Ask for ayurved

Ask for ayurved page for home remedies, health tips and paid consultation.
(570)

सुखासन (Sukhasana) में बैठकर भोजन करना केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह लंबी उम्र और बेहतरीन स्वास्थ्य का एक अचूक मंत्र ...
05/01/2026

सुखासन (Sukhasana) में बैठकर भोजन करना केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह लंबी उम्र और बेहतरीन स्वास्थ्य का एक अचूक मंत्र है। जब हम जमीन पर पालथी मारकर बैठते हैं, तो यह हमारे शरीर और मन पर कई सकारात्मक प्रभाव डालता है।

सुखासन में बैठकर खाने के स्वास्थ्य लाभ:
1. हृदय स्वास्थ्य और दीर्घायु: जब हम जमीन पर बैठते हैं, तो हमारे हृदय को शरीर के निचले हिस्से में रक्त पंप करने के लिए कम मेहनत करनी पड़ती है। इससे दिल पर दबाव कम होता है और वह लंबे समय तक स्वस्थ रहता है। साथ ही, बिना किसी सहारे के जमीन पर बैठने और उठने की क्षमता को वैज्ञानिक रूप से लंबी उम्र का संकेत (Longevity Indicator) माना गया है।

2. पाचन में सुधार (जठराग्नि): सुखासन में बैठने से पेट के क्षेत्र में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे पाचन तंत्र के अंग सक्रिय हो जाते हैं। भोजन के लिए आगे झुकने और फिर सीधा होने की क्रिया से पेट की मांसपेशियां सक्रिय रहती हैं, जिससे 'जठराग्नि' प्रज्वलित होती है और भोजन आसानी से पच जाता है।

3. वजन नियंत्रण और मोटापा: बैठकर खाने से 'वेगस नर्व' मस्तिष्क को सही समय पर तृप्ति का संकेत भेजती है। इससे आप जरूरत से ज्यादा खाने (Overeating) से बच जाते हैं। सही पाचन और नियंत्रित आहार सीधे तौर पर वजन कम रखने और मेटाबॉलिज्म को सुधारने में मदद करते हैं।

4. जोड़ों का लचीलापन और रीढ़ की हड्डी: सुखासन में बैठने से घुटनों, कूल्हों और टखनों का व्यायाम होता है। यह रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने में मदद करता है, जिससे शरीर का पोस्चर (Posture) सुधरता है और बुढ़ापे में होने वाली जोड़ों की समस्याओं का खतरा कम हो जाता है।

5. मानसिक शांति: यह आसन मन को शांत और एकाग्र करता है। शांत मन से किया गया भोजन शरीर को अधिक पोषण देता है और तनाव संबंधी बीमारियों को दूर रखता है।

निष्कर्ष: सुखासन में बैठकर भोजन करना एक संपूर्ण स्वास्थ्य पैकेज है। यह न केवल हमारे शरीर को बीमारियों से बचाता है, बल्कि हमें एक अनुशासित और लंबी जीवनशैली की ओर ले जाता है।

Hashtags:


क्या आप जानना चाहेंगे कि सुखासन में बैठने का सही तरीका क्या है जिससे घुटनों पर दबाव न पड़े?

हल्दी वाला दूध: इम्युनिटी बढ़ाने वाला प्राकृतिक कवचहल्दी और दूध का मेल केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक चिकित्सा ...
05/01/2026

हल्दी वाला दूध: इम्युनिटी बढ़ाने वाला प्राकृतिक कवच
हल्दी और दूध का मेल केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है। हल्दी में मौजूद सक्रिय तत्व 'करक्यूमिन' (Curcumin) इसे एक जादुई मसाला बनाता है। जब इसे गर्म दूध के साथ मिलाया जाता है, तो इसके स्वास्थ्य लाभ कई गुना बढ़ जाते हैं।

यह इम्युनिटी को कैसे बढ़ाता है?
1. एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल गुण: हल्दी में शक्तिशाली एंटी-सेप्टिक और एंटी-माइक्रोबियल गुण होते हैं। यह शरीर में प्रवेश करने वाले हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने के लिए सफेद रक्त कोशिकाओं (WBC) की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।

