Ashok Bhaiya

Ashok Bhaiya अपनी किसी भी परसनल समस्याओं के निश्चि?

09/05/2025

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09/05/2025
18/04/2025

शुरू से ही लेखन के प्रति झुकाव होने के कारण कुछ अखबारों और

पत्रिकाओं में मैं छपने लगा था. फिर उन्हीं दिनों सन 1985 में ही मैं,

बॉम्बे फिल्म राइटर्स एसोसिएशन में अपने मेम्बरशिप की रजिस्ट्रेशन

करा लिया था.

मुझे वहां का आई कार्ड भी मिल गया था. मेरी कई फिल्म स्टोरी और गीत

वहां रजिस्टर्ड हुआ. जो भी लिखता पंजीयन के लिए भेज देता था. किन्तु

बॉम्बे जाने के लिए मेरे पास कई समस्याएं थी. बाद में तो मेरी सदस्यता

भी एक्सपायर हो गयी. फिर कई बार रिनिवल करने की सोंचा, पर नहीं हो

पाया और मैं उधर से निराश हो गया. परन्तु हाल ही में 6-7 साल पहले

बलिया के निवासी सच्चिदान्द पांडेय से मेरी मुलाक़ात हुयी. पांडेय जी की

स्टोरी पर एक भोजपुरी फिल्म * कब ले आयी बहार * बनकर प्रदर्शित हो

चुकी है. * बकलोल दुलहा * में उनके कुछ गीत है. अतः उनकी संगत मुझे

काफी अच्छा लगा. बात और व्यवहार से तो काफी मधुर रहे. परन्तु किसी

की आंतरिक भाव को समझना कठिन होता है. एक बार वो बॉम्बे जा रहे थे.

अचानक मुझे याद आया तो मैंने कह दिया. भैया, आप बॉम्बे जा ही रहे हैं

तो मेरा वहां राइटर्स एसोशिएशन की मेम्बरशिप का रिनिवल कराना है,

करा देंगे. बोले वो. कार्ड है, दिखाओ. मैंने उन्हें कार्ड थमा दिया. जब वो मेरे

कार्ड की सदस्यता संख्या देखे तो भौचक्के रह गए. बोले - अरे भाई आप तो

हमसे भी सीनियर निकले. सन १९८५ के रजिस्टर्ड हो आप. कार्ड रख लेता

हूँ और दो ढाई हजार रुपये दे दो. जो लगेगा समझ लेंगे. और मैंने ढाई

हजार रुपये और कार्ड उन्हें दे दिया. फिर कई बार बलिया आये गए, मगर

मेरे रिनिवल का कोई जिक्र नहीं. उलटे मुझे ही याद दिलाना पड़ता कि.

भैया मेरे रिनिवल का क्या हुआ ? फिर क्या......... कोई न कोई बहाना

सुना देते. बहुत बाद में उनके ही एक मित्र द्वारा पता चला....... मेरा कार्ड

भी अब नहीं देंगे और रिनिवल भी नहीं हो सकेगा. मैंने कहा, क्यों ? पांडेय

जी आजकल लाईट में हैं, और वो ये नहीं चाहते कि, बलिया में उनके

आलावा कोई और सीनियर फिल्म राइटर हो. बस इतनी सी बात है. आप

समझ सकते हैं. लोगों की जिंदगी में कितनी द्वेषता और दुर्गन्ध है. आप

किसी कार्यक्षेत्र में संघर्ष में जुटे हैं और सफलता की टावर पर चढ़ ही रहे हैं,

तो धक्के देकर नीचे पहुंचाने के लिए कई ऐसे मिलेंगे जो अवसर मिलते ही

पूरा टावर ही धरासाई कर देंगे. लेकिन ऐसे लोग खुद कभी भी सुकून की

जिंदगी नहीं जीते. जब तक चल रहा है, लाईट में होते हैं ................. जैसे

ही अँधेरे का आगमन होता है, वो हमेशा के लिए गुमनाम हो जाते हैं.
.................. आजकल पांडेय जी का कहीं कोई पता नहीं है. मुझे उम्मीद

है, शीघ्र ही वो मुझे फटेहाल में मिलेंगे कहीं.

- अशोक भैया 9565120423

18/04/2025

जिन दिनों मैं ऋषिकेश में था तो

वहां से मुझे पटियाला (पंजाब) किसी मज़बूरी में जाना पड़ा था.

