Rajan Bhardhwaj Astrologer

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Aquamarine Gem Stone
16/01/2023

Aquamarine Gem Stone

Aquamarine Gem Stone Rich Gems House+91-98724-88379

14/01/2023
20/06/2020

कंकण (चूड़ामणि) सूर्य ग्रहण
21 जून, 2020

ग्रहण शुरू 09:15 AM
कंकण शुरू 10:17 AM
मध्य 12:10 PM
कंकण समाप्त 02:02 PM
ग्रहण समाप्त 03:04 PM
ग्रहण का सूतक 20-जून, 2020 की रात को 9:16 PM शुरू हो जायेगा।
ग्रहण के समय की सावधानियाँ
1 सूतक एवं ग्रहणकाल में मूर्ति को हाथ न लगाये। अनावश्यक खाना-पीना, मैथुन, नाखून काटना, तैलमर्दन वर्जित है।
2 रोगी, बालक, गर्भवती, बजुर्ग वयक्ति भोजन या दवाई ले सकता हैं।
3 गर्भवती महिला ग्रहणकाल में काटने या सीलने वाला काम जैसे सब्जी काटना, कपड़े सीना आदि काम न करें। गर्भवती महिलाओं को धार्मिक पुस्तकों का पाठ करना चाहिए।
4 ग्रहण को कभी भी नग्न आंखों से न देखें।
5.पक्का हुआ अन्न, कटी हुई सब्जी, ग्रहणकाल में दूषित हो जाते हैं, उन्हें नहीं रखना चाहिए। परन्तु तेल, घी, दूध, लस्सी, पनीर, चटनी आदि में तिल या कुशा ऱख देने से दूषित नहीं होते। सूखे खाने वाली चीजों में तिल या कुशा डालने की अावश्यकता नही।
सभी लोगों को ग्रहणकाल में जप-तप, पूजा-पाठ करना आवश्यक हैं। यह ग्रहण मृगशिरा , आर्द्रा नक्षत्र और मिथुन राशि में घटित होगा। इस कारण इन नक्षत्र और राशि वालो को विशेष स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।
मिथुन, धनु, राशि वालों को पूजा पाठ आवश्य करना चाहिए।

04/06/2020

चन्द्रमा के उपच्छाया ग्रहण ( वर्ष 2020)

5/6 जून 2020
5 जुलाई 2020
30 नवम्बर 2020
चंद्र - मालिन्य ( Penumbra)
उपच्छाया ग्रहण :- उपच्छाया ग्रहण वास्तव में चंद्र ग्रहण नहीं होता। प्रत्येक चंद्र ग्रहण के घटित होने से पहिले चंद्रमा पृथ्वी की उपच्छाया में अवश्य प्रवेश करता है, जिसे चन्द्र -मालिन्य अथवा इंग्लिश में (Penumbra) भी कहा जाता है। उसके बाद ही वह पृथ्वी की वास्तविक छाया [ दूसरे शब्दों में भूभा (umbra) ] में प्रवेश करता है। तभी उसे वास्तविक ग्रहण कहा जाता है। भूभा में चन्द्रमा के संक्रमणकाल को चन्द्र ग्रहण कहा जाता है।
ध्यान रहे, कई बार पूर्णिमा को चन्द्रमा उपच्छाया में प्रवेश कर, उपच्छाया शंकु से ही बाहर निकल जाता है। इस उपच्छाया के समय चन्द्रमा का बिम्ब केवल धुन्धला पडता है, काला नहीं होता तथा इस धुधंलेपन को साधारण नंगी आँख से देख पाना संभव नहीं होता। धर्म शास्त्रकारों ने इस प्रकार के उप-ग्रहणों (उपच्छाया) में चन्द्र बिम्ब पर मालिन्य मात्र छाया आने के कारण उन्हें ग्रहण की कोटि में नहीं रखा।
गत कुछ वर्षों से टी.वी. चैनलों तथा कुछ समाचार पत्रों द्वारा अपनी T. R. P. को बढाने के उद्देश्य से उपरोक्त उपछाया ग्रहणों को भी ग्रहण की कोटि में प्रदर्शित कर उनका प्रचार -प्रसार किया जा रहा है। और वहाँ बैठे एंकरों तथा अल्पज्ञ ज्योतिषी के द्वारा इन उपच्छाया ग्रहणों व्दारा 12 राशियों पर पडने वाले काल्पनिक प्रभावों का वर्णन भी कर देते हैं। ऐसे में लोग गुमराह और भयभीत होते हैं। अतः आप बिना कारण बहम न करें।
Rajan Bhardhwaj (Astrologer)
E-mail: bestastrologer4u@gmail.com