2. सूजन को कम करना (Anti-inflammatory): शरीर में पुरानी सूजन इम्युनिटी को कमजोर करती है। हल्दी वाला दूध शरीर की आंतरिक सूजन को कम करता है, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) बाहरी संक्रमणों से लड़ने के लिए अधिक ऊर्जा केंद्रित कर पाती है।

3. प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट: यह पेय एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है, जो 'फ्री रेडिकल्स' से कोशिकाओं को होने वाले नुकसान को रोकता है। यह कोशिकाओं को स्वस्थ रखकर समय से पहले बूढ़ा होने और बीमारियों से बचाने में मदद करता है।

4. श्वसन तंत्र की सुरक्षा: हल्दी वाला दूध गले की खराश, सर्दी-खांसी और फेफड़ों के संक्रमण में तुरंत राहत देता है। यह छाती में जमा कफ को बाहर निकालने में मदद करता है और श्वसन मार्ग को साफ रखता है।

बनाने का सही तरीका और नियम:
दूध और हल्दी का अनुपात: एक गिलास दूध में आधा छोटा चम्मच शुद्ध हल्दी पाउडर मिलाएं। इसे कम से कम 5-7 मिनट तक हल्की आंच पर उबालें ताकि हल्दी दूध में पूरी तरह रच-बस जाए।

काली मिर्च का जादू: हल्दी के 'करक्यूमिन' को शरीर तभी सोख पाता है जब उसके साथ चुटकी भर काली मिर्च डाली जाए। काली मिर्च हल्दी के अवशोषण को 2000% तक बढ़ा देती है।

मिठास के लिए: चीनी के बजाय इसमें शहद या गुड़ का प्रयोग करें (दूध थोड़ा ठंडा होने पर)।

सेवन का सही समय:
रात को सोने से पहले इसका सेवन सबसे अधिक प्रभावी माना जाता है। यह न केवल इम्युनिटी बढ़ाता है, बल्कि शरीर की अंदरूनी मरम्मत (Internal Healing) भी करता है और बेहतर नींद में सहायक होता है।

निष्कर्ष: बदलते मौसम और संक्रमण के दौर में हल्दी वाला दूध आपके परिवार के लिए एक सुरक्षित सुरक्षा कवच है। इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाकर आप कई बीमारियों से दूर रह सकते हैं।

Hashtags:

दिन भर तांबे का पानी पीना क्यों गलत है?1. कॉपर टॉक्सिसिटी (तांबे की विषाक्तता): हमारा शरीर तांबे को बहुत ही सूक्ष्म मात्...
05/01/2026

दिन भर तांबे का पानी पीना क्यों गलत है?
1. कॉपर टॉक्सिसिटी (तांबे की विषाक्तता): हमारा शरीर तांबे को बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में ग्रहण करने के लिए बना है। जब हम पूरा दिन केवल तांबे के बर्तन में रखा पानी पीते हैं, तो शरीर में तांबे का स्तर सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाता है। इसे 'कॉपर टॉक्सिसिटी' कहते हैं, जिसके कारण जी मिचलाना, उल्टी, दस्त और पेट में तेज दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

2. लिवर और किडनी पर दबाव: रक्त में तांबे की अधिक मात्रा को छानने का काम लिवर और किडनी को करना पड़ता है। यदि शरीर में तांबा लगातार बढ़ता रहे, तो यह इन महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है और इनकी कार्यक्षमता को धीमा कर सकता है।

3. इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन: लगातार क्षारीय (Alkaline) पानी पीने से पेट के प्राकृतिक अम्लीय वातावरण (Acidic Environment) में बाधा आ सकती है, जो भोजन को पचाने के लिए आवश्यक है।

2 गिलास ही क्यों पर्याप्त हैं?
आयुर्वेद के अनुसार, तांबे के पानी का सर्वोत्तम लाभ 'उषापान' (सुबह खाली पेट पीना) में है। रात भर तांबे के पात्र में रखे पानी के दो गिलास (लगभग 500-600 मिली) सुबह खाली पेट पीना शरीर को डिटॉक्स करने और वात-पित्त-कफ को संतुलित करने के लिए पर्याप्त है। इसके बाद दिन भर सामान्य मिट्टी के घड़े या स्टील के बर्तन का पानी पीना चाहिए।

