Dr munjal's diagnostic centre

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नई दिल्ली:डेंगू ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। डेंगू ने दिल्ली में दस्तक दी है। राजधानी में डेंगू के 29 नए मामले सा...
25/10/2012

नई दिल्ली:डेंगू ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। डेंगू ने दिल्ली में दस्तक दी है। राजधानी में डेंगू के 29 नए मामले सामने आए। इसके साथ अब तक दिल्ली में डेंगू के कुल 169 मरीजों की संख्या हो गई है। एक दिन में आने वाले मामलों में यह इस मौसम में सबसे ज्यादा संख्या है। हालांकि इस बीमारी से अब तक एक की मौत हुई है। नगर निकायों के अनुसार, नजफगढ़ को छोड़कर दक्षिण, उत्तर और पूर्वी दिल्ली नगर निगमों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में ऐसे मामले सामने आए हैं।

हालांकि इनमें किसी की मौत की खबर नहीं है। शनिवार को दिल्ली में डेंगू के मरीजों की कुल संख्या 140 थी, जो रविवार को बढ़कर 169 हो गई है। इनमें से तीन मरीज दिल्ली के बाहर के हैं। इनमें से दक्षिण और मध्य क्षेत्रों में डेंगू के 20-20 मामले देखने को मिले और करोलबाग व सिविल लाइंस में 19-19 मामले सामने आए। पिछले महीने डेंगू से एक बच्ची की मौत भी हो गई थी। पिछले साल राजधानी में 216 डेंगू के मामले देखने को मिले थे, जिनमें से आठ दिल्ली के बाहर के थे।

जब की तीन की मौत हो गई थी। 2010 में डेंगू के 4108 मरीजों में पांच की मौत हो गई थी। मरीजों में 24 दिल्ली के बाहर के थे। 2009 में 29 डेंगू के मरीज थे। 2008 में डेंगू के 50 मरीजों को डेंगू हुआ था, इनमें से दो की मौत भी हो गई थी। एमसीडी के एक अधिकारी ने बताया कि इस साल अब तक छह मामले चिकनगुनिया के आ चुके हैं। पिछले साल इसी अवधि के दौरान चिकनगुनिया के 10 मामले आए थे।

डेंगू के लक्षण इस प्रकार से हैं-

*ठंड लगती है और तेज बुखार होता है।

*सिर, मांसपेशियों, गले व आंखों में दर्द रहता है।

*कमजोरी होती है, भूख भी कम लगती है, मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है।

*शरीर पर लाल या गुलाबी रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं।

इलाज
*डिस्प्रिन, एस्प्रिन या कोई भी पेनकिलर न लें, इससे प्लेटलेट्स काउंट एकदम नीचे जा सकता है।

*राहत के लिए पैरासिटामोल ले सकते हैं लेकिन तुरंत डॉक्टर से मिलें।

बचाव के उपाय
*घर या ऑफिस के आस-पास पानी जमा न होने दें।

*जमा पानी में केरोसिन तेल डाल दें व मच्छरदानी का प्रयोग करें।

*कूलर को सुखाकर रख दें या हर हफ्ते पानी बदलें।

*घर में टूटे-फूटे डिब्बे, टायर, बर्तन आदि न रखें।

*पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें।

मादा एडीज इजिप्टी मच्छर : इनके शरीर पर चीते जैसी धारियां होती हैं, इनका हमला दिन के समय और ज्यादातर समय घुटने से ऊपर होता है।

डेंगू और मलेरिया में अंतर
डेंगू में मरीज को लगातार सात दिनों तक तेज बुखार रह सकता है, जबकि मलेरिया में तीन स्तर पर बुखार होता है। पहले ठंड लगती है, फिर गर्मी का एहसास होता है, पसीना आता है और मरीज को कंपकपी होती है। डेंगू व मलेरिया का मच्छर साफ पानी में पनपता है, लेकिन डेंगू के मच्छर दिन में लोगों को काटता है और मलेरिया के मच्छर रात में। डेंगू होने पर मरीज के सिर और मांसपेशियों में दर्द, गले और आंखों में दर्द, कमजोरी, भूख न लगाना और शरीर पर लाल रंग के चकत्ते नजर आने लगते हैं, जबकि मलेरिया में तेज ठंड, एनिमिया, जोड़ों में दर्द।