हनुमान चालीसा तुलसीदास की अवधी में लिखी एक काव्यात्मक कृति है जिसमें प्रभु राम के महान भक्त हनुमान के गुणों एवं कार्यों ...
08/04/2020

हनुमान चालीसा तुलसीदास की अवधी में लिखी एक काव्यात्मक कृति है जिसमें प्रभु राम के महान भक्त हनुमान के गुणों एवं कार्यों का चालीस चौपाइयों में वर्णन है। यह अत्यन्त लघु रचना है जिसमें पवनपुत्र श्री हनुमान जी की सुन्दर स्तुति की गई है। इसमें बजरंग बली‍ की भावपूर्ण वन्दना तो है ही, श्रीराम का व्यक्तित्व भी सरल शब्दों में उकेरा गया है।

'चालीसा' शब्द से अभिप्राय 'चालीस' (४०) का है क्योंकि इस स्तुति में ४० छन्द हैं (परिचय के २ दोहों को छोड़कर)।

वैसे तो पूरे भारत में यह लोकप्रिय है किन्तु विशेष रूप से उत्तर भारत में यह बहुत प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय है। लगभग सभी हिन्दुओं को यह कण्ठस्थ होती है। हिन्दू धर्म में हनुमान जी को वीरता, भक्ति और साहस की प्रतिमूर्ति माना जाता है। शिव जी के रुद्रावतार माने जाने वाले हनुमान जी को बजरंगबली, पवनपुत्र, मारुतीनन्दन, केसरी नंदन आदि नामों से भी जाना जाता है। मान्यता है कि हनुमान जी अजर-अमर हैं। हनुमान जी को प्रतिदिन याद करने और उनके मन्त्र जाप करने से मनुष्य के सभी भय दूर होते हैं। कहा जाता है कि हनुमान चालीसा के पाठ से भय दूर होता है, क्लेश मिटते हैं। इसके गम्भीर भावों पर विचार करने से मन में श्रेष्ठ ज्ञान के साथ भक्तिभाव जाग्रत होता है।

दोहा :-

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार

चौपाई:-
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥

शंकर सुवन केसरी नंदन तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥

विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया राम लखन सीता मनबसिया॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥

लाय सजीवन लखन जियाए श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावै अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥

आपन तेज सम्हारो आपै तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥

भूत पिशाच निकट नहि आवै महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥

नासै रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥

संकट तै हनुमान छुडावै मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥

चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥

साधु संत के तुम रखवारे असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता॥३१॥

राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥

तुम्हरे भजन राम को पावै जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥

अंतकाल रघुवरपुर जाई जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥

और देवता चित्त ना धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥

संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥

जै जै जै हनुमान गुसाईँ कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥
दोहा :-
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

08/02/2020

Saturn in the Signs
Let me explore some of the astrological features of Saturn and how he Functions in the 12 Zodiacal Signs.
1.Aries:Is wrathful, does evil deeds and is devoid of any virtue.2.Taurus:Suffers due to his wickedness and foolishness. Servility is the key characteristics of this person.
3.Gemini:Spends his time travelling;lives away from the native place and is secretive, deceitful, angry, mean and lustful.
4.Cancer:Full of contradiction, childhood is full of struggles, lacks maternal love and suffers from ill-health.
5.Leo:Committed to study, research and writing;enjoys conjugal happiness and gets wealth and honour from Spouse's family.
6.Virgo: Has a lean body, is reticent, affluent but disconnected, ambitious and arrogant.
7.Libra: Poised favourably for material prosperity, has a strong inclination for worldly and sensual pleasures and acquires name and fame.
8.Scorpio:Misappropriates wealth of others, Performs mean acts, life is full of hurdles, cruel, wrathful, avaricious and arrogant.
9.Sagittarius: Is soft spoken, reticent, given to scholarly pursuits and well versed in various disciplines.
10.capricorn: Fond of good places and ornaments, gets wealth, is extremely industrious and has sound knowledge of arts.
11.Aquarius: Crooked, lethargic, deceitful and unethical. Companions will also be mischievous.
12.Pisces: Is wealthy and becomes eminent in his family and among his relatives, is ethical, crafty and a connoisseurs of gems.