सेवन के नियम:
अंतराल: लगातार 3 महीने तक तांबे का पानी पीने के बाद कम से कम 1 महीने का ब्रेक लेना चाहिए ताकि शरीर अतिरिक्त तांबे को बाहर निकाल सके।

समय: सुबह का समय सबसे श्रेष्ठ है, दिन भर इसका सेवन वर्जित रखें।

निष्कर्ष: तांबा एक शक्तिशाली धातु है, इसे औषधि की तरह उपयोग करें, साधारण पानी की तरह नहीं। संतुलन ही अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है।

Hashtags:


क्या आप जानना चाहेंगे कि तांबे के बर्तन में रखे पानी की शुद्धता को घर पर कैसे जांचा जा सकता है?

05/01/2026

05/01/2026

05/01/2026

खड़े होकर भोजन करना न केवल पाचन तंत्र को बिगाड़ता है, बल्कि यह वात दोष (Vata Dosha) को असंतुलित करके जोड़ों के दर्द का ए...
04/01/2026

खड़े होकर भोजन करना न केवल पाचन तंत्र को बिगाड़ता है, बल्कि यह वात दोष (Vata Dosha) को असंतुलित करके जोड़ों के दर्द का एक मुख्य कारण भी बनता है।

खड़े होकर खाने से जोड़ों में दर्द और वात रोग क्यों होते हैं?
1. वायु तत्व का असंतुलन: आयुर्वेद के अनुसार, खड़े होकर या चलते-फिरते भोजन करने से शरीर में 'वायु' (Air Element) का प्रवाह अनियंत्रित हो जाता है। जब शरीर स्थिर नहीं होता, तो भोजन के साथ अतिरिक्त हवा पेट में जाती है। यह बढ़ी हुई वायु जोड़ों के बीच के 'सिनोवियल फ्लूइड' (चिकनाई) को सुखाने लगती है, जिससे जोड़ों में जकड़न और दर्द पैदा होता है।

2. तंत्रिका तंत्र पर तनाव (Stress on Nervous System): खड़े होकर भोजन करते समय हमारा शरीर 'फाइट या फ्लाइट' मोड में रहता है। इस तनावपूर्ण स्थिति में शरीर की मांसपेशियां और जोड़ (विशेषकर घुटने और कूल्हे) अकड़ जाते हैं। भोजन से मिलने वाली ऊर्जा जोड़ों को पोषण देने के बजाय उन्हें तनाव देती है, जिससे लंबे समय में गठिया (Arthritis) जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं।

3. इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन: खड़े होकर भोजन करने और पानी पीने से शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बिगड़ जाता है। जब पोषक तत्व और खनिज (जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम) सही ढंग से अवशोषित नहीं होते, तो वे जोड़ों में टॉक्सिन्स (विषाक्त पदार्थों) के रूप में जमा होने लगते हैं। यही संचय वात रोगों का कारण बनता है।

4. घुटनों पर सीधा दबाव: जब हम खड़े होकर कुछ खाते या पीते हैं, तो शरीर का पूरा भार घुटनों और एड़ियों पर होता है। गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से भोजन का दबाव सीधे निचले जोड़ों पर महसूस होता है, जिससे वहां की नसों में सूजन आ सकती है।

बचाव के उपाय:
सुखासन: हमेशा जमीन पर पालथी मारकर बैठें। यह स्थिति वात को शांत करती है।

स्थिरता: भोजन करते समय शरीर का स्थिर होना अनिवार्य है ताकि ऊर्जा केवल पाचन पर केंद्रित रहे।

शांति: मौन रहकर या शांत मन से खाने से वायु का संचार संतुलित रहता है।

निष्कर्ष: खड़े होकर खाना आपकी हड्डियों और जोड़ों की 'जीवनी शक्ति' को क्षीण करता है। यदि आप बुढ़ापे तक जोड़ों के दर्द से बचना चाहते हैं, तो बैठकर भोजन करने के नियम का पालन अवश्य करें।



क्या आप जानना चाहेंगे कि वात रोगों को शांत करने के लिए भोजन के बाद कौन सा विशेष अभ्यास करना चाहिए?

