिहास और जीवन का आधार है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका संबंध सती अनुसुइया आश्रम से माना जाता है, वहीं भौगोलिक दृष्टि से इसका उद्गम मध्यप्रदेश के सतना जिला क्षेत्र से होता है। यह पावन धारा सदियों से चित्रकूट की पहचान और श्रद्धा का केंद्र रही है।
विज्ञान दिवस के अवसर पर मैं यह कहना चाहती हूँ कि आस्था और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। विज्ञान हमें सिखाता है कि नदी केवल बहता हुआ जल नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है—जिसमें जल, मृदा, वनस्पति, जलीय जीव और मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। जब हम नदी में प्लास्टिक, कचरा, पूजा सामग्री या अन्य अपशिष्ट डालते हैं, तो हम इस संतुलन को नष्ट करते हैं। इसका परिणाम जल प्रदूषण, बीमारियों का बढ़ता खतरा और जलीय जीवन के विनाश के रूप में सामने आता है।
आज आवश्यकता है कि हम भावनात्मक श्रद्धा के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी अपनाएँ। यदि हम सच में मंदाकिनी को माँ मानते हैं, तो उसकी स्वच्छता और संरक्षण को अपना नैतिक कर्तव्य समझें।
मैं सभी नागरिकों, विद्यार्थियों, युवाओं और समाजसेवियों से आग्रह करती हूँ कि—
🔹 नदी में किसी भी प्रकार का कचरा न डालें।
🔹 घाटों पर स्वच्छता बनाए रखने में सक्रिय सहयोग दें।
🔹 पूजा सामग्री के लिए निर्धारित स्थानों का उपयोग करें।
🔹 प्लास्टिक के उपयोग को कम करें और पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाएँ।
🔹 स्वच्छता एवं जल संरक्षण से जुड़े जनजागरूकता अभियानों में भाग लें।
याद रखिए, स्वच्छ नदी केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का भी प्रश्न है।
आइए, इस विज्ञान दिवस पर हम सामूहिक संकल्प लें—
स्वच्छ मंदाकिनी, स्वस्थ समाज और सुरक्षित भविष्य की दिशा में हर संभव प्रयास करेंगे।
🌊 आस्था के साथ विज्ञान, और श्रद्धा के साथ जिम्मेदारी — यही सच्ची प्रगति है। ✨

21/02/2026

😊☺️🙏

आभार ☺️🙏
20/02/2026

आभार ☺️🙏

☺️🙏
18/02/2026

☺️🙏

🙏😊
17/02/2026

🙏😊

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Lucknow
462022

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