Astrologer:Rajan Bhardhwaj
E-mail:bestastrologer4u@gmail.com

कालसर्प  योगपरिभाषा :- जन्म कुंडली में सभी ग्रह राहु से केतु के बीच में हो तो कालसर्प योग होता है |अगर एक भी ग्रह राहु स...
30/01/2020

कालसर्प योग
परिभाषा :- जन्म कुंडली में सभी ग्रह राहु से केतु के बीच में हो तो कालसर्प योग होता है |
अगर एक भी ग्रह राहु से बाहर हो तो कालसर्प योग नही होता | इसमें ग्रह की डिग्रीज पर भी विचार किया जाता है |
कालसर्प योग का फल :-
कालसर्प योग में पैदा हुए व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता है ।संतान उत्पत्ति में बाधा आती है।इसके काम भी कठिनई से बनते हैं। परिवार के सदस्यों से वियोग या वाद-विवाद पैदा होता है। परंतु याद रहे, कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। किस भाव में कौन सी राशि अवस्थित है और उसमें कौन-कौन ग्रह कहाँ बैठे हैं और उनका बलाबल कितना है - इन सब बातों का भी संबंधित जातक पर भरपूर असर पड़ता है। इसलिए मात्र कालसर्प योग सुनकर भयभीत हो जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुद्धिमत्ता कही जायेगी।

कालसर्प योग की स्थितियां
जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भ्रम की बीमारी सताती रहती हो, या उसे हमेशा लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुँचा सकता है या वह व्यक्ति मानसिक तौर पर पीड़ित रहता है।

जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है।

जब कालसर्प योग में राहु के साथ शुक्र की युति हो तो जातक को संतान संबंधी ग्रह बाधा होती है।

जब लग्न व लग्नेश पीड़ित हो, तब भी जातक शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है।

चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है।

जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है।

जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है।

जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।

जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियाँ बढ़ती हैं।

जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।

जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, या देरी होती है।

यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्ति में भी फंसना पड़ जाता है।

जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है।

जब दशम भाव का नवांशेश मंगल/राहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक को हमेशा अग्नि से भय रहता है और अग्नि से सावधान भी रहना चाहिए।

जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है।

जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंधित जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो।

जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1ले 3रे 4थे 5वें 6ठे 7वें 8वें 11वें या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्री, पुत्र, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है।

जब राहु छठे भाव में हो तथा बृहस्पति केंद्र में हो तब जातक का जीवन खुशहाल व्यतीत होता है।

जब राहु व चंद्रमा की युति केंद्र (1ले 4थे 7वें 10वें भाव) या त्रिकोण में हो तब जातक के जीवन में सुख-समृद्धि की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।