खट्टे फल और दूध: सेहत के लिए एक खतरनाक मेलअक्सर हम फ्रूट क्रीम या स्मूदी के नाम पर दूध और खट्टे फलों का मिश्रण लेते हैं,...
04/01/2026

खट्टे फल और दूध: सेहत के लिए एक खतरनाक मेल
अक्सर हम फ्रूट क्रीम या स्मूदी के नाम पर दूध और खट्टे फलों का मिश्रण लेते हैं, लेकिन यह स्वाद आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है। आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इन दोनों को एक साथ लेने से बचने की सलाह देते हैं।

इसके पीछे के प्रमुख कारण:
1. दूध का फटना (Curdling Process): यह एक सरल वैज्ञानिक तथ्य है कि जब भी दूध में कोई अम्ल (Acid) मिलाया जाता है, तो दूध तुरंत फट जाता है। जब आप संतरा, नींबू, अनानास या कीवी जैसे खट्टे फल खाने के तुरंत बाद दूध पीते हैं, तो यही प्रक्रिया आपके पेट के अंदर होती है। फटा हुआ दूध पाचन तंत्र में भारीपन और बेचैनी पैदा करता है।

2. पाचन संबंधी जटिलताएं: खट्टे फलों में 'सिट्रिक एसिड' और 'विटामिन-सी' की प्रचुरता होती है। जब यह दूध के प्रोटीन (केसीन) के साथ मिलता है, तो पेट में जहरीले यौगिक बन सकते हैं। इससे आपको पेट दर्द, मरोड़, गैस, एसिडिटी और भारी अपच (Indigestion) की समस्या हो सकती है।

3. त्वचा और एलर्जी का खतरा: आयुर्वेद के अनुसार, दूध और खट्टे फलों का मेल शरीर में 'विषाक्त पदार्थों' (Toxins) का निर्माण करता है। ये टॉक्सिन्स रक्त में मिलकर त्वचा तक पहुँचते हैं, जिससे खुजली, चकत्ते, एक्जिमा और लंबे समय में सफेद दाग जैसी गंभीर समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है।

4. कफ और साइनस की समस्या: दूध और खट्टे फलों का गलत मिश्रण शरीर में कफ दोष को बढ़ा सकता है। यदि आप सर्दी-खांसी या साइनस के मरीज हैं, तो यह मेल आपकी समस्या को कई गुना बढ़ा सकता है।

सही तरीका और अंतराल:
नियम: किसी भी खट्टे फल के सेवन और दूध पीने के बीच कम से कम 2 से 3 घंटे का अंतर होना अनिवार्य है।

अपवाद: आयुर्वेद के अनुसार, केवल 'आंवला' एक ऐसा खट्टा फल है जिसे दूध के साथ लिया जा सकता है, क्योंकि इसकी तासीर अन्य खट्टे फलों से अलग होती है।

निष्कर्ष: सेहतमंद रहने के लिए केवल पौष्टिक खाना ही काफी नहीं है, बल्कि सही समय और सही मेल का ज्ञान होना भी जरूरी है। अपने पाचन और त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए दूध और खट्टे फलों को कभी भी एक साथ न मिलाएं।

Hashtags:


क्या आप जानना चाहेंगे कि दूध के साथ किन सब्जियों का सेवन वर्जित माना गया है?

प्रकृति ने हर मौसम की जरूरतों के अनुसार खास फलों की रचना की है। आयुर्वेद में इसे 'ऋतुचर्या' कहा गया है, जिसका अर्थ है मौ...
04/01/2026

प्रकृति ने हर मौसम की जरूरतों के अनुसार खास फलों की रचना की है। आयुर्वेद में इसे 'ऋतुचर्या' कहा गया है, जिसका अर्थ है मौसम के अनुसार खान-पान में बदलाव। आज के समय में 'कोल्ड स्टोरेज' की वजह से हर फल हर मौसम में मिल जाता है, लेकिन बिना मौसम के फल खाना सेहत के लिए फायदेमंद नहीं होता।