मेलबर्न:एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि गाय के दूध को आसानी से एक ऐसी क्रीम में बदला जा सकता है जो मानव को एचआईवी स...
25/10/2012

मेलबर्न:एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि गाय के दूध को आसानी से एक ऐसी क्रीम में बदला जा सकता है जो मानव को एचआईवी से बचा सकता है। मेलबर्न विश्वविद्यालय के प्रमुख वैज्ञानिक मारिट क्रामस्की ने पाया कि जब गर्भवती गायों को एचआईवी प्रोटीन का इंजेक्शन दिया गया तो उसने उच्च स्तर की रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला दूध दिया जो नवजात बछड़े को बीमारी से बचाता है।

इस गाय द्वारा बछड़े को जन्म दिये जाने के बाद पहली बार दिए गए दूध को कोलोस्ट्रम कहा गया। हेराल्ड सन की रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं की योजना इस दूध को क्रीम में बदलने से पहले उसके प्रभाव और सुरक्षा का परीक्षण करना है। यह क्रीम महिलाओं को पुरुषों पर विश्वास किए बिना यौन संबंध बनाने के दौरान विषाणुओं से बचा सकती है ।

अब ब्लड इंफेक्शन का पता लगाएगा ये टैस्टनई दिल्ली:दिल्ली सरकार जनवरी 2013 से राजधानी के सरकारी ब्लड बैंकों में ब्लड का सब...
25/10/2012

अब ब्लड इंफेक्शन का पता लगाएगा ये टैस्ट




नई दिल्ली:दिल्ली सरकार जनवरी 2013 से राजधानी के सरकारी ब्लड बैंकों में ब्लड का सबसे आधुनिक टेस्ट न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (एनएटी) शुरू करने जा रही है। माना जा रहा है कि दिल्ली देश का पहला ऐसा राज्य होगा जो सरकारी ब्लड बैंकों में यह टेस्ट शुरू करेगा। देश के कुछ जाने-माने अस्पतालों में ही इस टेस्ट की सुविधा है। अभी केवल ब्लड डोनर का ही टेस्ट किया जाता है। लिहाजा कई बार ब्लड में आए इन्फेक्शन का पता नहीं चल पाता। लिहाजा डोनर के ब्लड देने के बाद ब्लड बैंक में जमा खून के सैंपल लेकर उनका नैट टेस्ट किया जाएगा।

इस टेस्ट में एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी तीन वायरसों का टेस्ट होगा। ये टेस्ट करने के बाद ही ब्लड बैंक में खून रखा जाएगा। इस टेस्ट में ब्लड के अंदर मौजूद किसी भी इन्फेक्शन का पता लगाया जा सकेगा। दिल्ली के हेल्थ मिनिस्टर डॉ. अशोक कुमार वालिया के मुताबिक इस टेस्ट का काम फाइनल स्टेज में है। इस तरह की तैयारियां की जा रही हैं कि जनवरी, 2013 तक राजधानी के 10 सरकारी ब्लड बैंकों में इस टेस्ट को पूरी तरह से लागू कर दिया जाए। बाद में सभी ब्लड बैंकों में यह टेस्ट शुरू करने की प्लानिंग है।