लेखक : राजन भारद्वाज
मोबाईल:98724-88379, 9877079026

E-mail:
bestastrologer4u@gmail.com

16/01/2020

शनि की साढे़साती और उपाय

शनि देव 24 जनवरी 2020 सन् में मकर राशि में संचार करेंगे। तारीख 11 मई, 2020 को मकर राशि में ही वक्री होकर 29 सितंबर, 2020 सन् से मार्गी होकर संचार करेंगे |
धनु, मकर, कुम्भ राशि वाले जातक/जातिकाओं पर शनि की साढेसाती का प्रभाव रहेगा।
शनि की साढ़े साती, भारतीय ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से एक ग्रह, शनि की साढेसाती साढेसात ( ​7 -1⁄2)वर्ष चलने वाली एक प्रकार की ग्रह गोचर दशा होती है। ज्योतिष एवं खगोलशास्त्र के नियमानुसार सभी ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते रहते हैं। इस प्रकार जब शनि ग्रह चन्द्रलग्न से बारहवीं राशि में प्रवेश करते है तो उस विशेष राशि से अगली दो राशि में गुजरते हुए अपना समय चक्र पूरा करता है।[1] शनि की धीमी गति से चलने के कारण ये ग्रह एक राशि में लगभग ढाई वर्ष यात्रा करता है, इस प्रकार एक वर्तमान के पहले एक पिछले तथा एक अगले ग्रह पर प्रभाव डालते हुए ये तीन गुणा, अर्थात साढ़े सात वर्ष की अवधि का काल साढ़े सात वर्ष का होता है। भारतीय ज्योतिष में इसे ही साढ़े साती के नाम से जाना जाता है।
साढ़े साती के आरम्भ होने के बारे में कई मान्यताएं हैं। एक प्राचीन मान्यता के अनुसार जिस दिन शनि किसी विशेष राशि में होता है उस दिन से शनि की साढ़े साती शुरू हो जाती है। एक अन्य मान्यता यह भी है कि शनि जन्म राशि के बाद जिस भी राशि में प्रवेश करता है, साढ़े साती का समय आरम्भ हो जाती है और जब शनि जन्म से दूसरे स्थान को पार कर जाता है तब इसकी दशा से मुक्ति मिल जाती है। ज्योतिषविद शनि के आरम्भ और समाप्ति को लेकर एक गणितीय विधि का आकलन करते हैं, जिसमें साढ़े साती के आरम्भ होने के समय और समाप्ति के समय के अनुमान हेतु चन्द्रमा के स्पष्ट अंशों की आवश्यकता होती है। चन्द्रमा को इस विधि में केन्द्र मान लिया जाता है। इस प्रकार साढ़े साती की अवधि में शनि तीन राशियों से निकलता है, तो तीनों राशियों के अंशों के कुल समय को दो भागों में विभाजित कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया में चन्द्र से दोनों तरफ एक-एक अंश की दूरी बनती है।शनि जब इस अंश के आरम्भ बिन्दु पर पहुंचता है तब साढ़े साती का आरम्भ माना जाता है और जब अंतिम अंश को पार कर जाता है तब इसका अंत माना जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अलग अलग राशियों के व्यक्तियों में इसका प्रभाव भी अलग अलग होता है। कुछ व्यक्तियों को साढ़े साती आरम्भ होने के कुछ समय पूर्व ही इसके संकेत मिल जाते हैं और अवधि समाप्त होने से पूर्व ही उसके प्रभावों से मुक्त हो जाते हैं, वहीं कुछ लोगों को देर से शनि का प्रभाव दिखाई पड़ता है और साढ़े साती समाप्त होन के कुछ समय बाद तक इसके प्रभाव समाप्त होते हैं। उनके अनुसार साढ़े साती के संदर्भ में कुण्डली में जन्म चन्द्र से द्वादश स्थान का विशेष महत्व है। इस स्थान का महत्व अधिक इसलिये हैं कि द्वादश स्थान चन्द्र रशि के निकट होता है। ज्योतिष में द्वादश स्थान से काल पुरूष के पैरों का विश्लेषण किया जाता है तो दूसरी ओर बुद्धि पर भी इसका प्रभाव होता है।
सरल उपाय :-
ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार कुछ विशेष प्रकार की घटनाएं होती हैं जिनसे साढ़े साती चालू होने के संकेत मिलते हैं। इस दौरान असामान्य घटानाओं से आभास हो सकता है कि अवधि चालू है।ज्योतिषाचार्य इसके प्रभाव से बचने हेतु कई उपाय बताते हैं:

1) कहते हैं कि शिव की उपासना करने वालों को इससे राहत मिलती है। अत: नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा व अराधना करनी चाहिए। (2) पीपल वृक्ष शिव का रूप माना जाता है, वैसे इसमें सभी देवताओं का निवास मानते हैं, अतः पीपल को अर्घ्र देने से शनि देव प्रसन्न होते हैं। (3)अनुराधा नक्षत्र में अमावस्या हो और शनिवार का योग हो, उस दिन तेल, तिल सहित विधि पूर्वक पीपल वृक्ष की पूजा करने से मुक्ति मिलती है।(4)शनिदेव की प्रसन्नता हेतु शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। इसके अलावा हनुमान जी को भी रुद्रावतार माना जाता है। अतः उनकी आराधना भी इसके निवारण हेतु फ़लदायी होती है। (5)मान्यता अनुसार नाव के तले में लगी कील और काले घोड़े का नाल भी इसमें सार्थक उपाय होते हैं। इनकी अंगूठी बनवाकर धारण कर सकते हैं। शनि से संबंधित वस्तुएं, जैसे लोहे के बर्तन, काला कपड़ा, सरसों का तेल, चमड़े के जूते, काला सुरमा, काले चने, काले तिल, उड़द की साबूत दाल, आदि शनिवार के दिन दान करने से एवं काले वस्त्र एवं काली वस्तुओं का दान करने से शनि की प्रसन्नता प्राप्त होती है।इसके अलावा अन्य उपाय भी बताये जाते हैं। शनि की दशा और साढेसाती से बचने हेतु किसी योग्य पंडित से महामृत्युंजय मंत्र द्वारा शिव का अभिषेक कराएं तो भी मुक्ति मिलना संभव होता है।
Astrologer : Rajan Bhardhwaj
E-mail :- bestastrologer4u@gmail.com