मौसमी फल खाने के वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण:
1. शरीर की जरूरतों को पूरा करना: गर्मियों में शरीर को पानी की अधिक जरूरत होती है, इसलिए प्रकृति हमें तरबूज, खरबूजा और आम जैसे फल देती है। सर्दियों में शरीर को इम्युनिटी और विटामिन-सी चाहिए, जिसके लिए संतरा, अमरूद और अंगूर उपलब्ध होते हैं। बिना मौसम के फल खाने से शरीर को वह पोषण नहीं मिलता जिसकी उस समय आवश्यकता होती है।

2. पोषक तत्वों की प्रचुरता: मौसमी फल प्राकृतिक रूप से पेड़ पर पकते हैं, जिससे उनमें विटामिन और मिनरल्स का स्तर उच्चतम होता है। गैर-मौसमी (Off-season) फलों को समय से पहले तोड़कर रसायनों और इंजेक्शन के जरिए पकाया जाता है, जिससे उनकी गुणवत्ता खत्म हो जाती है।

3. कीटनाशकों और रसायनों से बचाव: बेमौसम मिलने वाले फलों को सड़ने से बचाने के लिए उन पर भारी मात्रा में प्रिजर्वेटिव्स और मोम (Wax) का छिड़काव किया जाता है। ये रसायन शरीर में जाकर लिवर और किडनी को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

4. बेहतर पाचन और स्वाद: ताजे और मौसमी फलों का स्वाद लाजवाब होता है और वे आसानी से पच जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, बेमौसम फल खाने से शरीर में 'वात, पित्त और कफ' का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे बीमारियाँ जन्म लेती हैं।

मौसम के अनुसार फलों का चुनाव:
गर्मी: तरबूज, आम, लीची, बेल और जामुन (शरीर को ठंडा रखने के लिए)।

सर्दी: संतरा, अमरूद, सेब, कीवी और पपीता (इम्युनिटी बढ़ाने के लिए)।

मानसून: अनार, नाशपाती और आलूबुखारा (पाचन को सुरक्षित रखने के लिए)।

निष्कर्ष: प्रकृति हमसे बेहतर जानती है कि हमारे शरीर को कब क्या चाहिए। इसलिए महंगे और विदेशी (Imported) फलों के पीछे भागने के बजाय, स्थानीय और मौसमी फलों को प्राथमिकता दें। यह न केवल आपकी जेब के लिए अच्छा है, बल्कि आपकी लंबी उम्र और अच्छी सेहत की चाबी भी है।

Hashtags:


क्या आप जानना चाहेंगे कि गर्मियों में 'बेल का शरबत' पीने के क्या-क्या चमत्कारी फायदे हैं?

आयुर्वेद और रसायन विज्ञान के अनुसार, तांबे के बर्तन में रखे पानी में नींबू या शहद मिलाकर पीना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हा...
04/01/2026

आयुर्वेद और रसायन विज्ञान के अनुसार, तांबे के बर्तन में रखे पानी में नींबू या शहद मिलाकर पीना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकता है। इसके पीछे के वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण निम्नलिखित हैं:

1. घातक रासायनिक प्रतिक्रिया (Chemical Reaction)
तांबा (Copper) एक सक्रिय धातु है। जब हम तांबे के बर्तन में रखे पानी में नींबू (जिसमें साइट्रिक एसिड होता है) मिलाते हैं, तो तांबे और एसिड के बीच एक तीव्र रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। यह प्रतिक्रिया 'कॉपर टॉक्सिसिटी' (तांबे की विषाक्तता) पैदा कर सकती है। यह पानी जहरीला हो जाता है, जिससे मतली, उल्टी, पेट में मरोड़ और गंभीर एसिडिटी हो सकती है।

2. आयुर्वेद का नजरिया
आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि तांबे के पात्र में रखे जल में 'अम्ल' (खट्टा) रस मिलाने से वह 'विरुद्ध आहार' बन जाता है। नींबू की अम्लीय प्रकृति तांबे के औषधीय गुणों को दूषित कर देती है, जिससे वह अमृत के बजाय विष के समान कार्य करने लगता है।

