16/06/2020
ात_करें
"डिप्रेशन जैसे मुद्दे पर बात करने से डिप्रेशन नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे हार्ट अटैक के बारे में बात करने से हार्ट फेल नहीं होता।
अगर बात करने से डिप्रेशन होता तो अब तक सारे साइकियाट्रिस्ट डिप्रेशन के शिकार हो गए होते।
हम लोग रोज बात करतें हैं ऐसे लोगों से, यकीन मानिए बहुत अच्छा लगता है मरीज के दुख को बांटकर, उसके चेहरे पर एक हंसी देखकर, और उसे अच्छा होता देखकर। उसके घर वालों की खुशी देखकर। जो बातें वो घर वालों या समाज को नहीं बता पाते वो हम सुनते हैं, उन्हें दिलासा देते हैं, उन्हें उस समस्या से निकलने में साथ देते हैं, बहुत अच्छा लगता है , ये एक फीलिंग है जिसे हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं बयां नहीं।
जब एक मानसिक रोग से ग्रस्त मरीज सही होता है तो सिर्फ एक मरीज ही नहीं सही होता!
सही हो जाती हैं उसकी उम्मीदें,
फिर से जाग उठते हैं उसके सपने, जिन्हें उसे पूरा करना था!
सही हो जाते हैं उसके परिवार वाले उसके बीबी उसके बच्चे! सही हो जाती है उसकी बूढ़ी मां...
जोश और हौसला वापस आ जाता है उसके बूढ़े बाप का जिसके झुके कंधे अब थोड़े स्थिर हो जाते हैं.. और क्यों ना हो उनका बेटा जो सही हो गया उन्हें संभालने को उसकी उम्मीदों का दीपक फिर से जलने लगा है।
किसी की मां सही हो कर वापस आ गई है,अब उस गोदी में उसका लाडला खेल पाएगा जो तरस गया था उसके प्यार को। उसे क्या पता था मां क्यों बदल गई थी क्यों उसे प्यार नहीं कर रही थी कुछ दिनों से।
खैर वो तो बच्चा है, हम आप कितना समझ पाएं हैं इसे।
अरे वो पागल है, अरे वो मेंटल है, ये साइको है,अरे वो खिसक गई है ये सब अलंकार दिए हैं हमारे समाज ने इन लोगों को। यही वजह है लोग आगे आकर बात करने से कतराते हैं, उनको अंदर ही अंदर घुटना ज्यादा सही लगता है। क्युकी उन्हें पता है ये लोग तैयार बैठें हैं उनके स्वागत में।
तो बताना ये था कि इन मुद्दों पर बात करने से अगर कुछ आती है,तो वो है समझ मानसिक स्वास्थ्य को और करीब से जानने की और समझने की, जिससे जब हमारा कोई अपना डिप्रेशन या किसी और मानसिक बीमारी में हो तो हम उसकी टाइम पर पहचान कर पाएं, उसे समझ पाएं, उससे बात कर पाएं, उसकी हेल्प कर पाएं। उसे अपने से अचानक दूर जाने से बचा पाएं।
आखिर हम कब तक ऐसे मुद्दों पर बात करने से कतराते रहेंगे क्यों स्वीकार नहीं कर रहें हैं हम? असल में हम सब स्वीकार ही नहीं करना चाहते। हम अगर कुछ जानते हैं तो वो इन लोगों का मजाक बनाना।
बनाइए मजाक लेकिन वो मजाक आपका भी बन सकता है जब किसी दिन आपका कोई अपना या आप खुद जब इसके शिकार होंगे। क्युकी ये बीमारियां जाति,धर्म, अमीर या गरीब, सफल या असफल नहीं देखती किसी को भी हो सकती है, कहीं कम तो कहीं ज्यादा, इसका दायरा बहुत बड़ा है।
और हां मौत का कोई बंटवार नहीं होता है, चाहे सेप्सिस से मरे, चाहे डायबिटीज से चाहे रोड एक्सिडेंट या फिर डिप्रेशन की वजह से सुसाइड करे.... इंसान मरा ही माना जायेगा, वापस नहीं आएगा.....
सुशांत सिंह राजपूत ने सुसाइड किया था, अब उनके डिप्रेशन की वजह वंशवाद, भाई भतीजावाद, चोटी पर पहुंचने की महत्वाकांक्षा या चाहे जो भी हो लेकिन जो भी था, उस स्ट्रेस ने डिप्रेशन को जन्म दिया और डिप्रेशन ने सुसाइड को.... अब वो वापस तो नहीं आएंगे लेकिन एक बात तो है कि उस बन्दे ने हम सबको मेंटल हेल्थ पर एक लम्बी बहस के लिए छोड़ दिया है, समय है इसकी गंभीरता को समझने का.......~क्रमशः 🙏
Dr. Jamshed Ahmad, MD ✍️ (Neuropsychiatrist)