28/02/2026
विज्ञान दिवस पर प्रेरणादायी संदेश
चित्रकूट की पावन धरती पर बहने वाली मंदाकिनी (पयस्वनी) केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी आस्था, संस्कृति, इतिहास और जीवन का आधार है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका संबंध सती अनुसुइया आश्रम से माना जाता है, वहीं भौगोलिक दृष्टि से इसका उद्गम मध्यप्रदेश के सतना जिला क्षेत्र से होता है। यह पावन धारा सदियों से चित्रकूट की पहचान और श्रद्धा का केंद्र रही है।
विज्ञान दिवस के अवसर पर मैं यह कहना चाहती हूँ कि आस्था और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। विज्ञान हमें सिखाता है कि नदी केवल बहता हुआ जल नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है—जिसमें जल, मृदा, वनस्पति, जलीय जीव और मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। जब हम नदी में प्लास्टिक, कचरा, पूजा सामग्री या अन्य अपशिष्ट डालते हैं, तो हम इस संतुलन को नष्ट करते हैं। इसका परिणाम जल प्रदूषण, बीमारियों का बढ़ता खतरा और जलीय जीवन के विनाश के रूप में सामने आता है।
आज आवश्यकता है कि हम भावनात्मक श्रद्धा के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी अपनाएँ। यदि हम सच में मंदाकिनी को माँ मानते हैं, तो उसकी स्वच्छता और संरक्षण को अपना नैतिक कर्तव्य समझें।
मैं सभी नागरिकों, विद्यार्थियों, युवाओं और समाजसेवियों से आग्रह करती हूँ कि—
🔹 नदी में किसी भी प्रकार का कचरा न डालें।
🔹 घाटों पर स्वच्छता बनाए रखने में सक्रिय सहयोग दें।
🔹 पूजा सामग्री के लिए निर्धारित स्थानों का उपयोग करें।
🔹 प्लास्टिक के उपयोग को कम करें और पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाएँ।
🔹 स्वच्छता एवं जल संरक्षण से जुड़े जनजागरूकता अभियानों में भाग लें।
याद रखिए, स्वच्छ नदी केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का भी प्रश्न है।
आइए, इस विज्ञान दिवस पर हम सामूहिक संकल्प लें—
स्वच्छ मंदाकिनी, स्वस्थ समाज और सुरक्षित भविष्य की दिशा में हर संभव प्रयास करेंगे।
🌊 आस्था के साथ विज्ञान, और श्रद्धा के साथ जिम्मेदारी — यही सच्ची प्रगति है। ✨