राजधानी में इस समय 53 ब्लड बैंक हैं। इनमें से 39 प्राइवेट व 14 सरकारी ब्लड बैंक हैं। राजधानी में सालाना 4.5 लाख यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है। इन सभी ब्लड बैंकों को एक आधुनिक लैब से आईटी के जरिए जोड़ा जाएगा। लैब लोक नायक जय प्रकाश अस्पताल में बनाई जाएगी। इस लैब में हर साल 1 लाख 25 हजार के करीब ब्लड बैंकों से आए सैंपलों की जांच की जाएगी। चूंकि लैब सीधे ब्लड बैंकों से वेब के जरिए जुड़ी होगी लिहाजा टेस्ट की रिपोर्ट तत्काल ब्लड बैंकों को ऑनलाइन दी जाएगी।

दिल्ली स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल के डायरेक्टर डॉ. भरत सिंह के मुताबिक अभी राजधानी में एलिजा (ईएलआईएसए) टेस्ट होता है। इसमें भी एचआईवी और हेपेटाइटिस बी और सी का टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट के जरिए ऐंटि बॉडी का पता लगाया जाता है। इनका पता लगाने में 20 से 30 दिन का समय लग जाता है, लेकिन नैट टेस्ट में 5 दिन के अंदर ही इन्फेक्शन का पता लगाया जा सकता है। हेल्थ डिपार्टमेंट के मुताबिक लैब को ऑपरेट करने का काम एक प्राइवेट एजेंसी को दिया जाएगा। प्राइवेट एजेंसी का कांट्रेक्ट हर 5 साल में बदला जाएगा। इसी साल नवंबर के महीने से इसके लिए टेंडरिंग का काम शुरू हो जाएगा। दिसंबर तक सब कुछ फाइनल करके जनवरी, 2013 तक ब्लड की नैट टेस्टिंग शुरू हो जाएगी।

लंदन: वैज्ञानिकों के नए अध्ययन के मुताबिक रोज व्यायाम करने वाली महिलाओं को मेंस शुरू होने से एक सप्ताह पहले एक्सरसाइज कम...
25/10/2012

लंदन: वैज्ञानिकों के नए अध्ययन के मुताबिक रोज व्यायाम करने वाली महिलाओं को मेंस शुरू होने से एक सप्ताह पहले एक्सरसाइज कम अथवा बंद कर देना चाहिए क्योंकि इस दौरान घुटने में जख्म होने का खतरा बढ़ जाता है।

ऑस्टिन के टेक्सास विश्वविद्यालय और नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि महिलाओं के घुटनों का नर्व फाइबर उनके मेंस से करीब एक सप्ताह पहले अर्थात तीसरे सप्ताह में सबसे ज्यादा कमजोर होता है।

‘डेली मेल’ की खबर के मुताबिक़, उनका कहना है कि नर्व फाइबर में आयी यह कमजोरी जोड़ों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है और इससे ज्यादा खराब जख्म भी हो सकते हैं। खेल की दुनिया में पुरूषों से ज्यादा महिलाओं में घुटनों की परेशानी आती हैं विशेष तौर पर फुटबॉल जैसे खेलों में जिनमें घुटनों को मोडऩे और ज्यादा घुमाने की जरूरत होती है।

अनुसंधानकर्ता यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यह परेशानी किसी हार्मोन से संबंधित तो नहीं है। इसके लिए वे 19 से 35 वर्ष उम्र की महिलाओं के साथ काम कर रहे हैं। महिलाओं में अंडाणु का निर्माण शुरू होने के समय का सही आंकलन करना बहुत आसान है और उसे महज शरीर के तापमान के जरिए पता किया जा सकता है । अंडाणु के निर्माण के दौरान महिला के शरीर का तापमान बढ़ जाता है और नए चक्र के आरंभ से पहले उसमें अचानक कमी आती है।

मेंस (मासिक चक्र) के दौरान हार्मोन के स्तर में भी बदलाव आता है । मेंस शुरू होने से पहले वाले सप्ताह में प्रोजेस्टेरॉन और एस्ट्रोजेन के स्तरों में काफी गिरावट आ जाती है।

वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि मासिक धर्म शुरू होने से ठीक पहले वाले सप्ताह, खासतौर पर तीसरे सप्ताह में घुटनों के नर्व फाइबर सबसे कमजोर होते हैं और उनके टूटने की संभावना बहुत ज्यादा होती है।

इस अनुसंधान के परिणामों को कोलोराडो में आयोजित 'इंटेग्रेटिव बायोलॉजी ऑफ एक्सरसाइज' सम्मेलन में दिखाया गया

कोलोरेक्टल कैंसर के 100 नये मामले, टार्गेट थेरेपी से मरीजों का इलाज संभवकोलोरेक्टल कैंसर जिसे आमतौर पर बड़ी आंत का कैंसर...
25/10/2012

कोलोरेक्टल कैंसर के 100 नये मामले, टार्गेट थेरेपी से मरीजों का इलाज संभव



कोलोरेक्टल कैंसर जिसे आमतौर पर बड़ी आंत का कैंसर भी कहते है। ये कैंसर बडी आंत (कोलन) में या फिर रेक्टम में होता है। शुरूआत में इसके लक्षणों में कमजोरी, थकान, सांस लेने में तकलीफ, आंतों में परेशानी, दस्त या कब्ज की समस्या, मल में लाल या गहरा रक्त आना, वजन सामान्य से कम होना, पेट दर्द, ऐंठन या सूजन शामिल है। वैसे तो कोलोरेक्टल कैंसर होने के कई कारण है लेकिन आज की अनियमित जीवनशैली और खाने की आदतें इसके होने की मुख्य वजह है।

ज्यादा रेड मीट (5 आउसं से ज्यादा प्रतिदिन ), धूम्रपान, खानपान में फल और सब्जियों को कम शामिल करना, फाइबर युक्त आहार न लेने जैसे कई कारक कोलोरेक्टल कैंसर को बढ़ा रहे है।

कोलोरक्टेल कैंसर का टयूमर 4 चरणों से गुजरता है। जिसमें ये बाउल की अदंरूनी लाइनिगं में शुरू होता है और अगर समय पर इलाज न किया जाये तो ये कोलन के मसल वॉल से होते हुये लिम्फ नोडस तक चला जाता है। और आखिरी स्टेज में यें रक्त में मिलकर दूसरे अंगो जैसे कि फेफेड़ो, लीवर में फैल जाता है और इस स्टेज को मटेास्टेटक कोलोरेक्टल कैंसर (एम सीआरसी) कहते है। जितनी जल्दी कैंसर की पहचान हो जायें उतना ही उपचार आसान हो जाता है।

अगर कैंसर का पहले ही स्टोज में पता चल जाये तो 90 प्रतिशत तक इसका उपचार संभव है और दूसरे स्टेज में 70-80 प्रतिशत तक, तीसरे स्टेज में 50-60 प्रतिशत आरै चौथे स्टजे में 30-50 प्रतिशत तक सभंवना होती है। लेकिन भारत में लोगों को इस कैंसर के बारें में जानकारी बहुत कम है जिसके कारण कैंसर के शुरूआत में ही इसका पता चलना काफी मुश्किल हो जाता है।

हालंकि दवाइयों के नये प्रयागों के साथ मरीज की जरूरत आरै बीमारी को देखाते हुए कैंसर के नये इलाज ढुंढे जा रहे है। जिसमें व्यक्तिगत रूप से मरीज के कैंसर के जैविक लक्षणों की पहचान की जाती है और फिर उसी के अनुसार इलाज की थेरेपी इस्तेमाल की जाती है और इस तरह की व्यक्तिगत पद्वति कोलेकर विशेषज्ञ भी एकमत है कि इससे भविष्य में कैंसर के इलाज को नई दिशा मिलेगी।