मैं हरिद्वार आकर शाम की गाड़ी, श्री गंगानगर एक्सप्रेस पकड़ लिया

और रात करीब 10 बजे पटियाला पहुँच गया. मैं उतरा स्टेशन पर उतरा.

सर्दी का तेज मौसम था. कुहांसा इतना अधिक की 10 कदम दूर के बाद

कुछ नहीं दिख रहा था. पहली बार देखा पटियाला का रेलवे स्टेशन,

लगा ये अंग्रेजों का किला है. मैं स्टेशन में एक ब्रेंच पर बैठ गया,

क्योंकि मुझे कोई लेने आ रहा था. इधर पूरे हाल में कुल 10-12 ही यात्री

दुबके हुए पड़े थे. मुझे उन लोगों की भाषा समझ में नहीं आ रही थी.

मुझे भी कोई नहीं समझ रहा था. मैं काफी टेंशन में टिकट खिड़की के पास

आकर टाइम पास करने लगा, तभी मेरे फोन की घंटी बजी. मैंने हेलो बोला-

तो उधर पूछा गया. - अशोक भाई, कहाँ हो तुम ? मैंने कहा, - यही टिकट

खिड़की के पास. उधर से, - ठीक है, वही रहना मैं पहुँच रहा हूँ 5 मिनट में.

मैंने ठीक है बोलकर, फोन काट दिया. लेकिन खुद मेरी समझ में नहीं आ रहा था,

कौन है ये आदमी ? क्योंकि ऋषिकेश में ही, किसी जान पहचान वाले ने

कहा था, अशोक भाई, वो आदमी आपको जानता है. जाओ वहां, तुम्हारे

लिए वो जगह सही है. मैं सोंच ही रहा था कि, तभी फोन फिर बजा........... -

अशोक भाई आ जाओ. मैंने पूछा - कहा आ जाऊं ? आवाज - अरे इधर

बाहर स्कूटर पर देखो. मैंने बाहर देखा तो स्कूटर पर कोई साधू-संत

जैसा हठा-कठा आदमी मुझे अपनी तरफ आने का इशारा कर रहा था.

अब तो साढ़े ग्यारह बज गए थे और ठण्ड भी बढ़ती जा रही थी और भूख

भी लग रही थी, किन्तु उलझन की वजह से ठण्ड और भूख पर कंट्रोल हो

गया था. स्कूटर के पास गया, वो मुझे बैठने को बोले. मैं बैठ गया. और

स्कूटर कुहरे को चीरते हुए मंजिल की ओर फटफटाता चला जा रहा था.

शायद 8-10 मिनट बाद, हम लोग एक शिव मंदिर पर रुक गए और साधु

जी हमें लेकर अंदर अपनी पर्सनल कुटिया में पहुँचते ही बोले,

- और सुनाओ अशोक भाई, कैसे हो. मैंने कहा, ठीक हूँ. मैं ऋषिकेश में था

तो वो......... अभी मैं बात पूरी ही कर रहा था तो देखा, संत जी अपने सीर

पे बालों का जटा-जुटा टोपी की तरह उतारकर बगल में रख दिए. और जब

मैंने गौर से उन्हें देखा तो हैरान होकर बोल ही दिया. - अरे भाई शिवानंद
..... यहाँ मंदिर में क्या कर रहे हो ? और ये सब क्या है ? ये बालों की टोपी ?

वो बोले - भाई, कोई क्या करे. भूख मिटाना है, पैसे बनाने है, तो भेष

बदलना ही पड़ता है. मैं तो कहूंगा. छोडो अपना यू पी, और बन जाओ यहाँ सूफी.

मैं सारा इंतजाम कर दूंगा. मैं कैसे बताऊँ कि, वो पल मेरे लिए कितनी

हैरानियत भरी थी. क्योंकि वो संत मेरे साथ स्कूल के क्लासमेट

थे. तभी उनके चेले, भोजन पानी का इंतजाम करने में लग गए. हम लोग

भोजन करने लगे. खैर.....खाना खाते में ही बोले- खाना खाकर सो जाना,

सुबह बात करते हैं. मैं भोजन करके चेलो द्वारा बताये हुए स्थान पर सो

गया. और सुबह ........... सुबह उजाला होते ही मैं सीधे पटियाला रेलवे

स्टेशन पर पहुँच गया, ताकि हरिद्वार के लिए कोई ट्रेन मिल सके.

(तो ये है जिंदगी की अनेक घटनाओं में एक दिलचस्प घटना).

- अशोक भैया 9565120423

23/03/2025

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