3. लिवर और किडनी पर प्रभाव
यदि तांबे के विषाक्त लवण शरीर के भीतर जाते हैं, तो इनका सबसे बुरा असर लिवर और किडनी पर पड़ता है। लंबे समय तक ऐसा करने से लिवर में सूजन या किडनी की कार्यक्षमता में कमी आ सकती है।

4. शहद के साथ सावधानी
यद्यपि शहद एसिडिक नहीं है, लेकिन तांबे के बर्तन में रखे पानी में शहद मिलाकर पीना भी उचित नहीं माना जाता। तांबे की तासीर और शहद के गुणों के मेल से पाचन संबंधी विकार उत्पन्न हो सकते हैं।

सुरक्षित तरीका क्या है?
अलग बर्तन का प्रयोग करें: तांबे के बर्तन में रखा पानी पहले एक कांच या मिट्टी के गिलास में निकाल लें।

उसके बाद मिलाएं: गिलास में निकालने के बाद ही उसमें नींबू या शहद मिलाएं।

सीधा संपर्क रोकें: नींबू का तांबे की सतह से सीधा संपर्क कभी नहीं होना चाहिए।

Hashtags:


क्या आप जानना चाहेंगे कि तांबे के बर्तन को साफ करने के लिए किन प्राकृतिक चीजों का उपयोग सबसे सुरक्षित है?

भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी पीना एक आम आदत है, लेकिन आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस आदत को स्वास्थ्य के लिए हा...
04/01/2026

भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी पीना एक आम आदत है, लेकिन आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस आदत को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानते हैं। भोजन के पोषक तत्वों का पूरा लाभ उठाने के लिए इस आदत से बचना अनिवार्य है।

यहाँ इसके पीछे के मुख्य वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण दिए गए हैं:

1. पोषक तत्वों के अवशोषण में बाधा (Iron Absorption)
चाय में 'टेनिन' (Tannins) और कॉफी में 'फिनोल्स' (Phenols) पाए जाते हैं। ये तत्व भोजन में मौजूद आयरन (Loha) के साथ चिपक जाते हैं और शरीर को उसे सोखने नहीं देते। यदि आप खाने के तुरंत बाद चाय पीते हैं, तो शरीर भोजन से मिलने वाले आयरन को 50% से 60% तक कम अवशोषित कर पाता है, जिससे एनीमिया (खून की कमी) का खतरा बढ़ जाता है।

2. पाचन क्रिया का धीमा होना (Digestive Agni)
आयुर्वेद के अनुसार, भोजन को पचाने के लिए पेट में 'जठराग्नि' (पाचन अग्नि) प्रज्वलित होती है। चाय या कॉफी की प्रकृति उत्तेजक होती है लेकिन इनका सेवन अग्नि को बाधित कर सकता है। इससे भोजन पेट में सही से पचने के बजाय सड़ने लगता है, जिससे गैस, ब्लोटिंग और एसिडिटी की समस्या होती है।

3. प्रोटीन के अवशोषण पर प्रभाव
अध्ययनों के अनुसार, चाय में मौजूद एसिड भोजन के प्रोटीन के साथ मिलकर उन्हें सख्त बना देता है। इससे प्रोटीन को पचाना हमारे पाचन तंत्र के लिए कठिन हो जाता है, जिससे मांसपेशियों के विकास और शरीर की मरम्मत की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

4. नींद और घबराहट
कॉफी और चाय में मौजूद कैफीन रक्तचाप (Blood Pressure) को बढ़ा सकता है और हृदय की गति को तेज कर सकता है। भोजन के बाद इनका सेवन करने से कई लोगों को बेचैनी या नींद न आने की समस्या भी हो सकती है।

सही समय क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आप चाय या कॉफी के शौकीन हैं, तो भोजन और इनके सेवन के बीच कम से कम 45 से 60 मिनट का अंतर रखें। यह अंतराल शरीर को भोजन से आवश्यक विटामिन और मिनरल्स सोखने का पर्याप्त समय देता है।

सुझाव: भोजन के बाद यदि कुछ पीने की इच्छा हो, तो गुनगुना पानी या छाछ (दोपहर में) एक बेहतर विकल्प हो सकता है।



क्या आप चाहते हैं कि मैं भोजन के बाद किए जाने वाले 'वज्रासन' के लाभों के बारे में भी जानकारी दूँ?