नई दिल्ली स्थित सर गगंराम अस्पताल के सीनियर कंस्लटेंट और मेडिकल कॉलेज के चेयरपर्सन डा. श्याम अग्रवाल के मुताबिक, टार्गेट थेरेपी में बॉयामेककर टेस्टिंग जैसे कि ओरएएस का भविष्य बहुत अच्छा है क्योकि इसमें केवल कैसंर प्रभावित कोशिकाओं का इलाज किया जाता है जो बहुत बहे तरीन तरीका है जबकि पारपं रिक थेरेपियों में उन सभी की शंकाओं को नष्ट कर दिया जाता है जो तेजी से बढ़ती है। पारम्परिक कैं सर इलाज में कीमोथेरेपी दवाइयों के जरिये शरीर से उन सभी शंकाओं को खत्म किया जाता है जो तेजी से विभाजित हो रही होती है।

कीमोथेरेपी दवाइयां सामान्य कोशिकाओं और कैंसर की शंकाओं में अतंर नहीं कर पाती इसलिए इसके कई साइड इफैक्टस देखने को मिलते है। इसके विपरीत टार्गेट थेरेपी में टयूमर कोशिकाओं को टार्गेट करके उन्हें खत्म किया जाता है। 8 टार्गेट थेरेपी में व्यक्तिगत रूप से बॉयामे वर्कर के जरिये मरीज की पहचान कर उसे दवाइयां दी जाती है। इससे दवाइयां काफी प्रभावकारी काम करती है। ब्रेस्ट कैंसर, कोलोरक्ेटल कैसंर, फेफेडों के कैंसर जैसी बीमारियों में टार्गेट थेरेपी काफी कारगर साबित हुई है।

डा.अग्रवाल के मुताबिक, जिन मरीजों को कोलोरक्टल कैंसर के साथ के आर ए एस जीन युटटिड होते है उनमें टार्गेट थेरेपी काम नहीं करती। इसलिये इी जी एफ आर पॉजिटव मरीजों की के आर ए एस जीन का भी टेस्ट किया जाना चाहिये ताकि ये पता चल सकें कि इ जी एफ आर ब्लॉकर काम करेंगे या नही। काले न कैंसर में के आर ए एस जीन के टेस्ट सेे कंसै र का इलाज जीन पर आधारित हो जायेगा जिससे मरीज का उसी के अनुकलू इलाज करने में मदद मिलगी और इससेे मरीज का व्यक्तिगत रूप से कैंसर का इलाज सभंव हो पायगा।

टार्गेट थेरपी में मरीज को चुनना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। 50 से 70 प्रतिशत कालोरक्टल कैंसर में के आर ए एस जीन की म्यटू श्न नही होता है। ऐसे मरीजों में ई जी एफ आर ब्लाकॅर इलाज अच्छी प्रतिक्रिया दिखाते है। अगर इलाज से पहले के आर ए एस की जाचं कर ली जाय तो यें पता चल जायेगा कि टार्गेट थेरेपी कितनी सफल रहेगी। टार्गेट थेरपी अकेले या पारंपरिक थेरेपियों का मिश्रण कैंसर के इलाज में उभरकर आ रहा है। इस तरह की टार्गेट थेरेपी ज्यादा प्रभावी होने के साथ कम साइड इफैक्स और मरीज का जीवन सुनिश्चित करती है।

जीन टेस्ट करने से कैसंर का इलाज सही मायनें में व्यक्तिगत रूप से होता है। डा. अग्रवाल का कहना है, ऐसा समय जल्द ही आने वाला है जब हम टार्गेट थेरेपी को मौलिक इलाज के तौर तरीकों में शामिल करेंगे अनुवांशिक टेस्ट करने से कैंसर जैसे रागे का इलाज करने में टार्गेट थेरपी मे और अधिक मदद मिलेगी।

http://www.youtube.com/watch?v=a17SaWJwBVM
10/10/2012

http://www.youtube.com/watch?v=a17SaWJwBVM

Inside look after a laboratory sample is collected and processed within the Department of Pathology and Laboratory Medicine, Clinical Chemistry Division of C...

10/10/2012
lab
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02/10/2012

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