मां के इस अनोखे मंदिर में जमीन पर सोने से महिलाएं हो जाती हैं गर्भवती |हर स्त्री के लिए मां बनना सौभाग्य होता है। लेकिन ...
06/01/2020

मां के इस अनोखे मंदिर में जमीन पर सोने से महिलाएं हो जाती हैं गर्भवती |

हर स्त्री के लिए मां बनना सौभाग्य होता है। लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण कई महिलाओं को ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हो पाता। लेकिन हिमाचल प्रदेश के सिमसा में स्थित एक मंदिर है जहां माता सिमसा महिलाओं को गर्भवती होने का आशीर्वाद देती हैं। कहा जाता है की इस मंदिर में संतानहीन लोगों को संतान सुख का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां सिमसा का यह मंदिर हिमाचल प्रदेश की दुर्गम पहाड़ियों के बीच सिमस गांव में स्थित है। मान्यताओं के अनुसार बताया जाता है की इस मंदिर के फर्श पर जो महिलाएं सोती हैं वे गर्भवती हो जाती है। देवी सिमसा खुद अपने भक्तों के सपनों में आकर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देतीं हैं।

हिमाचल स्थित यह चमत्कारी मंदिर संतानदात्री के नाम से प्रसिद्ध है। लोगों की आस्था का केंद्र इस मंदिर में लोग अपनी मुरादें लेकर आते हैं। हर वर्ष यहाँ सैंकड़ो नि:सन्तान दंपति संतान पाने की इच्छा लेकर माता सिमसा के दरबार में आते हैं। माता सिमसा मंदिर में नवरात्रों में होने वाले इस विशेष उत्सव को स्थानीय भाषा में “सलिन्दरा” कहा जाता है। सलिन्दरा का अर्थ है स्वप्न अथवा ड्रीम। इस समय नि:संतान महिलाएं दिन रात मंदिर के फर्श पर सोती हैं। कहते हैं कि ऐसा करने से वो जल्द से जल्द प्रेगनेंट हो जाती हैं। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि माता सिमसा सपने में महिला को फल देती हैं तो उस महिला को संतान का आशीर्वाद मिल जाता है।
स्वप्न में देती हैं लड़का या लड़की का संकेत
मान्यता के अनुसार, यदि कोई महिला स्वप्न में कोई कंद-मूल या फल प्राप्त करती है तो उस महिला को संतान का आशीर्वाद मिल जाता है। देवी सिमसा आने वाली संतान के लिंग-निर्धारण का भी संकेत देती है। जैसे कि, यदि किसी महिला को अमरुद का फल मिलता है तो समझ लें कि लड़का होगा। अगर किसी को स्वप्न में भिन्डी प्राप्त होती है तो समझें कि संतान के रूप में लड़की प्राप्त होगी. यदि किसी को धातु, लकड़ी या पत्थर की बनी कोई वस्तु प्राप्त हो तो समझा जाता है कि उसके संतान नहीं होगी।
स्वप्न मिलने के बाद महिला को तुरंत ही धरना व मंदिर परिसर छोड़ देती हैं। कहा जाता है की यदि स्वप्न के बाद भी यदि कोई महिला अपना बिस्तर मंदिर परिसर से नहीं हटाती तो उसे शरीर में खुजली होने लगती है और साथ ही उसे लाल दाग हो जाते हैं। जिसके कारण उसे वहां से जाना पड़ता है।

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