साइकिल चलाना केवल आवागमन का साधन नहीं है, बल्कि यह शरीर के संतुलन (Body Balance) और समन्वय (Coordination) को बेहतर बनाने...
04/01/2026

साइकिल चलाना केवल आवागमन का साधन नहीं है, बल्कि यह शरीर के संतुलन (Body Balance) और समन्वय (Coordination) को बेहतर बनाने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। आयुर्वेद और आधुनिक व्यायाम विज्ञान दोनों ही इसे संपूर्ण शरीर के संतुलन के लिए श्रेष्ठ मानते हैं।

साइकिलिंग और शारीरिक संतुलन का विज्ञान
1. कोर मसल्स (Core Muscles) की मजबूती साइकिल को सीधा रखने के लिए हमारे पेट और पीठ के निचले हिस्से की मांसपेशियों (Core) को निरंतर काम करना पड़ता है। जब आप पैडल मारते हैं और हैंडल संभालते हैं, तो शरीर का केंद्र बिंदु मजबूत होता है। एक मजबूत 'कोर' ही शरीर के बेहतर संतुलन की नींव है।

2. न्यूरोमस्कुलर समन्वय (Neuromuscular Coordination) साइकिल चलाते समय हमारे मस्तिष्क, आंखों और अंगों के बीच एक जटिल तालमेल बनता है। पैरों से पैडल मारना, हाथों से दिशा बदलना और आंखों से रास्ता देखना—यह पूरी प्रक्रिया मस्तिष्क के सेरिबैलम (Cerebellum) को सक्रिय करती है, जो शरीर के संतुलन को नियंत्रित करने वाला मुख्य हिस्सा है।

3. प्रोप्रियोसेप्शन (Proprioception) में सुधार यह शरीर की वह क्षमता है जिससे हमें बिना देखे अपने अंगों की स्थिति का आभास होता है। साइकिलिंग के दौरान ऊबड़-खाबड़ रास्तों और मोड़ों पर शरीर खुद को जिस तरह ढालता है, उससे हमारी 'सेंसरी मैपिंग' बेहतर होती है, जिससे बुढ़ापे में गिरने या असंतुलित होने का खतरा कम हो जाता है।

हड्डियों और जोड़ों का संतुलन
साइकिल चलाने से पैरों की मांसपेशियों, जैसे क्वाड्रिसेप्स (Quadriceps) और हैमस्ट्रिंग्स (Hamstrings) का समान रूप से विकास होता है। जब शरीर के निचले हिस्से की मांसपेशियां संतुलित रूप से मजबूत होती हैं, तो शरीर का पूरा भार जोड़ों पर नहीं पड़ता, जिससे चलते या खड़े होते समय संतुलन बेहतर बना रहता है।

मानसिक संतुलन और एकाग्रता
आयुर्वेद के अनुसार, साइकिल चलाने जैसी लयबद्ध (Rhythmic) गतिविधियां शरीर में 'वात दोष' को संतुलित करने में मदद करती हैं, बशर्ते इसे शांत मन से किया जाए। यह एकाग्रता बढ़ाती है, जिससे मानसिक संतुलन भी सुधरता है।

निष्कर्ष: प्रतिदिन 20-30 मिनट साइकिल चलाना न केवल आपकी शारीरिक बनावट को सुधारेगा, बल्कि यह आपके स्नायु तंत्र (Nervous System) को भी इतना प्रशिक्षित कर देगा कि आप जीवन के हर मोड़ पर अधिक स्थिर और संतुलित महसूस करेंगे।



क्या आप जानना चाहेंगे कि साइकिल चलाने के दौरान शरीर की मुद्रा (Posture) कैसी होनी चाहिए ताकि जोड़ों पर दबाव न पड़े?

Address

Meerut City

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Ask for ayurved posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Share on Facebook Share on Twitter Share on LinkedIn
Share on Pinterest Share on Reddit Share via Email
Share on WhatsApp Share on Instagram Share on Telegram